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सत्ता के ‘लाल’

ममता बनर्जी ने तो एक राजनेता के रूप में बैठक के नियमों का उल्लंघन किया। लेकिन सरकारी अधिकारी के तौर पर अलापन बंद्योपाध्याय के पास यह अधिकार नहीं है कि वे किसी भी तरह के सरकारी शिष्टाचार का उल्लंघन करें। जनतांत्रिक संस्थानों के नियम कायदे निजी नायकत्व के लिए नहीं होते। प्रशासनिक सेवा की अपनी सीमा और गरिमा है।

पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी तथा पूर्व मुख्य सचिव और वर्तमान में मुख्यमंत्री के सलाहकार अलापन बंद्योपाध्याय।

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राजा के साथ उठने-बैठने वाले लोग इसलिए इतराते हैं क्योंकि वो सत्ता के साथ हैं। कभी खुद ही राजकवि बनने की तमन्ना रखने वाले गालिब ने यह शेर राग दरबारियों के उपहास में लिखा था। लेकिन गालिब के सामंती समय की यह प्रवृत्ति आधुनिक लोकतंत्र में भी बरकरार है। जनतांत्रिक व्यवस्था में चयनितों और निर्वाचितों की स्वतंत्र भूमिका है। लोकतंत्र में अगर निर्वाचितों और चयनितों के बीच साठगांठ हो जाए तो संस्थानों का क्षय तय है। जब निर्वाचित, चयनितों के सहारे राजनीति करने लगें तो भारत जैसे लोकतंत्र के लिए चेत जाने का समय है। छवि प्रबंधन के इस दौर का खौफ यह है कि पद की गरिमा को बरकरार रखने की चिंता किसी को नहीं है। सत्ता के साथ नत्थी नौकरशाही के खतरे पर बात करता बेबाक बोल।

बंगाल में ‘यास’ तूफान से तबाही के बाद कलाईकुंडा में प्रधानमंत्री के साथ समीक्षा बैठक में दो खाली कुर्सियों की तस्वीर ने भारतीय राजनीति के उस चरित्र को फिर सामने रख दिया है जहां सत्ता के साथ जुगलबंदी कर नौकरशाही अपना नायकत्व खोजती है। बैठक में मुख्यमंत्री के साथ सूबे के मुख्य सचिव अलापन बंद्योपाध्याय भी देर से पहुंचे। इतना ही नहीं, वे मुख्यमंत्री के साथ बैठक अधूरी छोड़ निकल भी गए। प्रशासनिक सेवा के अधिकारी मुख्यमंत्री के निजी सहायक की तरह व्यवहार कर रहे थे। इस कदाचार के लिए अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू होते ही वे इस्तीफा देकर मुख्यमंत्री के मुख्य सलाहकार बन गए। बंद्योपाध्याय जिन्होंने अपने संवैधानिक कर्तव्य को छोड़ सत्ता के साथ जुड़ना पसंद किया उन्हें ममता बनर्जी एक शहीद की तरह पेश कर रही हैं। इतिहास के पन्नों पर बंद्योपाध्याय अब वैसे नौकरशाहों में शुमार हो गए हैं जो अपने पद की गरिमा को रिक्त कर सत्ता की कुर्सी के पास जमघट बनाते हैं।

आजादी के साथ ही एक ऐसी केंद्रीय सेवा की रूपरेखा तय हुई जो पूरे देश के लिए हो। लेकिन देश की संघीय राजनीति में क्षेत्रीय क्षत्रपों के उभार के साथ इस सेवा में भी क्षेत्रीयता हावी होने लगी। एक ऐसी व्यवस्था बन गई कि न चाहते हुए भी नौकरशाह केंद्र और राज्य की राजनीति का हिस्सा बन जाते हैं। ऐसे में बहुत से नौकरशाह स्वत: राज्य सरकार के प्रवक्ता की तरह काम करने लगते हैं। ऐसा करते ही वे उस खास सत्ता के साथ नत्थी हो जाते हैं तो अगली सत्ता आते ही सबसे पहले उन्हें हाशिए पर कर देती है।

नौकरशाही का काम होता है सरकार की नीतियों को लागू करना। सरकार की सारी नीति वृहत्तर स्तर पर स्वीकृत नहीं होती है। लेकिन, उन नीतियों के साथ नौकरशाह का चेहरा जुड़ जाता है। अगली सत्ता को उस नीति से दिक्कत होती है तो उन नौकरशाहों से भी दिक्कत होती है जो उसके साथ जुड़े थे। हालांकि इस सेवा की बुनियादी अवधारणा यही थी कि इसका नियंत्रण केंद्र के पास होगा। चूंकि नौकरशाह ज्यादातर वक्त राज्य के नेताओं के साथ रहते हैं तो उन्हीं की पहचान बन जाते हैं। अगर केंद्र में आते भी हैं तो तयशुदा समय के लिए और उसके बाद उन्हें राज्य में जाना होता है। एक सरकार में किसी को मुख्य सचिव या प्रधान सचिव बनाने के लिए किसी मुख्यमंत्री ने बीस अधिकारियों की वरिष्ठता की अनदेखी कर दी। लेकिन उस मुख्यमंत्री के जाते ही अगली सरकार उस अधिकारी को कनिष्ठतम पद पर भेज देगी। इस कारण नौकरशाह हमेशा खास तरह के दबाव में होते हैं।

बंगाल में देखें तो राजनीतिक तौर पर ममता बनर्जी का अपना स्वाभिमान हो सकता है। लेकिन, मुख्यमंत्री के तौर पर उन्हें अपने संवैधानिक कर्तव्य का ध्यान रख प्रधानमंत्री की बैठक में देर से नहीं आना चाहिए। प्रधानमंत्री पद की एक गरिमा होती है जिसका ध्यान रखना चाहिए। एक राजनीतिक के तौर पर वे नाराज हो सकती हैं कि मेरे विरोधी विधायक को बैठक में क्यों बुला लिया, आरोप लगा सकती हैं कि ऐसा मुझे अपमानित करने के लिए किया गया। उस वक्त अपने पद की गरिमा का ध्यान रखते हुए वे इसे नजरअंदाज कर सकती थीं। ममता बनर्जी को बैठक की प्रक्रिया से जो भी दिक्कत हुई वे बाद में प्रधानमंत्री दफ्तर से अपनी शिकायत रख सकती थीं। लेकिन उन्हें जनता से ज्यादा अपनी निजता की चिंता हुई। जब उनके राज्य की जनता महामारी से लेकर तूफान की तबाही की दोहरी मार से जूझ रही थी तब उन्होंने जनहित के लिए हुई बैठक का इस्तेमाल अपना हिसाब-किताब पूरा करने के लिए किया।

ममता बनर्जी को इस बात का भी अहसास था कि उनका यह कदम राज्य की जनता के हित में नहीं था। उन्हें अपने जनप्रतिनिधि होने की चिंता हुई तभी उन्होंने अपनी छवि बचाने के लिए कहा कि बंगाल के भले की बात हो तो मैं प्रधानमंत्री के पैर छूने के लिए भी तैयार हूं। अगर उन्होंने मुख्यमंत्री के तौर पर पहले ही सूबे की जनता के भले के लिए सोचा होता तो पैर छूने वाले संवाद बोेलने की जरूरत ही नहीं पड़ती। बैठक के नियमों को तोड़ना और पैर छूना ये दोनों मुख्यमंत्री की गरिमा के खिलाफ हैं। हां ये लोकलुभावन जरूर हैं और थोड़ी देर के लिए कथित बहादुरी वाली वाहवाही भी बटोरी जा सकती है। लेकिन ऐसे लोकलुभावन टोटको से नुकसान होता है तो सिर्फ लोक का।

ममता बनर्जी ने तो एक राजनेता के रूप में बैठक के नियमों का उल्लंघन किया। लेकिन सरकारी अधिकारी के तौर पर अलापन बंद्योपाध्याय के पास यह अधिकार नहीं है कि वे किसी भी तरह के सरकारी शिष्टाचार का उल्लंघन करें। जनतांत्रिक संस्थानों के नियम कायदे निजी नायकत्व के लिए नहीं होते। प्रशासनिक सेवा की अपनी सीमा और गरिमा है। ऐसे कई उदाहरण हैं जब नौकरशाह तत्कालीन सत्ता के भरोसे अपना चेहरा चमकाने का सुख लेते रहे हैं, लेकिन वह बहुत कम समय के लिए होता है।

इस पूरे संदर्भ में एक बुनियादी सवाल आता है कि सरकार का मतलब क्या हुआ? सरकार का मतलब विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका का स्वस्थ और स्वतंत्र संबंध है। कार्यपालिका का संदर्भ सरकार चलाने से होता है। पुलिस से लेकर नौकरशाही तक सरकार का हिस्सा हैं। हमारी व्यवस्था में नेतृत्व विधायिका से आता है। जो मंत्री बनते हैं वे कार्यपालिका का हिस्सा हो जाते हैं। प्रधानमंत्री से लेकर मुख्यमंत्री तक इसी कार्यपालिका का हिस्सा हैं। बिना नौकरशाही को साथ मिलाए कार्यपालिका चल ही नहीं सकती है।

लोकतांत्रिक व्यवस्था में नौकरशाहों की स्वतंत्र भूमिका है। सत्ताधारी दल न तो उनके साथ अपने निजी कर्मचारी की तरह व्यवहार कर सकता है और न उस पर बदले की कार्रवाई कर सकता है। लोकतांत्रिक संस्थाएं कॉरपोरेट के ‘बॉसवाद’ की तरह नहीं चलती हैं। ये संस्थाएं स्थायी होती हैं लेकिन जनप्रतिनिधि बदलते रहते हैं। हर जनप्रतिनिधि यह जानता है कि वह किसी और को हटा कर उसकी जगह पर आया है, लेकिन यह याद नहीं रखना चाहता कि कल उसे भी हटाने वाला आएगा। वह किसी सिनेमाई बाहुबली की तरह अपने वचन को ही शासन मानने लगता है। नौकरशाह को भी वह सत्ता स्थायी दिखने लगती है और वे उसके नायकत्व में अपना भविष्य देखने लगते हैं।

मौजूदा राजनीति में वर्चस्व स्थापित करने की प्रवृत्ति लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा है। विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के स्वतंत्र रहने से ही लोकतांत्रिक ढांचा अपना काम कर सकता है। आज के दौर में जनप्रतिनिधि चुने जाने के बाद भी अपनी छवि के शक्ति प्रदर्शन में सारी ऊर्जा झोंक देते हैं। ऐसे में सरकारी अधिकारियों को राजनीति का मोहरा बनाए जाने के खिलाफ ठोस विमर्श की जरूरत है। छवि प्रबंधन के इस असाधारण समय में सबसे मुश्किल है साधारण रहना। नौकरशाही की गुणवत्ता उसके साधारण रहने में ही है। ज्यों ही वह सत्ता के असाधारण को धारण करती है, उसका क्षय शुरू हो जाता है। चिंता यह है कि बंगाल से दिखा यह उदाहरण भारतीय राजनीति में आम न हो जाए।

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