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खाकी रही भावना जैसी

दिल्ली में ही हुए एक कार्यक्रम में पिछले साल फरवरी में सांप्रदायिक दंगे की शिकार महिला ने कहा-दंगाइयों ने मेरे सामने मेरे पति को मार कर खत्म कर दिया। वो डर के मारे घर में छिपा था, उन लोगों ने उसे मेरी आंखों के सामने मारा। दिल्ली पुलिस एक साल बाद भी मेरा बयान नहीं ले पाई है। मैं चश्मदीद हूं...।

Toolkit case, farmers movementदिल्ली के पटियाला कोर्ट में पेशी के दौरान पर्यावरण कार्यकर्ता दिशा रवि। (फोटो- पीटीआई)

किसी मामले पर मतभेद, असहमति, विरोध, असंतोष यहां तक कि अस्वीकृति राज्य की नीतियों में निष्पक्षता को निर्धारित करने के लिए वैध उपकरण है…दिल्ली की एक अदालत ने जब दिशा रवि पर पुलिसिया कार्रवाई के खिलाफ टिप्पणी की तो हमारे जेहन में जेएनयू के छात्र कन्हैया कुमार सहित ऐसे कई चेहरे आते हैं जिन्हें सरकार विरोधी आवाज उठाने के कारण सलाखों के पीछे भेज दिया गया। जेएनयू से लेकर जामिया जैसे नामी विश्वविद्यालयों के विद्यार्थियों की छवि देशद्रोही की बना दी गई। आज पर्यावरण वह मुद्दा है जिस पर उच्च-मध्यम वर्ग से लेकर मध्यम वर्ग तक जागरूक हो चुका है। इस तबके के युवा जब इन मुद्दों को लेकर खासे सक्रिय हैं तो कई मामलों में पुलिस उन्हें देश के दुश्मन की तरह प्रायोजित कर रही है। देश के खाकीधारी नागरिक अधिकारों और संविधान के दिशा-निर्देशों के खिलाफ जिस तरह का माहौल बना रहे हैं उस पर नजर डालता बेबाक बोल

bebak bol, dishr ravi, environmental worker पटियाला कोर्ट के एडिशनल जज धर्मेंद्र राणा ने दिशा रवि टूलकिट मामले में 18 पन्नों का जो फैसला दिया है उसे पुलिस-प्रशासन और न्यायिक क्षेत्र में एक मानदंड की तरह देखा जा रहा है। निर्भया कांड में भी जस्टिस राणा के फैसलों के अंशों को दिशासूचक की तरह देखा गया था। उन्होंने निर्भया के दोषियों को कानून का हर रास्ता अख्तियार कर लेने का मौका दिया था ताकि आने वाले समय में कोई इंसाफ के तरीके पर सवाल नहीं उठा सके।

सरकार पर सजग तरीके से नजर रखने वाले नागरिकों को सिर्फ इसलिए जेल में नहीं डाला जा सकता क्योंकि वे सरकार की नीतियों से असहमति रखते हैं…सरकार के आहत अहंकार की तुष्टि के लिए किसी नागरिक पर देशद्रोह के मुकदमे नहीं थोपे जा सकते… जज धर्मेंद्र राणा ने अदालत में ये टिप्पणियां पर्यावरण कार्यकर्ता दिशा रवि की जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान दिल्ली पुलिस की खिंचाई करते हुए की। धर्मेंद्र राणा ने कहा कि सरकार की नीतियों को भेदभाव रहित बनाने के लिए मतभेद, असहमति या विरोध करना जायज तरीकों में शामिल है।

अदालत में इसी टिप्पणी के एक दिन बाद दिल्ली में ही हुए एक कार्यक्रम में पिछले साल फरवरी में सांप्रदायिक दंगे की शिकार महिला ने कहा-दंगाइयों ने मेरे सामने मेरे पति को मार कर खत्म कर दिया। वो डर के मारे घर में छिपा था, उन लोगों ने उसे मेरी आंखों के सामने मारा। दिल्ली पुलिस एक साल बाद भी मेरा बयान नहीं ले पाई है। मैं चश्मदीद हूं…।

ये दोनों टिप्पणियां आज के समय में पुलिस के रवैए को परिभाषित करती हैं। पुलिस राज्य की सबसे प्राथमिक और मजबूत इकाई है। ऊपर दी गई अदालत की टिप्पणियों पर ध्यान दें तो नागरिक शब्द पर जोर है। नागरिक का संबंध राज्य से होता है तो जाहिर सी बात है कि किसी भी राज्य का रिश्ता अपने नागरिकों के साथ वैसा ही होगा जैसा उसकी प्राथमिक इकाई पुलिस का है। पुलिस देश के नागरिकों के साथ कैसा संबंध बना रही है, खास कर देश की राष्ट्रीय राजधानी की दिल्ली पुलिस। एक यह फरवरी है जब दिशा रवि को जमानत मिल रही है और कुछ साल पहले की भी फरवरी थी जब जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से कन्हैया कुमार को अपराधियों की तरह उठा लिया गया था। उसके बाद जामिया से लेकर बीएचयू तक सिलसिला ही शुरू हो गया बतौर नागरिक अधिकारों को लेकर सजग विद्यार्थियों को देशद्रोही साबित करने का। दिल्ली दंगों से लेकर कई मामलों में पुलिस पर ‘सौ नंबर’ के अन्याय के आरोप लगते रहे हैं कि जरूरत पड़ने पर पीड़ित उस तक पहुंच नहीं बना सके।

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के छात्रों के साथ पुलिस के अलोकतांत्रिक रवैए का असर था कि उस कन्हैया कुमार को देशद्रोही कह के अदालत परिसर में पीटा गया जिन पर पुलिस आज तक कोई दोष साबित नहीं कर पाई है, जो आज विपक्ष की मजबूत आवाज बन कर सांसदी का चुनाव तक लड़ चुके हैं। अदालत परिसर में कन्हैया कुमार पर हमला करने वालों में वकालत की डिग्री हासिल किए हुए लोग शामिल थे। इसके बाद जामिया परिसर में विद्यार्थियों पर पुलिस के डंडे बरसाना और जेएनयू को पुलिस छावनी में तब्दील होते देख पूरी दुनिया ने हमारे लोकतंत्र के स्वरूप पर सवाल उठाए। अब जब ‘विश्वविद्यालय’ के आरंभ में ही ‘विश्व’ लगा है तो दुनिया सवाल करेगी ही कि आपके यहां क्या हो रहा है। हम इसे अपना आंतरिक मामला कह कर खारिज नहीं कर सकते हैं।

हम दिल्ली पुलिस की नजीरों के साथ इसलिए बात कर रहे हैं क्योंकि यह देश की राष्ट्रीय राजधानी की पुलिस है जिसे संविधान के दिशा-निर्देशों के साथ चलना है। इसे नागरिकों के प्रति निष्पक्षता दिखानी चाहिए लेकिन वह राज्य को लेकर पक्षधरता दिखाने में जुट जाती है। फिर नागरिकों के पास भरोसे के लिए क्या बचेगा? राज्य बनाम नागरिक का संबंध संविधान पर आधारित होता है। एक नागरिक को जितने भी अधिकार मिले हैं और उसके लिए जितने भी कर्तव्य निर्धारित हैं वे संविधान से तय होते हैं।

यह एक कड़वा सच है कि पिछले लंबे समय से वैश्विक तौर पर आतंकवाद और चरमपंथ बढ़ा है। लेकिन उसकी आड़ में जिस तरह से नागरिकों की अभिव्यक्ति की आजादी को कमतर किया जा रहा है वो बड़ी चिंता की बात है। नागरिकता का कानून संविधान की ओर से दिया गया है जिसकी बुनियाद में स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व की वैश्विक मानववाद की अवधारणा है। इन्हीं वैश्विक मूल्यों पर अपनी-अपनी शर्तों के आधार पर राज्य अपना संविधान तैयार करता है, यहीं से मानव अधिकार का सवाल आता है, जो वैश्विक है।

अब सवाल है कि किसी राष्ट्र के अंदर वैश्विक मानवाधिकार का हनन हो, वहां का कोई नागरिक उस पर सवाल उठा कर उसे सामूहिक आवाज बनाने की कोशिश करेगा तो क्या उसके व्यवहार को देशद्रोह के दायरे में लाया जा सकता है? राष्ट्र और उसकी संस्थाओं की अवधारणा वृहत्तर है। सरकारें आती-जाती रहेंगी लेकिन राज्य स्थायी है और उसकी भूमिका ज्यादा बड़ी है। कल कांग्रेस शासन में थी आज नहीं है, आज भाजपा बहुत मजबूत स्थिति में है तो कल को उसके लिए भी हालात बदल सकते हैं।

पुलिस जैसा स्थायी ढांचा पक्षपाती होकर खास नजरिए के साथ युवाओं को देशद्रोही साबित करने में जुट जाए तो यह उस खतरनाक दिशा की तरफ जाना होगा जो हमारे लोकतांत्रिक ढांचे को ढहा देगा। अदालत ने पुलिस के इसी विपरीत दिशा की ओर बढ़ते कदम पर सवाल उठाए हैं।

दिल्ली पुलिस को इस बात का ध्यान रखना होगा कि वो वैचारिक विरोध के खिलाफ जो मामले दर्ज करती है वो किसी खास थाना क्षेत्र में नहीं बल्कि भारत जैसे लोकतांत्रिक देश की साख पर दर्ज होते हैं। ऐसे मामलों की आंच उस लोकतंत्र के चेहरे को झुलसाती है जो दुनिया में वसुधैव कुटुंबकम की पहचान रखता है। इसके साथ ही उस लोकतंत्र पर जो सरकार काबिज है वो भी सवालों के घेरे में आती है क्योंकि पुलिस की अगुआई भी उसी के हाथों में होती है।

उत्तर प्रदेश में एक इंसान पुलिस थाने जाता है और कहता है, उसकी बच्ची गायब है, तो पुलिस की पहली प्रतिक्रिया यही होती है कि किसी के साथ भाग गई होगी जरा इंतजार कर लो। कमजोर तबके के घर की लड़की 72 घंटे तक घर नहीं पहुंचती है और पुलिस भाग गई होगी की सामंती सोच के साथ मामला दर्ज नहीं करती है। दिल्ली पुलिस जेएनयू और जामिया की छात्राओं को भी इसी सामंती नजरिए से देखती है कि उन्हें किसी विरोध प्रदर्शन में हिस्सा नहीं लेना चाहिए।

रिया चक्रवर्ती से लेकर दिशा रवि तक के मामले में बिहार पुलिस से लेकर दिल्ली पुलिस का दिशाहीन रवैया उसे आधुनिक मूल्यों की वकालत करते युवाओं के खिलाफ खड़ा कर देता है। इस समय भारत विश्व का सबसे युवा लोकतंत्र है और हम एक वैश्विक युग में जी रहे हैं। आज के दौर में पर्यावरण सबसे ज्वलंत मुद्दा है जो पूरी दुनिया को एक तार में बांध रहा है। धरती और आसमान में आ रहे बदलावों का असर सब पर हो रहा है। अमेजन की आग की चिंगारियां पूरे विश्व की आबोहवा के भविष्य को बताती हैं तो वुहान से निकला एक विषाणु पूरी दुनिया को थाम देता है। जब पर्यावरण असंतुलन के कारण हुई बीमारियां वैश्विक हैं तो इसके खिलाफ युवाओं की वैश्विक गोलबंदी को आप अपराध के दायरे में कैसे ला सकते हैं।

जो युवा हमारे लोकतंत्र की सबसे बड़ी मजबूती होने चाहिए उन्हें सबसे बड़ी कमजोरी बनाया जा रहा है। युवाओं के आजाद लब के खिलाफ खड़ी हुई पुलिस को लेकर अदालत ने जो मानदंड सरीखा फैसला दिया है उसे पुलिस और प्रशासन को समझने की जरूरत है। अपने युवाओं के खिलाफ खड़ा देश आधुनिकता और लोकतंत्र की दौड़ में कितना पीछे धकेल दिया जाएगा इसका अंदाजा अदालत की इस टिप्पणी से लगाया जा सकता है-उदासीन और मौन नागरिकों की तुलना में जागरूक एवं प्रयासशील नागरिक निर्विवाद रूप से एक स्वस्थ और जीवंत लोकतंत्र का संकेत हैं।

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