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बेबाक बोल: आतंक की आग

बुरे काम का बुरा नतीजा, घरों से लेकर स्कूलों तक में दिया जानेवाला यह संदेश राज्य के शीर्ष स्तर पर नकार दिया जाता है। एक ऐसा आतंकवादी संगठन जिसने श्रीलंका से लेकर भारत तक को तमिल जातीयता की लड़ाई में झुलसा दिया, भारत के पूर्व प्रधानमंत्री की हत्या कर दी, उसकी अलगाववादी मानसिकता को राज्य सरकार जायज ठहराने लगती है। तमिलनाडु में सरकार और विपक्ष दोनों एक सुर में राजीव गांधी की हत्या के दोषी आतंकवादियों की आजादी की मांग कर रहे हैं। तमिलनाडु जैसा तटीय सीमावर्ती राज्य जो सामरिक सुरक्षा की दृष्टि से अहम है वहां आतंकवादियों का समर्थन कर विनाशकारी अलगाववाद की राह तैयार की जा रही है। तमिलनाडु की दोनों प्रमुख पार्टियां अगले चुनाव में जयललिता और करुणानिधि के बिना उतरने वाली हैं। दोनों दलों के पास इनका विकल्प नहीं, इसलिए सहारा बना रहे उसी तमिल जातीयता की आग को जिसकी आंच में लिट्टे के आतंकवादियों ने राजीव गांधी को मार डाला। वोट बैंक की खातिर आतंकवादियों के महिमामंडन और अलगाववाद की राजनीति के खिलाफ इस बार का बेबाक बोल।

लिट्टे सरगना टीवी प्रभाकरण।

‘वर्ष 2009 में लिट्टे के खिलाफ खत्म हुई जंग को जातीय युद्ध नहीं कहा जा सकता। सैन्य कार्रवाई में तमिल समुदाय को निशाना नहीं बनाया गया। यह ध्यान रखने की बात है कि इस आतंकवादी संगठन का आतंक श्रीलंका से फैलकर भारत तक पहुंचा और इसने भारत के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या की थी। श्रीलंका की जरूरत के समय भारत द्वारा तेज प्रतिक्रिया भारत की सच्ची दोस्ती को दिखाती है।’ श्रीलंका के पूर्व राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे ने 12 सितंबर को भारत की जमीन पर हुए कार्यक्रम में ये बातें कहीं। श्रीलंका में सेना और लिट्टे के बीच 2009 में खत्म हुए तीन दशक लंबे गृहयुद्ध के दौरान राजपक्षे ही राष्ट्रपति थे। राजपक्षे ने कहा, ‘लेकिन मैं अपने निश्चय पर दृढ़ रहा कि विदेशी सेनाएं हमारी जमीन से आतंकवाद का खात्मा नहीं कर सकतीं क्योंकि आम जनमानस का एक बड़ा हिस्सा उनका समर्थन नहीं करेगा।’

यह संयोग की बात है कि जब राजपक्षे भारत की जमीन पर आतंकवादी संगठन द्वारा पूर्व प्रधानमंत्री की हत्या की बात याद दिला रहे थे उसके कुछ पहले ही तमिलनाडु की सरकार दहशतगर्दों के साथ खड़ी होने का फैसला करती है। तमिनाडु की आॅल इंडिया द्रविड़ मुनेत्र कषगम (एआइडीएमके) सरकार ने राज्यपाल से राजीव गांधी के हत्यारों को छोड़ने की सिफारिश करने का फैसला किया है। मुख्यमंत्री के पलानीसामी के मंत्रिमंडल की इस वक्त की सबसे बड़ी चिंता उन सात आतंकवादियों की आजादी है जो देश के लोकप्रिय नेता सहित और भी कई लोगों के हत्यारे हैं, नफरत के सौदागर हैं। सिर्फ तमिलनाडु सरकार ही नहीं, दहशतगर्दों की आजादी पर विपक्ष का हाल भी मिले सुर मेरा तुम्हारा वाला है। द्रविड़ मुनेत्र कषगम (डीएमके) के नवनियुक्त अगुआ एमके स्टालिन ने भी राज्य सरकार से मांग कर डाली कि वह जल्द ही कैबिनेट मीटिंग बुलाकर एक प्रस्ताव पास करे, जिसमें पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के हत्यारों को छोड़ने के लिए राज्यपाल को सलाह दी जाए। स्टालिन ने यह भी कहा कि राजीव गांधी की हत्या के दोषी एजी पेरारीवलन को भी आजाद किया जाए। इसके पहले पेरारीवलन ने अगस्त में सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि राज्यपाल के पास उसकी दया याचिका गए हुए दो साल से ज्यादा हो चुका है मगर अभी तक कोई फैसला नहीं किया गया है।

यह हाल उस तमिलनाडु के नेताओं का है जहां के किसान एक साल पहले दिल्ली के जंतर-मंतर पर मल-मूत्र खा रहे थे और आत्महत्या कर चुके किसानों के नरमुंड की माला पहने हुए थे। यह समुद्र किनारे बसा वह संवदेनशील राज्य है जिसकी सुरक्षा पर पूरे देश की रक्षा टिकी है। खास बात है कि यह राज्य चुनावों में उतरने वाला है। पक्ष की जयललिता और विपक्ष के करुणानिधि दोनों अब नहीं हैं। इन दोनों के कद्दावर कद के जैसा नेता इन दोनों दलों के पास नहीं है। इनके पास है तो जयललिता और करुणानिधि की तस्वीरें और भावुकता व तमिल अस्मिता की राजनीति। जब दोनों दल जयललिता और करुणानिधि के बिना चुनावों में उतरेंगे तो जनता से वोट कैसे मांगेंगे। कद्दावर नेताओं का विकल्प है जातीयता की राजनीति। याद करें एक वह दौर था जब भारत का एक बहुत बड़ा हिस्सा लिट्टे सरगना टीवी प्रभाकरण के खिलाफ था। लिट्टे का आतंकवाद चरम पर पहुंचने के बाद ही कांग्रेस ने प्रभाकरण के खिलाफ अपनी स्थिति स्पष्ट की और श्रीलंका सरकार के सहयोग से एलटीटीई को खत्म करने का अभियान चलाया गया। श्रीलंका में एक चुनी हुई संप्रभु सरकार के खिलाफ एक आतंकवादी संगठन को नेस्तनाबूद करने में भारतीय जांबाजों की भूमिका उल्लेखनीय रही। लेकिन यह जातीयता का जहर था कि नब्बे के दशक में जब ये जवान आतंकवाद के खिलाफ अभियान के बाद समुद्र तट पर अपने देश में पांव रख रहे थे तो इनकी पहचान तमिलों के हत्यारे के रूप में की गई और अपने ही देश में इनका स्वागत करने से इनकार किया गया। वोट बैंक के नजरिए से वे भारत के शांतिदूत नहीं तमिलों के हत्यारे थे।

तमिलनाडु की स्थानीय राजनीति का असर हुआ कि जिस कांग्रेस ने अपना सबसे बड़ा नेता खो दिया वही इस मुद्दे पर वोट बैंक तलाशने लगी। आतंकवादी के बच्चे की दुहाई दी जाती है और माफीनामे की बात होती है। आतंकवाद के खिलाफ एक बहुत लंबी चली और आगे भी चलने वाली जंग की बड़ी सोच को परे रख एक राज्य में चुनावी अंकगणित ठीक करने की छोटी सोच अहम हो जाती है। तमिल अस्मिता का वोट बैंक आतंकवादियों की सोच के आगे सहज समर्पण था। पिछले तीन दशकों में भारत में अस्मितावादी राजनीति अपने उठान पर है। धर्म, भाषा और जाति की अस्मिता के आगे एक देश की भावना कब्र में दफन कर दी जाती है। कभी कश्मीर तो कभी तमिलनाडु, संकीर्ण राजनीति का यही हासिल है। तमिलनाडु जैसे तटीय सीमावर्ती राज्य में इस तरह की राजनीति कितनी खतरनाक है हमें इसका अंदाजा लग चुका है। पूर्वोत्तर से लेकर कश्मीर तक इसी अलग-अलग अस्मितावाद के चरम की आग में झुलस रहे हैं। इसने भारत के कई राज्यों में अलगाववाद का विनाशकारी रास्ता तैयार कर दिया है। इस आग में पानी किनारे बसा तमिलनाडु जल चुका है। एक समय ऐसा था जब सारे बड़े नेता आतंकवादी संगठन के सरगना प्रभाकरण से डरे हुए थे, उसके खिलाफ मुंह नहीं खोलना चाहते थे। आज तमिलनाडु के नेता आतंकवादियों की आजादी-आजादी का राग अलाप कर जो वोट बैंक की राजनीति शुरू कर चुके हैं उसे हर स्तर पर हतोत्साहित करने की जरूरत है। देश को अलगाववाद की राह में झुलसाने वाले कट्टर आतंकवादियों के मामलों से वोट बैंक को जितनी जल्दी अलग किया जाए उतना अच्छा है। यह बाकायदा कानून और व्यवस्था का मसला है, पूरे देश की सुरक्षा और संप्रभुता का मसला है। इसे कुछ दलों के स्वार्थ के लिए नहीं छोड़ा जा सकता।

महात्मा गांधी के हत्यारे को सजा मिली, इंदिरा गांधी के हत्यारों को सजा मिली। देश का हर एक नागरिक जो आतंकवादियों की बर्बर मानसिकता के कारण मारा जाता है हर किसी के हत्यारों को सजा मिले। देश के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या के कुछ दोषी पकड़े गए और बुरे काम का बुरा नतीजा वाला एक संदेश गया। लेकिन घर और स्कूलों में दिए जानेवाले इस बुनियादी संदेश को कोई पार्टी और नेता तार-तार कर बैठता है क्योंकि उसे अपनी सत्ता के लिए वोट जुटाने हैं। राजीव गांधी की हत्या का मामला ठंडा पड़ चुका था और लंबी न्यायिक प्रक्रिया से गुजर रहा था। पर वोट बैंक की राजनीति में इसे फिर से चूल्हे पर चढ़ा कर आतंकवादियों का महिमामंडन शुरू कर दिया गया। तमिनाडु में पक्ष से लेकर विपक्ष तक इस पूरे मुद्दे को नकारात्मकता की ओर ले जा रहा है। आतंकवाद चोरी-डकैती जैसा मामूली अपराध नहीं, बल्कि यह एक ऐसी नकारात्मक विचारधारा है जो कुछ व्यक्तियों की नहीं पूरे समाज और सभ्यता-संस्कृति की हत्या कर देती है। समाज और सभ्यता से जुड़े मसले को एक राजनीतिक पार्टी की भट्टी की आग नहीं बनने देना है। आज तमिलनाडु सरकार लिट्टे के आतंकवादियों के साथ खड़ी है तो कल किसी दूसरे राज्य की सरकार दूसरे आतंकवादियों के साथ खड़ी हो जाएगी। राजीव गांधी के हत्यारों को उनके जुर्म की कड़ी से कड़ी सजा दे जल्द से जल्द पूरे देश को एक सकारात्मक संदेश दिया जाए। श्रीलंका के पूर्व राष्ट्रपति लिट्टे की बर्बरता और राजीव गांधी की हत्या को याद करा गए हैं। क्या उनका यह संदेश आतंकवादियों की आजादी की मांग कर रहे नेता सुनेंगे?

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