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बेबाक बोल : खबर जिंदा है

14 मई 2018 को टॉम वुल्फ ने दुनिया को अलविदा कहा। 88 पार की उम्र में अपने खास तरह के फैशन के लिए मशहूर सूट-बूट वाले पत्रकार वुल्फ साहित्य और पत्रकारिता के इतिहास में अपना अध्याय दर्ज कर गए हैं जिसे नई पत्रकारिता के नाम से जाना जाता है। वुल्फ का मानना था कि अपनी खबर पर खोज करने से पहले एक पत्रकार को यह सोच लेना चाहिए कि वह इस धरती पर मंगल ग्रह से आया कोई प्राणी है जो अब तक कुछ नहीं जानता है। जो और जैसा है को पाठकों तक पहुंचाने के लिए सूचना, नाटकीयता और रचनात्मकता का प्रयोग कर वे एक चरवाहे की तरह पत्रकारिता करना चाहते थे। पत्रकारीय औजारों से साहित्यिक उत्पाद तैयार करवाने के पक्षधर वुल्फ के सिद्धांत को बाल्जाक, गोगोल, डिकेंस, तोलस्तोय, दोस्तोव्यस्की के लेखन में देखा जा सकता है। मार्केज के साहित्य में हम पत्रकारिता के औजार वाले उस साहित्यकार को देख सकते हैं जो अपनी रचनात्मकता से आज की खबर को कल के लिए अमर बना जाता है। इस बार बेबाक बोल में टॉम वुल्फ को श्रद्धांजलि जो कहते हैं कि खबर जिंदा है।

वुल्फ ने पाठकों की रुचि बढ़ाने के लिए दृश्यात्मक शब्दों को रचना शुरू कर दिया।

‘जिस दिन उन्होंने सैंटिएगो की हत्या की, वह सुबह साढ़े पांच बजे से ही बिशप की नाव के इंतजार में था। उसने सपने में खुद को इमारती लकड़ी वाले पेड़ों के एक झुरमुट में देखा था। हल्की बारिश हो रही थी और एक पल को तो सैंटिएगो शायद सपने में भी खुश था। हालांकि जब वह जागा तो उसने पाया कि वह चिड़ियों की बीट से ढका था।’ (गैब्रिएल ग्रेशिया मार्केज, क्रॉनिकल ऑफ ए डेथ फोरटोल्ड का अंश) मार्केज ने उस हत्या की कहानी लिखी जो 20 साल पहले हुई थी। रेमंड विलियम्स कहते हैं कि मार्केज ने कल्पना और पत्रकारिता को मिला कर अपना साहित्य रचा। ‘क्रॉनिकल ऑफ ए डेथ फोरटोल्ड’ में लेखक पांच अध्यायों में कई साक्षात्कारों के माध्यम से कहानी को आगे बढ़ाते हैं। मार्केज ने कहा था कि पिनोशे सरकार के सत्ता से जाने के बाद ही लिखेंगे। मार्केज के उपन्यास की शुरुआत एक रिपोर्ट की तरह होती है। मौसम और समय के सूक्ष्म विवरणों के साथ। रेमंड विलियम्स के अनुसार मार्केज इस तरह से अपने पाठकों को दुविधा में रखने में कामयाब होते हैं। वे छोटी से छोटी चीजों को पत्रकारीय विवरण की तरह विस्तार से बताकर बड़ी घटनाओं पर चुप्पी साध लेते हैं। कई चरित्र एक ही घटना का विवरण देते हैं जो पत्रकारिता का एक पहलू है। खूनी घटनाओं को भी मार्केज अपने विवरण से पन्नों पर जीवंत कर देते हैं। उनके पत्रकारीय अनुभवों का उत्पाद वह महान साहित्य है जिसे आज पूरी दुनिया पढ़ रही है। पिछली 14 मई को खबर मिलती है कि नई पत्रकारिता के जनक टॉम वुल्फ नहीं रहे। उनके निधन की खबर के साथ ही याद आते हैं प्रेमचंद, मार्केज से लेकर आज के साहित्यकार तक। समकालीन हिंदी साहित्य में ऐसे रचनाकार बड़ी संख्या में हैं जिनके साहित्य का कच्चा माल पत्रकारिता से आया है। प्रेमंचद की रचना ‘गोदान’ के बारे में कहा जा सकता है कि सारे अखबार की रपटें, इतिहास की किताबें नष्ट हो जाएं और एक ‘गोदान’ बची रह जाए तो पूरे उत्तर भारत का उस समय का इतिहास फिर से लिखा जा सकता है। साहित्य और पत्रकारिता के इसी अंतरसंबंध को एक सिद्धांत के रूप में प्रतिपादित कर रहे थे टॉम वुल्फ।

टॉम वुल्फ का जाना पत्रकारिता के एक युग का जाना है। पत्रकारिता और साहित्य के बीच की कड़ी का ऐसा अध्येता जो अपनी खबर के लिए केवल बाहर की विषय वस्तु को ही नहीं देखता है। वह सदियों की परंपरा से पोषित अपने मानस की भी पड़ताल करता है। यह वस्तु-जगत के बोध और आत्म-सजगता के मिलन का बिंदु भी बनता है। एक खबरनवीस तटस्थ तथ्यों के साथ विडंबनाओं और विरोधाभासों से भी गुजरता है। तथ्यों के साथ उसका गुस्सा, उसका दुख और रुमानियत खबरों को साहित्यिक विधा जैसी रोचक बना देती है। खबर जो करुणा, प्रेम, अपनत्व, सत्ता, हिंसा और स्मृति के मनोभावों के साथ लिखी जा रही है। टॉम वुल्फ और ‘न्यू जर्नलिज्म’ दोनों शब्द आज सहचर हैं। उनकी लिखी किताब ‘न्यू जर्नलिज्म’ लेखों का संग्रह है जो 1973 में प्रकाशित हुई थी। वुल्फ ने अपने समय के मौजूदा पत्रकारों और उपन्यासकारों का मजाक उड़ाते हुए 1960 में एक मुहिम शुरू की और पत्रकारिता में साहित्य का तड़का लगाया। वे एक ऐसे पत्रकार थे जिनकी कलम में साहित्य के औजार थे। उन्होंने ऐसी शैली विकसित की जिसके माध्यम से तथ्यपरक खबरनवीसी भी उपन्यासों की तरह रोचक लगती थी। वुल्फ ने जब पत्रकारिता को अपने पेशे के तौर पर शुरू किया था तब उनका ऐसा कोई उद्देश्य नहीं था कि वह कुछ नया या साहित्यिक रचें। हां, उनके अंदर एक इच्छा उमड़-घुमड़ रही थी कि वे अपने अंदर के असली वुल्फ को अपनी कलम से जाहिर करें। वुल्फ अपनी रचनाओं में दो तरह के पत्रकारों का जिक्र करते हैं। पहली श्रेणी को आज के हिसाब से हम खोजी पत्रकार कह सकते हैं। जल्दी से जल्दी खबर छापने की होड़ वाले पत्रकार जो आज भी खबरों को तोड़ रहे हैं। दूसरी श्रेणी में वे फीचर लेखकों को रखते हैं। फीचर पत्रकार वे हैं जिनके लिए पत्रकारिता, उपन्यासकार या साहित्यकार बनने की सीढ़ी थी। एक तरह से कहिए कि अखबार का दफ्तर, साहित्यकार बनने की प्रयोगशाला की तरह था। अखबार में काम करते वक्त आपके पास दो चीजें अहम होती हैं-भाषा और अनुभव। वुल्फ को कहीं न कहीं लगता है कि तथ्यपरक पत्रकारिता आपको मार देती है। शायद इसलिए वे सलाह देते हैं कि अपनी आत्मा और शरीर बचाते हुए नौकरी करो और जब उपन्यास के लिए कच्चा माल तैयार हो जाए तो अखबार की प्रयोगशाला छोड़ अपने कारखाने में चले आओ। यह वह दौर था जब उपन्यास को पत्रकारों की ‘आखिरी जीत’ का तमगा माना जाने लगा था।

साठ के दशक में अमेरिकी पत्रकारिता में सनसनी का जोर था और सनसनीखेज पत्रकारों की आपस में काफी भिड़ंत और प्रतियोगिता थी। दो विश्वयुद्धों के बाद युद्ध पत्रकारों का सबसे ज्यादा सम्मान था, वे सत्ता के सबसे नजदीक थे। उनके पास होते थे तथ्य और आंकड़े। इसके विपरीत फीचर लेखक शांति से और पूरा समय लेकर अपना काम करते थे। वुल्फ के मुताबिक, उस समय फीचर लेखन की कोई अहमियत नहीं थी। फीचर पत्रकारों को एक तरह से अस्थायी पत्रकार ही माना जाता था। वुल्फ ने ‘इस्क्वायर’ पत्रिका में अपने समय के महान मुक्केबाज जो लुईस पर एक खबर पढ़ी थी। उसका शीर्षक था ‘जो लुईस : प्रौढ़ावस्था में एक राजा की तरह’। उस खबर में शब्दों के जरिए दृश्यों का ऐसा चित्रण था कि पाठक पढ़ते हुए अपने हिसाब से जो लुईस को देखने लगता था। वुल्फ को लगा कि थोड़े से संपादन के बाद उस खबर और एक कहानी के बीच का बड़ा फासला खत्म हो जाता है।
वुल्फ को इस तरह की पत्रकारिता ने काफी प्रभावित किया। माना जाता है कि वुल्फ समझ नहीं पा रहे थे कि आखिर कोई पत्रकार ऐसे निजी स्तर पर कैसे पहुंच सकता है। रिपोर्टिंग के सौंदर्य के पहलू पर किसी का ध्यान नहीं गया था। वुल्फ का कहना था कि पत्रकारिता के इस पहलू से साहित्यकार अब तक अनजान थे। ऐसा इसलिए क्योंकि आधुनिक आलोचना में कच्चे माल को हमेशा उपहास ही माना जाता है। एकमात्र चर्चा का विषय यह था कि फलां-फलां सामग्री से एक कलाकार क्या बना पाया है। उनका जोर सामग्री के उत्पाद पर था न कि प्रक्रिया पर। कला की आधुनिक अवधारणा के तहत कलाकार के हाथ में सामग्री मिट्टी की तरह है। बाल्जाक, गोगोल, डिकेंस, तोलस्तोय, दोस्तोव्यस्की के लेखन में भी वे खबरनवीसी देखते हैं। मार्केज इसका ज्वलंत उदाहरण हैं। साहित्य में पत्रकारिता और पत्रकारिता में साहित्य की वुल्फ की इस अवधारणा को ही नई पत्रकारिता (न्यू जर्नलिज्म) का नाम दिया गया। हेराल्ड ट्रिब्यून के रविवारी परीशिष्ट के लिए लिखते हुए वुल्फ ने गैर गल्पकथा में इसका प्रयोग किया।

वुल्फ ने पाठकों की रुचि बढ़ाने के लिए दृश्यात्मक शब्दों को रचना शुरू कर दिया। इसमें पाठक और चरित्रों के बीच संवाद जरूरी है। वुल्फ कहते हैं, ‘पाठक का दिमाग एक उपमार्ग का दरवाजा नहीं जिससे कोई भी आकर गुजर आए।’ उन्होंने अपनी खबरों में खुद को डालना शुरू किया। अपनी खबरों में वे उत्तम पुरुष के रूप में मौजूद होते थे। एक बार उन्होंने अपनी ही एक खामी, फैशनपरस्ती को लेकर खबर लिख डाली। उसे पढ़ते हुए ऐसा लगता है कि सूत्रधार खुद टॉम न होकर कोई और है। आज हम भारतीय साहित्य के संदर्भ में देखें तो बेहिचक कह सकते हैं कि बिना कल्पना के साहित्य और बिना तथ्य के पत्रकारिता नहीं हो सकती। साहित्य में पत्रकारिता का यथार्थ मिलता है तो उसे एक उद्देश्य मिलता है। इस यथार्थ के इस्तेमाल का मकसद कुछ भी हो सकता है। इन दिनों टेलीविजन चैनलों पर ‘रियलिटी शो’ का मकसद यथार्थ से पैसा कमाना है। साहित्य में यथार्थ का यही शोध टॉम वुल्फ ने किया। वुल्फ की साहित्यिक पत्रकारिता को जल्द ही अलग-थलग एक कोने में खड़ा कर दिया गया, उसकी मृत्यु की घोषणा करते हुए। तथ्यपरक दिमाग और कमजोर रचनात्मकता एक पत्रकार की पहचान बताई गई। लेकिन आज मार्केज, अज्ञेय और राहुल सांकृत्यायन जैसे कालजयी लेखकों की रचनाओं में जब हम पत्रकारिता के औजार देखते हैं तो टॉम वुल्फ भी अपने लिए एक पुनर्पाठ मांगते हैं। खासकर साहित्य और पत्रकारिता के विद्यार्थियों के लिए।

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