बेखबरिया बालम

महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव से लेकर हाल में गुजरात के नए मुख्यमंत्री के चयन तक। खट्टर से लेकर भूपेंद्र पटेल तक सब फेल हैं लेकिन चैनलों का ‘मुख्यमंत्री कौन बनेगा’ का खेल बदस्तूर जारी हो जाता है।

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खबरिया चैनल पर अपनी बात रखने का अलग ही अंदाज हो गया है। सच को झूठ और झूठ को सच साबित करने वाला खेल।

तालिबान लड़ाकों ने मुल्ला बरादर से पूछा कि जनाब, हमारा अगला कदम क्या होगा? मुल्ला बरादर ने कहा, टीवी पर भारतीय चैनल लगाओ तो मुझे भी पता चल जाएगा कि मैं आगे क्या कर सकता हूं। सोशल मीडिया पर चला यह मजाक उन चैनलों का सच है जिन्हें यह खबर नहीं होती कि रुपाणी के बाद गुजरात का अगला मुख्यमंत्री कौन होगा लेकिन अपना कार्यक्रम ‘मुख्यमंत्री कौन बनेगा’ उसी आत्मविश्वास से चलाते हैं जैसे अफगानिस्तान में तालिबान की एक-एक बात जानते हैं। मुश्किल यह है कि इस तरह की खबरों को गोदी मीडिया बताने वाले वैकल्पिक नाम भी पत्रकारिता के नाम पर दूसरे अखबारों में छपी खबरों के विश्लेषक बन जाते हैं। कथित गोदी और स्वयंभू गैर-गोदी, चैनल चाहे कोई भी हो; एंकर और दर्शक को सीधे प्रसारण में ही एक साथ पता चलता है कि कौन आया, कौन गया या क्या हुआ। बे-खबर होती बेसाख पत्रकारिता पर बेबाक बोल

क्यूं नहीं लेता हमारी तू खबर
ऐ बे-खबर
क्या तिरे आशिक हुए थे
दर्द-ओ-गम खाने को हम
– नजीर अकबराबादी

‘समस्या सबके सामने है। पार्टी में समस्या है, परिवार में समस्या है। जो विधायक थे इसलिए दुखी थे कि वो मंत्री नहीं बने…मंत्री इसलिए दुखी थे कि उनको अच्छा विभाग नहीं मिला…जिनको अच्छा विभाग नहीं मिला वो इसलिए दुखी थे कि वो मुख्यमंत्री नहीं बन पाए। और जो मुख्यमंत्री बन पाए वो इसलिए दुखी हैं कि कब रहेंगे और कब जाएंगे इसका भरोसा नहीं।’

ये बोल हैं केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी के। गडकरी उन राजनेताओं में से हैं जो हंसते-हंसाते हुए राजनीति के सच को बेबाकी से सामने रख जाते हैं। इसके पहले भी वे इस तरह के सच बोलते रहे हैं। गडकरी ने आज की राजनीति का यह सच सामने रख दिया है कि अब तो मुख्यमंत्री को भी अपने बारे में पता नहीं कि कल उनका क्या होगा। लेकिन खबरिया चैनल दर्शकों को इस मुगालते में रखते हैं कि उन्हें सब पता है। वे सब जानते हैं।

महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव से लेकर हाल में गुजरात के नए मुख्यमंत्री के चयन तक। खट्टर से लेकर भूपेंद्र पटेल तक सब फेल हैं लेकिन चैनलों का ‘मुख्यमंत्री कौन बनेगा’ का खेल बदस्तूर जारी हो जाता है। हाल ही में एक राजनेता ने कहा, फिलहाल यही रणनीति चल रही कि जिन्हें मंत्री या मुख्यमंत्री नहीं बनाना है उनका नाम एक-दो सूत्रों के हवाले से आगे कर दो। उसके बाद चैनल उस नाम पर शोर मचाएंगे और सरकार इतनी खामोशी से एक नए चेहरे को सामने कर देगी कि आपके पास उसे ‘मास्टरस्ट्रोक’ कहने के अलावा कोई चारा नहीं बचेगा। पत्रकार अपनी नाकामी के बाद राज्यसभा के संभावित सदस्य कुमार विश्वास को जवानी के आडवाणी तो नितिन पटेल को सुशील मोदी की कुंडली वाला बता कर पल्ला झाड़ लेंगे। लेकिन अपनी भविष्यवाणी वाली पत्रकारिता से बाज नहीं आएंगे।

2019 में राजग की लगातार दूसरी जीत के बाद कोई चैनल उन चेहरों के नाम सामने नहीं ला सका था जिन्हें मंत्रिमंडल में शामिल किया गया। दर्शक सिर्फ कालीन और कुर्सियों को देखते रहने के लिए मजबूर थे जहां तक टीवी कैमरों की पहुंच थी। मंत्रियों के नाम के बारे में दर्शक और एंकर एक साथ तभी जान पाते जब मंत्री जी पद और गोपनीयता की शपथ लेने के लिए मंच पर पहुंचते। कोरोना महामारी के बाद बहुप्रतीक्षित मंत्रिमंडल फेरबदल ने तो राजनीति और मीडिया के बीच सूत्रों का संबंध ही खत्म कर दिया। सारे सूत्र आश्चर्य, आश्चर्य कह कर खुद आश्चर्य चकित थे और दर्शक बस उनकी उछल-कूद देखने के लिए मजबूर।

लगातार ऐसा होने के बाद कुछ चैनलों के लिए अपनी राख हुई साख को ढकने का एक ही उपाय था कि सभी एंकर की वर्दी बदल दी जाए या समाचार कक्ष में भागदौड़ के दृश्य बना दिए जाएं। उन्हें एक खास साज-सज्जा के परिधान में लाया जाए कि दर्शक सिर्फ ‘दर्शक’ रहे, दृश्यों में खबर खोजने की हिमाकत न करे। अब आपके पास खबर नहीं है तो आप अपने एंकरों के परिधान पर लगे तितलीनुमा जड़ाऊ गहने (ब्रोच) को तो खबर बनवा ही सकते हैं। एंकर शोधपरक खबर चलाते हैं कि प्रधानमंत्री ने कितनी बार ‘देश’ बोला कितनी बार ‘प्यारे देशवासियों’ कहा, तो सोशल मीडिया पर खबर चलती है कि एंकर ने खबर पढ़ते वक्त कितनी बार बाल झटके या कौन से चैनल के एंकर के परिधान और उनकी साज-सज्जा सबसे उम्दा है।

खबरिया चैनलों ने दृश्यों के बाजार को भुनाने के लिए लोकतांत्रिक राजनीति को एक उत्पाद में बदल दिया। इसकी शुरुआत हुई थी चुनाव सर्वेक्षण से। इस सर्वेक्षण के बहाने सनसनी पैदा कर ध्रुवीकरण का माहौल बना दिया जाता था। सड़क, बिजली, पानी, अस्पताल, महंगाई और रोजगार के बजाय जाति और धर्म का विश्लेषण, चुनावी विश्लेषण के नाम पर किया जाने लगा। आज जो योगेंद्र यादव जैसे नेता वैकल्पिक राजनीति का बाजार बना रहे हैं, उनकी पहचान इसी चुनावी विश्लेषण के बाजार से बनी थी। जमीन से जुड़े पत्रकारों को हटा कर टीवी पर आंकड़ा विश्लेषकों को लाया गया। आंकड़ेबाजी के उस खेल में उन खबरनवीसों के लिए जगह नहीं बची जो चुनाव के समय टूटी सड़क और बदहाल अस्पतालों की खबरें लाकर चुनावी उम्मीदवारों से सवाल पूछते थे। डाटा पत्रकारिता अकादमिक होने के नाम पर असल पत्रकारिता की जमीन निगल चुकी थी। जो चुनाव विश्लेषक कल तक चुनाव को एक बाजारू उत्पाद बना चुके थे आज उसी टीवी चैनल पर लोकतंत्र के खत्म होने का रोना रोते हैं। ये रोना तब शुरू हुआ जब इनके चुनाव सर्वे नाकाम होने लगे और इनकी आंकड़ेबाजी पर चुनाव आयोग तक ने हस्तक्षेप कर दिया। ‘एग्जिट पोल’ तक आते-आते यह पूरा बाजार नाकाम हो चुका है। चुनावी नतीजों से लेकर मंत्रियों का चयन सब कुछ एक आश्चर्य की तरह सामने आता है।

कौन बनेगा प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री जैसी भविष्यवाणी वाली पत्रकारिता ने पूरे लोकतंत्र को एक तरह के सट्टा बाजार में धकेल दिया। चाहे बाजार हो, क्रिकेट हो या राजनीति जहां भी उम्मीद जुड़ती है उन्हीं उम्मीदों का दोहन करने के लिए सट्टा बाजार भी आता है। यह बाजार का चरित्र है कि वह अपने साथ इस तरह की चीजें लाएगा ही। चुनाव उसके लिए जनतंत्र की एक परिघटना नहीं बल्कि मुनाफा कमाने का उत्पाद है और इसे किस तरह की डिब्बाबंदी में बेचा जाए, सब उसी में उलझे हैं।

एक समय था जब ‘दूरदर्शन’ की आलोचना सरकारी चैनल कह कर की जाती थी। उसकी आवाज को सरकार की आवाज मान लिया जाता था। निजी चैनल ये दावा करते हुए आए थे कि सरकारी भोंपू बन कर नहीं, जनता और पत्रकारिता के नजरिए से खबरें दिखाएंगे। लेकिन आज ‘दूरदर्शन’ देख कर कम कम से कम सरकार की आवाज तो सुनने का सुकून होता है। आज हर निजी चैनल ने अपनी-अपनी पक्षकारिता चुन ली है। किसी पर पक्ष का तो किसी पर विपक्ष का प्रवक्ता बनने के आरोप हैं। कोई सत्ता पक्ष को अजर-अमर साबित करने में जुट जाता है तो किसी आत्ममुग्ध पत्रकार को लगता है कि उसने खबर चला दी तो कन्हैया कुमार को बिहार में बेगूसराय से जीत ही जाना चाहिए था। अगर कन्हैया कुमार नहीं जीते तो दोष उस महान एंकर का नहीं, जनता का है जिसने उनके चैनल के हिसाब से नतीजे नहीं दिए।

कई चैनल चुनाव के समय शुरू होते हैं। बाद में कहां चले जाते हैं, पता भी नहीं चलता। अब चैनल खोलना भी एक तरह का राजनीतिक निवेश बन गया है।

कुल मिलाकर पत्रकारिता की विश्वसनीयता खत्म होने जैसा वातावरण बना दिया गया है। चैनलों को मुगालता है कि वे अपने हिसाब से देश में राजनीतिक धारणा बना रहे हैं। लेकिन आज असलियत यह है कि चैनल की खबरों से ज्यादा लोकप्रिय उसके मीम और विश्लेषण हो जाते हैं। खासकर पढ़ा-लिखा मध्यवर्ग पत्रकारिता के विश्लेषण का पाठक और दर्शक हो गया है। यह वर्ग टीवी चैनल पर जाता है और एंकरों के फैशन, कपड़ों और बुरी पत्रकारिता की आलोचना सोशल मीडिया पर करता है। वह जान गया है कि खबरों के मामले में इनकी कोई साख नहीं है। राजनेता इन पत्रकारों को बुलाते हैं तो सिर्फ दिवाली मिलन के लिए और उनके सोशल मीडिया खाते पर उनकी वही सबसे बड़ी उपलब्धि भी दिखती है। उनके पास दिखाने के लिए साधारण खबर भी नहीं है तो कोई अपने कपड़ों से तो कोई दूसरे अखबारों के विश्लेषण से असाधारण बनने की कोशिश करता है। वैसे इन्हें खबर तो होगी ही कि कितने बे-खबर हैं ये।

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