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बेबाक बोल: अटल विश्वास

सक्रिय राजनीति से बाहर होकर जो नेता पिछले एक दशक से मौन थे, उनके निधन पर पूरे देश के होठों पर उनकी कविता की पंक्तियां उतरने लगीं। मौत के एलान साथ ही जनमानस के बीच उनकी यादें जिंदा हो गर्इं। भारतीय राजनीति में अटल बिहारी के व्यक्तित्व में वह फक्कड़पन और कबीर का भाव दिखता है जो सत्ता के साथ संवेदना को जोड़ता है। राजनीतिक, आर्थिक और विदेश नीतियों की गाथा के इतर उनका वह मानवीय पक्ष ज्यादा प्रबल है जो सत्ता का मनुष्यता से संवाद कराता है। वोट और कुर्सी के इतर भी एक अटल बिहारी वाजपेयी बचते हैं, जिनके लिए विपक्षी नेता कहते हैं कि सही आदमी गलत पार्टी में है। वाजपेयी के साथ उस दौर के नेताओं का अंत हुआ जो राजनीतिक लाभ-हानि के परे मर्यादा की लक्ष्मण रेखा खींचते हैं। राजनीति को जिम्मेदारी मानने वाले वाजपेयी भारतीय परिदृश्य में उस रामराज्य वाली राजनीति के दूत थे, जिससे भारत का लोक जुड़ा है। इनके साथ हिंदुत्व की राजनीति में राम और रामायण का वह लोक पक्ष जुड़ता है जो सहज, सरल और करुणामय है। दक्षिणपंथी राजनीति में सहजता, उदारता और जिम्मेदारी का चेहरा रहे जननायक को अंतिम प्रणाम करता बेबाक बोल।

वाजपेयी के लिए राजनीति का रण इतना सहज बना, उनकी विदाई के बाद उन्हें अजातशत्रु कहा गया तो इसका एक बड़ा कारण उनका रचनाकार होना है, साहित्य के प्रति संवेदना है।

अटल जी को अलविदा कहते वक्त कोई क्या लिख सकता है। जो संवाद और भावों का सबसे बड़ा प्रेषक है आप उसके लिए शब्द कहां से खोजेंगे। इस युगांत पर हम अटल जी के लिए नहीं अपने लिए लिख रहे हैं। हां, हमने अटल बिहारी वाजपेयी को देखा है, सुना है, उनसे बातें की हैं, उनका राजनीतिक विश्लेषण किया है। हम भारतीय राजनीतिक इतिहास के एक मजबूत अध्याय के साथ चले हैं। कोई इतिहास कैसे बनता है, कैसे रचता है और इतिहास को कैसे बदलता है, उसके साथ कदमताल किया है। एक पत्रकार होने के नाते, कलम का कर्मचारी होने के नाते आज के समय में हम जैसे लोग अटल बिहारी वाजपेयी के साथ और सहजता से जुड़ जाते हैं। अटल बिहारी वाजपेयी पर सोचते और समझते वक्त जो शब्द सबसे ज्यादा सहज लग रहा है वह सहजता ही है। यह सामान्य, सहज आज सबसे ज्यादा दुर्लभ है। राजनीति के इस धुरंधर ने तीन बार सरकार बनाई। इनके तीनों कार्यकाल दृश्य मीडिया के जरिए हमारे जेहन में कैद हैं। एक वोट से हारे तो भी जाते हुए दुखी नहीं दिखे। पांच साल बाद भी जाते हुए चेहरे पर शिकन नहीं। वही सामान्य भाव था कि हमने अपना किया अब अगला संभाले।

अगर कोई वाजपेयी की सत्ता की पाठशाला का विद्यार्थी होना चाहे तो उसका पहला अध्याय यही सहजता होगी। सत्ता को सहजता से लेने की कला कोई वाजपेयी से सीखे। सत्ता में आना या उससे जाना, यह उनके लिए कोई मायने नहीं रखता था। सत्ता पाने की कभी लालसा भी नहीं दिखाई और पाने के बाद उसे बनाए रखने की होड़ भी नहीं लगाई। ‘सत्ता का खेल तो चलेगा, सरकारें आएंगी-जाएंगी मगर यह देश रहना चाहिए’ कहने वाले अटल बिहारी ही हैं। इन शब्दों में गीता का वह संदेश आत्मसात दिखता है कि कर्म किए जाओ, फल की चिंता मत करो। भारतीय राजनीति में महाभारत वह महाग्रंथ है जिसका सबसे ज्यादा संदर्भ दिया जाता है। राजनीति के महाभारत में अटल बिहारी वाजपेयी उस कृष्ण की तरह नजर आते हैं जो हार और जीत, जीवन और मृत्यु को सत्य मानते हुए सभी चीजों को सहजता से लेने की सीख देते हैं। ‘हार नहीं मानूंगा, रार नहीं ठानूंगा’ ये महज कवि के उद्गार नहीं, बल्कि पूरा राजनीतिक और जीवन दर्शन है। हार नहीं मानने तक लड़ो, लेकिन नतीजा जो भी आए उसके बाद रार नहीं ठानो। इन पंक्तियों में अटल बिहारी हार के प्रति भी एक सकारात्मक अनुगूंज लाते हैं। यहां बात जीतने की नहीं है, बल्कि बात है हार नहीं मानने की। आप अगर जीते नहीं हैं तो इसका मतलब यह नहीं कि आप हार मान लें। बस रार नहीं ठानें तो जो कुछ भी हासिल है वह जीत जैसा जगमग ही है।

वाजपेयी के लिए राजनीति का रण इतना सहज बना, उनकी विदाई के बाद उन्हें अजातशत्रु कहा गया तो इसका एक बड़ा कारण उनका रचनाकार होना है, साहित्य के प्रति संवेदना है। साहित्य आप में सहजता और करुणा का भाव लाता है। वाजपेयी की राजनीतिक पाठशाला का दूसरा अहम पाठ संवेदना ही है। साहित्य के साथ ने ही संभव बनाया कि उनकी राजनीति संवेदना की है संभावनाओं की नहीं। आज हर जगह राजनीति संभावना के रूप में ही देखी जा रही है, उसमें संवेदना का कोई स्थान नहीं है। अब कोई राजनीति के शीर्ष पर भी जाकर, सब कुछ पाकर उसके साथ अपनी संवेदना नहीं जोड़ता बल्कि आगे की संभावना तलाशता है। जिनके साथ चलकर राजपथ पर पहुंचते हैं वे किस चौराहे पर छूट गए हैं यह भी नहीं देखता, बस लक्ष्य यही रहता है कि और आगे कैसे पहुंचें, इससे ज्यादा कैसे पाएं। और इसी खोया-पाया वाले बहीखाते के पास आपको वाजपेयी का वह ऊंचा कद दिखेगा जो लेखा-जोखा को लेकर निर्मोही है। वे तो साफ कहते हैं, ‘जूझने का मेरा इरादा न था/मोड़ पर मिलेंगे इसका वादा न था’। वादों और इरादों से निर्मोही हुआ यह योद्धा बस समय के साथ चलता है और अपना कर्म करते हुए कहता है, ‘पार पाने का कायम मगर हौसला, देख तेवर तूफां का तेवरी तन गई’। तूफान के साथ तेवरी तानने वाले वाजपेयी के साथ संवेदनात्मक राजनीति भी इतिहास की किताब का हिस्सा हो गई।

सहजता और संवेदना के साथ वाजपेयी की पाठशाला का तीसरा अहम पाठ जिम्मेदारी का होगा। वाजपेयी उस दौर के नेताओं में से हैं जिनके लिए सत्ता एक जिम्मेदारी है और इस जिम्मेदारी को उन्होंने बखूबी निभाया भी। जिम्मेदारी के इसी अहसास की वजह से उन्होंने गठबंधन की राजनीति की राह चुनी थी। कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक के भारत पर केवल दिल्ली दरबार का राज नहीं चल सकता। कश्मीरियत, जम्हूरियत और इंसानियत के नारे के दायरे में सब कुछ आ जाता है। आज भी ये तीन शब्द जलाती हुई राजनीति का सबसे बड़ा मरहम हैं। दिल्ली से चली लाहौर तक की बस है तो पोखरण के विस्फोट से यह भी बताया कि ‘क्षमा शोभती उस भुजंग को जिसके पास गरल है’। विदेश नीति से लेकर आर्थिक नीति तक में इक्कीसवीं सदी के भारत के अगुआ होने की जिम्मेदारी निभाई और जहां जिम्मेदारी में चूक दिखी, तो उनके चेहरे पर शिकन की लकीरें भी उतनी ही साफगोई से उभरीं।यह वाजपेयी जी की संवेदना ही थी कि अपनी राजनीतिक जिम्मेदारी नहीं निभा पाने पर वे अपनी खिन्नता भी सार्वजनिक करते थे। बिना विचारधारा को समझे और नारेबाजी में उलझे नेताओं व कार्यकर्ताओं को वे संसद से लेकर सड़क तक झिड़क देते थे। भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को अगर किसी नेता और वह भी धुर विपक्षी के बारे में यह बोलना पड़ता है कि किसी दिन यह मेरी जगह लेगा तो हम उस चेहरे की लोकतांत्रिक ताकत का अंदाजा लगा सकते हैं। गैर-कांग्रेसी प्रधानमंत्री के रूप में पांच साल पूरे कर उन्होंने भारत के लोकतांत्रिक चेहरे को पूरा किया था। नीतीश कुमार से लेकर नवीन पटनायक व उमर अब्दुल्ला तक को साथ लाकर उत्कल, बंग, विंध्य, हिमाचल, यमुना-गंगा सबको साथ लेकर चलने की कोशिश की।

वाजपेयी की तारीफ में विपक्षी दलों के नेता भी कोई कंजूसी नहीं बरतते और कह बैठते थे कि अच्छा आदमी गलत पार्टी में है। राजनीतिक छुआछूत को उन्होंने कभी खुद पर हावी नहीं होने दिया। आज अगर हम किसी ऐसे नेता की तस्वीर लगाना चाहें जो सबको मंजूर हो तो उस फ्रेम में अटल बिहारी वाजपेयी की ही तस्वीर आती है। ममता बनर्जी से लेकर फारूक अब्दुल्ला तक, वाजपेयी को लेकर सबके दुख का भाव स्पष्ट दिखा। ‘प्यार इतना परायों से मुझको मिला/ना अपनों से बाकी है कोई गिला’ लिखने वाले अटल बिहारी वाजपेयी का जाना भारतीय राजनीति से कबीर के भाव का जाना है। अटल जी हमारे साथ हैं, पिछले दस साल से इसकी आस थी। आज उनका अभाव स्थायी हो गया है। लेकिन उनके जाने के बाद जिस तरह से उनकी समग्रता की राजनीति को याद किया गया, उससे लगता है कि वे देश को अपने प्रति अटल भरोसा दे गए हैं। इस नुकसान की भरपाई कोई नहीं कर सकता क्योंकि उन्होंने अपने लिए कोई रिक्त स्थान छोड़ा ही नहीं है।

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