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रहिमन बानी राखिए

जनतंत्र में जिस तरह के संवाद की जरूरत होती है उसे अगर खत्म कर दिया जाए तो उसके बाद जनतांत्रिक नैतिकता के लिए कोई जगह ही नहीं बच जाती है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में पक्ष और विपक्ष के बीच एक नैतिकता की डोर होती है जिसमें जनतंत्र सांस लेता है।

Bebak bol-BJP, Corona Virus, Farmer agitationहरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर।

कोरोना की दूसरी लहर के खौफनाक मंजर के समय मानवीयता के आधार पर किसान आंदोलन खत्म करने की मांग किसानों से लेकर पूरे समाज की हिफाजत के लिए जायज है। मनोहरलाल खट्टर की अगुआई वाली हरियाणा सरकार ने किसानों से अपील की है कि वे मानवीयता के आधार पर किसान आंदोलन खत्म कर दें। मुश्किल यह है कि मानवीयता के आधार पर यह मांग वह सरकार कर रही है जिसने किसानों के लोकतांत्रिक प्रदर्शन को खत्म करने के लिए कई अमानवीय तरीके अपनाए। प्रदर्शनकारी किसानों का आटा से लेकर डाटा तक छीनने की कोशिश हुई। कोरोना आज सबसे बड़ा संकट है तो किसानों के बीच भी भरोसे का संकट है। किसी सरकार को अपना इकबाल इतना तो बुलंद रखना चाहिए कि जब वह आदमियत की बात करे तो उसका अर्थ खोजना ही व्यर्थ न लगने लगे। पक्ष और विपक्ष के बीच नैतिकता और मानवीयता वह ऑक्सीजन है जिसके सहारे लोकतंत्र सांस लेता है। नैतिकता की टूटी डोर पर बेबाक बोल

मिरी जबान के मौसम बदलते रहते हैं
मैं आदमी हूं मिरा ए’तिबार मत करना
– आसिम वास्ती
देश में कोरोना की दूसरी लहर के भयावह मंजर के बीच हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहरलाल खट्टर तीन नए कृषि कानूनों को लेकर दिल्ली की सीमा और अन्य जगहों पर आंदोलन कर रहे किसानों से अपना विरोध वापस लेने की अपील कर चुके हैं। मुख्यमंत्री अपनी अपील की बुनियाद बनाते हैं मानवता को। उनका कहना है कि कोरोना के इस दौर में मानवता के आधार पर किसानों को अपना आंदोलन वापस ले लेना चाहिए।

आज वह राज्य सरकार मानवता की बात कर रही है जिसने किसान आंदोलन को शुरू से ही अमानवीय नजर से देखा। सबसे पहले तो उस कौम को खालिस्तानी कह कर आतंकवादी साबित करने की कोशिश की जिसने इस देश की जंग-ए-आजादी के साथ और उसके बाद सबसे ज्यादा पीड़ा सही है। पंजाब की वो कौम जिसने जलियांवाला बाग में जनरल डायर की गोलियां खाईं तो भारत विभाजन में अपनी जमीन से लेकर आसमान तक गंवा दिया।

पंजाब के हर घर में अपने पुरखों की दर्द भरी दास्तान की संदूकची है जो आज भी अगली पीढ़ी को सौंपी जाती है। इस कौम की साख पर आतंकवादी का दाग लगाने के बाद आपने लोकतांत्रिक ढांचे की हर मर्यादा को राष्ट्रीय राजमार्ग पर गड्ढे खोद कर उसमें दफन कर दिया। आंदोलनकारी किसानों से उनकी हर बुनियादी जरूरत, रोटी के लिए आटा से लेकर इंटरनेट का डाटा तक छीनने के लिए पूरी ऊर्जा लगा दी।

लेकिन इस कौम का जज्बा है कि वह इस तरह डटा रहा कि भाजपा यह मान कर चल रही है कि अगले चुनावों में हरियाणा की दस और पंजाब की तेरह सीटें अब उनके किसी काम की नहीं है। भारत के संघीय ढांचे को क्या इसी तरह बचाया जाएगा? यह तो ऐसा है कि किसी के हाथ में जख्म हुआ तो उसने उसका इलाज करने के बजाय उस हाथ को ही काट कर फेंक दिया। लेकिन होता यह है कि हाथ काटने के बाद भी उसका जख्म पूरे शरीर में फैलने का खतरा रहता है। पंजाब की सीमा से यह जख्म अखिल भारतीय हो चुका है इसका अंदाजा तो सरकार को है।

एक साल से भी ज्यादा समय तक सरकार ने इस आंदोलन की उपेक्षा की। इससे किसानों के बीच मायूसी का माहौल पनपा और आंदोलन की केंद्रीय ऊर्जा भी बिखर गई। हरियाणा और पंजाब के कोने-कोने में किसान अपने तरीके से सरकार के खिलाफ गुस्सा उतारने लगे। खासकर गणतंत्र दिवस समारोह की घटना के बाद से सरकार ने इस आंदोलन से पूरी तरह आंखें मूंद लीं और चुनावों में मशगूल हो गई जैसे दिल्ली की सीमा पर कुछ हो ही नहीं रहा है। बची-खुची उम्मीद हरियाणा विधानसभा के अविश्वास प्रस्ताव ने छीन ली।

इसका नतीजा यह रहा कि किसानों ने भी अपने विरोध और प्रदर्शन के लिए सामंती तरीका अपना लिया। पंचायती चुनाव में भाजपा नेताओं का सामाजिक बहिष्कार शुरू हुआ। उसके पहले ही हरियाणा के मुख्यमंत्री के हेलिकॉप्टर से लेकर उनके कैबिनेट मंत्री के कारों के काफिले पर किसान गुस्सा उतार चुके हैं। हालत तो यह हो गई कि हरियाणा विमुक्त घुमंतू विकास बोर्ड के वाइस चेयरमैन का विरोध करने के लिए किसानों ने उन्हें गली में दौड़ा दिया। भाजपा और जजपा के नेताओं के सामाजिक बहिष्कार के संदेश गांवों में गूंज रहे हैं।

जब किसानों के विरोध प्रदर्शन के मानवीय और लोकतांत्रिक तरीके को खारिज किया गया तो वे पुराने समय से चले आ रहे बहिष्कार के सामंती औजार पर आ गए। जब आधुनिक रणनीति को,आधुनिक तरीके को नजरअंदाज कर दिया जाए तो हुक्का-पानी बंद कर देना जैसी सामाजिक हिंसा को भी वे जायज मानने लगे हैं।

आज जब हम किसान आंदोलन पर बात कर रहे हैं तो यह दूसरी खतरनाक लहर का समय है जिसके लिए कोई तैयारी नहीं की गई थी। ऐसे समय में भीड़ वाली जगह खत्म करने की अपील सबसे जायज मांग हो सकती थी, लेकिन हरियाणा सरकार के अगुआ के सामने उनके उत्तराखंड के समकक्ष का बयान भी तो है जो कुंभ को लेकर दावा कर रहे थे कि खुली जगह में कोरोना नहीं फैलता है। जब आप एक तरफ नाजायज बोलेंगे तो दूसरी तरफ आपका जायज वैसे ही नैतिक रूप से संक्रमित हो चुका होता है। आज हर कोई यही कहेगा कि किसान आंदोलनकारी की सुरक्षा अहम है। लेकिन यह सद्भाव अब वह सरकार नहीं दिखा सकती जिसने हमेशा किसानों से बातचीत की मेज पर द्वेष और दुर्भाव ही परोसा।

महामारी के इस दौर में किसान अपने घर जाएं यह किसानों के साथ पूरे समाज के लिए जरूरी है, इस जायज समझ को भी रखने का अधिकार हरियाणा सरकार अपनी क्रूरता के कारण खो चुकी है। आज सरकार अपनी उसी खाई में गिरने के लिए मजबूर है जो उसने किसानों के लिए खोदी थी कि आप या तो हमारे साथ हैं या फिर हमारे खिलाफ।

हमने छत्तीसगढ़ में देखा कि किस तरह संवाद सूत्र के जरिए माओवादियों के चंगुल से सीआरपीएफ के जवान की सकुशल रिहाई हो सकी। इसके पहले दक्षिण भारत में वीरप्पन से लेकर एलटीटीई के आतंकवादियों के मामले में भी याद करें तो सरकार की हर पक्ष से संवाद की एक डोर होती थी। अपने संवाद की गुंजाइश बरकरार रख सरकार किसी न किसी के जरिए वहां तक पहुंचती थी। किसान आंदोलन में हरियाणा सरकार से लेकर केंद्र सरकार की सबसे बड़ी खामी यही है कि उसने संवाद के सूत्र को बचा कर रखा ही नहीं। या तो विश्वास है या फिर अविश्वास।

जनतंत्र में जिस तरह के संवाद की जरूरत होती है उसे अगर खत्म कर दिया जाए तो उसके बाद जनतांत्रिक नैतिकता के लिए कोई जगह ही नहीं बच जाती है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में पक्ष और विपक्ष के बीच एक नैतिकता की डोर होती है जिसमें जनतंत्र सांस लेता है। हरियाणा सरकार मानवीयता की बात करने के पहले नैतिकता रूपी उस सांस को थोड़ी ऑक्सीजन मुहैया कराए जिस डोर को उसने शुरू में ही तोड़ दिया है।

यह सिर्फ हरियाणा नहीं पूरे देश की समस्या है। जिसे पहला मौका मिलता है वह अपनी तरफ से नैतिकता और पवित्रता की डोर सबसे पहले काटता है। आज किसान आंदोलन और महामारी है तो कल किसी और रूप में कोई समस्या सामने आ सकती है। उसका सामना करने लिए जिस संवाद की डोर की जरूरत होती है उसे सरकारें अपनी अखंडता, सर्वोच्चता, अहम्मन्यता के जोर से काटे नहीं बल्कि उनकी जनतांत्रिक उड़ान के लिए आसमान भी दे। मानवीयता और नैतिकता पर दावा करने की गुंजाइश बचाए रखने के लिए जनता की उस जोरआजमाइश का वक्त पर सम्मान करें जिसे हम जनतंत्र कहते हैं।

किसान नेता राकेश टिकैत ने मांग की थी कि सरकार विरोध प्रदर्शन कर रहे किसानों का कोरोना से बचाव के लिए टीकाकरण करे। उन्होंने सरकार से अपील की थी कि वह आंदोलन स्थल पर टीकाकरण केंद्र खोले। उन्होंने दावा किया कि धरनास्थलों पर किसान शारीरिक दूरी का पूरी तरह पालन कर रहे हैं। राकेश टिकैत ने खुद उत्तर प्रदेश से लगती दिल्ली की सीमा पर आंदोलन स्थल के पास कौशांबी के अस्पताल में जाकर टीका लगवाया था।

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