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आधे-अधूरे

शिवसेना में बगावत का एक पाठ यह भी है कि देश अब इस पार या उस पार की राजनीति को ही स्वीकार कर रहा है। या तो आप हिंदुत्व की राजनीति करेंगे या फिर आप धर्म आधारित राजनीति के खिलाफ मुखर होकर लड़ेंगे तभी स्वीकार्य होंगे। नरम हिंदुत्व जैसी चीज नहीं चलेगी यह कांग्रेस को बार-बार बताया जा चुका है और अब उद्धव ठाकरे को भी संदेश दे दिया गया है कि उनका निजी मिजाज कैसा भी हो शिवसैनिकों की अगुआई उतनी सुस्ती के साथ नहीं की जा सकती।

आधे-अधूरे

महाराष्ट्र के नक्शे पर दहाड़ते बाघ का झंडा उठाने वाली शिवसेना ने हिंदुत्व और मराठी अस्मिता की विचारधारा चुनी। उग्र राजनीति के साथ उसने महाराष्ट्र की राजनीति में अपनी जमीन भी बनाई। पिछले विधानसभा चुनाव में त्रिशंकु जनादेश मिलने के बाद उसने कांग्रेस व राकांपा के साथ सरकार बनाई। महा विकास आघाडी सरकार आज संकट में है तो इसका बहुत बड़ा कारण उद्धव ठाकरे का राजनीतिक रूप से सुस्त मिजाज और विपरीत विचारधारा का साथ भी है। महाराष्ट्र में सरकार पर आए संकट के कई पाठ हो सकते हैं। अहम यह है कि आपको सत्ता बचाने के लिए लगातार मेहनत करनी है। कांग्रेस के बाद उद्धव ठाकरे को भी संदेश दे दिया गया है कि नरम हिंदुत्व जैसी कोई चीज नहीं होती। आप आधे उदारवादी और आधे हिंदू अस्मितावादी नहीं हो सकते हैं। महाराष्ट्र संकट को बदलते राजनीतिक मूल्यों के परिप्रेक्ष्य में समझने की कोशिश करता बेबाक बोल

‘अगर सेना सत्ता खो भी देती है तो हम फिनिक्स चिड़िया की तरह राख से फिर उठेंगे और अपनी उड़ान भरेंगे…।’ एकनाथ शिंदे की अगुआई में शिवसेना के विधायकों की बगावत के बाद उद्धव ठाकरे की बुलाई बैठक में महज 13 विधायकों के पहुंचने पर संजय राउत ने फिनिक्स की कहानी के जरिए अपना मनोबल बनाए रखने की कोशिश की। संजय राउत ने कहा कि जिसे जहां जाना है वहां जाए लेकिन आपको अंत में चुनाव लड़ कर उसमें जीतना होगा।

जब शिवसेना के बागी महाराष्ट्र की राजनीति की जमीन बदल रहे थे तब उद्धव ठाकरे ने फेसबुक पर लाइव आकर भावुकता की राजनीति का विकल्प अपनाया। उन्होंने बड़ी ही सादगी से सत्ता छोड़ने की पेशकश कर डाली। उद्धव की फेसबुक अपील के बाद एकनाथ शिंदे ने ट्विटर पर बागी विधायक का पत्र डाल दिया जिसमें विधायक का कहना था कि जब मुख्यमंत्री हमारे लिए अनुपलब्ध होते थे तो हमें एकनाथ शिंदे का ही साथ मिलता था। वह एकनाथ शिंदे ही होंगे जो भविष्य में हमारे साथ होंगे।

2014 के लोकसभा चुनाव के बाद महाराष्ट्र एक प्रतीक बना। चुनाव में भाजपा और शिवसेना साथ उतरी। जनादेश के त्रिशंकु हो जाने के बाद महाराष्ट्र में जो हुआ उसे सर्वशक्तिमान भाजपा के बरक्स उचित सा ठहराया गया। सत्ता के लिए संगीत-कुर्सी के खेल को नाम दिया गया भाजपा के खिलाफ प्रतिरोध का। रातों-रात सरकार बना लेने वाली भाजपा के लिए यह जैसे को तैसा बताया गया। देश के एकध्रुवीय होते राजनीतिक माहौल में दिल बहलाने के लिए वैचारिक भ्रष्टाचार को प्रतिरोध का नाम देने का ख्याल अच्छा ही लग रहा था। आज, शिवसैनिकों पर अपना प्रभाव स्थापित कर चुके एकनाथ शिंदे हमेशा से वैचारिक रूप से भाजपा के करीब रहने की पैरोकारी कर रहे थे। वे उन दलों के साथ जाने के खिलाफ थे जिनका शिवसेना के साथ किसी भी तरह का वैचारिक मेल नहीं बैठता है।

शरद पवार आज कह रहे हैं कि महा विकास आघाडी सरकार को गिराने की इस बार तीसरी कोशिश की गई है। लेकिन ढाई साल पहले राजनीति की जरा सी समझ रखने वाला इंसान आकलन कर सकता था कि महाराष्ट्र में सत्ता के लिए उथल-पुथल होती रहेगी। शिवसेना आज के हालात के लिए भाजपा और ईडी पर आरोप लगा रही है। संस्थाओं के इस्तेमाल का आरोप उस पार्टी के नेता लगा रहे हैं जिसका जन्म ही सड़क पर संघर्ष के साथ हुआ था। हिंदुत्व की विचारधारा और मराठी अस्मिता का मेल थी शिवसेना।

उग्र विचारधारा और उग्र राजनीति के साथ शिवसेना ने अपनी खास पहचान बनाई। एक समय ऐसा आया कि शिवसेना महाराष्ट्र में सत्ता और संघर्ष का पर्याय बन गई थी। लेकिन संघर्षपथ से सत्ता की ऊंचाई पर जाकर पार्टी ने फिर विरासतपथ का ही रास्ता चुना। बाल ठाकरे के भतीजे राज ठाकरे जो शिवसेना की उग्र राजनीति के अग्रदूत थे उन्हें अचानक से पीछे कर दिया गया। संघर्ष के इतिहास को इतिहास बना कर सत्ता उद्धव ठाकरे को दी गई जिनका व्यक्तित्व शिवसेना की राजनीति के उलट था।

उद्धव ठाकरे को कभी भी सड़क पर संघर्ष करते नहीं देखा गया था। लेकिन शिवसेना के उत्तराधिकारी का ताज उनके सिर पर ही सजा। महाराष्ट्र में जितनी उठा-पटक के बाद सत्ता मिली थी उस लिहाज से उद्धव ठाकरे अपनी कुर्सी बचाने के लिए सक्रिय नहीं रह पाए। यह आरोप बहुत पहले से लग रहे थे कि उद्धव ठाकरे शिवसैनिक कार्यकर्ताओं से कटे हुए रहते हैं। अब यह सच भी दिखने लगा जब शिवसेना की सत्ता का केंद्र ‘मातोश्री’ से हट कर ठाणे में एकनाथ शिंदे के पास पहुंच गया।

क्या शिवसेना के 40 से ज्यादा विधायक एक दिन में ही बागी हो गए? इसमें भाजपा का हाथ होने का आरोप दिख भी रहा तो सवाल यह है कि इतने दिनों तक उद्धव ठाकरे के आंख, कान और दिमाग क्या कर रहे थे? जिस तरह से सभी विधायक गुजरात से होते हुए असम पहुंचे उन्हें सुरक्षा मिली उससे साफ पता चलता है कि यह सब बहुत नियोजित तरीके से हो रहा था। बगावत करने वालों के लिए कुछ भी अचानक नहीं है। यह ‘अचानक’ सिर्फ उद्धव ठाकरे के लिए है जो कार्यकर्ताओं से अपना तालमेल बना ही नहीं पाए। शिवसेना सड़क पर लड़ने वाली कार्यकर्ता आधारित पार्टी है। इन्हीं कार्यकर्ताओं के बल पर उसकी सत्ता है। लेकिन उसके कार्यकर्ता कांग्रेस शैली की राजनीति के साथ सहज नहीं हो पा रहे थे।

आज कांग्रेस अपने सबसे बुरे दौर में है। उस पर भी यही आरोप लगते रहे हैं कि दस जनपथ तक चुनिंदा लोगों की ही पहुंच होती है। इसका सिला है कि आज राजग के दो कार्यकाल के बाद भी वह सत्ता की सबसे कमजोर कड़ी है। एक तरफ सत्ताधारी पार्टी आम लोगों से जुड़ रही है। निगम चुनाव से लेकर राज्यसभा, लोकसभा और राष्ट्रपति चुनाव तक में पूरा दम-खम दिखाती है।

महाराष्ट्र के संदर्भ में बात करें तो आज देश की मुख्यधारा का कोई भी राजनीतिक दल ‘विचारधारा बचाओ’ की बात नहीं कर सकता क्योंकि हर कोई सत्ता की तरह ‘किसी भी तरह की विचारधारा में मिल जाओ’ के नारे पर ही चल रहा है। फिलहाल तो भाजपा ने राजनीति में एक ही मूल्य स्थापित किया है कि राजनीति में किसी भी तरह का आलस, सुस्ती और ठहराव नहीं चलेगा। इसके लिए राष्ट्रपति चुनाव के उम्मीदवारों का ही उदाहरण देखा जा सकता है।

राजनीति में प्रतीकों का अपना महत्त्व है। आम भाषा में राष्ट्रपति और राज्यपाल जैसे पदों को रबर की मुहर कहा जाता है। कांग्रेस व अन्य विपक्षी दलों ने अपनी राजनीतिक विशेषज्ञता को परे रखते हुए इसे यथार्थ में ही रबर की मुहर मान लिया। आज जब राजनीतिक दिल को बहलाने के लिए ही सही विचारधारा-विचारधारा का जाप कर दिया जाता है तो विपक्ष के पिटारे से वह उम्मीदवार निकले जो भाजपा में नकारे जा चुके हैं। यशवंत सिन्हा को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बना कर कांग्रेस सहित विपक्ष ने साबित कर दिया कि वह अभी आलस को बिलकुल भी छोड़ना नहीं चाहता।

राष्ट्रपति चुनाव को भाजपा बनाम भाजपा बनाने में भी क्या किसी ईडी या सीबीआइ जैसी संस्था का दबाव था? इसके लिए विपक्ष के नेताओं की खरीद-फरोख्त हुई? विपक्ष को किसने मजबूर किया कि वह ऐसे व्यक्ति को राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के तौर पर पेश करे जो भाजपा में अपने आखिरी समय तक पार्टी के हर उस फैसले के साथ थे जिसे वह लोकतंत्र पर हमला बताता रहा है।

सियासी गलियारों में लंबे समय से इस बात की चर्चा चल रही थी कि भाजपा इस बार राष्ट्रपति पद के लिए आदिवासी समुदाय की महिला नेता को उम्मीदवार बना सकती है। भाजपा पर अब तक सांप्रदायिक राजनीति के जितने भी आरोप लगे हों लेकिन 2014 के बाद से वह सामाजिक न्याय की अपनी छवि को लेकर बहुत सजग है। अपनी इस छवि के लिए वह लगातार मेहनत भी कर रही है। राष्ट्रपति उम्मीदवार के रूप में द्रौपदी मुर्मू को पेश कर उसने अपनी लकीर और ऊंची कर ली है।

शिवसेना में बगावत का एक पाठ यह भी है कि देश अब इस पार या उस पार की राजनीति को ही स्वीकार कर रहा है। या तो आप हिंदुत्व की राजनीति करेंगे या फिर आप धर्म आधारित राजनीति के खिलाफ मुखर होकर लड़ेंगे तभी स्वीकार्य होंगे। नरम हिंदुत्व जैसी चीज नहीं चलेगी यह कांग्रेस को बार-बार बताया जा चुका है और अब उद्धव ठाकरे को भी संदेश दे दिया गया है कि उनका निजी मिजाज कैसा भी हो शिवसैनिकों की अगुआई उतनी सुस्ती के साथ नहीं की जा सकती।

सूबे के एकाधिकार में आने वाली जांच एजंसियों का विरोधियों को निपटाने के लिए महा विकास आघाडी सरकार ने भी खूब इस्तेमाल किया। ‘जिसकी सरकार उसकी संस्था’ का नियम तो भारतीय राजनीति में हर राजनीतिक दल मानता और जानता है। इसका एकमात्र विकल्प है संसद से सड़क तक कड़ी मेहनत, जो विपक्ष अभी करना नहीं चाह रहा है।

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