हाल-ए-चौपाल

2012 में यूपीए सरकार की दी गई जानकारी के अनुसार संसद की प्रति मिनट कार्यवाही पर 2.5 लाख रुपए खर्च होते हैं। संसद की एक घंटे की कार्यवाही पर 1.5 करोड़ रुपए और पूरे दिन के काम पर करीब 9 करोड़ रुपए खर्च होते हैं। लंबे अरसे से शायद ही कोई ऐसा सत्र रहा हो जिसमें कामकाज ठीक से हो पाया हो।

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संसद के मानसून सत्र के दौरान सदन का दृश्य।

जबां जबां पे शोर था कि रात खत्म हो गई, यहां सहर की आस में हयात खत्म हो गई।
– महताब जफर

जिसकी संख्या कम होती है, जिसके पास बहुमत नहीं होता उसे ही विपक्ष का दर्जा मिलता है। संसदीय लोकतंत्र में उम्मीद की जाती है कि जनता की आवाज उठाने के लिए विपक्ष सड़क पर रहे और सरकार ऐसी जिम्मेदारी से संसद चलाए जहां सबकी आवाज सुनी जाए। लेकिन पिछले कुछ समय से यह देखा गया है कि सरकारें संसद का इस्तेमाल कानून पास करवाने के औजार के रूप में करती हैं। नए कानूनों और उनमें संशोधनों पर बहस में उसकी कोई दिलचस्पी नहीं रहती। हर पक्ष आरोप लगाता है कि विपक्ष संसद नहीं चलने दे रहा है। पक्ष और विपक्ष के इस स्याह और सफेद में अकसर वह जनता गुम हो जाती है जिससे जनतंत्र का निर्माण होता है। संसदीय कार्यवाही की स्थिति टीवी चैनलों की उस बहस की तरह हो गई है जहां हर कोई शोर करता है, कोई किसी को सुनता-समझता नहीं है। संसद बनाम शोर की इस घातक प्रवृत्ति पर बेबाक बोल

हंगामे की भेंट चढ़ी संसद…। काफी समय से संसद सत्र के दौरान अखबारों से लेकर विभिन्न टीवी चैनल तक यही सुर्खियां बनती रही हैं। उर्दू अदब में हंगामा एक संवेदनशील मिजाज का शब्द है। लेकिन वाया इश्क सियासत की दुनिया में इसका एक ही मतलब रह गया है-असंवेदनशीलता। संसद का मानसून सत्र शुरू होते ही दिल्ली के जंतर-मंतर पर किसानों ने सड़क पर जन-संसद बुलाई। एक किसान आंदोलनकारी मीडियाकर्मी से कह रहा था कि हम इस संसद में हर दिन अलग-अलग मुद्दों पर बहस चलाएंगे। कभी आर्थिक विशेषज्ञ को बुलाएंगे तो कभी विभिन्न दलों के नेताओं को। उसने गहरी पीड़ा में कहा कि अगर संसद में इस पर सार्थक बहस चलती तो हमें सड़क पर यह करने की जरूरत क्यों पड़ती?

संसद में कृषि सुधारों से जुड़े अहम कानूनों को कोरोना की पहली लहर की विभीषिका के बीच विशेष सत्र बुलाकर पारित कर दिया गया था। संसद में बहस हुए बिना कानून बनने का नतीजा यह निकला कि महामारी के बीच सड़क पर किसान उतर पड़े जो सरकार के लिए अब तक की सबसे बड़ी चुनौती बने हुए हैं। इस मुद्दे पर सरकार से आस लगाए बैठे किसानों को संसद की सम्मानित सदस्य मवाली घोषित कर दें तो फिर उनके लिए आगे किसी बहस की क्या उम्मीद बचती है?

संसदीय शब्द का अर्थ ही ऐसी जनतांत्रिक व्यवस्था होता है जहां जनता का प्रतिनिधित्व हो। इसलिए जो भी बहुमत से चुन कर आता है सरकार और संसद चलाने की जिम्मेदारी उसी की होती है। 2012 में यूपीए सरकार की दी गई जानकारी के अनुसार संसद की प्रति मिनट कार्यवाही पर 2.5 लाख रुपए खर्च होते हैं। संसद की एक घंटे की कार्यवाही पर 1.5 करोड़ रुपए और पूरे दिन के काम पर करीब 9 करोड़ रुपए खर्च होते हैं। लंबे अरसे से शायद ही कोई ऐसा सत्र रहा हो जिसमें कामकाज ठीक से हो पाया हो।

संसद में जनता के पैसे की बर्बादी के आंकड़े के साथ प्राय: उसकी दुहाई सत्ता पक्ष की ओर से दी जाती है ताकि विपक्ष पर नैतिक दबाव बनाया जाए। मिनट और घंटे का हिसाब उस सरकार से भी होना चाहिए जिस पर संसद को चलाने की जिम्मेदारी है। लेकिन अब जो सरकार जितनी संख्या के साथ आती है वह विपक्ष को लेकर उतनी ही कठोर हो जाती है। हर सरकार यही इच्छा रखने लगी है कि उसका काम संख्या बल के जोर से हो जाए। कानून दो मिनट में पास हो जाए और बाकी हंगामा होता रहे। संसद न चले तो ही बेहतर है।

अब संसद का मतलब बहुमत से हो गया है। विपक्ष की संख्या कम है, उसके पास बहुमत नहीं है तभी वह विपक्ष है। संसदीय व्यवस्था में बहस करने की जो विपक्ष की भूमिका है उस बहस को भी आयोजित न होने देने की प्रवृत्ति दिल्ली, बिहार से लेकर कर्नाटक तक के सदनों में दिखती है। बहस होगी तो जवाब भी देना पड़ेगा। सरकारों को जवाब और जवाबदेही से बचने की आदत हो गई है। जब आप जवाब देने से बचना चाहते हैं तो विपक्ष पर संसद नहीं चलने देने का आरोप लगाते हैं जो अर्द्धसत्य है। क्योंकि विपक्ष की जीत इसी में है कि बहस हो। अगर बहस होगी तभी वह सत्ता पक्ष को घेर भी सकेगा। सरकार को घेरेंगे तो उसे जवाब देना होगा और यह बहस जनता तक पहुंचेगी।

आज के दौर में संसद की कार्यवाही का जीवंत प्रसारण होता है और कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक की जनता देखती है कि उसके प्रतिनिधि उसके हितों को लेकर कितने जिम्मेदार हैं, नए कानूनों को लेकर उनके पास क्या सोच-समझ और तर्क है। तो इन सबसे बचने का आसान तरीका है कि बहस ही न हो पाए और विपक्ष सिर्फ नारेबाजी करता हुआ दिखता रहे।

भारतीय संसद में उच्च सदन की अवधारणा इसी के तहत रखी गई थी कि उसमें हर क्षेत्र की मकबूल हस्तियांं पहुंच सकें और बहस का स्तर उच्च हो। इसके लिए कला, शिक्षा से जुड़े लोगों को सीधे चुनाव लड़ने के बजाए अप्रत्यक्ष निर्वाचन का प्रावधान रखा गया ताकि इन क्षेत्रों के लोग सदन में पहुंच कर उसे वैचारिक व नैतिक दिशा दे सकें। लेकिन अब वहां से भी कार्यवाही का हासिल सिर्फ शोर है जहां नजारा किसी आम चौपाल पर हुई बहस सा होता है।

संसदीय राजनीति में सबसे अहम होते हैं लोकतांत्रिक मूल्य। अरसे से देखा गया है कि इस लोकतांत्रिक मूल्य की नई परिभाषा गढ़ कर उसे बहुमत का नाम दे दिया गया है। संवैधानिक मूल्य से जनतांत्रिक मूल्य निर्मित होगा या बहुमत से जनतांत्रिक मूल्य निर्मित होगा, यह आज के दौर का सबसे अहम सवाल है। हाल ही में सेवानिवृत्त अधिकारियों के सरकार के खिलाफ ‘प्रतिबंधित सामग्री’ प्रकाशित करवाने पर पेंशन को प्रभावित करने का कानून पारित हो गया। यानी सरकारी अधिकारियों की सरकार के प्रति प्रतिबद्धता को नौकरी के बाद यानी ताउम्र तक विस्तारित कर दिया गया।

जाहिर सी बात है कि ‘प्रतिबंधित’ की परिभाषा हर सरकार अपने अनुसार तय करेगी। यह कानून अच्छा है या बुरा, यह तो हम तब तय करते जब संसद में इसे लेकर कायदे की बहस को सुन पाते। सहकारिता नाम से एक नया मंत्रालय बना दिया गया, जिस पर सुप्रीम कोर्ट को टिप्पणी करनी पड़ गई कि सहकारिता राज्य से जुड़ा मसला है जिसमें केंद्र सिर्फ रूपरेखा तय कर सकता है। संसद का इस्तेमाल जनतांत्रिक व्यवस्था के विकेंद्रीकरण को खत्म करने के लिए किया जा रहा है। लोकतांत्रिक परंपरा में जो बहस है उसकी जगह को काट कर कानून पास करा कर उसे पक्ष-विपक्ष में बांट दिया जा रहा है। तर्क और विवेक को खत्म कर उसे पक्ष-विपक्ष के सफेद और स्याह में सिमटा दिया गया है जो सिर्फ तू-तू, मैं-मैं की संस्कृति ही बना सकती है।

कल तक जो चिंता हम टीवी चैनलों की बहस को लेकर कर रहे थे वही चिंता अब संसद के लिए होने लगी है। पहले टीवी चैनल पर बहस का एक स्तर होता था। पक्ष और विपक्ष अपनी बात रखते थे और खबर प्रस्तोता सूत्रधार का काम करते थे। लेकिन धीरे-धीरे टीवी चैनल की बहस शोर में बदल गई, कौन क्या बोलता है यह समझना मुश्किल हो जाता है। इसी तरह लोकतंत्र को भी शोर में बदलने की हालत में पहुंचा दिया गया है। यहां संसद चलाने की जिम्मेदारी और गैरजिम्मेदारी का ठीकरा विपक्ष पर फोड़ा जा रहा है। सरकारों के लिए संसद कानून पास करवाने का औजार भर रह गई है। संसद की बहस का टीवी चैनल पर तू-तू-मैं-मैं वाला हश्र पूरी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए खतरे की घंटी है। इसका विश्लेषण महज संसद चलने के खर्चे से नहीं किया जा सकता। यह तो पूरे लोकतंत्र की जमापूंजी है जिसे कंगाल किया जा रहा है।

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