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भाजपा के प्रवक्ता भले बंगाल में बढ़ी सीटों को अपनी उपलब्धि बता रहे हों। लेकिन आपने 200 सीटों का जो गुब्बारा फुलाया था उसकी हवा निकलने की वजह पूछनी ही पड़ेगी। बंगाल में खराब प्रदर्शन के बाद इसका जिम्मेदार किसे ठहराया जाएगा?

भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा।

बंगाल में जीतेंगे 200
जगत प्रकाश नड्डा की अगुआई वाली भारतीय जनता पार्टी बंगाल में 200 सीटें जीतने का दावा कर रही थी, तभी तृणमूल कांग्रेस को अपनी सेवाएं दे रहे राजनीतिक रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने कहा कि भाजपा को दहाई अंक पार करने के लिए संघर्ष करना पड़ेगा। बंगाल में भाजपा 200 सीटों के बड़बोलेपन के बिना उतरती तो उसकी 77 सीटों की जीत पर मुबारकबाद दी जा सकती थी। लेकिन अब जबकि बंगाल में प्रशांत किशोर सही साबित हो गए हैं तो 200 का गुब्बारा फूटने की जिम्मेदारी भाजपा अध्यक्ष के कंधों पर ही आएगी। किसी दल के अगुआ और राष्ट्रीय नेता कोई नारा देते हैं तो उसका एक मान होता है। उस नारे की नाकामी से विश्वसनीयता का संकट भी पैदा होता है। भाजपा अध्यक्ष के तौर पर बंगाल नड्डा की पहली बड़ी परीक्षा थी जिसमें वे अपने दिए आंकड़े से बहुत दूर हैं। बंगाल जैसे गैर हिंदी प्रदेश और दक्षिण भारत में भाजपा की रणनीति की नाकामी का जिम्मेदार कौन, यही सवाल पूछता बेबाक बोल

तमिलनाडु और केरल के विपरीत भाजपा ने पश्चिम बंगाल में जीत के इस आंकड़े का बड़े आत्मविश्वास से एलान किया था। जीत के लिए पूरी ऊर्जा भी झोंक दी गई थी। लेकिन 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद बंगाल की हार एक ऐसा मोड़ है जहां से भाजपा के विजय रथ की दिशा ही बदल गई। 2014 के लोकसभा चुनावों में जीत के बाद उत्तर प्रदेश और अन्य क्षेत्रों में भगवा परचम लहराने का श्रेय दिया गया था पार्टी के तत्कालीन अध्यक्ष अमित शाह को। 2014 के लोकसभा चुनाव में शाह ने उत्तर प्रदेश का जिम्मा थामा और वहां की 80 में से 73 सीटों पर जीत दिला कर भारतीय राजनीति का इतिहास बदल दिया। इसके बाद अमित शाह भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष चुने गए। उनकी अगुआई में जिन राज्यों में भाजपा बहुमत से जीती वहां और जहां नहीं जीती वहां भी कुछ दिनों बाद भाजपा की सरकार बन गई। पार्टी अध्यक्ष के तौर पर उन्होंने उत्तर भारतीय राज्यों में भाजपा की जीत का जो विस्तार किया उसके बाद उन्हें आधुनिक चाणक्य कहा गया। उन्हीं की अगुआई में 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने 303 लोकसभा सीटों के साथ सत्ता में शानदार वापसी की।

अमित शाह के बाद जब जेपी नड्डा ने 2020 की जनवरी में भाजपा की कमान संभाली तो सबसे पहला सवाल यही उठा था कि क्या ये अपने पूर्ववर्ती के राजनीतिक कद के अनुसार पार्टी को संभाल पाएंगे। क्योंकि पार्टी में अब तक की सारी राजनीतिक सफलता का श्रेय अमित शाह को ही दिया जाता था। यही माना जाता रहा है कि शाह ऐसा ताना-बाना बुनते हैं जिसके बाद चुनाव की सारी फिजा बदल जाती है। भाजपा अध्यक्ष बनने के बाद पश्चिम बंगाल में नड्डा की पहली बड़ी परीक्षा थी। लेकिन उनके परीक्षा परिणाम पर जनता की ओर से प्रतिक्रिया आई कि भाजपा अपराजेय नहीं है और उसके विजय रथ को रोका जा सकता है।

हमारे यहां कहावत है कि वो इतना कमा गया कि उसकी सात पुश्तें बैठ कर खाएंगी। लेकिन किसी संगठन के साथ यह कहावत चरितार्थ नहीं होती है। किसी कुशल प्रधान की सांगठनिक कमाई मिलने के बाद आप बस कुछ समय तक ही अपना काम चला सकते हैं। लेकिन उसके बाद आपकी नई टीम और कार्यशैली होती है। इस समय प्रधान नड्डा थे, रणनीति उनके नाम थी तो इस हार का ठीकरा उनके ही खाते में जाएगा।

तमिलनाडु में भाजपा का जिस कदर कमतर प्रदर्शन रहा, वह भाजपा के लिए सवालिया निशान है ही, सबसे अहम है केरल की विधानसभा सीटों से सफाया होना। बाढ़ हो या महामारी, केरल एक प्रतीक बन चुका है लोककल्याणकारी राज्य का। अगर नड्डा के नेतृत्व में केरल से विदाई हुई है तो यह दक्षिण में भाजपा के दुर्ग बनाने का स्वप्न भंग भी है।

पांच राज्यों के चुनाव में नड्डा की अगुआई वाले रणनीतिकारों ने पश्चिम बंगाल को नाक की लड़ाई की तरह पेश किया। नतीजतन राष्ट्रीय मीडिया में सबसे ज्यादा चर्चा हुई बंगाल की। जिस बंगाल में आपने मुख्यमंत्री का चेहरा तक नहीं दिया था वहां आपने 200 सीटों का नारा दिया, वह भी तृणमूल और दूसरे दलों से आए दलबदलुओं के भरोसे। संघ के जमीनी कार्यकर्ता तृणमूल छोड़ कर आए नेताओं को टिकट देने से पहले ही नाखुश थे। इसके साथ ही सांसदों को विधानसभा चुनाव का टिकट देने का बेतुका फैसला भी किया गया। बाबुल सुप्रियो, स्वप्न दासगुप्ता और लॉकेट चटर्जी जैसे बड़े चेहरे तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवारों के सामने तिनके जैसे भी नहीं टिक पाए।

भाजपा के प्रवक्ता भले बंगाल में बढ़ी सीटों को अपनी उपलब्धि बता रहे हों। लेकिन आपने 200 सीटों का जो गुब्बारा फुलाया था उसकी हवा निकलने की वजह पूछनी ही पड़ेगी। बंगाल में खराब प्रदर्शन के बाद इसका जिम्मेदार किसे ठहराया जाएगा? क्या कोई ऐसा है जो पार्टी को उसकी जमीनी हकीकत के खिलाफ गुमराह कर रहा है?

इसके पहले भाजपा ने हरियाणा विधानसभा चुनाव में भी सीटों को लेकर बड़बोलापन दिखाया था। 2019 के विधानसभा चुनाव में मनोहरलाल खट्टर की अगुआई में भाजपा ने नारा दिया था अबकी बार 75 पार। लेकिन वहां भाजपा गठबंधन को महज चालीस सीटें मिलने के बाद दुष्यंत चौटाला का साथ लेना पड़ा था। दुष्यंत के मनोहरलाल खट्टर के साथ आने की व्याख्या शिवसेना के नेता संजय राउत ने की थी। तब उन्होंने कहा था कि महाराष्ट्र में हरियाणा जैसा नहीं हो सकता क्योंकि यहां पर कोई दुष्यंत चौटाला नहीं है जिसके पिताजी जेल में हैं।

शाह के नेतृत्व में हिंदी प्रदेशों पर भाजपा का परचम कायम हो गया था। उसके बाद नड्डा की असली परीक्षा गैर हिंदी प्रदेशों में थी। चाहे बंगाल हो या दक्षिण में तमिलनाडु व केरल। यहां की पहचान हिंदी भाषी राज्यों से अलग है। हिंदी प्रदेश में पहचान के आधार पर ध्रुवीकरण करने का सिलसिला कामयाब होता रहा है। लेकिन बंगाल और दक्षिण के राज्यों में आपको वहां के जमीनी हालात के हिसाब से रणनीति बनानी थी जिसमें आप नाकाम रहे।

खास कर तमिलनाडु में जिस तरह से द्रविड़ विचारधारा की राजनीति को नई पहचान मिली है उसे देख लगता है कि भाजपा ने अपने आसान पाठ्यक्रम के बाहर के अध्यायों को ठीक से समझने की कोशिश ही नहीं की। बंगाल और केरल की चेतना का स्तर हिंदी क्षेत्र से अलग है। बंगाल और केरल में बुद्धिजीवियों की अपनी भूमिका थी। केरल तो अपने कोविड योद्धा होने का तमगा लेकर ही चुनाव में उतरा था। ऐसी जगहों पर भी नड्डा हिंदी पट्टी पर चढ़ाई जा चुकी ध्रुवीकरण की काठ की हांडी वाली रणनीति लेकर ही पहुंचे और बुरी तरह खारिज हुए।

अगर बंगाल में आपने 200 सीटों का दावा न कर कड़े मुकाबले का जज्बा दिखाया होता तो वह आपकी हार को भी सम्मान दिलाता। अगर आप सिर्फ मजबूत चुनौती देने के बाद आते तो आपकी 77 सीटों के लिए मुबारकबाद दी जाती। लेकिन आपने पहले ही 200 का हवाई किला बना दिया। अब तृणमूल के 213 के सामने आपसे पूछा जाना लाजिम है-बस 77 ही?

किसी राष्ट्रीय अध्यक्ष या किसी राष्ट्रीय नेता के दिए नारे की अपनी एक प्रतिष्ठा होती है। उसका एक मान होता है। नारा नाकाम होने के बाद इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा? आपकी आंकड़ेबाजी ने बंगाल में प्रशांत किशोर को सही साबित कर दिया और नतीजों के बाद वे अपने आंकड़ों के साथ नायक की तरह मुखातिब थे। प्रशांत तो एक चुनावी व्यवसायी हैं और चुनावों के पहले आंकड़ेबाजी करना उनकी कंपनी का पेशा रहा है। उनके लिए राजनीतिक दल महज ग्राहक हैं। लेकिन भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष एक ऐसी पार्टी की अगुआई कर रहे हैं जिसका बड़ा जनाधार है। जनाधार वाली पार्टी के नेता अगर प्रशांत किशोर की तरह आंकड़ों के फेर में पड़ेंगे, तो फिर पेशेवर के आगे मात ही खाएंगे।

बंगाल में 200 सीटों के दावे के साथ मैदान में उतरना अतिरेक था। ऐसे अतिरेक का गुब्बारा फूटने के बाद विश्वसनीयता का संकट पैदा होता है। आज बंगाल में बेहतर करने के बाद भी 200 के बड़बोलेपन ने नड्डा की नेतृत्व क्षमता को सवालों के घेरे में खड़ा कर दिया है।

जीत-हार के तमाम विश्लेषणों के इतर ममता बनर्जी को स्त्री शक्ति के तौर पर देखा जा रहा है। ममता बनर्जी ने महिलाओं को ध्यान में रख कर जिन जनकल्याणकारी योजनाओं की शुरुआत की थी वो उन्हें महिला मतदाताओं के बीच लोकप्रिय बनाने में कामयाब रही। तृणमूल के चुनावी घोषणापत्र में हर घर की अभिभावक महिला को न्यूनतम आय, महिला छात्रावास और पेंशन खिड़की मुहैया कराने जैसी घोषणाओं के कारण ममता को महिलाओं का साथ मिला।

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