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बेबाक बोल : मिसाल

मजहब की दीवार लांघ एक लड़की और लड़का प्रेम करते हैं। इस प्रेम और शादी की मांग के खिलाफ लड़के की हत्या कर दी जाती है। एक लड़के की हत्या अपराध है और यह अपराध की ही श्रेणी में आएगा। लेकिन हत्या होते ही इसे दो परिवारों से निकाल कर, व्यक्तियों से निकाल कर धर्म और समुदाय का मसला बना दिया जाता है। इसी सांप्रदायिक सोच के खिलाफ खड़ा होता है वह पिता जिसके बुजुर्ग कंधे ने जवान बेटे की अर्थी उठाई है। दिल्ली की तंग गली में एक बड़ी सोच वाले बाप के घर इफ्तार पार्टी इसी संदेश के साथ हुई कि मेरे बेटे के हत्यारे वही लोग हैं जिन्होंने उसकी जान ली न कि उससे जुड़ा पूरा समुदाय। पूरे देश और समाज को सोचने के लिए मजबूर करने वाले यशपाल सक्सेना को सलाम जिन्हें सांप्रदायिकता की समझ थी। एक होशमंद और तरक्कीपसंद विचारों वाले पिता के बहाने सांप्रदायिकता जैसी आधुनिक समस्या पर बेबाक बोल।

चार महीने पहले दिल्ली के रघुवीर नगर में बड़े सियासी चेहरों के सामने एक बाप की आवाज गूंजती है-मेरे बेटे की हत्या हुई है।

‘मेरे पिता को पाकिस्तान ने नहीं युद्ध ने मारा है’। दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्रा गुरमेहर कौर का बोला गया यह वाक्य जब सोशल मीडिया पर गलत तरीके से उछाला गया तो पूरे देश में बहस छिड़ गई थी। बहस का हासिल जो भी रहा हो लेकिन इस होशमंद वाक्य को बनानेवाली वो मां थी जिसकी नन्ही बेटी के सिर से पिता का साया उठ गया था। वह नहीं चाहती थी कि उसकी बच्ची पाकिस्तान या मुसलमानों से नफरत करते हुए बड़ी हो। उस वक्त भी लगा था कि गुरमेहर कौर की मां जैसे लोग अपने बच्चों को वो पढ़ा जाते हैं जो सैकड़ों एकड़ में फैले आधुनिक स्कूल और विश्वविद्यालय नहीं पढ़ा पाते। ऐसी ही मिसाल दिल्ली की तंग गली में इफ्तार पार्टी के जरिए दी गई। यह पार्टी उन यशपाल सक्सेना ने दी जिनकी देखभाल उनके पड़ोसी कर रहे हैं। प्रेम पर नफरत का चाकू चलाने वालों के कारण कल किसी और के बच्चे न मारे जाएं यही चिंता है यशपाल सक्सेना की। रघुवीर नगर की तंग गली में इफ्तारी शाम में अंकित सक्सेना के दोस्त ‘आवारा ब्वॉयज’ उसकी तस्वीर वाली टी-शर्ट पहने थे। ये लड़के कभी चे गवेरा की फोटो वाली टी शर्ट भी पहने होंगे। लेकिन आज इनका हीरो अंकित है। इस नायक के पिता को यह नहीं मालूम कि कल उन्हें खाने के लिए रोटी कैसे मिलेगी। लेकिन उन्हें यह मालूम है कि नफरत के खिलाफ आज मुहब्बत की क्रांति नहीं होगी तो देश जलता रहेगा, बच्चे मरते रहेंगे। चार महीने पहले दिल्ली के रघुवीर नगर में बड़े सियासी चेहरों के सामने एक बाप की आवाज गूंजती है-मेरे बेटे की हत्या हुई है। मुझे राज्य से बस उसकी हत्या का इंसाफ चाहिए। अगर आप लोग मेरे घर बेटे की हत्या की सहानुभूति लेकर आए हैं तो स्वागत है लेकिन अगर किसी खास समुदाय के प्रति गुस्सा उतारना चाहते हैं तो वापस जाइए। अगर आप राजनीति के लिए आए हैं तो वापस जाइए। मेरे बेटे की हत्या कुछ लोगों ने की है किसी एक समुदाय ने नहीं। इसे सांप्रदायिक रंग मत दीजिए। बेटे के शोक के बीच एक साधारण पृष्ठभूमि का बाप और उसका परिवार इतना होशमंद हो सकता है, यह आज हमारे टूटते और बिखरते समाज को एक बड़ा हौसला दे गया है। अंकित का कत्ल कर दिया गया क्योंकि वह एक मुसलिम लड़की से प्यार करता था। इकलौते बेटे का शोक झेल रहे पिता कहते हैं कि इसे सांप्रदायिक मत बनाइए। जब एक आम इंसान बड़े कद के नेताओं को सांप्रदायिक न होने की सीख दे रहा था तो इस सांप्रदायिकता शब्द को ही समझने और समझाने की जरूरत महसूस हो रही है।

समाज मनुष्यों से बना है और इसका मूल आधार यह रहा है कि इंसानों का आपसी रिश्ता कैसा हो। हम जो रिश्ता बनाएंगे वह कैसा होगा, यह बुनियादी सवाल है। इस बुनियादी सवाल से ही व्यक्ति बनाम समाज का मसला खड़ा होता है। इसका सफर शुरू होता है आदि से लेकर मध्य व आधुनिक तक। आधुनिकीकरण की पूरी प्रक्रिया ही निज के जरिए सामाजिक बनने की है। अपना निज बरतते हुए भी आप सामाजिक कैसे हो सकते हैं। अरस्तू वाला मनुष्य सामाजिक प्राणी बनता कैसे है। सबसे पहले तो आपका मनुष्य होना जरूरी है। वह मनुष्य थोड़ा निज हो और सामाजिक हो। निज और समाज एक-दूसरे के विरोध में न खड़े हों। ये सारे आधुनिक भाव हैं जो आधुनिकता की ओर ले जा रहे थे। यानी व्यक्ति के निर्माण के बाद उसका सामाजिक होना अहम है। इसी सामाजिक होने की प्रक्रिया में अहम रहा है स्त्री-पुरुष का संबध या शादी का संबंध। समाज के बदलने के साथ विवाह के रूप भी बदलते गए हैं। एक वो भी दौर था जब राजे-रजवाड़े विजातीय धर्मों के साथ अपनी लड़कियों को ब्याह रहे थे। उस दौर में समुदाय नहीं राज्य का संरक्षण ज्यादा बड़ा भाव रखता था। शासक वर्ग अपने वैवाहिक संबंधों के जरिए अपनी सियासी ताकतों को और मजबूत करते थे जहां वृहत्तर राज्य था स्त्री नहीं। उस विमर्श में स्त्री की शुचिता नहीं सिंहासन का बचाव था। और यह भी एकमात्र रूप नहीं था। उसी समय जौहर भी था, जिसका विमर्श कहता था कि पति के बाद स्त्री का कोई अस्तित्व नहीं और उसकी शुचिता से समुदाय की शुचिता जोड़ दी गई थी। इन सबमें संपत्ति की भी भूमिका थी जो समाज के समीकरणों में अहम है।

ये सामंती व्यवस्थाएं जब आधुनिक समय में पहुंचीं तो इनका संप्रदायीकरण हुआ। संप्रदायीकरण समस्या ही आधुनिकता की है और आज सांप्रदायिकता का सवाल भी आधुनिक है। वे जो जाति और धर्म के खिलाफ जानेवालों को मार रहे हैं, कौन हैं। उस मारनेवाले का मानस आज भी सामंती है। आज भी उसकी समझ यही है कि उसकी बेटी या बहन उसकी नाक है, इज्जत है। दूसरे समुदाय में जाकर वह नाक कटा रही है, इज्जत गंवा रही है। ये समुदाय के लिए नाक का सवाल बना लेते हैं। जब चिंतन के केंद्र में परिवार है तो बनने वाले रिश्ते के केंद्र में भी वही होगा। दो व्यक्ति और दो परिवार धर्म और जाति के तौर पर अलग हैं। यह अलग होना और शादी जैसा संबंध अपने समुदाय के दायरे में ही करना यह परंपरागत सामंती मानसिकता का प्रमाण है। वहीं यह सवाल, परिवार से आगे बढ़ा कर धर्म और पूरे धार्मिक समुदाय का सवाल बना दिया जाता है। हम मुजफ्फरनगर की घटना अभी भूले नहीं हैं। वहां लड़की के साथ छेड़खानी का मामला था और उस छेड़खानी के खिलाफ प्रतिक्रिया हुई। वह विशुद्ध अपराध का मसला था जो दो धार्मिक समुदायों के बीच दंगे की वजह बन गया। महिलाओं के साथ छेड़खानी पुरुषवादी सोच है जो सभी धर्मों और समुदायों में है। यह गुंडागर्दी है, अपराध है। इस कारण विरोध होता है, झड़प होती है और किसी की जान चली जाती है। उस मौत को आधार बनाकर दो समुदाय अपनी इज्जत को लेकर भिड़ जाते हैं। अब यह एक व्यक्ति का अपराध न होकर एक समुदाय की इज्जत का मसला हो जाता है। व्यक्ति के अपराध को समुदाय के सिर के ताज के साथ जोड़ देना ही सांप्रदायिकता है।

दिल्ली की एक गली में एक लड़की है, एक लड़का है और दोनों में प्रेम है। प्रेम के बाद शादी की भी इच्छा है। इस प्रेम और शादी की मांग के खिलाफ कौन आते हैं? लड़की का परिवार लड़के के परिवार पर आरोप लगाता है और लड़के की हत्या कर दी जाती है। एक लड़के की हत्या अपराध है और यह अपराध की ही श्रेणी में आएगा। लेकिन हत्या होते ही इसे दो परिवारों के मसले से निकाल कर, व्यक्तियों से निकाल कर धर्म और समुदाय का मसला बना दिया जाता है। सोशल मीडिया पर जहर फैलाया जाने लगता है कि मरने वाला मुसलिम होता तो आप क्या करते और आपका खून नहीं पानी है जैसा बहुत कुछ। इसे व्यक्ति का नहीं एक पूरे समुदाय का अपराध करार दिया गया और पूरे समुदाय से ही बदला लिए जाने की मांग की जाने लगी। यही हुआ था मुजफ्फरनगर में और कासगंज में। लेकिन दिल्ली की तंग गली में एक बड़ी सोच वाले बाप ने पूरे देश और समाज को सोचने के लिए मजबूर कर दिया क्योंकि उन्हें सांप्रदायिकता की समझ थी। जिसका बेटा मरा है उसने उस कातिल समय में अपनी बुद्धि और विवेक को मरने नहीं दिया। इस स्तंभ में छोटी गली में रहनेवाले उस बाप के हौसले को सलाम जो सत्ता के गलियारों से आने वाली सांप्रदायिक गंध को सूंघ चुके थे। वे व्यक्ति के अपराध को समुदाय का अपराध घोषित कर राज्य से इंसाफ मांगने वालों को अपने घर के दरवाजे से दूर कर रहे थे। नाक के बदले पूरे समुदाय की नाक और हाथ के बदले पूरे समुदाय का हाथ मांगने वाली यह प्रवृत्ति हमें किस बर्बर युग में ले जाएगी यह समझाने की कोशिश पिता के साथ पड़ोसियों ने भी शुरू कर दी। बेटे की चिता का बोझ सबसे भारी होता है। लेकिन बेटे की चिता उठाने वाले ने अपना कंधा टूटने के बाद भी समाज और देश को जोड़ने की जो मिसाल दी है वह बहुत से अंकित को अपनी मां की गोद में तड़प-तड़प कर मरने से बचाने की राह पर ले जा सकता है।

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