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बेबाक बोल : फुटबॉल का ‘खेल’

इंग्लैंड की फुटबॉल टीम के स्वीडिश मूल के मैनेजर स्वेन गोरान एरिक्सन ने कहा था, ‘फुटबॉल में राजनीति से ज्यादा राजनीति है’। आज जब फुटबॉल की नियामक संस्था फीफा कई देशों में वर्ल्ड बैंक या अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से ज्यादा दखल रखती है तो अपनी कमजोरियों से जूझ रहे देश वैश्विक छवि मजबूत करने के लिए इसकी मेजबानी में पूरा दमखम लगा देते हैं। कभी फुटबॉल कामगार तबके का सबसे बड़ा प्रतीक था और आज इसके पास इतना बड़ा बाजार और दर्शक है कि उसके बरक्स सिर्फ ओलंपिक है। इसके जरिए कोई भी देश वैश्विक बाजार के साथ संवाद कर सकता है। ग्लोब की तरह ही गोल फुटबॉल की धरती के देशों पर पकड़ इतनी मजबूत हो चुकी है कि यह सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक रिश्तों को व्यापारिक रिश्तों में बदल सकता है। पिछले कई दशकों में हॉलीवुड सिनेमा से लेकर वैश्विक मीडिया तक में अपनी खराब छवि से परेशान रूस ने इस बार अपनी पहचान चमकाने के लिए फीफा का दांव खेला है। खेल के पीछे के इसी वैश्विक ‘खेल’ पर बेबाक बोल।

प्रतीकात्मक तस्वीर।

एक सदी पहले जब दुनिया हिल उठी थी तो उसे रूसी क्रांति के नाम से जाना गया था। सोवियत संघ (यूएसएसआर) एक नई शक्ति बना और इंसान की पहुंच चांद तक हो गई। लेकिन चांद पर पहुंचा यूएसएसआर बीसवीं सदी में ही जमींदोज हो गया। आज उस रूस ने अपनी पहचान पाने के लिए फीफा विश्व कप फुटबॉल का सहारा लिया है। लेनिन के देश में पुतिन फुटबॉल विश्व कप के लिए 12 अरब अमेरिकी डॉलर खर्च कर रहे हैं। पिछले कुछ समय से वैश्विक मीडिया में रूस अपनी बदहाली के लिए जाना जा रहा था तो पुतिन जिम से लेकर तरणताल तक में अपना स्वघोषित ‘निजी फिटनेस’ प्रमाणपत्र दिखा रहे थे। 18 सालों से राज कर रहा राष्ट्रीय अध्यक्ष अपनी ब्रांडिंग में लगा हुआ था कि वह जिम में कितना पसीना बहा सकता है और तरणताल में अपना शारीरिक सौष्ठव दिखा सकता है। लेकिन सिर्फ उनकी निजी चुस्ती-फुर्ती से पुराने रूस की नई दुनिया में ब्रांडिंग नहीं हो सकती थी। इसके लिए चुना गया वैश्विक बाजार का सबसे बड़ा ब्रांड फीफा। दक्षिण अफ्रीका से लेकर ब्राजील तक ने अपनी ब्रांडिंग के लिए इसे चुना था। शकीरा का गाना ‘वाका, वाका दिस टाइम फॉर अफ्रीका’ पूरी दुनिया की जुबान पर चढ़ गया था। हालांकि शकीरा का ग्लैमर इन देशों की बदहाली को छुपाने में नाकाम रहा था और अब देखना यह है कि रूस ने उत्तर से दक्षिण और पूरब से पश्चिम तक के अपने 11 शहरों में जो मैच रखे हैं, उससे कौन सी तस्वीर सामने आती है। दक्षिण अफ्रीका से लेकर ब्राजील और अब रूस। कहते हैं कि खेल के पास दुनिया को बदलने की ताकत है। खेल जब जुनून बन जाता है तो वह समाज और राजनीति को प्रभावित करता है। लेकिन उसके बाद सत्ता और बाजार उसे इतना प्रभावित करते हैं कि वह अपने मकसद से भटक जाता है। कभी वंचितों और कमजोर तबकों के बीच लोकप्रिय इस खेल से लोक बेदखल है।

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फुटबॉल के समाजशास्त्र के अध्येता डेविड गोल्डबैट अपने बेलाग्रेड प्रवास का एक वाकया सुनाते हैं। वहां फुटबॉल मैच खत्म होते ही हारी हुई टीम के समर्थक उत्तेजित हो उठे। उन्होंने स्टेडियम में आग लगा दी। इस आग को डेविड अपने नजरिए से देख रहे थे। उच्च सुरक्षा वाले स्टेडियम में आम खेल प्रेमियों का आग लगाना क्या इतना आसान था? तो यह वहां का प्रशासन था जिसने आगजनी हो जाने दी? नागरिकों के पीछे वह राज्य था जो फुटबॉल में हार और जीत को अपनी अस्मिता से जोड़ रहा था? आज दुनिया क्रिकेट और फुटबॉल के बाजार में बंटी है। पांच सौ साल पहले विभिन्न तरह की लकड़ियों से गेंद को खेलने के दौरान क्रिकेट का विकास हुआ और सत्रहवीं सदी तक यह विशिष्ट खेल के रूप में स्थापित हो चुका था। कई जगह तो क्रिकेट प्रेमी रविवार को भी खेलते नजर आते और चर्च का दिया दंड भुगतते। इंग्लैंड की सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों ने क्रिकेट को बहुत ज्यादा प्रभावित किया। बेसबॉल क्रिकेट के आधे समय में खेला जाता था और फुटबॉल 90 मिनट में। इसके उलट क्रिकेट का एक टेस्ट मैैच पांच दिन का होता है और यह भी तय नहीं था कि पांच दिनों में नतीजा निकल ही जाए। क्रिकेट के पिच की लंबाई 22 गज तय है लेकिन मैदान का आकार या क्षेत्रफल नहीं। जबकि हॉकी या फुटबॉल में मैदान के माप भी तय होते हैं। इस कारण क्रिकेट विधिबद्ध खेलों में सबसे आगे रहा। 1774 में क्रिकेट में लिखित कानून बन चुका था। क्रिकेट के खेल का तब कोई तय समय नहीं था। यह गांवों का खेल था और वहां जीवन धीमा होता है। इसके विपरीत फुटबॉल और हॉकी औद्योगिक समाज में उपजे खेल हैं, जहां के समाज के लिए समय बहुत कीमती होता है। अगर क्रिकेट के उपकरणों की बात करें तो मामूली बदलावों के बाद भी उसका मूल स्वरूप बरकरार है जो प्राकृतिक और पूर्व तकनीकी क्रांति का है।

इंग्लैंड में क्रिकेट का विकास वहां के समाज को भी परिलक्षित करता है। जो अमीर मजे के लिए क्रिकेट खेलते थे ऐमचुर कहलाए जिन्हें ‘जेंटलमैन’ भी कहा जाता था जबकि पेशेवर खिलाड़ी को ‘प्लेयर’ की उपाधि से ही संतोष करना पड़ता था। क्रिकेट में कुलीनों के लायक पैसा नहीं था इसलिए इसे सिर्फ खेल के लिए खेलना ही राजसी स्वभाव माना जाता था। एक कहावत है ‘वाटरलू का युद्ध ईटन के खेल के मैदानों में जीता गया था’। तात्पर्य यह कि युद्ध जीतने के लिए जो संयम चाहिए वह क्रिकेट जैसे खेल से आया। इसके साथ ही क्रिकेट में ऊंच-नीच की भावना मजबूत हुई। इसमें भेदभाव आज भी कायम है कि ‘बेनीफिट आॅफ डाउट’ बल्लेबाज को ही मिलता आ रहा है। सफल बल्लेबाज आज भी नायक होते हैं और गेंदबाजों को कमतरी झेलनी पड़ती है। वहीं फुटबॉल के उद्भव की बात करें तो चीन के सैन्य अधिनियम में ऐसे खेल का उल्लेख है तो उससे पहले यूनान और रोम में भी इसकी झलक मिलती है। 1314 में लंदन के मेयर ने एक कानून बनाया जिसके मुताबिक शहर के अंदर फुटबॉल खेलना मना था। इस नियम के उल्लंघन पर सख्त सजा का प्रावधान था। इंग्लैंड और फ्रांस के बीच चले सौ साल के युद्ध के दौरान सभी राजाओं ने फुटबॉल खेलने पर रोक लगा दी थी। ऐसे प्रतिबंधों ने इसे और लोकप्रिय बना दिया। सोलहवीं सदी में खेल और कला के माध्यमों पर शुद्धतावादी हमला भी हुआ। क्रिकेट के उलट रग्बी या फुटबॉल में शारीरिक संपर्क ज्यादा होता है और झगड़े भी। इसलिए कुलीन वर्ग इसे हेय दृष्टि से देखता था। पारंपरिक वर्चस्व की बात करें तो क्रिकेट पर अब तक खास तरह के देशों का दबदबा (वेस्टइंडीज की बात न करें तो) बना रहा। वहीं फुटबॉल के ज्यादातर महान खिलाड़ी गरीब देशों से आते हैं।
फुटबॉल के भूगोल ने भी वर्चस्व तोड़ने की कोशिश की थी। उदाहरण के तौर पर अर्जेंटीना में उच्च स्तर के खिलाड़ियों का 75 फीसद राजधानी ब्यूनस आयर्स से ताल्लुक रखता है जबकि लंदन में यह मात्र 25 फीसद है। दोनों राजधानियों का अंतर साबित करता है कि फुटबॉल महज एक खेल न होकर एक गूढ़ समाजशास्त्रीय विषय है। इटली में औद्योगिक रूप से मजबूत उत्तरी हिस्सा फुटबॉल पर अपना दबदबा रखता है जबकि दक्षिणी हिस्सा जो कृषि प्रधान है, इसमें पिछड़ा हुआ है। 2000 में इंग्लैंड की फुटबॉल टीम के स्वीडिश मूल के मैनेजर स्वेन गोरान एरिक्सन ने कहा था, ‘फुटबॉल में राजनीति से ज्यादा राजनीति है’। आज फुटबॉल की नियामक संस्था फीफा कई देशों में वर्ल्ड बैंक या अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से ज्यादा दखल रखती है।

‘द गार्जियन’ में छपे अपने लेख में लेस कारपेंटर बताते हैं कि अमेरिकी सॉकर डायवर्सिटी टास्क फोर्स के चेयरमैन डग एंडरसन की मानें तो पूरी व्यवस्था बिखर चुकी है और किसी को भी इसकी चिंता नहीं है। अब सिर्फ संपन्न घरों के बच्चे ही फुटबॉल खेल पा रहे हैं। एक मध्यवर्गीय और कमजोर तबके के परिवारों के पास इतने पैसे नहीं हैं कि वे इन क्लबों की भारी फीस चुका सकें। फुटबॉल लोक से जुड़ा था और इसके तमाम बड़े सितारे झुग्गियों (फावेला) से आए। वे कहते हैं कि 2015 का महिला विश्वकप जीतनेवाली टीम में भी ज्यादातर खिलाड़ी श्वेत थीं। और अगर वे अश्वेत हैं भी तो उनका पालन-पोषण अमेरिका के बाहर हुआ था। यह बात और भी ज्यादा आश्चर्यजनक है क्योंकि ठीक इसी दौर और माहौल में बास्केटबॉल के हालात सर्वथा विपरीत हैं। वहां अब भी इतनी असमानता नहीं है। रोजर बेनेट और ग्रेग कैपलम के एक शोध में सामने आया कि अब फुटबॉल के ज्यादातर खिलाड़ी श्वेत, पढ़े-लिखे और खुशहाल घरों से हैं। 2008 के बाद से यह खाई और चौड़ी हुई है। माता-पिता फुटबॉल की कोचिंग पर 12000 डॉलर प्रतिवर्ष तक खर्च करते हैं। इसमें वजीफे नाममात्र के हैं। पैसे और राजनीति का वर्चस्व क्रिकेट के बाद अब फुटबॉल की भी मासूमियत छीन रहा है। पूरी दुनिया में यह खेल हर तबके के बीच जितना लोकप्रिय होता जा रहा है उतना ही इस पर खास तबके का वर्चस्व भी होता जा रहा है। आम दर्शक और खास खिलाड़ियों का यह मेल आज ‘खेल’ तो खराब कर ही रहा है।

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