पहले गुना फिर भागा

अफगानिस्तान में वही महिलाएं उम्मीद हैं जो आज बंदूकों को धता बताते हुए सत्ता में भागीदारी की मांग कर रही हैं। कक्षा में लड़की और लड़कों के बीच जो पर्दें टंगे हैं उन पर्दों को भी वहीं की लड़कियां नोचेंगी। शरिया कानूनों के सामने ज्ञान-विज्ञान और जम्हूरियत की वापसी उसी मिट्टी में मटमैले हो रहे लोगों को करना होगा।

Bebak Bol, Talibani Governance
काबुल में पाकिस्तान के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे लोगों पर बंदूक ताने खड़ा तालिबानी। फोटो- रॉयटर्स

ऐ पड़ोसी तू बता
हम को तो कुछ होश नहीं
था हमारा भी कोई
घर तिरे घर से पहले

  • यूसुफ तकी

उसामा बिन लादेन को मारने के बाद अमेरिका ने अपने नागरिकों की हत्या का बदला लेने का दावा किया था। आज अफगानिस्तान की अंतरिम सरकार में हक्कानी नेटवर्क के सरगना सिराजुद्दीन हक्कानी को रखा गया है जिसके सिर पर अमेरिकी सरकार ने एक करोड़ डॉलर का इनाम घोषित कर रखा है। अफगानिस्तान को सभ्य बनाने का ठेका लेने वाली अमेरिकी सरकार उसी तालिबान के तुष्टीकरण के लिए मजबूर है जिसके मंत्री पर अमेरिकी नागरिकों को मारने का इल्जाम है। आतंकवादी और आतंकवादियों को पनाह देने वाली सरकार को एक ही मानने का दावा करने वाली अमेरिकी सरकार आज अपने घर में भी सवालों के घेरे में है। जहां तक अफगानिस्तान का सवाल है वहां का नया मुस्तकबिल वही लोग लिखेंगे जो आज बंदूकों से डरे बिना लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए सड़क पर उतर रहे हैं। भारत सहित दुनिया के देशों की अफगानिस्तान में हुई चूक पर बेबाक बोल।

मुल्ला हसन अखुंद को अफगानिस्तान की अंतरिम सरकार का प्रधानमंत्री बना दिया गया है। हसन अखुंद जिस रूढ़िवादी इस्लाम के पैरोकार हैं उसके बाद अफगानिस्तान में महिलाओं, धार्मिक अल्पसंख्यकों और आधुनिक सोच रखने वालों का क्या होगा इस पर पूरी दुनिया चिंता कर रही है। इन सबके साथ भारत के लिए बड़ी चिंता का विषय यह है कि इन सबका असर हम पर क्या होगा, हम अफगानिस्तान के लिए क्या कर सकते थे और आगे क्या कर सकेंगे। पड़ोसियों के साथ भू-राजनीति की कूटनीति में हम कितने गलत और सही साबित हुए।

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का सबसे ज्यादा दोहाराया जाने वाला वाक्य है-हम लोग अपने दोस्त बदल सकते हैं लेकिन पड़ोसी नहीं। चीन, पाकिस्तान और अफगानिस्तान हमारे पड़ोसी देश हैं। अफगानिस्तान में पैदा हुए हालिया संकट के बाद हमारे इन पड़ोसियों के साथ कैसे कूटनीतिक रिश्ते हैं? इन तीनों के साथ कूटनीतिक रणनीति बिगड़ने का असर हमारे सबसे संवेदनशील क्षेत्र कश्मीर पर क्या पड़ेगा?

आज अफगानिस्तान की कमान मुल्ला हसन अखुंद के हाथों में है। हसन वह शख्स है जिसकी छवि अमेरिका के दुश्मन के रूप में थी। जाहिर सी बात है कि अब अफगानिस्तान शरिया कानून के अनुसार ही चलेगा। लेकिन इसके पहले अमेरिका की अगुआई में इन सबको ‘आतंकवादी’ घोषित किया जा चुका है। जो अमेरिका का दुश्मन उसे पूरी दुनिया का दुश्मन साबित कर ही दिया जाता था। सोवियत संघ से लेकर अमेरिका जैसे बाहरी देश अपने हिसाब से अफगानिस्तान को चलाते रहे और आतंकवाद की अपनी-अपनी परिभाषा गढ़ते गए। राजनीतिक विद्वानों का एक आकलन दावा करता है कि सोवियत संघ की नाकामी का एक बड़ा कारण यह भी था कि उसने अपने संसाधनों का बड़ा हिस्सा अफगानिस्तान में झोंक दिया।

उसके बाद अमेरिका का वर्चस्व हुआ और उसने तालिबान को पीछे धकेल कर एक कठपुतली सरकार का निर्माण कर दिया। अमेरिका समर्थित उस सरकार की छवि एक भ्रष्ट शासन की थी जिसकी आम जनता में कोई साख नहीं थी। उस बेसाख सरकार के साथ अमेरिका के लिए अपनी साख बचाना मुश्किल हो रहा था। अफगानिस्तान पर खर्च अमेरिका के लिए बोझ बन चुका था और वह वहां से भाग खड़ा हुआ। इसके साथ ही अफगानिस्तान से भागे वहां के प्रधानमंत्री अशरफ गनी। गनी ने तो अपनी मातृभूमि छोड़ने में अमेरिकी सैनिकों से भी ज्यादा तेजी दिखाई। मुसीबत में जब कोई प्रधानमंत्री सबसे पहले देश छोड़ कर भागे तो समझा जा सकता है कि अवाम और कौम से उसका रिश्ता कैसा था।

अमेरिका के अफगानिस्तान छोड़ने के साथ ही वहां की फिल्मकार सहरा करीमी की अफगानिस्तान को बचाने की मार्मिक अपील दुनिया भर में फैली। इस अपील के कुछ समय बाद सहरा और उनके परिवार को अफगानिस्तान से सुरक्षित निकाल लिया गया। लेकिन सवाल यही है कि अफगानिस्तान को वो क्यों बचाते जो मुल्क में महज ठेकेदारी के लिए आए थे। अफगानिस्तान को ठेके पर अशरफ गनी को दिया गया था और फायदा नहीं दिखा तो दोनों भाग गए। सहरा किसी और लोकतांत्रिक मुल्क में अफगास्तिान के दर्द पर फिल्म बना लेंगी, लेकिन जो अफगानिस्तान की मिट्टी में मौजूद हैं उनका क्या होगा? अमेरिका की इस महानाकामी के लिए उस पर जिम्मेदारी कौन तय करेगा?

पहले सोवियत संघ और बाद में अमेरिका ने अफगानिस्तान को सभ्य बनाने का ठेका लिया था। अंग्रेज भी भारत में यही दावा करके आए थे कि वे हिंद महासागर के इस प्रायद्वीप को सभ्य बना रहे हैं, इनकी भलाई के लिए हमारा शासन जरूरी है। लंबे समय तक चले स्वतंत्रता आंदोलन के बाद जब अंग्रेज भारत छोड़ने के लिए मजबूर हुए तो यहां भी एक तबके ने डर दिखाया था कि अंग्रेजों के जाने के बाद हमारा क्या होगा। अंग्रेजों की वजह से डाक, रेल, अस्पताल और स्कूल मिले। अंग्रेज न आते तो भारत में छुआछूत, सती कुप्रथा चलती रहती।

गोया अंग्रेज न आते तो हम भारतीय अभी तक पत्तों से शरीर ढक कर गुफा मानव बने रहते, किसी ऐसी ‘टाइम मशीन’ में बैठे रहते जो पाषाणकाल के आगे भारत को बढ़ने ही नहीं देती। ऐसा ही कुछ अमेरिका के अफगानिस्तान छोड़ने पर कहा जाने लगा कि वहां तो आधुनिकीकरण हो रहा था, लोकतांत्रिक संस्थाएं बन रही थीं अब क्या होगा? उस अमेरिका की महानता के गीत गाए जा रहे हैं जो अफगानिस्तान में उसामा बिन लादेन को नहीं खोज पाया था और पाकिस्तान में जाकर मारा। लादेन की लाश को समंदर में दफनाया गया ताकि कोई उसकी कब्र तक न खोज पाए। लादेन को मार अमेरिका ने अपनी पीठ थपथपा दी कि ट्वीन टावर पर आतंकी हमले का बदला ले लिया। एक तरह से अमेरिका ने आतंकवाद पर विराम लगने जैसा ही एलान कर दिया था।

आज आलम यह है कि तालिबान लड़ाकों के पास उसी अमेरिका के हथियारों का जखीरा है। अमेरिकी सैनिक उन्हीं हथियारों से मारे गए जो अमेरिका के पैसे से खरीदे गए थे। आज काबुल में मारे गए अमेरिकी सैनिकों के जिम्मेदार तालिबान छोड़ कर किसी और संगठन को बता दिया गया। अफगानिस्तान में लोकतंत्र को बचाने की अपील भगोड़ों से की जा रही थी। कोई भी बाहर की ताकत एक बेहतर मुल्क नहीं बना सकती, अफगानिस्तान इस सबक का विश्वविद्यालय बन चुका है।

आज के समय में सबसे जरूरी था अफगानिस्तान में सरकार का गठन करवा कर उस पर लोकतांत्रिक तरीके से चलने का दबाव बनाना। इस दबाव में भारत की अहम भूमिका हो सकती थी। अमेरिका ने अफगानिस्तान से भागते वक्त यह भी न सोचा कि उसके भारत जैसे सामरिक और रणनीतिक सहयोगियों की क्या स्थिति होगी। पाकिस्तान और चीन वहां अपनी चाल चल रहे हैं, सरकार निर्माण में दखल दे रहे हैं और हम संवाद करने के लिए भी अन्य देशों की मध्यस्थता के भरोसे हो गए हैं। आइएसआइ का अगुआ काबुल पहुंच कर भारत के लिए खतरे का संकेत दे ही चुका है। पाकिस्तान और चीन समर्थित काबुल, नई दिल्ली के लिए एक बड़ी परेशानी बन चुका है।

अफगानिस्तान ने भारत की कूटनीति को अटल बिहारी वाजपेयी का संदेशा याद रखने की जरूरत बता दी है। विदेश नीति के संदर्भ में हमेशा दरवाजे-खिड़की खोले रखने चाहिए। कल कोई भी संभावना हो आपकी बातचीत के लिए जमीन बची रहनी चाहिए। जरूरी नहीं कि एक देश का हित दूसरे देश के हित से मिले। कभी हमारा हित चीन के साथ जाने में हो सकता है तो कभी अमेरिका के साथ तो कभी पाकिस्तान के साथ। कूटनीति को लेकर हमेशा एक स्वतंत्र नीति होनी चाहिए। एक स्वतंत्र विदेश नीति के नाते भारत की अफगानिस्तान में फिलहाल संभावना खत्म हो गई है क्योंकि अमेरिका पर ज्यादा भरोसा कर बाकियों को दुश्मन की तरह दिखा दिया।

आज भारत जब कश्मीर को लेकर चिंतित हो गया है तो अमेरिका बहुत दूर है। यह वो वक्त है जब भारत अपनी सीमा से लगते पड़ोसियों के साथ अपने लाभ की कूटनीति पर ध्यान दे। जहां तक अफगानिस्तान की बात है वहां वही महिलाएं उम्मीद हैं जो आज बंदूकों को धता बताते हुए सत्ता में भागीदारी की मांग कर रही हैं। कक्षा में लड़की और लड़कों के बीच जो पर्दें टंगे हैं उन पर्दों को भी वहीं की लड़कियां नोचेंगी। शरिया कानूनों के सामने ज्ञान-विज्ञान और जम्हूरियत की वापसी उसी मिट्टी में मटमैले हो रहे लोगों को करना होगा। अमेरिका की मदद से देश से जाने वाले फिल्मकार कल को आस्कर जीतने वाली फिल्म बना सकते हैं, लेकिन अफगानिस्तानियों को अपनी फिल्म का नायक व निर्देशक खुद बनना होगा। अफगानिस्तान जिस तरह से सभ्यता के कथित जंगबहादुरों का रणछोड़िस्तान बन गया है इससे उसे सबक लेना होगा। अपने इस पड़ोसी देश को लोकतांत्रिक बनाने में भारत जिस तरह की भी मदद करेगा उसकी सीमाई सुरक्षा के लिए उतना ही बेहतर होगा।

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