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बा-गुनाह!

मलिक ने कश्मीर के युवाओं को गांधी की अहिंसा के बारे में नहीं पढ़ाया बल्कि आजाद कश्मीर का ख्वाब दिखा कर अपनी विचारधारा का मानसिक गुलाम बना लिया। दिल्ली की अदालत में हो सकता है महात्मा गांधी की तस्वीर लगी हो, और आपके पास वही अंतिम तर्क बचा हो। लेकिन आपके खड़े किए वैचारिक स्कूल में गांधी की तस्वीर नहीं आजाद कश्मीर का नक्शा है।

कश्मीरी अलगाववादी नेता यासीन मलिक को गुरुवार 25 मई को दिल्ली के पटियाला हाउस कोर्ट में पेशी के लिए ले जाती पुलिस। (फोटो- पीटीआई)

यासीन मलिक के दोषी साबित होने के दौरान अदालती दलीलें हमें उन हादसों का सामना करवाती हैं जो हमारी हुकूमतें करती आई हैं। वादी के युवाओं को आजाद कश्मीर का सब्जबाग दिखाने वाला अलगाववादी दिल्ली की अदालत में बेगुनाह साबित होने के लिए खुद को महात्मा गांधी का अनुयायी बताता है। वह भरी अदालत में गर्व से कहता है कि मैंने देश के सात प्रधानमंत्रियों के साथ ‘काम किया’ है। जब मलिक भारत के खिलाफ युद्ध छेड़ने का दोषी साबित हो चुका है तो अब तक घाटी व दिल्ली के बीच बनाई गई इस बातचीत की कड़ी टूटने के बाद इसे कैसे देखा जाएगा? यासीन मलिक की विचारधारा के स्कूल में बच्चे गांधी की तस्वीर नहीं आजाद कश्मीर का नक्शा देखते हैं। यासीन मलिक को जब तक उम्र कैद की सजा हुई है तब तक कश्मीर की पीढ़ियों पर उसका प्रभाव पड़ चुका है। अब कैसा होगा वादी का भविष्य? कश्मीर की इस कसक पर बेबाक बोल

यासीन मलिक का अदालत में दावा : हथियार गिराने के बाद मैंने महात्मा गांधी के सिद्धांतों का पालन किया है। तब से मैं कश्मीर में अहिंसक राजनीति कर रहा हूं।
अदालत : चौरी चौरा की एक छोटी सी हिंसा के बाद महात्मा गांधी ने पूरा असहयोग आंदोलन वापस ले लिया था। लेकिन लंबे समय तक कश्मीर के हिंसा में झुलसने के बावजूद दोषी ने न तो हिंसा की निंदा की और न अपने प्रतिरोध की उन तारीखों को वापस लिया जो हिंसा का कारण बनी…सबूत कुछ और कहानी कहते हैं।

पूरे आंदोलन को हिंसक होने के लिए ही तैयार किया गया था और उसके कारण बड़े पैमाने पर हिंसा हुई। इसलिए दोषी न तो महात्मा गांधी के नाम का आह्वान कर सकता है और न ही उनके अनुयायी होने का दावा कर सकता है। क्योंकि महात्मा गांधी के सिद्धांतों में हिंसा के लिए कोई जगह नहीं थी।

दिल्ली की एक विशेष अदालत में यासीन मलिक को सजा सुनाने के दौरान दोनों पक्षों की तरफ से दी गई दलीलें और जज की टिप्पणी भारत में अशांति के बड़े इतिहास को रेखांकित करती हैं। यह जिरह उन वजहों को सामने लाती है जिसके कारण मजबूरी का नाम महात्मा गांधी जैसी खराब लोकोक्ति बनी। जिस मलिक को भारत सरकार के खिलाफ युद्ध छेड़ने का भी दोषी पाया गया, वह अदालत में गर्व के साथ कहता है कि दिल खोल के…मैं भीख नहीं मांगूंगा…मैं फांसी कबूल करूंगा…अपने राजनीतिक जीवन में मैंने सात प्रधानमंत्रियों के साथ काम किया है…।

सबसे पहले यासीन मलिक के अपराध पर बात। आखिर वह कश्मीर से लेकर इस पूरे देश की जनता का दोषी क्यों है? यासीन मलिक की शुरुआत एक आतंकवादी के तौर पर हुई। जम्मू-कश्मीर मुक्ति मोर्चा (जेकेएलएफ) के अगुआ के तौर पर उसने तकनीकी शब्दावली में तो हथियार छोड़ दिया था। लेकिन हथियार रखने के बाद उसने जो दूसरा रास्ता चुना वह ज्यादा घातक था।

जो हाथ गोली चलाते हैं, वे तो कसूरवार हैं ही। लेकिन, उससे भी बड़ा कसूरवार वह है जिसने उन हाथों में बंदूक थमाई। गोली चलाने वाले के लिए तो कोई कारण हो सकता है, लेकिन गोली चलाकर दूसरों की जान लेने के लिए उकसाने वालों को न्यायोचित ठहराने का कोई कारण नहीं हो सकता है।

कश्मीर के जिन बच्चों के हाथों में किताबें हो सकती थीं यासीन मलिक जैसे आतंक के निवेशकर्ताओं की वजह से उन हाथों तक बंदूक पहुंचाने के लिए पैसे आए। हाफिज सईद से लेकर न जाने कितने भारत विरोधियों ने मलिक के जरिए कश्मीर में आतंकवाद पर निवेश किया। जिस पैसे से बच्चों के लिए स्कूल का बस्ता आ सकता था, उसका इस्तेमाल उनके हाथों में पत्थर थमाने के लिए किया गया।

जिस बेरोजगार के लिए आप किसी स्वरोजगार का माध्यम तलाश सकते थे उसकी नौकरी आतंकवाद के कारखाने में लगवा दी। राज्य सरकार के सामने मलिक ने आतंकवाद की राह छोड़ने का दावा किया था लेकिन परोक्ष रूप से उसने आतंकवाद की ऐसी प्रयोगशाला स्थापित कर दी थी जहां आतंकवादियों का बहुगुणन हो रहा था। जिस तरह, एक अमीबा से टूट कर दूसरा अमीबा बनता है उसी तरह वह वहां एक के बाद एक आतंकवादी तैयार करवाने के लिए निवेश करवा रहा था। उससे ज्यादा खतरनाक उसकी आतंकवाद की प्रयोगशाला है।

इसके बाद अगर आप गांधी का नाम लेते हैं तो आप आतंकवाद के धंधे के साथ भी दगा करते हैं। आप जब भीख नहीं फांसी की मांग करते हैं तो आपको पता है कि इसकी गूंज कश्मीर तक जाएगी और आपके स्थापित आतंकवाद के कारखाने में र्इंधन का काम करेगी। आपके पास अदालत में गांधीवाद की सफाई है लेकिन आज जो आपके नाम पर सड़कों पर उतर रहे हैं उनके पास कोई सफाई नहीं है। उन तक गांधीवादी विचारधारा पहुंचाने के लिए एक पैसा भी नहीं खर्च किया गया है।

मलिक ने कश्मीर के युवाओं को गांधी की अहिंसा के बारे में नहीं पढ़ाया बल्कि आजाद कश्मीर का ख्वाब दिखा कर अपनी विचारधारा का मानसिक गुलाम बना लिया। दिल्ली की अदालत में हो सकता है महात्मा गांधी की तस्वीर लगी हो, और आपके पास वही अंतिम तर्क बचा हो। लेकिन आपके खड़े किए वैचारिक स्कूल में गांधी की तस्वीर नहीं आजाद कश्मीर का नक्शा है। यह नक्शा अभी लंबे समय तक उन्हें देश के खिलाफ खड़ा करेगा क्योंकि आपको तो उम्रकैद दी जा सकती है लेकिन आपकी अलगाववादी विचारधारा को खत्म करने के लिए अभी हमें लंबी राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और वैचारिक लड़ाई लड़नी है।

यह अदालती फैसला आगे जो भी मोड़ ले लेकिन यासीन मलिक के इस मामले को पूरे राजनीतिक दृष्टिकोण से भी देखने की कोशिश हो। अदालत में यासीन ने सात प्रधानमंत्रियों के साथ ‘काम करने’ की बात कही है। सात प्रधानमंत्रियों के साथ काम करने का मतलब है एक पूरी उम्र का गुजर जाना। एक पूरी राजनीतिक उम्र बीतने के बाद मलिक को उम्रकैद की सजा सुनाई गई है। अब राजनीतिक दल क्या अपना आत्मनिरीक्षण करेंगे कि उन्होंने कश्मीर के साथ क्या किया है और आगे क्या करना है?

यह तो तय है कि कश्मीर की समस्या के समाधान में बातचीत ही एक रास्ता है। सात प्रधानमंत्रियों के साथ के बाद मलिक के जेल जाने के बाद इस पूरी बातचीत की पद्धति को ही दागी बनाने की कोशिश होगी। अनुच्छेद-370 के खात्मे के बाद कश्मीर में जो माहौल सुधारने की कोशिश हो रही है उन सब पर भी इसका नकारात्मक असर डालने की कोशिश होगी।

कश्मीर के संदर्भ में दो चीज अहम है। पहला है उसके अंदर मलिक जैसों का तैयार किया गया आंतरिक संघर्ष और दूसरा, बाहरी यानी पाकिस्तान का खतरा। आंतरिक संघर्ष में जूझ रहे यानी आजाद कश्मीर की मांग कर रहे लोगों को पाकिस्तान की तरफ से वित्त पोषण मिलता है। कई कारणों से यासीन मलिक ने हथियार छोड़ कर बातचीत का रास्ता पकड़ने की बात की थी। यासीन मलिक को लोग कश्मीर में दिल्ली का दलाल तो दिल्ली में पाकिस्तान का दलाल कहने लगे थे। वह चाहे जिस भी छवि के साथ था, लेकिन अब तक उसे बातचीत की एक कड़ी के रूप में ही देखा गया था।

जहां इतना बहुस्तरीय संघर्ष हो, वहां उम्रकैद के इस ताजे फैसले के बाद क्या असर पड़ेगा उस पर पैनी नजर रखने की जरूरत होगी। अदालत के इस फैसले के बाद भारत सरकार कश्मीर को किस तरह संभालेगी यह बहुत मायने रखता है। वादी में फिर से लक्षित हत्या शुरू हो चुकी है। गोली खाने वाले और गोली चलाने वाले दोनों केंद्र सरकार के खिलाफ नारे लगा रहे हैं। मलिक को जब तक उम्रकैद मिली है, तब तक वहां पीढ़ियों पर असर हो चुका है।

सात सरकारों के साथ बात करने वाला भारत सरकार के खिलाफ युद्ध छेड़ने का दोषी पाया गया है। कश्मीर में आतंकवाद का निवेश अलगाववादियों के लिए पूरी तरह मुनाफा वसूल रहा। यह वैसी खता है जो सदियों तक की जाती है और सदियों तक सजा पाई जाती है। देखते हैं मौजूदा या आगे की सरकार कश्मीर में अलगाववाद और खौफ के खातेदारों का खाता बंद कर पाएगी या नहीं।

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