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एक अनार 23 बीमार

कांग्रेस का भारतीय राजनीति में बहुत लंबे समय तक सत्ता में रहना ही उसके वर्तमान की त्रासदी है। केंद्रीय सत्ता से लेकर राज्यों में कांग्रेस की लिफाफा सरकार का बोलबाला रहा है। सत्ता की प्रतीक बनी देश की ऐतिहासिक पार्टी के साथ ऐसा बहुत बड़ा तबका जुड़ा जिसका कोई जनाधार नहीं था। ये न सिर्फ सत्ता में रहे बल्कि इनके हाथों में कांग्रेस की केंद्रीय कमान भी रही।

congress faction, dissent in congressहाल ही में जम्मू में हुई कांग्रेस के असंतुष्ट गुट की बैठक में मौजूद पार्टी नेता।

जब भाजपा ने जम्मू-कश्मीर में मुफ्ती मोहम्मद सईद की पीडीपी के साथ करार किया था तो कोई राजनीतिक भविष्यवक्ता इस बात का अंदाजा भी नहीं लगा सका था कि इस प्रदेश में कभी सबसे बड़ा राजनीतिक फैसला होगा। कश्मीर में अनुच्छेद-370 का खात्मा भाजपा की बड़ी वैचारिक प्रतिबद्धता में से एक था। किसी भी राजनीतिक दल के लिए विचारधारा अहम होती है। राजनीति के मैदान का कड़वा सच यह है कि आप अपनी विचारधारा की फसल तभी लहलहा सकते हैं, जब आपके हाथ में सत्ता हो और जमीन पर जनता के साथ जुड़ने के लिए ठोस मेहनत। आज कांग्रेस सत्ता में नहीं है तो उसे उन ‘विचारकों‘ का इतिहास भारी पड़ रहा है जो बिना किसी जनाधार के पार्टी से लेकर देश की सत्ता में केंद्रीय कमान रखते आए। ऐन चुनाव से पहले कांग्रेस में रह कर पार्टी का मनोबल तोड़ने वाले उन नेताओं पर बेबाक बोल जिनका कभी जनाधार रहा ही नहीं।

मैं पार्टी का विचारक और इतिहासकार भी हूं…मेरी बात को किसी राजनेता के बजाए इतिहासकार और विचारक के तौर पर भी लेना चाहिए… जब पांच राज्यों में चुनाव का एलान हो चुका है तो ये बातें कांग्रेस के वरिष्ठ नेता आनंद शर्मा कह रहे हैं जो खुद को इतिहासकार और विचारक की तरह देखे जाने की वकालत कर रहे हैं। ये कांग्रेस के उन नेताओं में शामिल हैं जिन्हें मीडिया ने दुनिया भर के आर्थिक और राजनीतिक संगठनों की तर्ज पर ‘जी-23’ का नाम दिया है।

जी…शब्द के साथ लगे वैसे समूह जो अक्सर दुनिया की भलाई के नाम पर जुटते हैं, बड़ी-बड़ी बातें होती हैं और दुनिया का हाल पहले से भी खराब होता रहता है। चमकती है तो सिर्फ उन नेताओं की छवि जो खास तरह की शक्ति की पहचान बना कर इकट्ठा होते हैं और दुनिया तो कहती है कि ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है।

जब पुदुचेरी में कांग्रेस की सरकार गिर चुकी और उसे चुनावों में उतरने के लिए अपनी बनावट की पूरी शल्यक्रिया से गुजरना था तो उसके उलट शल्य जैसे किरदार एकजुट होकर विचारक बनने का दावा करने लगते हैं। शल्य महाभारत का वह किरदार है जो युद्ध के मैदान में एक प्रतीक बन जाता है मनोबल तोड़ने का। वह ऐसा सारथी है जो अपने रथ पर सवार योद्धा को लेकर प्रतिबद्ध नहीं होता और उसकी मौत का कारण बनता है।

जब पार्टी के नेताओं को एकजुट होकर जनता को सत्ता पक्ष के विचारों के खिलाफ लैस करना था तो ये ऐसे समय में सत्ता पक्ष के मददगार बनने का इतिहास रचने लगते हैं। राहुल गांधी कहीं दंडवत उठक-बैठक कर रहे हैं और प्रियंका असम के चाय बगानों में पत्तियां तोड़ रही हैं तो ये पूरी पार्टी का मनोबल तोड़ रहे हैं।

‘जी-23’ से जुड़े नेताओं को चिंता है कांग्रेस की धर्मनिरपेक्ष छवि की, जिसने बंगाल में इंडियन सेक्युलर फ्रंट के साथ गठबंधन कर लिया। ये नेता जिस जम्मू में बैठ कर कांग्रेस आलाकमान को कोस रहे थे जरा उसी जम्मू-कश्मीर का कुछ समय पहले का इतिहास पलट कर देख लेते। वहां विधानसभा चुनाव के बाद दूसरे क्रम में आने पर भारतीय जनता पार्टी ने समझौता किया था मुफ्ती मोहम्मद सईद की पार्टी पीडीपी (पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी) के साथ।

भाजपा अपने हिंदुत्ववादी विचारों से लैस होते हुए भी जम्मू कश्मीर और वहां पर अपनी जमीनी हकीकत जानती थी, इसलिए वहां आसमानी उड़ान भरने से परहेज किया और पीडीपी के साथ सत्ता में आई। लेकिन वहां सत्ता में आने के बाद भाजपा ने अपनी विचारधारा के साथ कोई समझौता नहीं किया। आज जहां पीडीपी अपनी जमीन बचाने के लिए संघर्ष कर रही है तो भाजपा अपने वजूद के आसमान पर है। साथ ही वहां से अनुच्छेद 370 को खत्म कर अपनी विचारधारा का झंडा फहरा चुकी है।

जब भाजपा पीडीपी के साथ चुनावी समझौता कर रही थी तो कोई राजनीतिक पंडित अंदाजा भी नहीं लगा सका था कि यहां देश की आजादी के बाद का सबसे बड़ा राजनीतिक फैसला होगा। भाजपा ने देश के कई हिस्से में उन दलों के साथ गठबंधन किया जिनसे उसका कोई वैचारिक जुड़ाव नहीं था। लेकिन हर जगह जीत के बाद वह अपनी विचारधारा पर मुखर होकर उग्र तरीके से आगे बढ़ती रही है।

राजनीतिक दलों में वैचारिक टकराव बहुत आम है खासकर तब जब वे सत्ता से दूर हों। लेकिन अहम यह भी है कि आपको यह वैचारिक टकराव तब दिखाना होता है जब आप सत्ता में हों। तभी आप उसे दुरुस्त कर सकते हैं। लेकिन सत्ता से सेवानिवृत्ति होते देख जब आप इस तरह से आपदा में अवसर तलाशेंगे तो फिर आपको कोई भी गंभीर विचारक की तरह नहीं देखेगा।

जब देश में किसान आंदोलन ने सत्ता पक्ष को परेशान कर रखा है तो उनसे मैदान में डटे रहने का गुर सीखने के बजाए ये नेता कांग्रेस की छवि को लेकर अधीर क्यों हो रहे हैं। क्या इन्हें विचार से ज्यादा खुद के प्रचार की चिंता है? जिन्हें वर्तमान की परवाह नहीं वे इतिहासकार होने की दावेदारी सिर्फ इसलिए कर रहे हैं कि सत्ता की मलाई मिलने का विकल्प खुला रहे।

कांग्रेस का भारतीय राजनीति में बहुत लंबे समय तक सत्ता में रहना ही उसके वर्तमान की त्रासदी है। केंद्रीय सत्ता से लेकर राज्यों में कांग्रेस की लिफाफा सरकार का बोलबाला रहा है। सत्ता की प्रतीक बनी देश की ऐतिहासिक पार्टी के साथ ऐसा बहुत बड़ा तबका जुड़ा जिसका कोई जनाधार नहीं था। ये न सिर्फ सत्ता में रहे बल्कि इनके हाथों में कांग्रेस की केंद्रीय कमान भी रही। भारत की सत्ता के मानचित्र में कांग्रेस के सिकुड़ते ही इनका द्वंद्व शुरू हो रहा है। न तो इनके पास किसी तरह की शक्ति है और न जमीनी लड़ाई लड़ने की कोई योग्यता। जनाधार तो बिल्कुल नहीं।

कांग्रेस के बंगाल के अगुआ ने तंज करते हुए इन्हें ‘ज्ञानी’ शब्द से नवाजा है। यहां ज्ञानी का मतलब क्या होगा? अधीर रंजन चुनौती देते हैं कि आप लोग बड़े ज्ञानी हैं तो जमीन से जुड़ो। यह कटाक्ष कांग्रेस में सीधे-सीधे उस विभाजन पर है जिसमें एक तो जिनका जनाधार है और दूसरा जिनका खालिस विचार है। ये टकराहट प्रखर रूप में तब उभरी है जब बंगाल, असम और तमिलनाडु के चुनाव में कांग्रेस की अहम भूमिका है। यहां सारा दारोमदार क्षेत्र के जमीनी नेताओं और राहुल व प्रियंका गांधी पर है।

फिलहाल तो राहुल और प्रियंका अकेले दिखाई दे रहे हैं क्योंकि इन सबकी योग्यता और क्षमता के हिसाब से सत्ता में आने के लिए जो संघर्ष होना चाहिए था वह न होकर उसके समांतर आलोचनात्मक विवेक की बात उठा दी गई है। विभिन्न राज्यों में कांग्रेस के गठबंधन के कई विरोधाभास हैं। एक तरफ तो बंगाल है तो दूसरी तरफ केरल है। बंगाल में वामपंथ के साथ समझौता है, जबकि केरल में दोनों एक-दूसरे के खिलाफ खड़े हैं।

राजनीतिक आदर्श की बात करें तो ये गठबंधन विरोधाभास के रूप में जरूर दिखते हैं। अलग-अलग राज्यों में यह विरोधाभास दिखना स्वाभाविक है क्योंकि ज्यादातर जगहों पर भाजपा केंद्रीय ताकत के तौर पर उभर चुकी है। कांग्रेस का ज्यादातर जगहों पर भाजपा से ही मुकाबला है। सिर्फ केरल में विपक्ष की सरकार है। कांग्रेस को अब वह सब कुछ झेलना है जो कभी उसकी केंद्रीय हुकूमत में अन्य दलों ने झेला है।

ऐसे हालात में भाजपा के खिलाफ जितने लोग या दल हैं उन्हें एकताबद्ध करने की ऐतिहासिक जिम्मेदारी भी कांग्रेस पर ही है। वह कैसे उन ताकतों को इकट्ठा करके भाजपा के खिलाफ रणनीति बनाए, एक राष्ट्रीय दल के रूप में कांग्रेस के इन ‘अधीर विचारकों’ की जिम्मेदारी तो यह होनी ही चाहिए थी। अभी इस अहम मोड़ पर बंगाल के गठबंधन में धर्मनिरपेक्षता के नाम पर बगावत करना उस दल को फायदा पहुंचाना है जिन्होंने आपकी आडंबरी धर्मनिरपेक्षता को जनता के सामने सबसे बड़ा तंज और रंज बना दिया है। आपकी वजह से भारत के चुनावी मैदान में इस पवित्र शब्द ने अपनी गरिमा खो दी है।

हर पार्टी में विचारक की अपनी अहमियत होती है लेकिन जमीनी योद्धाओं के बिना वह किसी अजायबघर में प्रदर्शित सजावटी सामान की तरह ही हो जाते हैं। ज्ञानी और जमीनी के इस फर्क के साथ जूझ रही कांग्रेस के ये अधीर-23 आगे किस रथ पर सवार होते हैं यह तो देखने की बात होगी।

पीडीपी जम्मू-कश्मीर के लिए स्वशासन की वकालत करने वाली पार्टी रही है। वादी में उसकी राजनीति का आधार ही इस स्वशासन की भावना को मजबूत करना था। 2014 में जम्मू-कश्मीर में विधानसभा चुनाव के बाद भाजपा और पीडीपी में करार हुआ। अनुच्छेद 370 पर दोनों दलों ने कहा कि वे कश्मीर से जुड़े संविधान के सभी प्रावधानों को लेकर प्रतिबद्ध हैं। लेकिन 19 जून 2018 को यह गठबंधन टूट गया।

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