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2019: डर के आगे…

2019 का चुनाव दो दलों या दो प्रतिनिधि चेहरों का नहीं बल्कि दो महागठबंधनों का चुनाव होगा। गठबंधन को लेकर सत्ता पक्ष जितना लचीला रुख अख्तिायार कर चुका है और परिवर्तन की लकीर के बरक्स सुधार की बड़ी लकीर खींच रहा है उससे उसके खोने के डर का भी पता चलता है। भाजपा और कांग्रेस जैसे बड़े राष्टÑीय दलों के सामने क्षेत्रीय क्षत्रप अपनी लकीर बड़ी कर चुके हैं। 2014 के आर-पार वाले माहौल के उलट इस बार हर खेमे में खोने का डर और गठबंधन के बढ़े कद के हालात पर बेबाक बोल।

बिहार जैसे राजनीतिक रूप से अहम क्षेत्र में भाजपा ने वक्त की नजाकत और जरूरत को भांप लिया और जद एकी के साथ 17-17 सीटों पर समझौता किया। इनमें पांच सीटें वैसी भी हैं जिन पर भाजपा जीत दर्ज कर चुकी है।

विपक्षी दलों के नेताओं को ‘देहाती औरत’ से लेकर ‘पूतना’ तक के संबोधन देनेवाले गिरिराज सिंह पांच सालों तक अपने विवादित बयानों के कारण अक्सर चर्चा में रहे। सार्वजनिक मंच पर गिरिराज अक्सर कुछ ऐसा कह जाते थे, जिससे हंगामा मचता था। लेकिन अफसोस जिस नवादा सीट से उन्होंने चुनाव जीता था और राजग सरकार के सबसे बिगड़े बोल वाले नेता के रूप में सामने आए, इस बार उस सीट से चुनाव नहीं लड़ पाएंगे। बिहार में भाजपा के सहयोगी दलों के गठबंधन के कारण अब यह सीट लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) के पास है।

बिहार जैसे राजनीतिक रूप से अहम क्षेत्र में भाजपा ने वक्त की नजाकत और जरूरत को भांप लिया और जद एकी के साथ 17-17 सीटों पर समझौता किया। इनमें पांच सीटें वैसी भी हैं जिन पर भाजपा जीत दर्ज कर चुकी है। महाराष्टÑ में शिवसेना को अपने गठबंधन की फौज में शामिल कर लिया है। बिहार में रालोसपा ने जो छोटा झटका दिया था उसके असर को भी बेअसर कर दिया। भाजपा जैसी मजबूत पार्टी के लिए बिहार में इतना समझौतावादी होना बता रहा है कि इस बार 2019 का चुनाव दो दलों या दो नायकों की लड़ाई नहीं है। इस बार का मैदान 2014 की तरह आर-पार का नहीं है कि इसके खिलाफ वह। इसलिए हर खेमे में खोने का डर है।
चुनावों को लेकर आचार संहिता लागू है, लेकिन राजनीतिक पंडित अभी तक कोई ठोस चुनावी परिदृश्य सामने नहीं ला पाए हैं, इन्हें भी गलत साबित होने का डर है। फरवरी के पहले हफ्ते में विपक्ष हावी-सा दिख रहा था और कथित उदारवादी तबके ने परिवर्तन की उम्मीद की किरण फैला दी थी। पुलवामा हमले के बाद इनके उत्साह के बुलबुले फूट गए। केंद्र सरकार अपने पक्ष में इस माहौल को भुनाती, उससे पहले ही इस तबके ने आत्समर्पण कर दिया। यह वही तबका है जो जितनी जल्दी उत्साह में आता है, उतनी ही जल्दी निराशा के समुद्र में गोते भी लगाता है। सबसे खास बात यह है कि आशा और निराशा का माहौल रचने वाले इस तबके का मत फीसद सबसे कम होता है, इसलिए फिलहाल इस पाठ से इन्हें बाहर ही रखते हैं।

बिहार में तेजस्वी यादव चेतावनी देते हुए कहते हैं, ‘अगर अबकी बार विपक्ष से कोई रणनीतिक चूक हुई तो फिर देश में आम चुनाव होंगे या नहीं, कोई नहीं जानता। अगर अपनी चंद सीटें बढ़ाने और सहयोगियों की घटाने के लिए अहंकार नहीं छोड़ा तो संविधान में आस्था रखने वाले न्यायप्रिय देशवासी माफ नहीं करेंगे’। तेजस्वी यादव के बयान में 2024 में चुनाव नहीं होने वाली अतिश्योक्ति हटा दें तो डर साफ-साफ महसूस किया जा सकता है। यही वजह है कि महागठबंधन के मोर्चे में शामिल दलों के बीच एकता बनाए रखने के लिए जहां तेजस्वी ने अधिकतम समझौते किए, वहीं कांग्रेस की अकड़ अंतिम दौर तक बनी रही। पिछले चुनावों में सीटों और वोटों के फीसद का खयाल किए बिना कांग्रेस ने सोलह सीटों तक की मांग की थी। लेकिन राजद ने मौजूदा राजनीतिक हालात और जमीनी हकीकत, दोनों की बात की। तेजस्वी के खौफ के आगे बसपा प्रमुख मायावती का अति उत्साह भी है कि कांग्रेस सात सीटें छोड़ने की बात न करे, पूरे 80 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे। मायावती के अनुसार सपा-बसपा मिलकर भाजपा को हरा देंगे। हर राज्य में डर और उत्साह का माहौल अलग-अलग है जिसमें विपक्ष पूरी तरह उलझ रहा है।
भाजपा को पता है कि इस बार वैसी कोई सुनामी और लहर नहीं है तो वह इसकी तैयारी भी कर रही है। लेकिन दिल्ली में आम आदमी पार्टी और कांग्रेस का गठबंधन कोई फैसला नहीं कर पा रहा है। दिल्ली प्रदेश कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष और वरिष्ठ कांग्रेस नेता अजय माकन चेतावनी के लहजे में साफ-साफ कह रहे हैं कि अगर कांग्रेस और आम आदमी पार्टी का गठबंधन नहीं हुआ तो राष्ट्रीय राजधानी की सातों सीटें भाजपा की झोली में जाएंगी।

गठबंधन को लेकर दोनों दलों के भय की बानगी दिल्ली में ही देखी जा सकती है। आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के संभावित गठबंधन के खिलाफ भाजपा नेताओं का अभियान शुरू है और वे इसे महामिलावट बता रहे हैं। भाजपा और आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ता एक-दूसरे के घोषणापत्र जला रहे हैं। भाजपा नेता उन आरोपों की याद दिला रहे हैं जो कांग्रेस और आम आदमी पार्टी ने एक-दूसरे पर लगाए थे। दिल्ली में सबसे अहम है भाजपा का अपने सातों चेहरों पर मंथन करना। इसके लिए पार्टी ने सर्वेक्षण भी करवाया। भाजपा की पहले भी रणनीति रही है कि जिन क्षेत्रों में उसके प्रतिनिधियों ने अच्छा काम नहीं किया है उन चेहरों को बदल देना। चेहरे बदल जाने से जनता को बदलाव की थोड़ी भावना तो महसूस होती है।
अगर सामने के श्यामपट पर एक लकीर खिंच चुकी है तो फिर क्या किया जा सकता है। या तो उस लकीर को मिटा दिया जा सकता है या उसके समांतर एक बड़ी लकीर खींची जा सकती है। भाजपा और कांग्रेस दोनों दलों के समांतर क्षेत्रीय क्षत्रप बड़ी लकीर खींच चुके हैं। अब भाजपा बनाम सब या कांग्रेस बनाम सब की लड़ाई नहीं है। ये सब अपनी-अपनी लकीर की लंबाई से बंधे हुए हैं। इस बार की जंग इन समांतर खड़ी लकीरों के साथ है।
कर्नाटक के मुख्यमंत्री कुमारस्वामी सर्वश्रेष्ठ उदाहरण हैं गठबंधन की जीत के। सबसे बड़ी पार्टी होने के बाद भी भाजपा के पास सरकार बनाने का संख्याबल नहीं था। अब लकीर को बड़ा करने की शक्ति कुमारस्वामी के पास थी। वे जिसके साथ हाथ मिलाते, वही लकीर बड़ी हो जाती। कांग्रेस से हाथ मिलाते ही भाजपा के शपथ लिए मुख्यमंत्री को अधूरा भाषण छोड़ आंखें पोछते हुए बाहर जाना पड़ा था। गठबंधन के संख्याबल ने बड़ी लकीर छोटी कर दी।
कर्नाटक में गठबंधन के जरिए लकीर बड़ी हुई कांंग्रेस की। लेकिन इससे सबक सीखा भाजपा ने। जबकि कांग्रेस हर राज्य में असमंजस में रही। पिछले चुनावों में तीन राज्यों में वह अपने बूते सरकार बना पाई है, लेकिन लोकसभा चुनावों में वह एकला चलो रे की हालत में नहीं है। भाजपा और संघ पूरी ताकत से अपनी जमीन वापस पाने को जुटे हैं। पिछले पांच सालों में संघ ने जो जमीनी ताकत बनाई है, उससे भाजपा को भरोसा है कि अगर वह एक जगह कुछ दे रही है तो दूसरी जगह मांग भी सकती है, एक जगह खो रही है तो दूसरी जगह पा भी जाएगी। लेकिन पिछले लोकसभा चुनावों में अस्तित्व के स्तर तक हिल चुकी कांग्रेस अगर एक जगह कुछ खोती है तो दूसरी जगह उसी अनुपात में पा जाना उसके लिए संभव नहीं है।
भाजपा और संघ ने जिन जगहों पर परिवर्तन की आहट सुनी वहां डरी भी और आपदा प्रबंधन किया। परिवर्तन की लकीरों को पहचान वहां मान-मनौव्वल की बड़ी लकीर खींचने में भी नहीं हिचकिचाई। महाराष्टÑ में एक-दूसरे पर लगातार कीचड़ उछालने के बाद खतरा देखा तो ‘दाग अच्छे हैं’ कहकर गले लगा लिया। जहां गठबंधन संभव नहीं है उन दलों के नेताओं को अपनी पार्टी में शामिल करने की रणनीति अपनाई। लेकिन उसे इस बात की भी समझ है कि इस बार मामला एकतरफा नहीं हैं। इस बार अन्य दलों से भाजपा में लोग सिर्फ आए नहीं हैं, बल्कि अच्छी-खासी संख्या में उससे नाता भी तोड़ा है।
2019 का मुकाबला दो चेहरों या दो दलों का नहीं, बल्कि गठबंधनों का ही मुकाबला है। यह राजग का डर ही है कि वह विपक्ष के मेल को महामिलावट कर हमलावर हो रहा है। इस हमले के पीछे उसका वह डर है जो उसके अपने गठबंधन में दलों की संख्या बढ़ती जा रही है। वैसे डरना सही भी है, क्योंकि उससे निकलने की कवायद ही हासिल-ए-महफिल है। डर के आगे ही जीत है।

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