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बेबाक बोल: कलमवीर

म्यांमा में जुंटा सरकार की नजरबंदी के दौरान वह आजाद प्रेस और विदेशी मीडिया ही था जिसने आंग सान सू की को दुनियाभर में मानवाधिकार कार्यकर्ता के रूप में पहचान दिलाई। जुंटा सरकार के दौर में सू की के पक्ष में आजाद कलमवीर ही आवाज उठा सकते थे। लेकिन आज सत्ता का चेहरा बनीं सू की ने उन दो पत्रकारों की रिहाई की अपील अनसुनी कर दी जिन्हें म्यांमा सरकार ने सात साल के लिए सलाखों के पीछे भेज दिया है। अमेरिकी राजनेता थॉमस जेफरसन कहते थे कि अखबार बिना सरकार वाले विकल्प को वे कभी नहीं चुनेंगे। लेकिन सत्ता में आते ही जेफरसन के लिए प्रेस का सत्य बदल गया। कोई देश कितना लोकतांत्रिक है उसका एक पैमाना वहां की प्रेस की आजादी है। कम्युनिस्ट सरकार वाले देशों में प्रेस पर सरकारी पहरा तो है ही अन्य लोकतांत्रिक देशों में भी इस मामले में तेजी से गिरावट आ रही है। सरकार बनाम अखबार के बदलते रिश्तों पर इस बार का बेबाक बोल।

आज सत्ता का चेहरा बनीं सू की ने उन दो पत्रकारों की रिहाई की अपील अनसुनी कर दी जिन्हें म्यांमा सरकार ने सात साल के लिए सलाखों के पीछे भेज दिया है।

‘आज म्यांमा समेत पूरी दुनिया में प्रेस के लिए एक दुखद दिन है। ऐसा पत्रकारों की रिपोर्टिंग को खामोश करने और प्रेस को डराने के लिए किया गया है।’ विश्व की प्रतिष्ठित समाचार एजंसी रॉयटर्स के मुख्य संपादक स्टीफन जे एडलर की ये पंक्तियां हम सबके लिए हैं। क्याव सोओ और वा लोन को पिछले साल दिसंबर में ही गिरफ्तार कर लिया गया था। इन पत्रकारों पर आरोप है कि इन्होंने रोहिंग्या मामले में म्यांमा सरकार के गोपनीयता कानून का उल्लंघन किया। वहीं इन पत्रकारों का कहना है कि हमने रखाइन प्रांत में रोहिंग्या मुसलमानों की हत्या का खुलासा किया। हमने वही लिखा जो हुआ। आरोप है कि रखाइन प्रांत में रोहिंग्या मुसलिम अल्पसंख्यकों के खिलाफ म्यांमा के सुरक्षा बलों के अभियान के बारे में खबरें करने की ही गाज इन पत्रकारों पर गिरी है।

प्रेस की आजादी के लिए काम करने वाली संस्था ‘रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स’ के महासचिव क्रिस्टोफ डेलोर ने म्यांमा की नेता आंग सान सू की से पत्रकारों की रिहाई करवाने की अपील के साथ कहा कि यह म्यांमा में लोकतांत्रिक बदलाव पर सवाल खड़े करता है। क्रिस्टोफ डेलोर ने पेरिस में कहा, ‘लोकतांत्रिक देश जिस गति से नीचे की ओर जा रहे हैं, वह उन लोगों के लिए खतरे का संकेत है जो यह समझते हैं कि अगर मीडिया की स्वतंत्रता सुरक्षित नहीं रही तो अन्य तरह की आजादी भी सुरक्षित नहीं रहेगी’। डेलोर ने यह अपील उन सू की से की है जिन्हें शांति के नोबेल पुरस्कार से नवाजा गया है। एक समय था जब वे म्यांमा में मानवाधिकार की आवाज का विकल्प थीं। लेकिन आज प्रेस की आजादी के लिए उनकी आवाज बुलंद नहीं हो रही। उनके मानवाधिकारों में रोहिंग्या नहीं हैं तो पत्रकार भी नहीं हैं। दुनिया भर में लोकतंत्र के गिरने की चेतावनी की गति को हम सू की की चुप्पी में सुन सकते हैं। लेकिन नोबेल पुरस्कार विजेता को याद रखना होगा कि वह विदेशी मीडिया ही था जिसने उनके मानवाधिकार की जंग को वैश्विक मंच तक पहुंचाया था। एक वह भी वक्त था जब सू की के समर्थन में लिखना म्यांमा सरकार के विरोध में जाना था। पिछले साल सितंबर में गौरी लंकेश की हत्या के बाद अपने स्तंभ में लिखा था, हम सब गौरी लंकेश। आज उसके एक साल बाद वैश्विक स्तर तक सूची काफी लंबी हो गई है। कलम के शहीदों की संख्या बढ़ती जा रही और हम सब शार्ली एब्दो, लंकेश, शुजात बुखारी के नारे भी बढ़ते जा रहे। 1990 के बाद आज वह समय है जब दुनिया भर में सबसे ज्यादा पत्रकारों को जेल भेजा गया, उनपर हमले किए गए और उनकी हत्या तक की गई। अफगानिस्तान, सीरिया, फिलिस्तीन, सीरिया, बांग्लादेश जैसे देश तो पत्रकारों के खून से रंगे ही थे, यूरोपीय और अमेरिकी देश भी पत्रकारों के आगे सत्ता की तोप मुकाबिल कर रहे। कट्टरपंथियों से मुकाबला करने वाले पत्रकार लोकतांत्रिक तरीके से चुने गए शासकों से भी जंग लड़ रहे। छापेखाने के साथ ही शुरू होती है आधुनिक पत्रकारिता और प्रेस की आजादी। आधुनिक लोकतंत्र में प्रेस और आजादी सहचर शब्द बनकर आए। किसी देश का लोकतंत्र कैसा है यह सरकार बनाम अखबार के रिश्ते से तय होता है। पिछले तीन दशकों में वैश्विक स्तर पर यह रिश्ता बहुत खराब होता जा रहा है। सरकारें अखबार को विपक्ष की तरह देख रही हैं और उसे कुचल रही हैं।

पिछले तीन दशकों के नवउदारीकरण के दौर के बाद जो समस्याएं आर्इं तथाकथित लोकतांत्रिक सरकारें उसे संभाल नहीं पार्इं। इन सरकारों ने अपनी नाकामी का ठीकरा प्रेस पर फोड़ना शुरू किया क्योंकि सरकार और जनता के बीच यही संवाद का पुल है। अमेरिका से लेकर सीरिया और अफगानिस्तान तक पत्रकारों पर हमले बढ़े हैं। बहुचर्चित पनामा पेपर्स की खोजी रपट से जुड़ी पत्रकार डफ्ने कार वानालिजिया अपने घर के बाहर जब कार में बैठती हैं तो एक भयानक बम विस्फोट होता है और वे मारी जाती हैं। डफ्ने की खोजी रपटों ने माल्टा सरकार की साख को संकट में ला दिया था। आरोप है कि डफ्ने की हत्या खोजी पत्रकारों की पूरी बिरादरी को डराने की कोशिश थी। पत्रकारों की हत्या और गिरफ्तारियों के इतर कुछ देशों में पूरी नागरिक जमात सरकार की सेंसरशिप से जूझ रही है। कम्युनिस्ट देश चीन विकास की सूची में कितने अंक की भी उछाल मार ले लेकिन नागरिकों की आजादी में उसका सूचकांक नीचे गिरता जा रहा है। वहां का हर नागरिक सार्वजनिक मंच पर आते ही सरकारी छन्नी का शिकार भी होता है और उस छन्नी से पार जाने की अपनी जंग भी लड़ता है। एकमात्र सरकारी एजंसी के अलावा आजाद पत्रकारिता तक आम चीनियों की पहुंच नहीं है। सोशल मीडिया के मंचों पर सरकार की निगरानी के रबड़ से नागरिकों द्वारा लिखे व्यवस्था विरोधी शब्द खुद ब खुद विलीन हो जाते हैं। कम्युनिस्ट शासन वाले चीन के इतर खुद को लोकतंत्र का ब्रांड अंबेसडर कहने वाले अमेरिका में 2016 से ही सरकार और कलमवीर आमने-सामने हैं। अमेरिका हर तरह के लोगों और विचारों के साथ बसा एक नया देश था जो आधुनिक व लोकतांत्रिक विचारों की अगुआई कर रहा था। यहां के संविधान में प्र्रेस की आजादी को शामिल किया गया। आज नवउदारवादी नीतियों का शिकार अमेरिका भी है जहां बेरोजगारी और आर्थिक मंदी का संकट मुंह बाए खड़ा है। पहले वैश्विक-वैश्विक का राग अलापने के बाद सबसे बड़ा दुश्मन प्रवासियों को करार दिया गया। प्रवासियों के बाद अमेरिका का सबसे बड़ा दुश्मन मीडिया को ही बताया जाने लगा। राष्ट्रपति के संवाददाता सम्मेलन में पत्रकारों को बेइज्जत किया गया। अमेरिकी सरकार ने प्रेस को अमेरिका का सबसे बड़ा दुश्मन करार दिया। लेकिन यह एक सुखद पक्ष है कि दमन के बाद प्रेस ने अपनी आजादी की कीमत पहचानी है। अमेरिका ने 16 अगस्त 2018 को वह ऐतिहासिक दिन भी देखा जब अमेरिका के तीन सौ अखबारों ने एक साथ प्रेस के दमन के खिलाफ संपादकीय लिखा। इसकी अगुआई की 146 साल पुराने अखबार दि बोस्टन ग्लोब ने।

सभी संपादकीयों के शब्द अलग-अलग थे लेकिन भाव एक ही था प्रेस की आजादी के खिलाफ आवाज उठाना, इस आजादी की कीमत बताना। द’ बोस्टन ग्लोब ने अपने आॅनलाइन संपादकीय में ट्रंप सरकार को करारा जवाब देते हुए लिखा, ‘अमेरिका की महानता उस आजाद प्रेस पर निर्भर करती है जो शक्तिशाली लोगों के बारे में सच बोल सकता हो’। द’ वेंच्युरा काउंटी रिपोर्टर लिखता है, ‘हमारे राष्टÑपति दरअसल फेक न्यूज के मास्टर हैं और उन्हें इस बात का कोई पश्चाताप नहीं है। राष्टÑपति के दावों की सत्यता परखने वाली एक आॅनलाइन डाटाबेस फैक्ट चेकर के अनुसार 558 दिनों में राष्टÑपति ट्रंप 4,229 झूठे दावे कर चुके हैं।’ पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति और विद्वान थॉमस जेफरसन ने भी कहा था कि अगर मुझे अखबारों के बगैर सरकार और सरकार के बगैर अखबार में से किसी एक विकल्प को चुनने कहा जाएगा तो मैं दूसरा विकल्प ही चुनूंगा। हालांकि, यह भी सच है कि सत्ता में आने के बाद उन्हें अखबार के सत्य संदिग्ध लगने लगे थे। यह भी सच है कि सत्ता के साथ अभिव्यक्ति का सच बदलने का पैमाना पूरी दुनिया के लोकतांत्रिक देशों में है। विपक्ष के रूप में आपको मीडिया लोकतंत्र का चौथा खंभा लगता है तो सत्ता में आते ही वह उसके लिए संकटकाल बन जाता है। इसलिए हर सरकार सत्ता में आते ही कलमवीरों को अपने तरीके से ढालना चाहती है। सरकार बनाम अखबार की यही जंग लोकतंत्र की जंग है, नागरिक अधिकारों की जंग है। फिलहाल इस जंग में सरकारों का पलड़ा भारी हो रहा और सत्ता से मुठभेड़ में वे शब्द और सूचनाएं मारे जा रहे जो उसका विकल्प या विपक्ष तैयार करते हैं। इस पलड़े को जल्द ही संतुलित करना होगा। आजाद कलमवीर के बिना किसी भी सरकार को लोकतांत्रिक होने का तमगा नहीं दिया जा सकता।

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