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बेबाक बोल: आप की बीमारी

आम आदमी पार्टी ने अपना राजनीतिक प्रतीक चिह्न या आम भाषा में कहें चुनावी निशान झाड़ू को बनाया। सीकों से बनी झाडूÞ आम लोगों से जुड़ी है, यह प्रतीक है सामूहिकता का, यह प्रतीक है संगठन का। अगर सीकें बिखर गर्इं तो झाड़ू सफाई का सबसे अहम औजार नहीं रह जाएगी। लेकिन झाड़ू की इकट्ठी और मजबूती से बांधी गई सीकों की सीख उन्हीं आम आदमी पार्टी के अगुआ अरविंद केजरीवाल ने नहीं ली जिन्होंने इस निशान के साथ दिल्ली में प्रचंड बहुमत पाया। सत्ता मिलने के शुरुआती दौर में प्रशांत भूषण और योगेंद्र यादव को ही अपने से जोड़ा रखा होता तो आज आशुतोष और आशीष खेतान जैसे लोग पार्टी से यूं नहीं बिखरते। देश और सार्वजनिकता के लिए काम करने का नारा लिए आए ये पेशेवर आज निजी, निजी करके अपनी पुरानी दुनिया में वापस नहीं लौटते। आम आदमी पार्टी के संस्थापक सदस्यों ने जिस तरह से पार्टी और अरविंद केजरीवाल से आजादी मांगी है उससे साफ पता चलता है कि केजरीवाल की प्राथमिकता कभी लोगों को साथ रखने की रही ही नहीं है। आखिर ऐसी कौन सी बीमारी है कि बिछड़े सभी बारी-बारी यही पूछता बेबाक बोल।

‘हम आपका इस्तीफा कैसे स्वीकार कर लें? न, इस जन्म में तो नहीं…सर, हम आपको बहुत प्यार करते हैं’। इस बार 15 अगस्त पर जब आशुतोष ने आम आदमी पार्टी से अपनी आजादी की घोषणा की तो आम आदमी पार्टी के संयोजक और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने ऐसी मधुर भाषा में ट्वीट किया। आशुतोष का इस्तीफा तो अभी तक नहीं स्वीकारा था लेकिन बकरीद पर आशीष खेतान ने अपनी कुर्बानी का भी एलान करते हुए कहा कि उन्होंने भी जश्न ए आजादी के दिन ही अपनी भी आजादी मांग ली थी। आज आशुतोष के इस्तीफे पर केजरीवाल शहद की मिठास लिए कहते हैं कि सर, हम आपको बहुत प्यार करते हैं। लेकिन जरा याद करें कुछ समय पहले की बात जब योगेंद्र यादव, प्रशांत भूषण, शांति भूषण, एल रामदास केजरीवाल से अपील कर रहे थे कि वे आम आदमी पार्टी को लोकतांत्रिक ढंग से चलाएं, अपनी तानाशाही प्रवृत्ति पर लगाम लगाएं। लेकिन अरविंद केजरीवाल ने अपनी आवाज पर सबके साथ आने के बावजूद अकेला चलना ही पसंद किया।

भारत माता, देशप्रेम, आंदोलन, आंदोलन का राग अलापने वाले दिल्ली में ऐतिहासिक सत्ता पाते ही इसी अंदाज में आते हैं कि आम आदमी पार्टी में तीन ही लोग अहम हैं-मैं, मैं और सिर्फ मैं। उनके इस एको अहम् द्वितीयो नास्ति, अहम् ब्रह्मास्मि जैसे अंदाज ए बयां का असर था कि लोकतांत्रिक तौर-तरीकों में यकीन रखने वाले लोग उनसे दूर होते गए। अरविंद केजरीवाल के अहंकार के शुरुआती दौर में लोग उन्हें समझाते जा रहे थे और वो इस कोशिश में लगे लोगों को पार्टी छोड़ने के लिए मजबूर करते जा रहे थे। विश्वसनीय और लोकप्रिय चेहरों को पार्टी से बेदखल करने के बाद केजरीवाल फिर आंदोलन-आंदोलन के खेल में मशगूल हो गए। एक आंदोलन शुरू करते और उस पर शिगूफा छिड़ते ही बेतकल्लुफी से उसे बेनतीजा छोड़ देते। आम आदमी पार्टी का जन्म वैकल्पिक राजनीति के नारे से हुआ था। वैकल्पिक राजनीति का यह नारा सुनने में तो बहुत चमकदार लगा था, उम्मीदों से भरा। इसी आकर्षण में वाम और समाजवादी धारा के वैसे लोग जो किन्हीं वजहों से अपनी जगह खो चुके थे या नई जगह की तलाश में थे इसमें पूरे जज्बे के साथ शामिल हुए। समाजवाद और वामपंथ के बीच से एक रास्ता निकालने का सवाल दिखा। वाम के सामने आम को खड़ा किया गया। इस आम की चमक में तो बहुत से वाम भी आए और एक खास विचारधारा छोड़ कर नई विचारधारा बनाने की राह चुनी। वैकल्पिक राजनीति के सुनहरे ख्वाब के सामने इसके लिए राह चुनने की जमीनी हकीकत सामने आते ही इसकी जमीन ही खिसकने लगी। यहां सवाल था कि वैकल्पिक राजनीति का मतलब क्या होगा? आप पूंजीवादी, समाजवादी, वामपंथी या किस नई राह पर चलेंगे? लेकिन विचारधाराओं की खिचड़ी में से कोई एक विचारधारा अपने मुखर स्वाद के साथ निखर ही नहीं पाई।

वैकल्पिक और आंदोलन की राजनीति को लेकर आप ने सिर्फ जुमले ही दिए और जुमलों का हश्र उस काठ की हांडी की तरह होता है जो दुबारा आग पर नहीं चढ़ती। दिल्ली में प्रचंड बहुमत के बाद मांग थी कि पार्टी में फैसले लेने का तरीका, इसके चलने का तरीका तय हो, एक लोकतांत्रिक ढांचे का विकास हो। प्रशांत भूषण और योगेंद्र यादव जैसे संस्थापक सदस्य तो इसी बुनियादी बहस के बाद ही बाहर हो गए। प्रशांत भूषण का आरोप था कि आंदोलन से निकली पार्टी एक छोटे से गुट में तब्दील हो गई है। दिल्ली में सत्ता मिलने के बाद कई संस्थापक सदस्यों की सलाह थी कि पार्टी का दिल्ली के बाहर भी विस्तार हो। उनकी यह दलील भी सही थी कि जब तक पार्टी का विस्तार नहीं होगा तो काम करने की जमीन कैसे मिलेगी। कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक के जो लोग आम आदमी पार्टी से स्वत:स्फूर्त जुड़े उन्हें काम करने का मौका तभी मिलेगा जब पार्टी दिल्ली के बाहर जाए। बिना अखिल भारतीय हुए कैसा विकल्प होगा और कैसी राजनीति? कार्यकर्ताओं व नेताओं के राजनीतिक रोजगार जैसी बुनियादी चीज को अरविंद केजरीवाल ने खारिज किया। उस वक्त केजरीवाल दिल्ली तक ही सीमित रहना चाहते थे। उन्होंने फैसले लेने की व्यवस्था को खुद तक सीमित कर दिया।

अब लोकपाल या जनलोकपाल, ईमानदार, देशप्रेमी सब कुछ केजरीवाल ही थे। विकल्प वाली राजनीति के ब्रांड अंबेसडर ने पार्टी के अंदर लोकतंत्र की किलकारियां तो गूंजने ही नहीं दीं उसके बाद राज्यसभा सीटों के मामले में अपनी रही-सही छवि भी खो बैठे। दिल्ली में मात्र सात संसदीय क्षेत्र और पार्टी में महत्त्वाकांक्षी नेताओं की फौज। कल के खोजी पत्रकारों और आंदोलनकारी वकीलों को जब लगने लगा कि सदन में शपथ लेने का उनका सपना पूरा नहीं होने वाला है तो देश को बदलने का सपना छोड़ कर अपने निजी व्यवसाय के साथ ही जाने का फैसला किया। आम आदमी पार्टी के खोने और पाने का दायरा इतना सीमित हो गया है कि इसमें सक्रिय लोग खुद को राजनीतिक रूप से बेरोजगार समझने लगे। भविष्य बनने से पहले ही विकल्प की राजनीति भूत हो गई। बिना कोई विचारधारा वाली और व्यवस्थाहीन पार्टी के अगुआ ने विरोध और आरोप को ही अपनी पहचान बना लिया। उनके इस प्रयोग से अपना रोजगार खोए बेरोजगारों ने भी उनका ही तरीका अख्तियार कर लिया। अब वे आप के विरोध में आप को अलविदा कह रहे हैं।

कल जो हर बात पर भारत माता की जय और वंदे मातरम बोल रहे थे, वे शायद यह नारा लगाते वक्त संसद में भाषण देने का सपना भी देख रहे थे। आम आदमी पार्टी की तत्कालीन लोकप्रियता को देख उससे जुड़ा हर नेता खुद को लोकसभा से लेकर राज्यसभा तक का सबसे योग्य उम्मीदवार मानने लगा था। इन नेताओं की आज यह उम्मीद इसलिए टूटी है कि बीते कल में इन्हें इस बात का सपना दिखाया गया था। क्या इनके आदर्शों में कोई देशभक्ति या भारत माता थीं? अगर आपके लोकसभा या राज्यसभा जाने का रास्ता बंद हो जाएगा तो आप पार्टी को ही अलविदा कह देंगे, इतना ही था आपके आंदोलन का सार। कभी गांधी या नेहरू टोपी को अण्णा टोपी की पहचान तो दे दी गई थी। लेकिन राजनीतिक लाभ की कोशिश नाकाम होते ही उस टोपी की नाकामी अरविंद केजरीवाल के सिर ही पहना दी गई है।

आम आदमी पार्टी और अरविंद केजरीवाल के संदर्भ में इस स्तंभ में एक अंग्रेजी की कहावत का पहले भी जिक्र किया था कि ईमानदारी तो अवसर नहीं मिलने भर की चीज है। यहां आम आदमी पार्टी से जुड़े लोग देशभक्ति के लिए भी यही कहावत चरितार्थ कर रहे हैं। तो अब जबकि बिछड़े सभी बारी-बारी तो ‘आप’ से पूछा जा सकता है कि आखिर आपको क्या है बीमारी? योगेंद्र और प्रशांत जब एक थे तो खुलकर बोले थे, और तभी यह समझ गया था कि यह आंदोलन और विकल्प की राजनीति जुमला ही साबित होने वाला है। यह ठीक है कि इस बार जो जा रहे हैं वे खुलकर नहीं बोल रहे हैं और आप इस्तीफा भी नामंजूर कर उनके साथ दोस्ती की दुहाई दे रहे हैं। इस बार आपको बस यही चिंता है कि अब कोई बचेगा ही नहीं तो फिर मेरा क्या होगा। यही चिंता अगर आप योगेंद्र और प्रशांत के जाते वक्त करते तो आपकी बीमारी इतनी नहीं बढ़ती। आज यह साफ दिख रहा है कि आम आदमी पार्टी के अगुआ की प्राथमिकता सबको इकट्ठा करने की नहीं है। आप आंदोलन वाली स्थिति से बाहर नहीं निकल पाए तो आपकी बीमारी के खिलाफ आपके साथियों ने भी अगस्त क्रांति छेड़ते हुए आम आदमी पार्टी छोड़ो आंदोलन शुरू कर दिया है। क्या अपने खिलाफ हुए इस आंदोलन के बाद अपना इलाज खोजेंगे आप?