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बेबाक बोल: यौन हिंसा : मौन हिंसा

उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के असोहा इलाके के बबुरहा गांव के बाहर संदिग्ध परिस्थितियों में मृत पाई गई दो किशोरियों की अंत्येष्टि शुक्रवार की सुबह कड़ी सुरक्षा व्यवस्था के बीच कर दी गई। पुलिस के अनुसार बबुरहा गांव में पशुओं के लिए चारा लेने गई तीन दलित किशोरियां खेत में संदिग्ध अवस्था में मिली थीं, जिनमें दो की मौत हो गई थी। तीसरी का इलाज चल रहा है। दोनों मृत किशोरियों के शव पोस्टमार्टम के बाद गांव लाए गए थे।

UP Unnao Crimeउन्नाव के बबुरहा गांव में घटनास्थल का मुआयना करते जांच अधिकारी।

हाथरस के खेत में जलाई गई चिता से उठे सवालों की आग ठंडी भी नहीं हुई है कि उत्तर प्रदेश के खेत से दो और नाबालिग दलित लड़कियों की लाश मिलती है। वह राज्य जो देश की संसद की शक्ल तय करता है वहां कानून और प्रशासन पर जातिगत वर्चस्व हावी होने का खमियाजा कमजोर तबका और महिलाएं भुगत रही हैं। बदायूं, हाथरस, उन्नाव तक के खेतों में लड़कियों की हत्या कर मर्दवादी वर्चस्व का सबक दिया जा रहा है। राजनीति से लेकर पर्यावरण के मुद्दों पर सक्रिय स्त्रियों के लिए इंटरनेट पर यौन कुंठा वाली ट्रोलिंग से लेकर खेतों में लड़कियों का कत्ल जब समाज की संस्कृति का हिस्सा लगने लगे तो यह वह भयावह समय है जब हमें सत्ता और समाज को मानवीय मूल्यों के प्रति संवेदनशील बनाने के लिए सबसे ज्यादा सवाल पूछना चाहिए। आनलाइन कार्यक्रम में एक लड़की के माइक आन रहने के बाद मर्दवादी चुटकुलों पर हंसता देश और खेतों में कत्ल होती लड़कियों पर सवाल उठाता बेबाक बोल

भाई अपनी बहनों के बारे में कहता है-‘वो खेत से चारा लाने के लिए गई थीं। जब उन्हें आने में देर हुई तो हम उन्हें देखने गए। हमने देखा कि वे खेत में पड़ी हैं और उनके हाथ-पैर चुन्नी से बंधे हुए थे’।

प्रिया रमानी के खिलाफ मानहानि केस में अदालत कहती है-‘अब वक्त आ गया है कि हमारा समाज ये समझे कि हो सकता है कि एक पीड़ित मानसिक आघात के कारण शायद कई सालों तक कुछ न बोले। लेकिन एक महिला को अपने साथ हुई यौन हिंसा के खिलाफ आवाज उठाने के लिए सजा नहीं दी जा सकती…इस बात को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है कि अधिकतर यौन हिंसा के मामले बंद दरवाजों के पीछे होते हैं और पीड़ित को पता ही नहीं होता कि उनके साथ क्या हो रहा है…’।

जब देश के शहरी वर्ग की महिलाएं ‘मी टू’ यानी अपने यौन उत्पीड़क के खिलाफ आवाज उठाने के मामले में प्रिया रमानी के ‘दोषमुक्त’ होने का जश्न मना रही थीं तभी उन्नाव में तीन लड़कियों के गायब होने के बाद उनके खेत में पड़े होने की खबर मिलती है। चारा लाने गई बहनें नहीं लौटीं तो उनका भाई उन्हें खेत में इस हालत में पाता है। दो लड़कियों की मौत हो चुकी है और तीसरी जीवन के लिए संघर्ष कर रही है। यह किसी बंद कमरे के अंदर नहीं खेत में खुलेआम की गई हत्या है।

अदालत से जीत का निशान बनाकर निकलती प्रिया रमानी और खेत से निकलता लड़कियों का शव। दिल्ली से कुछ सौ किलोमीटर की दूरी पर ये विरोधाभास देखने के बाद हमारे पास कहने के लिए और क्या रह जाता है। दिल्ली के सबसे संभ्रांत क्षेत्र में भी हम स्त्री उत्पीड़क के दोषसिद्ध होने नहीं बल्कि एक स्त्री के ‘दोषमुक्त’ होने पर ही खुश हो पा रहे हैं कि एक स्त्री का अपने उत्पीड़न के बारे में बात करना पुरुष की मानहानि नहीं है। इन सबके बीच उन्नाव के खेत से निकली लड़कियों की लाशें हमें फिर हाथरस के हाल पर ला पटकती हैं।

उन्नाव की फिजा में सबसे पहले प्रशासन का यह बयान तैरने लगता है कि लड़कियों के शरीर पर किसी तरह के चोट का निशान नहीं है, उनके साथ कोई यौन हिंसा नहीं की गई है। उत्तर प्रदेश में कानून के इकबाल का यह हाल है कि कमजोर तबके की लड़की की लाश मिलते ही प्रशासन को सबसे पहले यह सफाई देनी पड़ती है कि जिस शरीर की जान निकल चुकी है उस शरीर के साथ कोई यौन अपराध नहीं हुआ है। जब दिल्ली की सीमा पर किसान आंदोलन चल रहा है तो खेतों से लड़कियों की लाश निकलने को किस तरह से देखा जाए।

किसान आंदोलन में जिस तरह खाप और जातिगत वर्चस्व के नाम पर प्रशासन को घुटनों पर बिठाया जा रहा था, उसी वक्त आशंका जताई जा रही थी कि इस तरह की गोलबंदी का फायदा उस सरकार को ही मिलेगा जो पहचान की राजनीति के नाम पर सबको बांट कर अब तक की सबसे मजबूत सरकार बन बैठी है और इसके नतीजतन हाशिए पर गए हैं दलित और कमजोर तबके की महिलाएं।

उत्तर प्रदेश में जातिगत वर्चस्व के कानून और प्रशासन पर हावी होने के कई मामले हम पहले देख चुके हैं। दो दलित लड़कियों का शव फिर से हमारे सामने है। घर, खेत से लेकर थानों तक में जातिगत वर्चस्व कायम करने का शिकार औरतें ही बनती हैं। दलित समाज की महिलाओं के ऊपर हमले बढ़े हैं इसके आंकड़े हर जगह उपलब्ध हैं।

जातिगत वर्चस्व के साथ मर्दवादी मानसिकता मजबूत होगी ही। यह मर्दवादी मानसिकता औरतों के वजूद को उसके शरीर तक ही देखती है। उन्नाव के इस मसले में सबसे पहले शरीर पर बात खत्म करने की कोशिश की गई कि लड़कियों के साथ यौन हिंसा की निशानी नहीं है।

फिर यहां हत्या का कारण क्या हो सकता है? ये वैसा समाज है जहां संपत्ति के लिए हत्या होती है, लेकिन नाबालिग लड़कियों का संपत्ति से भी कोई लेना-देना नहीं होता है। तो फिर इस हत्या के पीछे भी लड़कियों को सबक सिखाने की मानसिकता काम कर रही होगी? बदायूं से लेकर हाथरस तक स्त्रियों की लाशों के जरिए सामंती समाज और उसका साथ देता प्रशासन जो सबक दे रहा है उससे कौन सबक ले रहा है और किस तरह का?

समाज में कानून व्यवस्था और नैतिकता का वजूद खत्म होने की मार सबसे पहले कमजोर तबके को ही उठानी पड़ती है। नैतिकता और मानवीय मूल्यों को खत्म कर देने और कानून के बेकायदा होने के बाद हम जिस अराजकता की स्थिति में पहुंच जाएंगे उस पर काबू पाना किसी भी सरकार के लिए संभव नहीं होगा। सरकार का काम न सिर्फ कानून और व्यवस्था को लागू करना होता है बल्कि नैतिक मूल्यों को स्थापित करने की जिम्मेदारी भी उसके ऊपर है।

आज विश्वविद्यालय से लेकर सामाजिक आंदोलन में सक्रियता तक को लेकर जिस तरह से स्त्रियों की बुलंद आवाज को निशाना बनाया जा रहा है वो एक बड़े खतरे की घंटी है कि स्त्रियों के शरीर, उनकी आवाज और उनके अधिकार को कुचलना हमारी संस्कृति न बन जाए।

जिस सूबे में यौन उत्पीड़न की शिकार लड़की का शरीर गैर कानूनी तरीके से अंधेरे में जला दिया जा रहा हो, जहां के खेतों में पेड़ों से लटकती लड़कियों की लाशें मिलना आम बात हो जाए वहां हम किस तरह से उस आधुनिकता की बात कर पाएंगे कि मिन्त्रा जैसी कारोबारी कंपनी को अपना निशान इसलिए बदलना पड़ गया क्योंकि उसके स्त्री अस्मिता के खिलाफ जाने की शिकायत मिली थी। इन आधुनिक बोधों के बीच उत्तर प्रदेश के खेत में हम क्या लेकर जाएंगे? घर में क्या हो रहा है उस पर तो अलग सवाल है लेकिन खेतों में जलती और मिलती लाशों के बीच हम राजनीति की उस खेती का क्या करें जो एक घोर मर्दवादी समाज की फसल पैदा कर रही है।

किसी आनलाइन कार्यक्रम में एक लड़की का माइक आॅन हो जाता है और उसकी युवा सुलभ बातों पर पूरे देश की मर्दानी मानसिकता मीम बनाकर हंसने लगती है। आधुनिक शहर की लड़की के नाम के साथ हैशटैग पर ही-ही वाले मजाक से लेकर उत्तर प्रदेश के खेतों में मिली लड़की की लाश में अगर संबंध खोजना चाहेंगे तो हम सब खुद को भी किसी लड़की के कत्ल का अप्रत्यक्ष हिस्सेदार पाएंगे।

उत्तर प्रदेश का कानून और प्रशासन बेहतर समाज के लिए आधुनिक मूल्यों को आगे करने के बजाए सामंती ताकतों को मजबूत करने का संदेश दे रहा है। यौन हिंसा तो नहीं हुई है- कह कर भी खेतों से स्त्रियों के खिलाफ एक संदेश दिया जा रहा है। हर कोई अपने-अपने तरीके से इस संदेश को क्रियान्वित भी कर रहा है। अगर कानून पितृसत्ता, जाति व्यवस्था, जाति वर्चस्व पर यकीन करेगा और उसे खुलकर दिखाएगा तो कानून का भय खत्म होना ही है।

आखिर खेत में लड़कियों की हत्या करते वक्त, उनकी लाशों को पेड़ से लटकाते वक्त कानून का डर दिखना बंद क्यों हो गया है? समाज के संचालन में भय से ज्यादा नैतिकता जरूरी है। नैतिकता ही मनुष्य को नियंत्रित करती है और उसे मानवीय मूल्यों के करीब ले जाती है। जब नैतिकता में ही गिरावट आ जाए तो भय सत्ता का संदेश बन जाता है। उत्तर प्रदेश के खेतों से लड़कियों को जो भय का सबक दिया जा रहा है उसके खिलाफ हम आज निर्भय होकर नहीं बोलेंगे तो कल तक बहुत देर हो जाएगी।

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