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बेपर्दा मुर्दा

कोरोना की दूसरी लहर में सबसे बड़ा संकट यह है कि कैसे विश्वास कायम हो। अब फिर से वही स्थिति आ गई है। सड़कें खाली हो रही हैं और रेलवे स्टेशन भर रहे हैं। दिल्ली से लेकर महाराष्ट्र तक से पलायन शुरू हो चुका है। आखिर जनता उस व्यवस्था पर भरोसा भी कैसे करे जो बिना तैयारी की पूर्णबंदी करने के कारण पहले ही दागदार हो चुकी है।

Bebak bol, Covid-19दिल्ली में एक अस्पताल के बाहर कोरोना से किसी अपने को खोने के बाद बिलखते परिजन। (फोटो सोर्स- दानिश सिद्दीकी/ रॉयटर्स)

अस्पताल में जगह नहीं मिलने से मौत के मुंह में पहुंचा कोरोना पीड़ित का शव अंतिम संस्कार स्थल पर भी कतार में है। जब शवदाह गृह की चिमनी पिघलने की खबर आई तो अदालत भी हरकत में आई। कोरोना की दूसरी लहर में देश के इस मरघटी मंजर का कारण यह है कि एक साल पहले हमने कोरोना को लेकर अतिरेकी व्यवहार किया। सत्ता पक्ष इंतजामों को लेकर लापरवाह बना रहा तो विपक्ष से जुड़ा बड़ा बुद्धिजीवी तबका इस विषाणु को सरकार की साजिश साबित करने में जुटा रहा। बीमारी और उसकी दवाई एक वैज्ञानिक सच्चाई है। लेकिन हमारे देश में इसे अंधविश्वास के उस चरम तक पहुंचा दिया कि शुरू में अग्रिम पंक्ति के योद्धाओं ने भी कोरोना का टीका लेने से इनकार कर दिया। जब देश के नीति-नियंता चुनाव और महाकुंभ में व्यस्त थे तो श्मशान घाटों और कब्रगाहों ने मौतों का आंकड़ा देना शुरू किया। जब मुर्दा जिस्म ने आंकड़ों को बेपर्दा करना शुरू कर दिया है तो विषाणु पर विभाजित देश की व्याख्या करता बेबाक बोल।

मंत्री जी डॉक्टर-डॉक्टर चिल्लाते रह गए, कोई डॉक्टर नहीं आया आधे घंटे तक, खाली वोट लेने के लिए आते हैं…!
हजारीबाग सदर अस्पताल से झारखंड की राजधानी रांची तक इलाज के लिए पहुंची महिला ने अस्पताल का निरीक्षण करने पहुंचे मंत्री को जब ये बात कही तब तक कोरोना विषाणु से हमारा सामना हुए एक साल से ज्यादा का समय हो चुका था। झारखंड की इस घटना के बरक्स आज हजारों लोगों के सामने इससे भी हौलनाक हादसे हैं हमारी सत्ता और समाज के सामने दर्ज करवाने के लिए। एक साल बाद कोरोना की दूसरी लहर का हमला होने पर पता चला है कि हमने तो पहली लहर में ही तैरने की कोशिश से इनकार कर दिया था।
आज अस्पतालों में मरीजों के लिए बिस्तर नहीं है। कोरोना जांच केंद्रों पर इतना बोझ है कि कई मरीजों को कहा जा रहा है कि कोरोना तो होगा ही अब बाद में ये जांच करवाने के लिए आइएगा कि नकारात्मक हुए या नहीं। अस्पताल में जीने की आस लिए पहुंचे लोगों के लिए जगह नहीं है और मरने के बाद भी अंतिम संस्कार स्थलों पर वे कतार में हैं।

पिछले एक साल में हिंदुस्तान की सभी संस्थाओं ने कोरोना को लेकर अतिरेकी व्यवहार किया। सत्ता के चेहरे और उससे जुड़ी संस्थाएं कोरोना के तूफान में शुतुरमुर्ग की तरह बदइंतजामी के ढेर की रेत में सिर छुपाए बैठी रहीं जैसे कुछ हुआ ही न हो। हां, सत्ता का कोई नुमाइंदा धूप स्नान तो कीचड़ स्नान जैसे नुस्खे अवश्य सुझाता रहा। सरकार गिराने से लेकर सरकार बनाने तक की गलबहियां में दो गज की दूरी को कभी जरूरी नहीं समझा गया। मरीजों और मौत के आंकड़े देना बंद करने के बाद कोरोना को लेकर सवालों के हर दरवाजे बंद कर दिए गए। चुनावी रैलियों से लेकर महाकुंभ तक में कोरोना फैलने के सवाल को हारे को हरिनाम के खाते में डाला जाने लगा।
एक तरफ सत्ता पक्ष तो ऐसे दिखा रहा था कि कोरोना तो कुछ नहीं है दूसरी तरफ विपक्ष और उससे जुड़ा बुद्धिजीवी वर्ग इसे सत्ता की साजिश साबित करने में जुटा रहा। जब विपक्ष को कोरोना से जुड़े अनुसंधान और लोगों तक जल्दी टीके की पहुंच की मांग उठानी थी तो पूर्व सत्ताधारी मुख्यमंत्री पत्रकारों के बीच शेखी बघार रहे थे कि वे इस सरकार के लाए टीके को नहीं लेंगे। अब जो लोग टीके के आयात और निर्यात को लेकर ट्वीट कर रहे हैं, पहले इसे ही लेकर वे अंधविश्वास फैलाने में इस कदर कामयाब रहे कि अग्रिम पंक्ति के योद्धाओं तक ने शुरू में टीका लेने से इनकार कर दिया।

आज जब महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश के शहरों से लेकर राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली तक में कोरोना की दूसरी लहर कहर बरपा रही है तो हम अपने देश के हालात को किस तरह देखें? कोरोना से बड़ी संख्या में मौत की सच्चाई दो अतिरेक में विभाजित है। पूरी दुनिया के लिए यह कोरोना युग है तो हमारे देश में यह विषाणु द्वारा विभाजित युग है। वैज्ञानिक तथ्य, बीमारी, विज्ञान जैसी चीजें श्वेत और श्याम में हैं। या तो आप इस तरफ हैं या उस तरफ। बीच में कोई खाली जगह छोड़ी नहीं गई है।

हर लोकतांत्रिक देश में पक्ष और विपक्ष के बीच की खाली जगह विद्वानों, वैज्ञानिकों, चिकित्सकों, अनुसंधानकर्ताओं की रही है। भगवा, लाल और नीले की राजनीति के बीच हमने उस इंद्रधनुषी झंडे को झुका दिया जो सबका था यानी ज्ञान और विज्ञान का झंडा। अब सिर्फ विभाजन का डंडा है। सत्ता ने कहा, टीका आ गया तो विपक्ष ने कहा कि इतनी जल्दी टीका कैसे बन सकता है। लेकिन उन वैज्ञानिकों की प्रयोगशाला में झांकने वाला कोई नहीं है जो इक्कीसवीं सदी के हिसाब से काम कर रहे हैं। जो उस तकनीक को सामने ला रहे हैं जो कम समय में दवा तैयार कर सुरक्षात्मक आवरण बना सकती है। समय और जरूरत के साथ आगे बढ़ने का नाम ही ज्ञान और विज्ञान है। लेकिन हमारे विभाजित युग में सबने अपनी-अपनी गोलबंदी कर ली है। कोई इधर वाला न उधर वाले को सुनने को तैयार है और न कोई उधर वाला इधर वाले को सुनने को।

कोरोना सिर्फ भारत का मामला नहीं, बल्कि एक वैश्विक सच्चाई है। लेकिन हमारे देश में इसकी शुरुआत से ही असली चुनौती और असली समस्या से भटकाने की कोशिश हुई। हम इसकी सच्चाई को स्वीकारने के साथ अपने देश की क्षमता, वैज्ञानिकों की क्षमता और टीके के उत्पादन की वास्तविकता को ध्यान में रख कर जनता में एक वैज्ञानिक सोच और चेतना देने का काम करते तो जनता भी उसी रूप में तैयार होती।

महामारी के समय में सरकार के साथ जनसंचार साधनों की अहम भूमिका होती है। लेकिन हमारे जनसंचार माध्यमों ने जिसमें सामाजिक पहरुआ कहा जाने वाला नया मीडिया या इंटरनेट मीडिया भी शामिल है, ने पहले चीनी चमगादड़ की जासूसी कथा बना दी तो फिर मरकज के बहाने एक खास कौम पर सारा ठीकरा फोड़ इसे अवैज्ञानिकता के दायरे में ला दिया। जब देश दहशत में था तो जिस दीया और थाली के प्रतीक को राष्ट्रीय एकता के प्रतीक के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता था उसे अंधविश्वास की हद तक पहुंचा दिया। जो कोरोना नंगी आंखों से नहीं दिख सकता था उसे जनसंचारी साधनों ने विभाजनकारी बना कर काले-सफेद के खांचे में समेट दिया। वैज्ञानिक चेतना और सामाजिक यथार्थ के साथ कोरोना से जूझते हुए उससे उबरने का जो सामूहिक प्रयास हो सकता था वह तो खत्म हुआ ही, साथ ही एक-दूसरे पर अविश्वास का संक्रमण भी फैला दिया गया। सरकार के प्रचार तंत्र से लेकर आधुनिक जनसंचार माध्यमों ने नीम-हकीम खतरे जान वाली भूमिका निभाई। डॉक्टरों और वैज्ञानिकों को छोड़ कर हर कोई कोरोना विशेषज्ञ बन बैठा।

कोरोना की दूसरी लहर में सबसे बड़ा संकट यह है कि कैसे विश्वास कायम हो। अब फिर से वही स्थिति आ गई है। सड़कें खाली हो रही हैं और रेलवे स्टेशन भर रहे हैं। दिल्ली से लेकर महाराष्ट्र तक से पलायन शुरू हो चुका है। आखिर जनता उस व्यवस्था पर भरोसा भी कैसे करे जो बिना तैयारी की पूर्णबंदी करने के कारण पहले ही दागदार हो चुकी है। पहली ही लहर की मारी अर्थव्यवस्था संभली नहीं है और फिर से वही स्थिति आने का खौफ है। आज हालात इतने खराब हैं कि सरकार और जनसंचार माध्यम चाहे कितनी भी कोशिश कर लें, वह इस स्थिति में नहीं है कि जनता में विश्वास पैदा कर इस आवाजाही को रोक लें।

इस बार संक्रमण का दौर तेजी से गांवों में फैल रहा है और वहां की स्वास्थ्य व्यवस्था का और भी बुरा हाल है। भारत में कोरोना विषाणु का संकट भरोसे का संकट भी बना दिया गया है। या कहें कि हमारे समाज के अंदर जो एक अविश्वास का वातावरण था कोरोना ने उसे बेपर्दा कर दिया है। यह सिर्फ समुदायों के बीच का अविश्वास नहीं है। इसमें मानवता, सरकार और उसकी सारी मशीनरी पर अविश्वास गहरा गया है। जनतंत्र के जितने संसाधन हैं वे सब कोरोना से संक्रमित दिख रहे हैं। दूसरी बार मानवता से लेकर मशीनरी तक छाए संक्रमण के खिलाफ सुधारवादी लहर हम ला पाते हैं कि नहीं यह देखना होगा।

भारत में कोविड-19 के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। शुक्रवार को रात आठ बजे तक केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की ओर से आई रिपोर्ट के अनुसार एक दिन में रिकॉर्ड 2,17,353 नए मामले सामने आए हैं। साथ ही देश में अब तक 1,42,91,917 लोग संक्रमित हो चुके हैं। बीमारी का इलाज करा रहे मरीजों की संख्या 15 लाख के पार चली गई है। मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, संक्रमण से 1,185 और लोगों की मौत होने के बाद कुल मृतक संख्या बढ़कर 1,74,308 हो गई है।

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