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हार्दिक आघात

राहुल गांधी विचारधारा की बात करते हुए और क्षेत्रीय दलों पर निशाना साधते हुए यह भूल गए कि भाजपा को अभी तक बड़ी चुनौती ममता बनर्जी और एमके स्टालिन जैसे नेताओं ने ही दी है। बंगाल से लेकर तमिलनाडु तक विचारधारा की ही लड़ाई देखी गई।

भारतीय राजनीति में जब संवैधानिक मूल्यों की बात होती है तो उसमें अहम है संघवाद और क्षेत्रीय दलों की भूमिका। उदयपुर के चिंतन शिविर में राहुल गांधी ने विचारधारा की ओर मुड़ने की बात कहते हुए क्षेत्रीय दलों को पूरी तरह नकार दिया। पिछले आठ सालों में बिहार, बंगाल, तमिलनाडु में क्षेत्रीय दलों से टक्कर लेने में भाजपा को पूरी तरह वैचारिक लड़ाई लड़नी पड़ी। आज दक्षिण भारत के राज्य पूरी वैचारिकी के साथ दिल्ली वाली सरकार से बहसतलब हैं। लेकिन राहुल गांधी को इन जगहों पर विचारधारा इसलिए नहीं दिखी क्योंकि यहां कांग्रेस अप्रासंगिक हो चुकी है। इन जगहों पर कांग्रेस को जिक्र के लायक भी नहीं समझा गया और क्षेत्रीय नायक अपनी पूरी शक्ति लगा कर भाजपा से जूझे। क्षेत्रीय दलों को कहीं जीत मिली तो कहीं हार, लेकिन वे अप्रासंगिक नहीं हुए बल्कि संघवाद को मजबूत किया। क्षेत्रीय दलों पर राहुल के किए इस हार्दिक आघात पर बेबाक बोल

‘बीजेपी कांग्रेस के बारे में बात करेगी, कांग्रेस नेताओं के बारे में बात करेगी, कांग्रेस कार्यकर्ताओं के बारे में बात करेगी, लेकिन क्षेत्रीय दलों के बारे में नहीं, क्योंकि वह जानते हैं कि क्षेत्रीय दलों का अपना स्थान है, वह बीजेपी को नहीं हरा सकते, क्योंकि उनकी कोई विचारधारा नहीं है’।

उदयपुर के चिंतन शिविर में राहुल गांधी के विचारधारा वाले इस बयान के बाद कांग्रेस के सहयोगी सहित अन्य क्षेत्रीय दल नाराज हो गए। राहुल गांधी के बचाव में शशि थरूर ने कहा कि हम सब राहुल की बात का मतलब समझ गए हैं, और राहुल के कहने का मतलब था कि हमारे पास राष्ट्रीय दृष्टि है, हम पूरे देश के लिए बोलते और सोचते हैं। राहुल के चिंतन ने उनके सहयोगियों को ही चिंता में डाल दिया कि हम पर ही ऐसा वार कैसे कर दिया। एचडी कुमारस्वामी ने राहुल को याद दिलाया कि आप क्षेत्रीय दलों के भरोसे ही दस साल तक केंद्र में राज करते रहे।

उदयपुर चिंतन शिविर से जो बात निकल कर आई, वो विचारधारा बनाम व्यक्ति की है। कांग्रेस के इस शिविर के पहले और 2014 के बाद से हम जैसे राजनीतिक टिप्पणीकार कांग्रेस को इसी विचारधारा की याद दिला रहे थे जिसे वह कभी जनेऊ दिखा कर, कभी अपना गोत्र बताकर और नरम वाले हिंदुत्व की बात कह कर भुला दे रही थी। वह भाजपा से भाजपा बन कर लड़ना चाह रही थी और आखिरकार उसे सबक मिल ही गया कि वह गलत औजार से लड़ाई लड़ रही थी।

आज राहुल गांधी कह रहे हैं कि विचारधारा से ही पार्टी बन सकती है व्यक्ति से नहीं। यह बात आदर्श के आसमान से तो बहुत अच्छी लगती है लेकिन हकीकत की जमीन पर कांग्रेस व्यक्ति केंद्रित पार्टी ही है। यहीं पर राहुल की विचारधारा के सामने व्यक्ति का विरोधाभास भी खड़ा हो जाता है। यह सिर्फ कांग्रेस ही नहीं भारत के ज्यादातर मुख्यधारा के राजनीतिक दलों का सच है कि वह व्यक्ति केंद्रित है। नेहरू, इंदिरा से लेकर आज नरेंद्र मोदी तक पार्टी का आधार एक नायक के कंधों पर रहता आया है।

नायक अपनी भूमिका ठीक से निभाता है तो सभी सहनायक और राजनीतिक पटकथा दुरुस्त रहती है। लेकिन व्यक्ति यानी नायक के ढहने के बाद विचारधारा हारे को हरिनाम ही रह जाती है।

विचारधारा को विस्तारित करते हुए उदयपुर में स्वीकारा गया कि नम्र हिंदुत्व की राजनीति नहीं चलेगी। कांग्रेस ने सामाजिक न्याय की नीति पर जोर दिया है। अफसोस इसी बात का है कि हिंदुत्व की चौहद्दी के बाहर जितनी भी जमीन बची है उस पर आम आदमी पार्टी की सत्ता की गद्दी लग रही है। आम आदमी पार्टी एक हाथ में धर्मनिरपेक्षता तो दूसरे हाथ में नम्र हिंदुत्व का झंडा लेकर चलती है और कांग्र्रेस की दावेदारी वाली जमीन पर जरूरत के हिसाब से गाड़ आती है।

आज जब भाजपा अपनी ऐतिहासिक जीत की आठवीं सालगिरह के जश्न में डूबी है तो कांग्रेस के पास ऐसा कोई दावा नहीं है कि उसने उसकी ध्रुवीकरण की राजनीति को किसी भी तरह की वैचारिक चुनौती दी हो।

भाजपा ने ध्रुवीकरण की राजनीति करते हुए नई आर्थिक नीति को जोरदार गति दी। इस नई आर्थिकी में कांग्रेस का सब कुछ पुराना समाहित है तो वह वैचारिक रूप से इसके खिलाफ खड़ी हो भी कैसे सकती है? हिंदुत्व, ध्रुवीकरण और आर्थिकी को जब आप चुनौती ही नहीं दे सकते हैं तो फिर आपका वजूद ही क्या रह जाएगा, मतलब आपकी विचारधारा कहां से आएगी?

सामाजिक न्याय के मसले पर भाजपा इतना काम कर चुकी है कि आज अन्य पिछड़ा वर्ग उसका सबसे बड़ा मतदाता है। अण्णा आंदोलन, आम जनता के दिमाग में स्थापित कर चुका था कि भ्रष्टाचार तो कांग्रेस में समाहित है यानी उसका स्थायी रूप है। कांग्रेस के लिए यह जगह तो लंबे समय तक खाली नहीं होने वाली है।

सवाल उठता है कि अब आगे क्या? कांग्रेस के लिए राजनीति का कौन सा झंडा बचता है? इस सवाल का जवाब जमीन से कटे नेताओं के शिविर में नहीं मिलने वाला। अभी तक तो यही दिख रहा है कि विचारधारा के नाम पर भी पार्टी उन्हीं राहुल गांधी को अगुआई देगी जिन्हें भाजपा परिवारवाद के नाम पर खारिज करवा चुकी है। ऐसे में कांग्रेस उस जगह पर खड़ी है जहां से उसे किसी भी दिशा में कोई रास्ता मिलता हुआ नजर नहीं आ रहा है।

विचारधारा का जो एकमात्र रास्ता बचा हुआ है, उस पर चिंतन शिविर उठने के दौरान ही सबसे पहले गुजरात से अवरोधक लगा दिया गया। गुजरात में चुनाव होने हैं और कांग्रेस ने किस आधार पर एक 26 साल के युवक को प्रदेश अध्यक्ष बनाया था, जिसकी जातिगत ध्रुवीकरण के अलावा कोई वैचारिक पहचान ही नहीं थी।

इसके साथ ही राम जन्मभूमि आंदोलन, अनुच्छेद 370, नागरिकता कानून विरोधी आंदोलन जैसे वैचारिक मसले पर कांग्रेस में अभी तक अपनी डफली, अपना राग वाले हालात हैं। संघ ने हिंदुत्व और राष्ट्रवाद के मिश्रण का जो विश्वविद्यालय तैयार किया, कांग्रेस का एक बड़ा तबका खुद ही उसका विद्यार्थी बना हुआ है।

ऊपर भारत की राजनीति में व्यक्ति बनाम विचारधारा का जिक्र किया जा चुका है। जैसे ही किसी दल के नेतृत्व की राजनीतिक शक्ति कम होती है उसकी जनता को अपने साथ मिलाने की क्षमता भी कम होती जाती है। पिछले सालों में अनगिनत लोग कांग्रेस को छोड़ कर दूसरे दलों में गए और उनकी पहली पसंद भाजपा ही थी। आज भी कांग्रेस के बहुत से नेता मुखर होकर विकल्प की तलाश कर रहे हैं।

राहुल गांधी विचारधारा की बात करते हुए और क्षेत्रीय दलों पर निशाना साधते हुए यह भूल गए कि भाजपा को अभी तक बड़ी चुनौती ममता बनर्जी और एमके स्टालिन जैसे नेताओं ने ही दी है। बंगाल से लेकर तमिलनाडु तक विचारधारा की ही लड़ाई देखी गई।

राजनीतिक लड़ाई में बड़ी मात के बाद जनता की ओर से खारिज होने का सिलसिला लंबा चल सकता है। लेकिन मात खाए दल को वापस खड़े होना है तो उसे चुनावी मौसमी लड़ाई से परहेज कर अपने संघर्ष को बारहमासा बनाना होगा। प्रियंका गांधी के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश को जिस तरह से ‘गुलाबीपुर’ बना दिया गया था वह खेल में बने रहने के नाम पर आपका दिल ही बहला सकता है।

चिंतन शिविर में क्षेत्रीय दलों को निशाना बनाकर राहुल गांधी ने जो वैचारिक दरिद्रता दिखाई है, उससे कांग्रेस का बहुत जल्दी राजनीतिक ‘उदय’ आसान तो नहीं दिखता है। सवाल यह भी है कि यह वैचारिक विचलन उनका अपना है या किसी और का? यह बात किसी से छुपी नहीं है कि ज्यादातर राजनेताओं की आवाज अपनी होती है, शब्द उनकी वैचारिक टीम के होते हैं। उनकी पटकथा कोई और लिख रहा होता है। राहुल गांधी के बयान के बाद जो भूल सुधार का सियासी तूफान आता रहता है, उसका असली दोषी कौन है? अगर राहुल पटकथा को परे रख कर अपनी ओर से कथा सुनाने लगते हैं तो उन्हें आत्मावलोकन की जरूरत है।

राहुल अगर कह रहे हैं कि भाजपा क्षेत्रीय दलों पर हमला नहीं करती तो इससे साफ पता चलता है कि उन्हें राजनीति के सामान्य ज्ञान वाली खबरों से अद्यतन नहीं किया जाता है। भाजपा क्षेत्रीय दलों को लेकर सिर्फ वहीं नरम रहती है जहां उसका किसी से गठबंधन होता है या उसकी संभावना होती है।

भाजपा के नेता जब बंगाल में जाते हैं तो ममता बनर्जी को लेकर तीखे हमलावर होते हैं और कांग्रेस के जिक्र की जरूरत भी नहीं समझते हैं। भाजपा बिहार में राजद को पूरी तरह घेरती है, और वहां कांग्रेस मुख्य राजनीतिक घेरे से बाहर है तो वह अपना जिक्र होने के लिए ही तरसती है। उत्तर प्रदेश में भाजपा और समाजवादी पार्टी वैचारिक तौर पर एक-दूसरे को लेकर हमलावर थे।

इतने सारे राजनीतिक झटके मिलने के बाद भी राहुल गांधी खुद को और अपनी टीम को दुरुस्त नहीं कर रहे हैं तो वे वैचारिक लड़ाई जीतना तो छोड़िए शुरू ही नहीं कर पाएंगे। 2014 के बाद संघवाद और वैचारिक संघर्ष जैसी चीजें बची हुई हैं तो उसका श्रेय क्षेत्रीय क्षत्रपों को ही जाता है। अगर आप विचार के स्तर पर मजबूत होते तो क्षेत्रीय नायकों को खलनायकों की तरह पेश नहीं करते। राहुल गांधी की वैचारिक टीम को एक और चिंतन शिविर की जरूरत है कि इस तरह के वैचारिक फिसलन आगे न हों।

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