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जब मौत मुकाबिल हो

आज मौत सामने बैठी है तब हम चुप कैसे रह सकते हैं? सहज तौर पर देखा जाए तो असहाय होने पर आदमी के मुंह से कम से कम एक चीख तो निकलती है। जब वह चीख भी निकलनी बंद हो जाए तो वह चुप्पी डराती है। बच्चा भी कोख से निकलने के बाद चीख कर अपने जिंदा होने का सबूत देता है। आज तमाम लोकतांत्रिक संस्थानों की चुप्पी डराने लगी है।

सत्ता के घोर अंधकार के पीछे उम्मीद की एक रोशनी हमेशा कायम रहती है। कवि सुरजीत पातर की भी ऐसी ही भावना है।

बिहार के एक अस्पताल में कोरोना पीड़ित पति का इलाज करवा रही महिला का आरोप है कि आइसीयू में उसके यौन उत्पीड़न की कोशिश हुई और वह इसलिए चुप रही कि कहीं उसके पति का इलाज न रोक दिया जाए। जिस पति की जिंदगी के लिए वह इतनी बड़ी प्रताड़ना झेल रही थी, वो मरने के बाद सत्ता के लिए मृतकों में शामिल एक आंकड़ा भर बन कर रह गया। आज हम सबसे बड़े लोकतंत्र नहीं बड़ी जनसंख्या करार दिए गए हैं। सामूहिकता में शोक के बजाए अलग-अलग सरकारें अपनी पीठ थपथपा रहीं कि वहां इतने मरे तो हमारे यहां सिर्फ इतने। मौत की चीत्कार और सत्ता के अहंकार के खिलाफ बोलना हर उस जिंदा का फर्ज बन गया है जिस पर अब मुर्दों की उम्मीदें टिकी हैं। जाने वाले की उम्मीद कायम थी कि मेरे पीछे बोलने वाला रह गया है। सत्ता के उस अंधेरे की पहचान करता बेबाक बोल जो जिंदा लोगों की आवाज से डरता है। जब मौत मुकाबिल हो आवाज निकालो यारो।

अंधेरे को लगता है कि अपनी जद में लेकर उसने रोशनी की पहचान छुपा दी है। अंधेरे में हम देख नहीं सकते हैं तो अंधेरा खुद भी कुछ नहीं देख सकता है। उसे लगता है कि सब कुछ उसके नियंत्रण में है। वह रोशनी को बर्दाश्त नहीं करता क्योंकि वह उसे चीर देती है। लेकिन जिनकी रोशनी छीन ली गई है, उनके पास अंधेरे को हराने वाली आवाज तो है। अंधेरे को आवाज से डर लगता है। अंधेरा सत्ता का प्रतीक है, वह आवाज उठाने वालों से डरता है।

की ए इंसाफ हऊ मैं दे पुत्त करण गे
की ए खामोश पत्थर दे बुत करण गे
जो सलीबां ते लटके ने, लत्थने नहीं
राज बदलन गे सूरज चढ़न लैन गे

पंजाबी कवि सुरजीत पातर की ये पंक्तियां उस ‘खानदानी भारत’ के बारे में है जिससे पाश ने अपना नाम खारिज कर देने की सिफारिश की थी। राजनीति में खानदानी मतलब सिर्फ अपने वंश को सत्ता हस्तांतरण नहीं बल्कि अपनी सामंती प्रवृत्ति को सत्ता हस्तांतरण की बात है। राजा इसलिए राजा बना है क्योंकि वह राजा का बेटा है। तो क्या जनता उस राजा से अपने जीने के लिए सांस मिलने की उम्मीद कर सकती है जिसे राजा बनाने में उसकी कोई प्रत्यक्ष भूमिका नहीं है। भगत सिंह की विचारधारा ने पंजाब की मिट्टी को जो पाश और पातर जैसे कवि दिए, वे ईश्वर की बेबसी पर सबसे पहले सवाल उठाते हैं। पातर की पंक्तियां कहती हैं-तुम गिरजाघर में जाकर कितना भी रो लो वह ईश्वर जो खुद लहूलुहान है सलीब से उतर कर तुम्हारे घाव पर मरहम लगाने नहीं आएगा।

कवि सलीब पर लटके ईश्वर को उसके हाल पर छोड़ खुदमुख्तार होने के लिए कहते हैं। वे कहते हैं, हर अहंकारी सत्ता का वैसा ही हश्र होता है जैसा सूरज का होता है। ब्रह्मांड में सूरज से बड़ी शक्ति कौन हो सकती है? लेकिन जो सूरज सुबह उगता है वह शाम में ढल जाता है। मरघट से आंखें मूंदे बादशाह और उसके राग दरबारियों का भी यही हाल होना है। अपने मुर्दा हुए लोगों के प्रतिशोध में जनता जब जिंदा होगी तो एक ऐसी शाम आएगी जब ये शक्तियां ढल जाएंगी। सत्ता के अधैर्य के खिलाफ जनता ने हमेशा धैर्य से लड़ाई लड़ी है। इसके पहले भी खुद को खुदा समझने वाले तख्तनशीनों का तख्त पलटता रहा है। पहले भी वे आए हैं और गए हैं। जनता की प्रयोगशाला का पुख्ता टीका है-बदलाव।

अहंकारी सत्ता दोपहर में सूरज की तरह ऊंचाई पर पहुंचती है। उस समय उसके जुल्म की इंतहा होती है, वह सब जला देना चाहती है। वैज्ञानिक विषाणु की बीमारी के चरम पर पहुंचने को भी उम्मीद की तरह देख रहे हैं कि अब तो इसकी ढलान तय है। सत्ता के भी अहंकार और गैरजिम्मेदारी के शीर्ष पर जाने के बाद उसे गिरना ही है। पहले तो आप थोड़ी लोकलाज रख छुपमछुपाई करते हैं तो जनता भी संकोच में होती है। लेकिन जब आपकी आंखों से शर्म का पर्दा हट जाता है तो जनता भी आंख मिला कर सवाल करने के लिए तैयार हो जाती है।

विषाणु का संदेश है कि आगे की लड़ाई हमें किसी सूबे-सियासत या मिल्कियत के लिए नहीं लड़नी है। यह हमें किसी और के लिए नहीं अपने लिए लड़नी है। अपने-अपने घरों से निकल कर हमें एक-दूसरे को मुंह दिखाना है। अपने बच्चों के सामने हम वैचारिक रूप से शून्य नहीं हो सकते। वे घर में कैद हैं। हर अभिभावक को अपने बच्चों के लिए पूरी पाठशाला बनना है। हर किसी को अपनी कविता लिखनी है। इसी पंजाब की मिट्टी में एक कवि का कविता के लिए कत्ल हुआ। मगर वह फना होकर फनकारों की फौज दे गया। अब सत्ता के तिलिस्म को तोड़ने के लिए बीमारी से टूटे मन को हौसला देना है। जब सरकार ने कुछ नहीं किया तो अदालत ने हमें राम भरोसे घोषित कर दिया। हमारी अभिव्यक्ति के खातों पर ताला लगा दिया गया तो पूरी दुनिया हमारे लिए बोलने लगी।

आज मौत सामने बैठी है तब हम चुप कैसे रह सकते हैं? सहज तौर पर देखा जाए तो असहाय होने पर आदमी के मुंह से कम से कम एक चीख तो निकलती है। जब वह चीख भी निकलनी बंद हो जाए तो वह चुप्पी डराती है। बच्चा भी कोख से निकलने के बाद चीख कर अपने जिंदा होने का सबूत देता है। आज तमाम लोकतांत्रिक संस्थानों की चुप्पी डराने लगी है। मौत दरवाजे पर बैठी है और सब चुप हैं। जब देश का नागरिक आंकड़ा बन रहा है, तब भी सत्ता को छविरंजन की फिक्र है। अभी हम सबसे बड़े जनतंत्र नहीं सबसे बड़ी जनसंख्या भर करार दिए गए हैं। जो मरे हैं उनकी कोई पहचान नहीं, वे सिर्फ कुछ फीसद भर हैं।

जन को महज संख्या बनाने वाले इस अंधेरे समय के खिलाफ बोलने में एकबारगी डर तो लगेगा। क्या अपने खिलाफ उठी आवाज को अंधेरा बर्दाश्त करेगा? लेकिन आवाज रूहदार होकर सोचती है, अगर मैं चुप रही तो जिस शमादान के अंदर मुझे जलना है वह क्या कहेगी? आवाज के पास लड़ने से डरने और अपने वजूद के लिए मर मिटने दोनों के लिए वजहें हैं। उसे दोनों में से वही चुनना है जिसमें वह बेआवाज न मर जाए। आवाज की मौत बिन बोले हो गई तो उसके गर्भनाल के रिश्ते उसे खारिज करेंगे। तो आवाज को अपने अंदर की आवाज सुननी होगी। अब यह देश और सरकार का नहीं, अपनी अंतरात्मा का मसला है।
कवि कहते हैं कि मेरे दोस्त इस उम्मीद के साथ मरे हैं कि मैं उनके दुख-दर्द पर कोई गीत लिखूंगा। अगर मैं चुप रहा, मैंने कुछ न कहा तो उन सबकी आत्मा को चैन नहीं आने वाला है। इसलिए मुझे बोलना है। और अभी भी जो चुप्पी को चुन रहे हैं उनका भ्रम पातर ऐसे तोड़ते हैं-
एवी शायद मेरा आपणा वहम सी
के कोई दीवा जरेगा मेरी कबर ते
जे हवा ए रही तो कबरां तों की
सब घरां तो वी दीवे बुझै रैण को

यह मेरा वहम ही था कि जब मैं मर जाऊंगा तो कोई मेरी कब्र पर दीया जलाएगा। जो हवा चल रही है अगर यही चलती रही तो कब्र को भूल जाओ, घरों में भी दीया जलाने वाले नहीं रहेंगे। बीमार पड़ी सत्ता के अंधकार के खिलाफ आवाज उठानी ही पड़ेगी। अंधेरे में आवाज ही एक पहचान है जो उसके खिलाफ उठ खड़ी होती है। अंधेरे में कोई देख नहीं सकता है। अंधेरे को लगता है कि अपनी जद में लेकर उसने रोशनी की पहचान छुपा दी है। आज सारी लड़ाई पहचान की है। अंधेरे में हम नहीं देख सकते हैं तो अंधेरा खुद भी कुछ नहीं देख सकता है। उसे लगता है कि सब कुछ मेरे नियंत्रण में है। वह रोशनी को बर्दाश्त नहीं करता क्योंकि वह उसे चीर देती है। लेकिन जिनकी रोशनी छीन ली गई है, उनके पास अंधेरे को हराने वाली आवाज तो है। अंधेरे को आवाज से डर लगता है। वह सवाल पूछने वालों से डरता है।

दिल्ली में महज पैंतीस साल का युवा अभिनेता सत्ताधीशों के नाम यह लिख कर मर जाता है-मुझे भी अच्छा इलाज मिल जाता तो मैं भी बच जाता तुम्हारा…। मरने वाले के बस इस एक वाक्य में वो वजहें हैं जिसके लिए पाश बोले और मारे गए। पाश के कत्ल के बाद भी पातर आज तक बोल रहे हैं। मरने वाले ने किसे ‘तुम्हारा’ लिखा? सत्ता को या समाज को? अंधेरे में गुम मुर्दे इंतजार कर रहे हैं जिंदा लोगों के बोलने का। मरने वालों की आवाज बन कर ही कोई कौम अपने जिंदा होने का सबूत दे सकती है।

केंद्र के तीन कृषि कानूनों के खिलाफ जब पंजाब के किसानों ने अपनी आवाज बुलंद की तो उन्हें अपनी मिट्टी के कवियों और अन्य संस्कृतिकर्मियों का भी साथ मिला। कृषि कानूनों के खिलाफ खड़े किसानों के समर्थन में सुरजीत पातर ने अपना पद्मश्री पुरस्कार लौटाने का एलान किया। सुरजीत पातर को 2012 में साहित्य और शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए पद्मश्री पुरस्कार से नवाजा गया था।

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