जेब में सरकारी छेद

हर तरफ से थक-हार कर सरकार मुद्रीकरण के नाम से अर्थव्यवस्था के लिए नई उम्मीद लेकर आई है। वैसे भी लगातार सब कुछ बेच देने के आरोपों से सरकार बहुत परेशान हो रही थी। इससे राजनीतिक स्तर पर परेशानी और बदनामी हो रही थी। अब ‘मुद्रीकरण’ के साथ बेचने का ठप्पा हट गया। सरकार का दावा है कि यह सब ‘गुड गर्वनेंस’ के लिए किया जा रहा है।

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नोटबंदी के बाद देशबंदी की कड़ी के साथ अर्थव्यवस्था ऐसी हालत में जा पहुंची कि घरेलू विकास दर ऋणात्मक में चली गई।

खुश है जमाना, आज पहली तारीख है…किशोर कुमार की आवाज में फिल्म ‘पहली तारीख’ के गाने के ये बोल भारतीय नौकरीपेशा तबके पर खूब जंचते थे। लेकिन अब इस वर्ग के पास पहली तारीख वाली वह खुशी भी नहीं रह गई। तनख्वाह आने के संदेश के साथ सिलेंडर गैस की कीमतें बढ़ने का संदेशा आ जाता है। 2014 में आई ऐतिहासिक सरकार सब कुछ बेच देने के आरोपों से परेशान हुई तो उसने मुद्रीकरण की योजना पेश कर दी। मुश्किल यही है कि नोटबंदी से लेकर अब तक इस सरकार की नीतियों ने उसी तबके की जेब खाली की है जिसके नाम पर जनकल्याणकारी योजनाएं बनती हैं। मौजूदा सरकार ने अपनी उज्ज्वला योजना के विज्ञापन पर दिल खोल कर खर्च किया था। अब लगता है कि सरकार उसी तबके से इस खर्च की भरपाई करना चाहती है जिसके लिए यह योजना लेकर आई थी। लोगों की जेब खाली कर खजाना भरने के इस शास्त्र पर बेबाक बोल

‘नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के लिए आरएफपी किसने मंगाया था…क्या यह अब ‘जीजाजी’ के स्वामित्व में है’। केंद्र सरकार के छह लाख करोड़ की राष्ट्रीय मुद्रीकरण पाइपलाइन की योजना पर विपक्ष के नेता राहुल गांधी के सवाल उठाने पर केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने इस तरह ‘जीजाजी’ वाली भाषा में जवाब दिया।

देश ही नहीं दुनिया के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में से एक जेएनयू निर्मला सीतारमण जैसी अपनी पूर्व विद्यार्थी पर गर्व करता है। लेकिन इस तरह की भाषा के बाद जेएनयू भी शर्मिंदा हुआ होगा। अमूमन महीने की पहली तारीख को आम आदमी की नजर अपने मोबाइल पर होती है कि उसके खाते में तनख्वाह के कितने पैसे आए। लेकिन महीने के पहले ही दिन सरकार ने संदेशा भेजा कि रसोई गैस के सिलेंडर में 25 रुपए का इजाफा कर दिया गया है। आम लोगों की तनख्वाह तीस दिन में एक बार आती है, लेकिन पंद्रह दिन के ही अंदर रसोई गैस की कीमत में इजाफा कर दिया जा रहा है।

जिस सरकार को अपने खजाने की इतनी चिंता है, जो 2014 के बाद से ही पैसा-पैसा कर रही है उसे आम आदमी के बजट और खजाने की कोई चिंता ही नहीं है। आखिर नीतियों में ऐसा ठहराव क्यों हो गया है कि प्रेस कॉन्फ्रेंस तक में आर्थिक विशेषज्ञ की भाषा में बात नहीं की जा सकती है। देश की अर्थव्यवस्था पर अहम सवालों के जवाब गोविंदा मार्का गीत ‘मैं चाहे ये करूं, मैं चाहे वो करूं…मेरी मर्जी, के तर्ज पर दिए जा रहे हैं।

इसकी वजह यह है कि ऐतिहासिक स्तर का चुनाव जीतने के कुछ समय बाद ही नोटबंदी जैसा कदम उठा लिया गया। उससे अर्थव्यवस्था को जो झटका लगा उस पर कोई बात करने को तैयार नहीं था, उसके फायदे गिनाने वाला कोई नहीं था। अलबत्ता उसके नुकसान पर बात करना कुछ-कुछ देशद्रोह जैसा मान लिया गया। उसके बाद बिना मुकम्मल तैयारी के देश की अर्थव्यवस्था पर जीएसटी थोप दी गई। इसमें कोई शक नहीं कि इन दोनों का देश की अर्थव्यवस्था को तगड़ा झटका लगा।

जीएसटी ने राज्य सरकारों को कंगाली की हालत में ला दिया। उनके पास भू-राजस्व और ईंधन तेलों पर कर के अलावा आमदनी का कोई जरिया बचा ही नहीं। अब सब कुछ केंद्र सरकार का था। इन सबकी वजह से अर्थव्यवस्था गिरी तो उसका नुकसान उद्योगपति घरानों को भी हुआ। बाजार नीचे आने के बाद उद्योगपतियों ने मदद मांगी, अखबारों में उद्योगों की बदहाली के विज्ञापन छपने लगे। इस हालात से उबरने के लिए कोरोना के ठीक पहले 2019 के अंत में सरकार ने कारोबारियों को करों में भारी छूट दी। कॉरपोरेट टैक्स में छूट का सीधा मतलब था सरकार का अपनी आय में कटौती करना। उसके बाद कोरोना आ गया और अर्थव्यवस्था बुरी तरह बीमार हो गई।

यह हकीकत है कि कोरोना के कहर के पहले से ही भारतीय अर्थव्यवस्था कराह रही थी। करों में भारी छूट का भी कोई असर नहीं हुआ और अर्थव्यवस्था गिरती ही चली गई क्योंकि आगे कोरोना का अवरोधक था। नोटबंदी के बाद देशबंदी की कड़ी के साथ अर्थव्यवस्था ऐसी हालत में जा पहुंची कि घरेलू विकास दर ऋणात्मक में चली गई।

ऐसे विषम हालात में सरकार के पास अर्थव्यवस्था को संभालने के दो ही रास्ते हो सकते थे। सरकार को खजाने के लिए पैसा इकट्ठा तो करना ही होता है। इसके लिए या तो वो प्रत्यक्ष कर में इजाफा करेगी या फिर अप्रत्यक्ष कर में। प्रत्यक्ष कर में बढ़ोतरी का मतलब है कि जो नौकरशाह हैं, आयकर के दायरे में आनेवाले नौकरीपेशा लोग और सबसे बड़ा कॉरपोरेट। प्रत्यक्ष कर का यही जरिया हो सकता है। लेकिन सरकार पर इस वर्ग में बढ़ोतरी नहीं करने का दबाव इतना था कि उसने दूसरा रास्ता चुना। यानी प्रत्यक्ष कर से परहेज का असर अप्रत्यक्ष कर पर पड़ेगा ही। अप्रत्यक्ष कर की तरफ रुख करने का मतलब है, जो गरीब व कमजोर तबका है उसकी खरीद क्षमता और भी कमजोर होगी। पहले से ही अर्थव्यवस्था के साथ बदहाल हुए गरीब तबके की हालत और भी खराब हो गई।

बाजार को मजबूत बनाना है तो लोगों की जेब में पैसा देना ही पड़ेगा। आप देने के बजाय लोगों की जेब से जो भी बचा-खुचा पैसा है वह भी निकालने की कोशिश करेंगे तो क्या हालत होगी। साबुन, अनाज और सरसों तेल की कीमतों में इजाफा कर दिया गया। ऊपर से यह वर्ग ईंधन तेलों की महंगाई की दोहरी मार झेल ही रहा है। महंगाई बढ़ाने में ईंधन तेल की ऊंची कीमतों का सबसे बड़ा हाथ होता है। सरकार के पास जब पैसा जमा करने का कोई तरीका नहीं बचा है तो वह लगातार ईंधन तेलों की कीमतों में इजाफा कर रही है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तेलों के दाम कम होने के बाद भी भारत में डीजल, पेट्रोल और रसोई गैस सिलेंडरों की कीमतें लगातार बढ़ रही है।

इसके अलावा सरकार ने सोचा कि वह परिसंपत्तियों की बिक्री से कमाई कर सकती है। लेकिन मंदी के दौर में इनका भी कोई खरीदार नहीं निकला। सरकारी विमानन जिम्मेदारी से भी मुक्त होने की ओर कदम बढ़ाए गए। लेकिन मंदी की मार के दौरान उस सफेद हाथी में भला कौन पैसे लगाता। निवेश और निजीकरण का शोर तो बहुत मचा। लेकिन उसका भी कोई बेहतर परिणाम नहीं निकला। रेलवे से जो मोटी कमाई की आस बंधी थी वह भी पूरी नहीं हुई। निजीकरण की कवायद का कोई फायदा नहीं हुआ और कई ट्रेनें खाली और घाटे में चलने लगीं। जिन विलासिता भरी ट्रेनों को शोरशराबे के साथ शुरू किया गया था वो आज अपनी कंगाली का रोना रो रही हैं।

हर तरफ से थक-हार कर सरकार मुद्रीकरण के नाम से अर्थव्यवस्था के लिए नई उम्मीद लेकर आई है। वैसे भी लगातार सब कुछ बेच देने के आरोपों से सरकार बहुत परेशान हो रही थी। इससे राजनीतिक स्तर पर परेशानी और बदनामी हो रही थी। अब ‘मुद्रीकरण’ के साथ बेचने का ठप्पा हट गया। सरकार का दावा है कि यह सब ‘गुड गर्वनेंस’ के लिए किया जा रहा है।

लब्बोलुआब यह कि आप किसी तरह की योजना लेकर आएं देश चलाने के लिए पैसा चाहिए, योजना बनाने और उसके कार्यान्वयन के लिए पैसा चाहिए। मुश्किल यही है कि इसे भी आप उन्हीं की जेब से निकलवा रहे हैं जिनके लिए योजना बना रहे हैं। यह तो उस तबके को पूरी तरह खत्म करने जैसा हुआ। सरकार दावा कर रही है कि देखो हमने अस्सी करोड़ की जनता को मुफ्त राशन दिया। इसका सीधा मतलब तो यह हुआ कि अब अस्सी करोड़ जनता गरीबी रेखा के नीचे है। आपकी तरह-तरह की बंदियों की कड़ी ने मध्यवर्ग को निम्नवर्ग में धकेल दिया है।

ताजा आंकड़ों की बात करें तो सिर्फ बीती अगस्त में विभिन्न क्षेत्रों में पंद्रह लाख लोगों ने नौकरी गंवाई है। ऐसी हालत में भी आप जनता की जेब खाली कर अपना खजाना भरने की कवायद में हैं तो यह ज्यादा दिनों तक नहीं चलनेवाला। खाली जेब वाली जनता की सरकार का खजाना भरा हो ही नहीं सकता। यह सीधी सी बात जल्दी समझ आ जाती अगर अर्थव्यवस्था की मुखिया हर सवाल का टेढ़ा जवाब देने से तौबा करतीं। विमुद्रीकरण से लेकर मुद्रीकरण तक के सफर में आम जनता को क्या मिला इसका जवाब देना ही होगा।

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