ताज़ा खबर
 

बेबाक बोल: फिर ’84

पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने संसद में सिख विरोधी दंगों के लिए माफी मांग कर एक नजीर पेश की थी। इसरो, आइआइएम, आइआइटी से लेकर भाखड़ा नांगल तक, इन चीजों का श्रेय कांग्रेस एक पार्टी के तौर पर लेती रही है। तो 1984 में कत्लेआम का वह मंजर जिसने हिंदुस्तान के इतिहास को एक काली तारीख दी, वह किसके हिस्से आएगा? नागरिक को जब भीड़ बना दिया जाता है तो वह दंगाई बन बैठता है। लेकिन नागरिक को भीड़ बनाता कौन है? यह सवाल 1984 से पूछा जा रहा है। मनमोहन सिंह की माफी के बाद विदेशी जमीन पर राहुल गांधी कांग्रेस पार्टी को 1984 के लिए क्लीन चिट देते हैं। जिस पीड़ा को पीढ़ियों ने भुगता और जो अदालत में विचाराधीन है उस पर राहुल अपना निजी फैसला सुना जाते हैं। ऐसे समय में जब कि राहुल अपनी छवि एक जिम्मेदार विपक्षी नेता की बना रहे हैं तो सवाल यह है कि क्या कांग्रेस अध्यक्ष इस सवाल के लिए तैयार नहीं थे, या उनका यह तयशुदा जवाब सलाहकार मंडल द्वारा तैयार था। बीच बहस में आई ’84 पर बेबाक बोल।

कांग्रेस अध्यक्ष कहते हैं कि दंगों में कांग्रेस पार्टी की कोई भूमिका नहीं थी।

‘इंदिरा गांधी की हत्या एक राष्ट्रीय त्रासदी थी…। उसके बाद जो हुआ उससे हमारा सिर शर्म से झुक गया…। मुझे सिख बिरादरी से माफी मांगने में कोई संकोच नहीं है, मैं 1984 की घटना के लिए सिर्फ सिखों से नहीं पूरे देश से माफी मांगता हूं…’। 11 अगस्त 2005 को संसद में जब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की आवाज गूंजी थी तो उस दिन भारतीय लोकतंत्र और मजबूत हुआ था। यह माफी उस पार्टी के प्रधानमंत्री मांग रहे थे, जिस पर 1984 में सिख दंगों को भड़काने का आरोप है। यह माफी वो मांग रहे थे जो खुद सिख बिरादरी से आते हैं। यह बहुत देरी से निभाया ‘राजधर्म’ था।

इंदिरा गांधी की हत्या भारत के लिए जितनी बड़ी त्रासदी थी उससे बड़ी त्रासदी बनकर उभरा सिखों के खिलाफ दंगा। यह दंगा बानगी थी सत्ता के अहंकार की। यह बानगी थी ‘राजधर्म’ से आंखें मूंदने की। यह बानगी थी उस मानसिकता की कि अगर किसी खास मजहब या संप्रदाय के लोगों ने कोई अपराध किया, और उसे मानने वाले लोग अल्पसंख्यक हैं तो उस पूरी कौम को ही दोषी मान लो। इंदिरा गांधी की हत्या उनके सिख अंगरक्षकों ने की तो पूरी सिख कौम के खिलाफ नफरत उमड़ पड़ी। कांग्रेस की सत्ता थी और आरोप है कि कांग्रेसी हुक्मरानों ने हर उस घर, गली, सड़क, चौराहे से आंखें मूंद लीं जहां सिखों का कत्लेआम हो रहा था, उनके घर जलाए जा रहे थे, दुकानें लूटी जा रही थीं। दिल्ली से लेकर देश के कोने-कोने तक हर सिख इंदिरा गांधी की हत्या का दोषी था। बड़ा पेड़ गिरा था तो छोटे पौधों और कोपलों को रौंदने से रोकने वाले मुंह दूसरी तरफ कर चुके थे। 1984 में कांग्रेस के हुक्मरानों पर गलती करने के जो आरोप हैं उसके लिए मनमोहन सिंह ने 2005 में माफी मांग कर देश और दुनिया को एक सकारात्मक संदेश दिया। लेकिन 2018 में विदेशी जमीन पर राहुल गांधी ने इस हिंसा के लिए कांग्रेस पार्टी को पाक-साफ करार देकर वक्त की सुई फिर ’84 पर मोड़ दी और एक नई बहस छेड़ दी। गलती कबूल कर सुधार की ओर बढ़ने से सकारात्मक राह और कोई नहीं हो सकती। मनमोहन सिंह के जरिए उस वक्त पार्टी ने वही सुधार की राह चुनी। लेकिन दंगों में कांग्रेस पार्टी की भूमिका को नकार कर राहुल गांधी ने उस पूरी पीड़ा को एक बार फिर सामने ला दिया जो एक बड़े समुदाय ने भुगती।

कांग्रेस अध्यक्ष कहते हैं कि दंगों में कांग्रेस पार्टी की कोई भूमिका नहीं थी। ऐसे दंगों में पार्टी की वैसी सीधी, दस्तावेजी भूमिका होती भी नहीं है। कोई भी पार्टी प्रेस कांंफ्रेंस करके दंगा नहीं करवाती, न ही दंगे पर फैसला लेने के लिए कोई कार्यकारिणी परिषद की बैठक बुलाती है। एक घटना घटित होती है और उस पर सत्तारूढ़ पार्टी का रवैया क्या है आगे का माहौल बहुत कुछ इसी से तय होता है। एक बड़ा आरोप है कि कांग्रेसी नेताओं ने हिंसात्मक माहौल को बढ़ाने में मदद की। एक ऐसी प्रधानमंत्री की हत्या होती है जो पूरे देश में लोकप्रिय थीं, अपनी पार्टी का संबल थीं। ऐसी घटना के बाद एक संवेदना आती है, भावनात्मक कष्ट और दुख पैदा होता है। यहीं पर उस सत्तारूढ़ पार्टी की जिम्मेदारी बहुत बढ़ जाती है जिसकी नेता की हत्या हुई है क्योंकि वो देश की भी नेता हैं। जनता की भावनाओं का ज्वार फूटना स्वाभाविक होता है। यहीं से पार्टी का काम और हस्तक्षेप शुरू होता है कि वह इस पीड़ा और भावना को कौन सा मोड़ दे। गलत के प्रति कांग्रेस पार्टी का रवैया क्या था? आरोप है कि कांग्रेस की सत्ता से जुड़े लोगों ने इसे देश की पीड़ा के बदले देश के गुस्से के माहौल में बदल दिया। सड़कों पर बदले की हिंसा का खून बहने लगा। आज राहुल गांधी वैश्विक मंचों पर अपनी लोकतांत्रिक छवि पेश करने में जुटे हैं। वे एक मजबूत विपक्ष की आवाज भी बन रहे हैं। मुद्दों को लेकर उनकी समझ भी स्पष्ट हो रही है। लेकिन वैश्विक मंच पर ’84 के दंगों जैसे मामलों पर जवाब देने के लिए उन्हें और उनकी टीम को बेहतर तैयारी करनी थी। आज जब आप विपक्ष के रूप में सत्ता पर सवाल कर रहे हैं तो उस वक्त के भी सवाल उठेंगे जब आप सत्ता में थे। तो क्या यह एक तयशुदा जवाब था जो उन्होंने बहुत सोच-समझ कर दिया?
मनमोहन सिंह संसद में एक मानवीय बयान देकर, उस पीड़ा के साझीदार बने थे। लेकिन राहुल गांधी ने जो बयान दिया उससे पूरी हिंसा और दंगे को एक बार फिर से प्राकृतिक घोषित करने जैसा लगने लगा। यह उस पीड़ा पर नमक छिड़कने जैसा था जिसकी टीस पीढ़ियों ने भुगती है। कभी उनके पिता ने भी बड़ा पेड़ गिरने जैसे संवाद कहे थे, जिसकी व्यापक आलोचना हुई थी। आज जब भी ’84 की बात आती है तो राजीव गांधी का वह बयान भी गूंज जाता है। इसलिए राहुल गांधी को इस संवेदनशील मसले पर खासी सावधानी बरतनी चाहिए थी। जो मामला अदालत में विचाराधीन है उस पर अपनी तरफ से फैसला नहीं सुना देना चाहिए।

इसके साथ ही राहुल गांधी विदेश की धरती पर आतंकवाद को बेरोजगारी से जोड़ने की अतिश्योक्ति कर डालते हैं। उन्होंने कहा कि बेरोजगारी के कारण लोग आतंकवादी बन रहे हैं। ऐसा कहते वक्त शायद वे अल जवाहिरी, बुरहान वानी और वैसे कई आतंकवादियों के सरगनाओं के नाम भूल गए थे जो इंजीनियर से लेकर प्रबंधन तक की बेहतरीन नौकरी में थे। इन लोगों ने अपने चमकते हुए पेशेवर करियर को छोड़ कर आतंकवाद की राह चुनी थी। इनके दिमाग में जहर फैला था धार्मिक कट्टरता का। इसी धार्मिक कट्टरता की वजह से कोई बढ़िया नौकरी कर रहा इंसान आतंकवादी बनकर किसी पत्रकार, वकील, डॉक्टर, लेखक, बुद्धिजीवी या ब्लॉगर का सिर काटते हुए वीडियो बना और फैला सकता है। राहुल एक जिम्मेदार विपक्ष की तरह जनता से जुड़ने की कोशिश में हैं। लेकिन कुछ कमी रह जाती है कि ’84 का दंगा हो या बेरोजगारी, राहुल जनता की पीड़ा के साथ संवाद नहीं कर पाते हैं। राहुल से जब विदेश में ’84 के दंगों पर सवाल पूछा गया तो उन्हें याद दिलाना था कि भारतीय संसद में कांग्रेस के प्रधानमंत्री ने ही दंगों के लिए माफी मांगने का संवेदनशील कदम उठाया था। सभी आरोपी नेता न्यायिक प्रक्रिया से गुजर रहे हैं जिसके पूरे हुए बिना अभी कोई फैसलानुमा बात नहीं कही जा सकती। मजबूत विपक्ष के बिना लोकतंत्र मजबूत नहीं हो सकता। यह भारतीय लोकतंत्र की मजबूती है कि राहुल गांधी आज तंत्र से बाहर होकर लोक के लिए सवाल कर रहे हैं। अब उन्हें और सतर्क रहने की जरूरत है ताकि वे उन मुद्दों पर भी पीछे की ओर कदम उठाने की ओर मजबूर न हो जाएं जहां वे दो कदम आगे बढ़ चुके हैं। खासकर उन्हें अपने सलाहकार मंडल की लोकतांत्रिकता पर ज्यादा ध्यान देना होगा तभी वे लोक के नायक बन सकते हैं।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App