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मौसम अज्ञानी

रामविलास पासवान की राजनीति को लेकर एक मजबूत समझ थी और उन्होंने अपने जुझारूपन से अपनी जमीन तैयार की थी। वो जिस हाशिए के तबके से आते थे वहां से राजनीति के शीर्ष पर पहुंचना आसान नहीं था।

लोक जनशक्ति पार्टी के नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री राम विलास पासवान के पुत्र चिराग पासवान।

1977 का समय और हाजीपुर की सीट। पूरे देश में एक नाम गूंजा जिसने कांग्रेस उम्मीदवार को सवा चार लाख वोटों से हराया। जनता पार्टी के टिकट पर यह करिश्मा करने वाले नेता का नाम रामविलास पासवान था। इस बड़ी जीत के लिए उनका नाम गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रेकार्ड में भी दर्ज किया गया। वो करिश्माई विरासत आज इस अंजाम पर पहुंची है कि चिराग पासवान खुद को ‘अनाथ’ कहने के लिए मजबूर हो रहे हैं। पासवान जिस हाशिए के समुदाय से आते थे, उसमें से निकल कर सत्ता की चमक बनना आसान नहीं था। पासवान ने ऐसी रणनीति चुनी कि वो सत्ता का हिस्सा बनकर अपनी राजनीति करते रहें। लेकिन उनके वारिस ने इसके उलट दूसरे को नुकसान पहुंचाने की रणनीति चुनी। इसका हासिल यह है कि फिलवक्त वो हाशिए पर अकेले खड़े हैं। राजनीति के मौसम में अज्ञानी साबित हुए चिराग पासवान पर बेबाक बोल

हम खुश हैं हमें धूप विरासत में मिली है
अज्दाद कहीं पेड़ भी कुछ बो गए होते
– शहरयार

दिल्ली में पशुपति कुमार पारस के घर के बाहर चिराग पासवान इंतजार कर रहे हैं और काफी समय तक कोई दरवाजा खोलने वाला नहीं है। चिराग के मुंह पर बंद दरवाजा यही बता रहा कि सिर्फ विरासत मिल जाना काफी नहीं होता है, उसे बचाने की योग्यता भी होनी चाहिए। जब राजनीति के वारिसों पर सवाल उठ रहे थे तब चिराग ने ऐसी पार्टी की कमान संभाली जो उन्हें विरासत में मिली। जाहिर सी बात है, उनके ऊपर बहुत बड़ी जिम्मेदारी थी। लेकिन वो अपने परिवार को ही नहीं संभाल पाए और अपने ही बनाए चक्रव्यूह में फंस गए।

बिहार में विधायक विहीन लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) ने दिल्ली में अपनी अंदरूनी सरकार बदल दी। लोजपा के संस्थापक अगुआ रामविलास पासवान ने आम हिंदुस्तानी सियासतदान की तरह अपनी विरासत बेटे चिराग पासवान को सौंप दी थी। लेकिन आज चिराग के चाचा और परिवार के अन्य सदस्य चिराग को बेदखल कर लोजपा पर कब्जा कर चुके हैं। पार्टी के इस पारिवारिक फेरबदल को किसी क्रांति का नाम नहीं दिया जा सकता क्योंकि परिवार के पांच लोगों ने ही मौसम बदल दिया और यह विरासत के अंदर वाला ही मामला है। राजनीतिक परिदृश्य में इसे कैसे देखा जाए? रामविलास पासवान की बनाई जमीन पर कब्जे की इस जंग का वजह बना बिहार विधानसभा चुनाव का नतीजा।

पिछले काफी समय से चुनाव लोकोन्मुखी नहीं बल्कि अस्मितावादी हो गए हैं। चुनाव में जीत-हार पहले भी होती थी और हारने वाला अगले चुनाव तक शांत बैठ जाता था, क्योंकि जनता ने उसे नकार दिया है। लेकिन जब पहचान की राजनीति हावी है तो चुनावों में निजी हमले ज्यादा होते हैं और चुनाव खत्म होने के बाद उस निजी अपमान पर जीत-हार की अलग लड़ाई शुरू हो जा रही है। यह दृश्य सबसे पहले बंगाल में दिखा कि चुनाव के बाद भी राजनीतिक कटुता का माहौल शांत होने का नाम नहीं ले रहा है। पहले कहा जाता था कि जिंदा कौमें पांच साल इंतजार नहीं करती हैं। अब हाल यह है कि बड़ा नुकसान और अपमान झेल चुके लोग जरा भी इंतजार नहीं करते हैं।

बिहार में बंगाल का यही भाग-2 रूप बदल कर शुरू हो गया है। बिहार में अंतर इतना रहा कि मामला त्रिकोणीय हो गया था। विधानसभा चुनाव की बात करें तो बिहार भाजपा के लिए बहुत अहम राज्य था। यह सच है कि नीतीश कुमार और भाजपा का मेल अक्सर बेमेल हो जाता है। पिछले विधानसभा चुनाव के समय नीतीश कुमार का मजबूत होना भाजपा के लिए कहीं से भी हितकर नहीं था। नीतीश जितना कमजोर होते भाजपा की सियासी सौदेबाजी की क्षमता उतनी ही मजबूत होती। चिराग ने भाजपा के साथ अपना भविष्य देखते हुए नीतीश के खिलाफ बल्लेबाजी शुरू कर दी। पूरे चुनाव में वह निजी तौर पर नीतीश के खिलाफ हो गए।

जातिगत समीकरण में पासवान और सवर्ण जातियों को अपने साथ ले जाने की कोशिश की। दलित धड़े में दरार पैदा कर नीतीश को कमजोर करना चाहा। इन सबका नीतीश कुमार को तो नुकसान पहुंचा ही लेकिन सबसे ज्यादा घाटे में खुद चिराग आ गए। उनकी तो पूरी शक्ति ही खत्म हो गई।

इसके बाद से जद (एकी) खुलकर चिराग के खिलाफ आक्रामक हो गई। लोजपा की बात करें तो इस पूरे घटनाक्रम से चिराग को बहुत बड़ा झटका लगा है। लेकिन पशुपति कुमार पारस कब तक फायदे में रहेंगे यह नहीं कहा जा सकता है। हां, वह जद (एकी) है जिसे इस फूट से सबसे ज्यादा खुशी मिली होगी।

रामविलास पासवान की राजनीति को लेकर एक मजबूत समझ थी और उन्होंने अपने जुझारूपन से अपनी जमीन तैयार की थी। वो जिस हाशिए के तबके से आते थे वहां से राजनीति के शीर्ष पर पहुंचना आसान नहीं था। भले ही उन पर मौसम विज्ञानी का तंज किया जाता था लेकिन वो राजनीति और सामाजिक विज्ञानी थे। उनकी रणनीति थी कि किस तरह अपनी राजनीतिक क्षमता बढ़ाई जाए। जो भी सत्ता में होता था उसके सहयोग से वो अपनी राजनीति को आगे बढ़ाते थे। अपनी अहमियत बढ़ा कर ही वो लोजपा को इस हालत में रखते थे कि वह केंद्रीय सत्ता का हिस्सा बन सके।

चिराग ने अपने पिता की इसी विरासत को नहीं समझा। रामविलास पासवान वजीर की हैसियत के लिए जद्दोजहद करते थे लेकिन चिराग प्यादा बनने के लिए तैयार हो गए। चिराग को लगा कि नीतीश के कमजोर और भाजपा के मजबूत होने पर वो नया समीकरण बनाएंगे और सत्ता का लाभ लेंगे। यह रणनीति पूरी तरह नाकाम रही। चाहे कांग्रेस हो, मिलीजुली सरकार या फिर भाजपा की अगुआई, रामविलास पासवान की हर तरह की सरकार में हिस्सेदारी थी। उन्होंने अपनी पार्टी के वजूद की असलियत को देखते हुए किसी में फर्क नहीं किया। उनके पास एक तरह से सत्ता का ‘सेकुलरिज्म’ था। वो किसी भी दल के साथ-साथ चलते थे और अपना समीकरण बनाते थे। लेकिन चिराग ने आगे के फायदे के लिए पीछे-पीछे चलना स्वीकार कर लिया। इसका नतीजा हुआ कि पिता की बनाई जमीन भी छिन गई।

सवाल है कि क्या पशुपति पारस और उनके साथ के लोग लोजपा को पुरानी रणनीति पर वापस ले जाएंगे? दिल्ली में बैठ कर ऐसा सोचा जा सकता है। लेकिन लोजपा को अपनी लड़ाई बिहार में लड़नी है। अगर हम हाजीपुर और लोजपा के अन्य गढ़ की जमीनी हकीकत देखें तो पार्टी के समर्थक चिराग को लेकर भावुक हैं। लोजपा कोई मध्यवर्गीय तबके की पार्टी नहीं है। हाशिए पर पड़ा समुदाय रामविलास पासवान के कद से खुश था और चिराग को अपने बीच में से निकले एक पढ़े-लिखे नेता के रूप में देखता है।

आगे चिराग के भविष्य का क्या हो सकता है? हम अभी पशुपति कुमार पारस की कही बातों का विश्लेषण करें तो उनके पास भी रामविलास की विरासत के अलावा ज्यादा कुछ नहीं है। तात्कालिक फायदा देखते हुए जो गलती चिराग ने की पशुपति कुमार पारस भी इस फायदे को आगे बहुत दूर तक शायद ही ले जा पाएं। अपनी जाति के बीच वे भी सिर्फ रामविलास पासवान से बनी पहचान ही रखते हैं। देश के कई अन्य क्षेत्रों की तरह ही बिहार की राजनीति भी भावना प्रधान है। कल को अगर अभी के हालात के साथ पशुपति कुमार और चिराग एक साथ चुनाव में उतरेंगे तो जनता की सहानुभूति उस बेटे के साथ हो सकती है जिससे उसका हक छीन लिया गया। उनके लिए यह विरासत वाजिब है क्योंकि रामविलास खुद चिराग को उत्तराधिकारी घोषित कर चुके थे।

रामविलास पासवान ने राजनीति की शुरुआत सोशलिस्ट पार्टी के साथ की थी। लेकिन पूरे देश ने उनका नाम जाना 1977 में जब वो इतने अधिक वोटों के अंतर से जीते कि उनका नाम गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रेकार्ड में शामिल किया गया। यह करिश्माई विरासत आज इस दुखद मोड़ पर खड़ी है। लेकिन यह भी सच है कि राजनीति में संभावनाओं का कोई अंत नहीं है। इस पटखनी के बाद धूल-धूसरित चिराग अपनी जमीन पर मेहनत करें तो उन्हें नया राजनीतिक जीवन मिल सकता है।

उत्तर से लेकर दक्षिण तक है पारिवारिक उलटफेर की राजनीति
भारतीय राजनीति में पारिवारिक उलटफेर उत्तर से लेकर दक्षिण तक की राजनीति का हिस्सा रहा है। उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव अपने बेटे अखिलेश यादव को अपना उत्तराधिकारी चुन चुके थे। लेकिन उनके भाई शिवपाल यादव ने अपनी समांतर शक्ति दिखाते हुए पार्टी को दो फाड़ कर दिया। यह राजनीतिक घमासान लंबा चला और चुनाव आयोग ने अखिलेश यादव के गुट को प्रमुखता दी क्योंकि चुने हुए प्रतिनिधि उनकी तरफ थे।

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