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मुलजिम के मुजरिम

कांग्रेस के नेता कह रहे हैं कि यूएपीए कानून का दुरुपयोग किया जा रहा है। सच तो यह है कि इस कानून को लाया ही इस मंशा से गया था कि सत्ता अपने हिसाब से नागरिक अधिकारों को बंधक बना उसका दुरुपयोग कर सके, इसके सदुपयोग की बात ही बेमानी है।

फादर स्टेन स्वामी का एनआईए की कस्टडी में निधन हो गया था। (एक्सप्रेस आर्काइव फोटो)

आज हम विज्ञान और तकनीक जैसी चीजों को लेकर आगे बढ़ रहे हैं। शिक्षा के मामले में शिखर पर जा रहे हैं तो अन्य उपलब्धियों का बिल्ला भी अपने कंधे पर लगा रहे हैं। लेकिन नागरिक अधिकार, मनुष्यता, सामूहिक जिम्मेदारी और संवेदना के स्तर पर इक्कीसवीं सदी का मनुष्य सबसे छोटा दिखने लगा है। स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के वैश्विक नारे को दुनिया के हर कोने में खारिज किया जा रहा है। साम्यवाद के नाम पर वैयक्तिक स्वतंत्रता हनन का सबसे बड़ा आरोपी चीन विकास के पैमाने पर दुनिया की बड़ी शक्ति बन चुका है। भारत जैसे देश में भी हर नई सत्ता अब तक के हासिल नागरिक अधिकारों को कमतर करने की लगातार कोशिश में रहती है। पार्किंसन के मरीज फादर स्टेन स्वामी के सिपर और स्ट्रा पाने की अदालती लड़ाई न्यायिक हिरासत में उनकी मौत के साथ खत्म हो जाती है। एक मुलजिम के मानवाधिकार की हत्या की मुजरिम व्यवस्था पर सवाल उठाता बेबाक बोल

‘मान लो मेरी बेटी को बहुत लंबे समय तक जेल में रहना पड़ेगा और एक वक्त आए कि वो मेरे को देख ही न पाए। मैं बूढ़ा हो रहा हूं। मैं न देख पाऊं। इस तरह के विचार कई बार आते हैं, उसको नहीं आएंगे। उसको आने भी नहीं चाहिए।’ ये शब्द थे नताशा नरवाल के पिता महावीर नरवाल के। फादर स्टेन स्वामी की हिरासत में मौत से पहले हमने ‘फादर ऑफ द ईयर’ की मौत देखी थी। ‘फादर ऑफ द ईयर’ शीर्षक से ही महावीर नरवाल का वीडियो इंटरनेट पर मिल जाएगा। फर्क इतना ही है कि इस पिता की मौत अपनी बेटी की जेल से रिहाई के इंतजार में हुई थी। इस पूरे साक्षात्कार में महावीर नरवाल अपनी बेटी की हिम्मत और हौसले के बारे में बताते हैं। एक ही समय उनका हौसला टूटता सा दिखता है, उनकी आंखों में नमी दिखती है, उनका गला भर्राता है जब वे यह दुख जताते हैं कि बेटी के जेल से बाहर आने के पहले वे मर सकते हैं। नताशा को अंतरिम जमानत तब मिली जब उनके पिता की कोविड से मौत हो गई। नताशा को दिल्ली दंगों के मामले में जमानत मिली भी तो जेल के बाहर उसका स्वागत करने के लिए पिता नहीं थे।

महावीर नरवाल की त्रासदी के बाद भी पार्किंसन जैसी बीमारी से ग्रस्त 84 साल के बुजुर्ग फादर स्टेन स्वामी की जमानत याचिका नामंजूर की जाती रही। पार्किंसन के मरीज जो गिलास से पानी भी नहीं पी सकते थे। स्टेन स्वामी अंदेशा जता रहे थे कि कहीं वे जेल के अंदर ही न मर जाएं। लेकिन हमारी व्यवस्था एक बीमार बुजुर्ग से डरी हुई थी। व्यवस्था को उस ‘सिपर’ और ‘स्ट्रॉ’ से भी डर था जिसके सहारे वे पेय पदार्थ सहजता से ले सकते थे, मगर उन्हें यह बुनियादी चीज भी अदालती लड़ाई के बाद मिली। यह कोविड का समय था जब मानवता के आधार पर ऐसे बंदियों को जमानत मिल जानी चाहिए थी। स्टेन स्वामी को मुक्ति तब मिली जब मौत आई। स्टेन स्वामी दोषी थे या नहीं अब यह सिद्ध नहीं हो सकेगा, लेकिन हमारी व्यवस्था उनके बुनियादी मानवाधिकार और गरिमापूर्ण जीने के अधिकार की हत्या की दोषी साबित हो चुकी है।

जेल के बाहर महावीर नरवाल और जेल के अंदर फादर स्टेन स्वामी की मौत हमें गैब्रिएल ग्रेशिया मार्केज की कृति ‘क्रॉनिकल ऑफ अ डेथ फोरटोल्ड’ की याद दिलाती है। इसमें मार्केज उस व्यवस्था के गुनाह को बेपर्दा करते हैं जो यह जानती है कि हत्या होने वाली है और उसे होने दिया जाता है। मार्केज के पात्र सैंटिअगो की हत्या की साजिश रची जाती है, लेकिन कोई भी उन्हें रोकने नहीं आता है। इस बात का कोई सबूत नहीं है कि सैंटिअगो ने अपराध किया था। सब जान रहे थे कि असली अपराधी की रक्षा कौन कर रहा है। संभावित त्रासदी को फलित होने के लिए एक ऐसा अंधेरा कायम किया जाता है कि उसे रोकने के लिए उम्मीद की कोई रोशनी उभर न पाए। हम मार्केज के काल्पनिक सैंटिअगो की हत्या में स्टेन स्वामी के खून के धब्बे का यथार्थ आज भी खोज सकते हैं। खुद के शरीर पर नियंत्रण न रख पाने वाले बुजुर्ग को जमानत तो नहीं ही मिली और अस्पताल में इलाज मिला भी तो अदालती दखल के बाद। ऐसे मामलों के बाद अक्सर हमारे मुंह से निकलता है कि व्यवस्था ढह गई। लेकिन अब तो लगता है कि व्यवस्था जैसी कोई चीज है ही नहीं। ढहता सिर्फ उस इंसान का हौसला है जो व्यवस्था को बचाने की बात करता है।

किस व्यवस्था को बचाने की बात कर रहे हैं लोग। आज भी हमारे पास ऐसे लोग मौजूद हैं जिनका जन्म गुलाम भारत में हुआ था। ये वे लोग हैं जिनकी मां की लोरियों में भी आजादी का सपना था। उस आजादी के सपने में अहम था इंसाफ का राज। ऐसा राज जिसमें जब तक अपराध सिद्ध न हो जाए तब तक किसी के साथ मुजरिम जैसा व्यवहार न हो। यह मुलजिम का अधिकार है कि राज्य उसे वह तमाम सुविधाएं उपलब्ध कराए जिसमें वह खुद को बेगुनाह साबित कर सके। लेकिन आजाद भारत की सरकार यूएपीए लेकर आ गई। अब पूरा संदर्भ ही उलटा हो गया जब राज्य ने अपराध घोषित करके अपराधी का तमगा दे दिया। अब उस कथित अपराधी को साबित करना है कि वह निर्दोष है। यह एक बुनियादी भटकाव है। आजादी के बाद हम उस दौर में पहुंच गए हैं जहां नागरिक को ही बताना है कि वह अपराधी नहीं है। यानी राज्य जो वैयक्तिक स्वतंत्रता प्रदान करता है वह हर किसी का अधिकार नहीं है।

आधुनिक राज्य का संदर्भ उदारवाद के ढांचे से है। राजशाही, सामंती और औपनिवेशिक ढांचे से संघर्ष करके ही हमने राष्ट्रवाद और राष्ट्रीयता का भाव अर्जित किया था। लेकिन अब राज्य नागरिक के वैयक्तिक अधिकार को छीन रहा है। अंग्रेजों जैसी साम्राज्यवादी शक्तियों का मकसद था भारत के संसाधनों की लूट। संसाधनों से भरपूर भारत में अलग-अलग समय पर आक्रमणकारी और औपनिवेशिक शक्तियां आती रहीं। इन्हीं के खिलाफ स्वाधीनता आंदोलन चला और राष्ट्रवाद का जन्म हुआ। अब व्यक्तिगत आजादी को सुनिश्चित कर राष्ट्रीय संपत्ति की सामूहिकता का नारा दिया गया। राष्ट्र की संपत्ति को सुरक्षित रखना नागरिक का कर्तव्य माना गया। उसी सामूहिक स्मृति और चेतना की निर्मिति है हमारी अभिव्यक्ति की आजादी को लेकर मुखर मांग और उसके लिए छेड़ी जा रही अहिंसक लड़ाई।

फादर स्टेन स्वामी की मौत के बाद वर्तमान निजाम पर तो सवाल है ही। आज कांग्रेस के वरिष्ठ नेता भी स्टेन स्वामी को श्रद्धांजलि देने के लिए ट्वीट कर रहे हैं। सवाल है कि यूएपीए को लेकर आया कौन? कांग्रेस उन्हीं गांधीवादी मूल्यों के खिलाफ गई जिसकी विरासत की वह दावेदारी करती है। कांग्रेस के शासन में यह कानून लाया गया था। व्यक्तिगत आजादी के लिए अहिंसक संघर्ष को भी अपराध के दायरे में डाल दिया गया। संसाधनों के मनमाने दोहन के अवरोधक बने लोग अपराधी की तरह जेल में बंद किए जाने लगे। कांग्रेस के राज में ही यह कानून आया कि विनाशकारी नीति के बाधक बने लोगों को अपराधी घोषित करो और उसके बाद उन्हें साबित करना है कि वे अपराधी नहीं हैं। कांग्रेस के नेता कह रहे हैं कि यूएपीए कानून का दुरुपयोग किया जा रहा है। सच तो यह है कि इस कानून को लाया ही इस मंशा से गया था कि सत्ता अपने हिसाब से नागरिक अधिकारों को बंधक बना उसका दुरुपयोग कर सके, इसके सदुपयोग की बात ही बेमानी है।

वर्तमान निजाम को मुलजिम स्टेन स्वामी का मुजरिम साबित करना आसान है। लेकिन लोकतांत्रिक उदारवादी मूल्यों की हत्या का जिम्मेदार कौन है? सलाखों के पीछे ऐसी त्रासदियों का कालक्रमित ब्योरा पुराना है। इसका भयावह रूप हम चीन में देख सकते हैं। चीन में एक समय ऐसा था जब साम्यवाद ने भूख और गरीबी को रोकने का काम किया। वहां आज उसी साम्यवाद के नाम पर वैयक्तिक स्वतंत्रता को खत्म कर संसाधनों की देशी-विदेशी लूट का हिस्सा बन जाने को जायज बताया जा रहा है। संसाधनों के दोहन के लिए वैयक्तिक स्वतंत्रता को खत्म करना वैश्विक संदर्भ बन गया है। यानी नागरिक या तो खुद मरेगा या व्यवस्था के रचे चक्रव्यूह में मार दिया जाएगा।

इस स्तंभ में प्राय: शेक्सपियर से लेकर मार्केज और आर्वेल के किरदारों के उदाहरण होते हैं। हम भारतीय रामायण और महाभारत के किरदारों से आज के समय को तौलते हैं। चाहे धृतराष्ट्र हो या दुर्योधन, हमें उनमें भी मनुष्यता के पक्ष मिलते हैं। लेकिन आने वाले समय में शायद हम उन संदर्भों को नहीं ले पाएंगे क्योंकि हम उससे ज्यादा पराभव देखेंगे। ऐसे पराभव के आने के पहले ही उसके लिए रची कहानी को सिर्फ कहानी ही रहने देने के लिए जरूरी है कि फादर स्टेन स्वामी की मौत के बाद नागरिक अधिकार और राज्य के संबंध पर वृहत्तर संदर्भों में बहस हो।

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