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बेबाक बोल: विश्वास की हत्या

निष्पक्षता और स्वायत्तता दो ऐसे शब्द हैं जो संवैधानिक संस्थाओं को लोक और तंत्र से जोड़ते हैं। एक बेहतरीन ढांचे को पैदा करने के बाद राजनीतिक दल उससे दूध का कर्ज मांगने लगते हैं जो बाद वालों के लिए नजीर बन जाता है। सीबीआइ के दो आला अधिकारी तू-तू मैं-मैं पर उतर आए, सीवीसी भी उसमें मोहरा बन गया और देश की गरिमामय जासूसी संस्था के कर्मचारी राजधानी की सड़क पर कॉलर पकड़ कर घसीटे गए। एक आम नागरिक चाहे औरत हो या मर्द, हिंदू या मुसलमान सवर्ण हो या दलित जिस ढांचे की ओर भरोसे से देख इंसाफ की जंग के लिए साहस जुटाता है अब कहां जाएगा? कोई इसे पिंजरे का तोता कह कर भूल गया जिसे बाद में च्यूइंगम की तरह चबाया गया तो कोई इसे सबसे बड़ा चुटकुला बता कर हंस रहा। लेकिन इस प्रहसन के बीच सवाल यह है कि देश का अवाम जो अपने तंत्र के प्रति भरोसा खो रहा है उसे कौन वापस करेगा। यह सीबीआइ बनाम सीबीआइ नहीं सीबीआइ बनाम देश के विश्वास की लड़ाई है। विश्वास की इस हत्या के खिलाफ बेबाक बोल।

राकेश अस्थाना (बाएं) और आलोक वर्मा (दाएं) के बीच विवाद।

बंदिल के फफोले जल उठे सीने के दाग से इस घर को आग लग गई घर के चिराग से… बलात्कार के बाद एक बच्ची की हत्या कर दी जाती है। इस बर्बरता के बीच उसके मां-बाप चीख कर कहते हैं कि राज्य पुलिस पर भरोसा नहीं इसकी सीबीआइ जांच कराएं। बालिका संरक्षण गृह में 34 बच्चियों के बलात्कार के आरोप लगते हैं, राज्य के संवेदनशील लोग कहते हैं कि राज्य की पुलिस पर भरोसा नहीं इसकी सीबीआइ जांच कराएं। दक्षिण भारत के एक केंद्रीय विश्वविद्यालय में प्रतिभाशाली दलित छात्र आत्महत्या कर लेता है। उसकी मां कातर आवाज में कहती है कि राज्य पुलिस पर भरोसा नहीं सीबीआइ जांच कराओ। कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक नाइंसाफी के खिलाफ इंसाफ की उम्मीद में भरोसे का नाम केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो यानी सीबीआइ। भारत की लोकतांत्रिक संस्थाओं में वैसी संस्था जिस पर लोक का सबसे ज्यादा भरोसा है।

लोकतंत्र में लोक और तंत्र को जोड़ने में कई फिसलन और छेद हैं। लोक और तंत्र के बीच की टूटती कड़ी को जोड़ने का नाम है सीबीआइ। आप तोता कह लें, गिद्ध कह लें या फिर बाज कह लें, एक ऐसी संस्था जिस पर अमीर से लेकर गरीब, औरत से लेकर मर्द और हिंदू से लेकर मुसलमान तक का भरोसा है। इंसाफ पर भरोसे का नाम पड़ गया, बोझ बढ़ गया इसलिए यह संस्था अपने मुख्य उद्देश्य से भी हट गई। नेहरू सरकार में लालबहादुर शास्त्री ने जब इस संवैधानिक संस्था का गठन किया था तो इसका एक ही बड़ा मकसद था भ्रष्टाचार पर काबू पाना। लेकिन धीरे-धीरे इसे किसी शर्लक होम्स या ब्योेमकेश बख्शी की तरह की लोकलुभावन संस्था बना दिया गया जिसके पास सामूहिक बलात्कार से लेकर बड़े वित्तीय घोटाले, हत्या, गुमशुदगी तक के मामले आने लगे। इसका काम इतना बढ़ गया कि यह अपने मुख्य मकसद से हट गई जिसक असर इसकी छवि पर भी पड़ा।

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय का छात्र नजीब अहमद गायब होता है। यह एक छात्र की गुमशुदगी का मसला था और दिल्ली पुलिस में इतनी काबीलियत होनी चाहिए थी कि वह इस मामले को सुलझा लेती। लेकिन दिल्ली पुलिस की भी शुरुआती कार्रवाई वैसी रही जैसी अन्य राज्यों की पुलिस की होती है। दिल्ली पुलिस से लोगों का भरोसा टूटा और इस गुमशुदगी मामले में भी सीबीआइ जांच की मांग हुई। नजीब के गुमशुदगी मामले को दिल्ली पुलिस पेचीदा बना देती है और इसका बोझ भी सीबीआइ के कंधों पर आ जाता है। नतीजा यह कि पुलिस के बाद सीबीआइ भी बेसाख होती है और उसे बिना किसी नतीजे के नजीब अहमद की गुमशुदगी की फाइल बंद करने का एलान करना पड़ता है। आरुषि तलवार-हेमराज हत्याकांड में उत्तर प्रदेश पुलिस का बचकाना व्यवहार जगजाहिर हुआ। नोएडा पुलिस की गलतियों का खमियाजा सीबीआइ को भुगतना पड़ा और यह हत्याकांड उसके लिए साख का सवाल बन गया। ये उदाहरण हैं कि जब छोटी संस्था ठीक से काम नहीं करती तो बड़ी संस्था के पास काम करने के लिए कोई जमीन ही नहीं बचती है। हर मर्ज का मरहम जब सीबीआइ को बनाया जाने लगा तो यह मरहम ही बेअसर होने लगा। जम्मू कश्मीर का बकरवाला समुदाय ही नहीं, रोहित वेमुला की मां ही नहीं, गोरखपुर के आॅक्सीजन कांड में मारे गए बच्चों के अभिभावक ही नहीं हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक समानांतर संस्थाओं की नाकामी से नाखुश होकर भरोसेमंद जांच के लिए सीबीआइ की तरफ ही देखते हैं। देश के आम नागरिकों से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक का भरोसा जिस संस्था पर है, आज वह सीबीआइ बनाम सीबीआइ की जंग में खड़ी हो गई है।

1993 में हवाला धनशोधन मामले ने भारत में भ्रष्टाचार का नया रूप दिखाया था। तात्कालिक हालात को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गई थी। उस समय सीबीआइ के अंदर पनपते भ्रष्टाचार को देखते हुए इस संस्था के निदेशक का कार्यकाल दो साल किया गया था। लेकिन अब यह साफ दिख रहा है कि इस बदलाव के बाद कुछ भी नहीं बदला।
लोक और तंत्र के बीच भ्रष्टाचार की फांस पर नकेल कसने के लिए भरोसे का एक चेहरा तैयार कर उसे सीबीआइ का नाम दिया गया था। इसे अंतरराष्टÑीय संस्थाओं के साथ तालमेल के अधिकार भी मिले हैं। लेकिन इसकी स्थापना के बाद से ही हर सत्ताधारी पार्टी पर आरोप लगे कि वह इसका इस्तेमाल अपने हक में कर रही है। कभी सीबीआइ को कांग्रेस ब्यूरो आॅफ इनवेस्टिेगेशन कहा जाने लगा था तो मौजूदा सरकार पर इसे कमजोर करने का आरोप है। हर सत्ताधारी इसकी आजादी की कसमें खाता है और विरोधी इसे सरकार का पिछलग्गू बताता है। कांग्रेस की सरकार ने सीबीआइ को जन्म देकर इससे दूध का कर्ज मांगना शुरू कर दिया जो आगे की सरकारों के लिए नजीर बन गया। आखिर इतना बेहतरीन ढांचा नाकाम क्यों साबित हो रहा है?

अण्णा आंदोलन के समय लोकपाल की मांग उठी और भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की आंधी में यूपीए सत्ता से बाहर हो गई। अण्णा हजारे की अगुआई में जब लोकपाल की मांग हो रही थी तो हिंदुस्तान का आम नागरिक भी सीबीआइ को पिंजरे का तोता कह रहा था। भ्रष्टाचार भारत का एक सबसे खौफनाक सच दिख रहा था और उसके खिलाफ जंग को दूसरी आजादी तक का नाम दे दिया गया। आम आदमी पार्टी के अगुआ अरविंद केजरीवाल ने सरकार बनाते ही आम आदमी को भुला कर लोकपाल को एक रोमानी सपना बना दिया। सीबीआइ के दो सेवानिवृत्त आला अधिकारी खुद भी जांच के कठघरे में हैं। सीबीआइ ने कई अहम मामलों का खुलासा कर अपनी विश्वसनीयता के सबूत दिए थे। राजनीतिक दखलंदाजियों के बीच भी चेहरा बचाए रखने की कोशिश की थी। इस ताजा मामले में सीबीआइ के साथ केंद्रीय सतर्कता आयोग से लेकर खुफिया एजंसी तक की नाकामी सबके सामने आ गई। जिस तरह खुफिया एजंसी के लोग सरेराह पकड़े गए और खुलेआम उन्हें सरकारी गुप्तचर मान भी लिया गया उससे इस संस्था के भी छेद सामने आ गए।
सीबीआइ को जब अपने ही मुख्यालय पर छापा मारना पड़ गया तो देश का एक बहुत बड़ा तबका निराश हुआ और खुद को बेहद कमजोर समझने लगा। देश की सबसे गरिमामय और विश्वसनीय संस्था के दो आला अधिकारी तू-तू मैं-मैं करते हुए सड़क पर आ गए तो उन्हें लगा कि अब हमारी कौन सुनेगा।

नब्बे के दशक के बाद से बाजार के उग्र हमले ने लोकतांत्रिक संस्थाओं पर भी कब्जा जमाना शुरू कर दिया था। ऊपर से नीचे तक चल रहा पूंजी का टकराव कई बांध तोड़ चुका है। यह अब दो धु्रवीय राजनीतिक दलों के टकराव से कहीं आगे बढ़ चुका है। सरकार और जनता के बीच बाजार एक शक्तिशाली पक्ष बनकर उभरा है जो किसी को भी नहीं बख्श रहा। भारत की संवैधानिक संस्थाओं पर अब इनका असर गहरे से दिखने लगा है। पहले भी ऐसा होता था या पिंजरे का तोता कह कर इस मुद्दे को खारिज नहीं किया जा सकता है। यह तोता नहीं अवाम का भरोसा है। इस जंग में सीबीआइ ही नहीं निष्पक्षता और स्वायत्तता जैसे शब्द भी बेसाख हुए हैं जिनमें आम लोगों की जान अटकी है। लोकतंत्र में तथ्यों के विपरीत छवि निर्माण का अपना महत्त्व है, जो आम नागरिकों को अपनी चुनौतियों से जूझने की ऊर्जा देता है। हर हुकूमत के लिए सीबीआइ का दर्जा सीजर की पत्नी जैसा हो गया है। यह फौरी जरूरत है कि इसे शक से परे किया जाए। तंत्र में लोक का भरोसा बनाए रखने के लिए इनकी लाज बचनी जरूरी है।

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