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बेबाक बोल : आगे 2019 है…

जंतर मंतर और रामलीला मैदान से एनजीओ, आइआइटी, हाई प्रोफाइल समाज सेवकों के डिजाइनर आंदोलन से आम आदमी पार्टी का ब्रांड निकला था। शहर की दीवार से लेकर ऑटोरिक्शा तक ईमानदारी के प्रमाणपत्र बांट रहे थे। केजरीवाल और शीला दीक्षित में से ईमानदार कौन और जनता किसे चुनेगी जैसे कौन बनेगा करोड़पतिनुमा सवाल पूछ कर जनता से जवाब को ‘लॉक’ करने के लिए कहा गया था। इस विज्ञापनी आंदोलन का असर था कि आम आदमी पार्टी को विपक्षविहीन सरकार बनाने का मौका मिला। लेकिन जब सामने कोई विपक्ष नहीं था तो सत्ता के अहंकार ने नौकरशाहों को ही विपक्षी दलों की तरह देखना शुरू कर दिया। दिल्ली जैसे केंद्रशासित प्रदेश में केंद्र और राज्य के हितों का टकराव आम है। लेकिन केजरीवाल सरकार ने इस वैधानिक मुद्दे को निजी पीड़ा बताकर खुद को सबसे बड़ा पीड़ित घोषित करना शुरू कर दिया। जनता के सामने पेश की गई इसी विज्ञापनी पीड़ा पर बेबाक बोल।

धरना खत्म हुआ। नौ दिनों तक चली खींचतान का वही आओ बात करें वाला नतीजा इस बार भी निकला। जब बात ही करने का आमंत्रण देना था और यही आश्वासनों का आसन ही लगाना था तो वातानुकूलित धरने को लेकर इतने प्रयोग क्यों? नौकरशाहों के साथ विपक्षी दलों सा व्यवहार क्यों? पर्यावरण एजंसियां चेतावनी दे रही थीं कि अब जल्द कदम न उठाए गए तो दिल्ली-एनसीआर का पूरा क्षेत्र बंजर हो जाएगा। देश की राजधानी दिल्ली की पॉश कालोनियों में भी बहुमंजिला इमारतों के नलके सूखे थे। पानी को लेकर पड़ोसी न सिर्फ नोक-झोंक कर रहे थे बल्कि इन झगड़ों में हत्या भी हो रही थी। एक युवक रक्तदान करके घर लौटता है और पानी के कनेक्शन लगाने के झगड़े में सड़क पर उसका खून बह जाता है। जबकि पानी का महकमा खुद मुख्यमंत्री केजरीवाल के पास है। दावा किया जा रहा है कि नौकरशाहों की कथित हड़ताल को खत्म करवाने के लिए किए गए इस अनोखे धरने से अरविंद केजरीवाल ने आम जनता के बीच अपनी सहानुभूति बटोर ली। आंदोलन की पैदाइश आम आदमी पार्टी के अगुआ की चमक फीकी पड़ गई थी। आंदोलन को आपने अपना ब्रांड बनाया था। पहले आपने जनलोकपाल को लेकर आंदोलन किया था। टूजी से लेकर बड़े कारोबारियों और बड़े नेताओं के खिलाफ जंतर मंतर पर आरोप मढ़े जा रहे थे। उस वक्त इस विज्ञापनी आंदोलन के बोल थे, भ्रष्टाचार, भ्रष्टाचार और सिर्फ भ्रष्टाचार। एनजीओ, आइआइटी, सूचना क्रांति के नायकों का बनाया यह विज्ञापन हिट हुआ और विज्ञापन के नायक केजरीवाल को दिल्ली की कुर्सी मिली। जो इस विज्ञापन के खिलाफ था वह भ्रष्टाचार के साथ था।

लेकिन कुर्सी मिलते ही वह भ्रष्टाचार भी खत्म और जनलोकपाल भी। जनलोकपाल और भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग लड़ने वाले सारे नेताओं की आम आदमी पार्टी से बेदखली शुरू हो गई। यह बेदखली इसलिए कि आंदोलन से उपजी पार्टी में लोकतांत्रिक स्वरूप की मांग की गई। लेकिन जनता के लिए जनलोकपाल मांग रहे केजरीवाल के लिए अब यह काठ की हांडी बन चुका था। आम आदमी पार्टी में सिर्फ एक लोकपाल था, खुद केजरीवाल। अब नायक के विज्ञापन की दूसरी पटकथा लिखी गई। वो मोबाइल से भ्रष्टाचार दूर करने का दावा, स्टिंग-स्टिंग का नारा सब विपश्यना की खामोशी में गुम हो गया। दिल्ली की जनता के पैसों से विज्ञापन ही विज्ञापन। हर तरह के तसल्लीबख्श विज्ञापन। आम आदमी की पहचान बनी नीली ‘वैगनआर’ का ठेका रद्द हो चुका था। अब वह कार आंदोलनकारी से आध्यात्मिक बने मुख्यमंत्री की छवि का भार ढोने में नाकाम थी।अब सरकारी स्कूल और मोहल्ला क्लीनिक थे। यह काम ठीक ही चल रहा था। जनता की सरकार का जनता के लिए। ज्यादा विज्ञापन के साथ थोड़ी हकीकत भी मिल जाए तो जनता खुश हो जाती है। इस काम के लिए तारीफ भी हुई। लेकिन अब सामने 2019 का बाजार था और नायक को लग रहा था कि इतने भर से आम आदमी पार्टी का ब्रांड चुनावी बाजार में बिक नहीं पाएगा। दिल्ली का एक बड़ा मध्यवर्गीय तबका भी तो है जिसके लिए अलग से तड़का जरूरी था। यह मध्यवर्गीय तबका भी सफाई और पानी जैसी बुनियादी समस्याओं से जूझ रहा है।

इसी मध्यवर्गीय तबके का खुद पर ध्यान दिलाने के लिए वातानुकूलित धरना शुरू हुआ। अब इसे नौकरशाही बनाम सरकार के मसले की तरह उछाला गया। सरकार धरने पर थी और ट्वीट, ट्वीट कर रही थी। हर ट्वीट एक नई पीड़ा के साथ था। चुनावी बाजार में पीड़ा ही तो मरहम का काम करती है। हमें काम नहीं करने दिया जा रहा कि पीड़ा। भारतीय लोकतंत्र पिछले ‘70 सालों’ से हर चुनावी बाजार में इसी पीड़ित भाव वाले विज्ञापन को देखता आ रहा है। अब आम आदमी पार्टी की सरकार पीड़ा के विज्ञापन में बाजी मार चुकी थी तो नौकरशाहों को लगा कि हम तो खलनायक बन गए। चार जजों की अप्रत्याशित प्रेस कांफ्रेंस की तरह आइएएस संघ प्रेस क्लब ऑफ इंडिया पहुंचता है। नौकरशाहों का संघ कहता है कि हम हड़ताल पर नहीं हैं, विरोध कर रहे हैं। अंशु प्रकाश मामले से डरे हुए हैं हमें सुरक्षा चाहिए। जनता की अदालत में अपना-अपना विज्ञापन रखने के बाद सभी पक्षों में सुलह हो गई। एक नए तरह का धरना खत्म कर संवाद की बात होने लगी। अफसरों ने कहा कि वे काम करना चाहते हैं और सरकार ने कहा कि वे काम करवाना चाहते हैं। विज्ञापनों का ऐसा ही खेल कुछ समय पहले भी हुआ था और अपने-अपने दांव खेलने के बाद दोनों पक्ष अपनी दीर्घा में लौट गए।यह 2019 के जनता बाजार का ही असर है कि चार राज्यों के मुख्यमंत्री दिल्ली की जनता की खातिर दौड़ पड़े। मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने तो बाकायदा आम आदर्मी पार्टी की रैली में शिरकत की। वाम और अवाम की इस जोड़ी को देख कांग्रेस कह रही है कि केजरीवाल पर विश्वास न करना उनकी कोई विचारधारा नहीं है। दिल्ली के चुनावी बाजार में कांग्रेस अपना विज्ञापन थोड़ा हटकर करना चाह रही है। वह ‘आप’ को भाजपा की बी ग्रेड बता कर कह रही कि अब हम खालिस हैं। काम नहीं करने देने वाले पीड़ितों के इस बाजार में असली पीड़ित दिल्ली की जनता है। धरना देने वाले और इस धरने के खिलाफ धरना देने वाले सब दावा कर रहे कि वे जनता के पक्ष में गोल करना चाह रहे हैं। लेकिन सरकार और नौकरशाहों के बीच फुटबॉल बनी जनता यह सोच रही है कि उसका हर गोल आत्मघाती क्यों हो जाता है। फिलहाल तो आंदोलन वाले कारखाने से 2019 के जनता बाजार के लिए संपूर्ण राज्य का विज्ञापन निकला है। सारे चोर हैं जी… के नारे के बाद जो माफी मांगो आंदोलन निकला उसे भी जनता ने देखा। स्मार्टफोन तो वही है पर अब भ्रष्टाचार विरोधी स्टिंग के बजाए पीड़ितों का ट्वीट है।

आंदोलन का नया विज्ञापन ठंडा मतलब कोकाकोलानुमा, पीड़ित मतलब केजरीवाल। इस बार मांग है दिल्ली को स्वतंत्र राज्य के दर्जे की। यह मांग ऐसी है जो हर सत्ताधारी पार्टी उठाती है और विपक्ष में कहती है कि ऐसा हो नहीं सकता। कोई भी सरकार व्यवस्थापिका और कार्यपालिका दोनों से चलती है। दिल्ली एक केंद्रशासित प्रदेश है, देश की राजधानी है इसलिए इसे पूर्ण राज्य का दर्जा देने में दिक्कत है। सारे देशों के दूतावास, केंद्रीय मंत्रालयों के होते कोई केंद्रीय सत्ता ऐसा होने देना नहीं चाहेगी। लेकिन आम आदमी पार्टी के अगुआ की दिक्कत यह है कि वे इसे वैधानिक से व्यक्तिगत बना देते हैं। राशन की घर-घर आपूर्ति व्यवस्था में दिक्कत आई तो इसे लेकर भी केंद्र के मुखिया पर निजी निशाना साधा। व्यवस्थापरक इस समस्या को व्यक्तिगत बनाकर आप इसे राजनीतिक हास्य में तब्दील कर देते हैं। इस तरह एक वास्तविक समस्या को आप और उलझा कर रख देते हैं। आम आदमी पार्टी को दिल्ली में ऐतिहासिक जीत के साथ विपक्षहीन सत्ता मिली थी। इसका एक नकारात्मक असर पार्टी के अहंकार के तौर पर दिखा। जब ‘आप’ के पास कोई विपक्ष नहीं था तो आपने नौकरशाहों को ही विपक्ष के तौर पर देखना शुरू कर दिया। केंद्रशासित प्रदेशों में कार्यपालिका और व्यवस्थापिका के बीच समन्वय के लिए आप कभी गंभीर नहीं दिखे। मुख्य सचिव मामले में सिर्फ धक्कामुक्की नहीं शाब्दिक उत्पीड़न और सत्ता की धौंस की भी धमक थी। सत्ता में अपनी शुरुआत से ही आम आदमी पार्टी कार्यपालिका को विपक्ष की तरह देख टकराव का रास्ता ही अपना रही है जिसका सबसे ज्यादा नुकसान वह आम जनता भुगत रही है जिसने आपको ऐतिहासिक जीत दिलाई थी। अब यही जनता तय करेगी कि आंदोलन के विज्ञापन के बाद अहंकार, टकराव और मैं-मैं वाली राजनीति के इस विज्ञापन को कितना तवज्जो देती है। अब 2019 दूर नहीं, दबाव तो सब पर है।