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बेबाक बोल: चौपट राजा

राष्ट्रमंडल और एशियाई खेलों से लेकर ओलंपिक तक में एक नगरी की लड़कियां भारत के लिए सोना, चांदी और कांसे के तमगे बटोर कर लाती हैं। यहां की बेटियां खेतों में काम करने से लेकर अंतरिक्ष यात्रा का मुकाम तय कर चुकी हैं, विश्व सुंदरी का ताज पहन चुकी हैं। लेकिन सकारात्मक ऊर्जा से भरे मानव संसाधन और असीम संभावनाओं से भरी यह नगरी आज कुख्यात हो रही कथित बाबाओं के डेरे, बाबाओं के भक्तों पर काबू पाने पर हुए दंगा-फसाद के कारण। बर्बर और सामूहिक बलात्कार इस नगरी की पहचान को और अंधेरे में डाल रही। राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित छात्रा का सामूहिक बलात्कार होता है और मुख्यमंत्री अपने अधिकारी के हाथों दो लाख का चेक भिजवाते हैं। इसके पहले भी हरियाणा के कई पुलिस थानों की फाइलों में बलात्कार के चीखते मामले गूंगी व्यवस्था से पूछ रहे हैं कि कैसे बचाएं और पढ़ाएं अपनी बेटियों को। अंधेर नगरी में आग लगती है और चौपट राजा बांसुरी बजाता है। हर नई आग के बाद राजा अपनी बांसुरी की धुन बदल देता है। इस चौपट राजा पर ऊपर से लेकर नीचे तक की चुप्पी के खिलाफ बेबाक बोल।

हरियाणा के सीएम मनोहर लाल खट्टर।

‘घूंघट की आन-बान, म्हारे हरियाणा की पहचान’। हरियाणा सरकार की पत्रिका ‘कृषि संवाद’ के एक अंक में घूंघट को सूबे की पहचान बताया गया था। घर की देहरी से निकलती दुपट्टे से चेहरा ढके और सिर पर बोझा रखी महिला। पर्दाप्रथा का महिमामंडन करती घूंघट में बोझा ढोती यह तस्वीर खट्टर सरकार की सामंती सोच का विज्ञापन कर रही थी। जब सरकारी सोच में स्त्री की छवि ऐसी है तो फिर स्कूल जाने वाली, रात में सड़क पर कार चलाने वाली, राष्टÑपति से टॉपर का तमगा लेती लड़कियों को खट्टर राज का ढांचा किस तरह से देखेगा।

एक लड़की भ्रूण हत्या से बच कर मां के पेट से बाहर निकली। गली के शोहदों से बचकर स्कूल गई। सबसे ज्यादा नंबर लेकर टॉप भी किया और राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित हुई। अंदाजा लगा सकते हैं कि कितने अरमानों से मां-बाप ने पाला-पोसा और पढ़ाया-लिखाया होगा। उसकी युवा आंखों में कितने सपने तैर रहे होंगे। राष्टÑपति पुरस्कार लेते वक्त गर्व की कैसी अनुभूति हुई होगी, मां-बाप, परिजनों ने कितने आशीष दिए होंगे। इस टॉपर, राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित छात्रा का सामूहिक बलात्कार होता है। वह आगे की पढ़ाई में व्यस्त थी और कोचिंग जाने के रास्ते में उसका अपहरण कर लिया जाता है। हरियाणा के डीजीपी का बयान है कि लड़की से सामूहिक बलात्कार का एक आरोपी सेना का जवान है। राज्य के मुखिया इस बर्बरता पर चार दिन बाद कहते हैं, ‘कानून अपने तरीके से काम करेगा और जो दोषी हैं उन्हें सजा मिलेगी।’ जिस लड़की के साथ बर्बरता हुई मुख्यमंत्री उसके परिवार से खुद मिलने तो नहीं गए लेकिन दो लाख रुपए का चेक भिजवा दिया।

जिस सरकार के मंत्री बलात्कार के आरोपी बाबाओं के डेरे में जाकर, कथित बाबाओं के जन्मदिन पर लाखों का चेक देकर आते हैं, उस सरकार के मुख्यमंत्री सामूहिक बलात्कार पीड़ित के पास दो लाख का चेक भिजवाते हैं। यहां खट्टर से एक सवाल पूछने का मन करता है, आप ऐसे मामले में इतने कट्टर कैसे हो जाते हैं? लड़की की मां ने ठीक ही सवाल पूछा है कि क्या मेरी बेटी की इज्जत की कीमत दो लाख रुपए है? जब उसकी मां ने वो पैसे ठुकराए होंगे तो क्या आपको अपनी गलती का अहसास हुआ कि राज्य के मुखिया के तौर पर संवेदना के प्रदर्शन में आप कितने पीछे रह गए?गाय, गोबर और विलुप्त सरस्वती की रक्षा में पैसे झोंकने वाले और अनर्गल बयानों की झड़ी लगाने वाले सामूहिक बलात्कार पर चार दिन की चुप्पी साध कर दो लाख का चेक भिजवाते हैं। इस कट्टर मुख्यमंत्री से एक मां का सवाल है, ‘आप कहते हैं, बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ। लेकिन कैसे? मुझे अपनी बेटी के लिए इंसाफ चाहिए।’

चमकते हरियाणा बनाने का दावा करने वाली खट्टर सरकार ने संभावनाओं से भरे एक राज्य को सामंती युग में धकेल दिया। पूरी शिक्षा पद्धति को योग, गाय-गंगा, गोबर तक सीमित कर दिया और सामाजिक विभेद की दीवार ऊंची कर दी। बलात्कार का संबंध बहुत गहरे तक सामाजिक भेदभाव से भी है। शिक्षा को, तार्किकता को आप बांधते हैं तो एक बीमार समाज की धारणाओं को ढक देते हैं। यही बीमार धारणाएं बाद में महामारी का रूप ले लेती हैं। सामूहिक बलात्कार जैसी बर्बरता सिर्फ यौन सुख के लिए नहीं होती बल्कि वह पूरी स्त्री जाति के प्रति विद्वेष के कारण होती है। भारत विभाजन हो या कोई और दंगा महिलाओं पर दमन के लिए बलात्कार होगा। कुंठित और कट्टर समाज में एक लड़की राष्ट्रपति पुरस्कार हासिल कर लेती है तो आसपास के सामंती सोच के पुरुषों को वह जरा भी नहीं सुहाती। एक टॉपर के शरीर का नहीं बल्कि उसके हौसले, मजबूती और सपनों का सामूहिक बलात्कार होता है। खट्टर सरकार में सबसे ज्यादा ढोंगी बाबाओं के डेरे लगे और उन्हें सरकारी संरक्षण मिलने का आरोप लगा। बाबाओं को जेल भिजवाने को लेकर जिस तरह के दंगे हुए और आम नागरिकों की जानें गर्इं वह भी इनके राजनीतिक रिपोर्ट कार्ड में दर्ज है। जाट आरक्षण आंदोलन में जिस तरह सरकार ने समर्पण किया और आम लोग बंधक बने, व्यवस्था ठप हुई उससे ज्यादा नाकामी किसी सरकार की और क्या हो सकती है। राम रहीम को हेलिकॉप्टर से जेल भिजवा दिया लेकिन पंचकूला के आम नागरिकों को भक्त से दंगाई बने बवालियों के बीच छोड़ दिया गया। राम रहीम को सजा होने पर दंगे के दौरान जिन 36 लोगों की जानें गर्इं उनका जिम्मेदार कौन है इसका जवाब आज तक नहीं मिला। खट्टर राज में हुए हर हिंसा-फसाद में मरने वालों का आंकड़ा 30 के ऊपर ही जाता है। महिलाओं के खिलाफ, वैज्ञानिक चेतना के खिलाफ बोलने वाले मंत्रियों और नेताओं की फौज है। ढोंगी बाबाओं का ‘डेरा’ बना दिया गया यह राज्य बलात्कारियों का भी गढ़ बन गया है और व्यवस्था हर तरफ सोई हुई है।

आज हरियाणा में सरकार के बड़े नेता से लेकर छुटभैये नेता तक टॉपर छात्रा के सामूहिक बलात्कार पर चुप्पी साधे हुए हैं। यह चुप्पी सिर्फ हरियाणा में नहीं है। वीडियो वायरल होता है कि पुलिसवाले का बेटा एक लड़की की बुरी तरह पिटाई करता है। गृह मंत्रालय के अगुआ इस पर नाराजगी जताते हैं। उसके बाद आरोपी बेटे की गिरफ्तारी होती है और उसके पुलिसवाले पिता को निलंबित कर दिया जाता है। लेकिन खट्टर राज में हुई इस बर्बरता पर चारों तरफ सन्नाटा है। देश के सर्वोच्च नागरिक का दफ्तर एक मेधावी छात्रा को सम्मानित करता है। उसके पास राष्टÑपति पुरस्कार का तमगा है और आज वह सामूहिक बलात्कार के जख्मों से जूझ रही है। सर्वोच्च नागरिक निजी तौर पर इस आम नागरिक के लिए नहीं बोल सकते। लेकिन उनका दफ्तर तो अपनी तरफ से बयान जारी कर उस लड़की की हौसलाअफजाई कर सकता था।

वैसे, स्त्री हिंसा पर, अराजकता पर ऊपर से नीचे तक विचलित करने वाली यह चुप्पी नई नहीं है। दिल्ली के एक आइएएस अधिकारी का अपमान करने का मुख्यमंत्री पर आरोप लगता है और पूरा आइएएस संघ मुख्यमंत्री के खिलाफ बगावत कर हड़ताल कर देता है। वहीं चंडीगढ़ में भाजपा के एक बड़े नेता के बेटे पर आइएएस अधिकारी की बेटी का बुरी नीयत से पीछा करने का आरोप लगता है। लड़की के आइएएस पिता का आरोप था कि अपनी बेटी के लिए इंसाफ की मांग करने के बाद उन्हें प्रताड़ित किया गया। लेकिन लड़की के पिता की पीड़ा से, उनके खौफ से आइएएस एसोएिशन को कोई फर्क नहीं पड़ता। कल आइएएस की बेटी के उत्पीड़न पर आप चुप थे, आज टॉपर छात्रा के सामूहिक बलात्कार पर चुप हैं। इस व्यवस्थागत चुप्पी का शिकार आइएएस से लेकर आम इंसान तक की बेटी है। हम सबकी बेटी सामंती सोच वाले घूंघट से बाहर निकलने का खमियाजा भुगत रही। इस पूरी व्यवस्थागत चुप्पी पर मां का सवाल है, ‘कैसे पढ़ाऊं और बचाऊं अपनी बेटी को’? लेकिन इस सवाल को वह नीरो नहीं सुन रहा जो रोम के जलने पर चैन की बांसुरी बजाता है। दुख यह है कि हरियाणा के नाम वाला रोम जितनी बार जलता है, उतनी ही बार यहां का नीरो बांसुरी की धुन बदल लेता है।

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