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बेबाक बोल: हे राम!

भारतीय संस्कृति में राम का कोई एक रूप नहीं। गंगा किनारे बसे नगर से लेकर जंगलों में कबीलाई सभ्यता की तरह जी रहे लोगों के अपने-अपने राम। हम उस संस्कृति के वाहक हैं जहां सड़क पर राम के वेश में चलने वाले को बहरूपिया कह उसे प्रणाम करते हैं। राम के इतने रूप हैं कि उन्हें किसी खास आकृति और वेश-भूषा में डालकर एकरूप किया ही नहीं जा सकता। वैदिक राम तो वेद के खिलाफ खड़ी शक्तियों के साथ राम और औपनिवेशिक सत्ता के खिलाफ जंग में महात्मा गांधी की धुन में भी रघुपति राघव राजा राम। बुद्ध के भी राम तो मंदिर-मस्जिद और पंडित, मुल्ला को ललकारने वाले कबीर के राम। आस्तिकों के भी राम और नास्तिकों के भी राम। भारतीय लोक में राम प्रतिबद्धता के प्रतिरूप हैं। राम एक आदर्श हैं, विचारधारा हैं, नीति हैं। जनता का, जनता के द्वारा और जनता के लिए वाले आधुनिक नागरिक शास्त्र में भी रामनीति दिखती है। बहुरूप मंगलकारी राम के नाम के साथ बेबाक बोल में दीपावली की शुभकामना।

भारतीय संस्कृति में राम एकता की वह मूर्ति है जिसकी प्राण-प्रतिष्ठा सदियों पहले लोक के हृदय में हो चुकी है।

मशहूर जिनके दम से है दुनिया में नाम-ए-हिंद, है राम के वजूद पे हिंदोस्तां को नाज, अहले नजर समझते हैं उसको इमाम-ए-हिंद।
अल्लामा इकबाल जब फारसी में दो अक्षर के राम का इस्तेमाल करते हैं तो यह वाल्मीकि और गोस्वामी तुलसीदास के राम जितना ही व्यापक हो जाता है। फारसी भाषा में ‘राम’ आधिपत्य का भाव लेकर आता है। इस आधिपत्य वाले राम का मिलन राजघाट पर महात्मा की समाधि के ‘हे राम’ से होता है। आधिपत्य, लोक और करुणा का मेल हैं राम।
घरों में दिवाली की तैयारी पूरी है, बस श्रीराम की अयोध्या वापसी का शुभ दीपक जलाना है। अदालत पूछती है कि पटाखे क्यों, जब श्रीराम अयोध्या लौटे थे तो दीपमालिका ही तो जली थी। इसके जवाब में कोई कहता है कि राम के समय सुप्रीम कोर्ट था क्या, तो कोई कहता है कि बारूद तो मुगल लाए थे तो दिवाली में पटाखे क्यों। इस बहस का सार यही है कि राम तो अल्लामा इकबाल के भी हो गए, घी के दीयों के साथ पटाखों के भी हो गए। लोक से लोकतंत्र तक में राम जुड़ने का ही तो नाम हुए। राम एक ऐसा नाम, जो भारत के लोक में बसा, गंगा-जमुनी तहजीब में सजा। तुलसीदास से लेकर अल्लामा इकबाल तक कोई राम रचि राखा तो कोई इमाम-ए-हिंद बताता है। प्राचीन भारत के लोक और साहित्य में रामकथा की समृद्ध परंपरा रही है। संस्कृत और प्राकृत दोनों ही में थोड़े-बहुत परिवर्तन के साथ रामकथा मिलती है। तुलसीदास ने इस संपूर्ण रामकथा साहित्य का गहन अध्ययन किया था। नाना पुराण और आगम-निगम की बात हम सब लोग जानते हैं, लेकिन तुलसीदास ने अपनी रामकथा का आधार वाल्मीकि की रामायण को बनाया।

वाल्मीकि की रामायण के पहले भी रामकथा की एक सुदीर्घ मौखिक परंपरा थी। कुशीलव नामक जाति के लोग इस रामकथा का लोक में और राजा के दरबार में वाचन किया करते थे। इसी मौखिक परंपरा को आधार बनाकर वाल्मीकि ने रामायण की रचना की। राम पौराणिक पात्र न होकर लोक का अंग हैं। जहां लोक है वहां राम हैं। वाल्मीकि, बिमलसूरि, कबीर व तुलसीदास-सबके अपने-अपने और बहुत कुछ मिलते-जुलते राम हैं। तुलसी के राम बहुत हद तक वाल्मीकि के राम हैं। इन सबके साथ राम तो आवाम के हैं। रामायण का बालकांड रामजन्म, विवाह, यज्ञोपवीत आदि संस्कारों से संबंधित है। इन सबकी धुरी महिलाएं हैं। ये महिलाएं अपने भावों को लेकर मुखर हैं। सौरी गृह में नन्ही किलकारियों से लेकर मुक्तिधाम की अंतिम यात्रा तक राम के लोकगीत। लोकगीतों में राम को सिर्फ पूजा नहीं जाता, उनकी खिंचाई भी होती, उनसे झगड़ा होता, मानमनौव्वल भी होता। राम सखा भी हैं, प्रियतम भी, पिता भी हैं पुत्र भी, राजा भी हैं प्रजा भी। लोक के रिश्तों का समुच्चय हैं राम। संस्कृति के तौर पर वैदिक युग से लेकर स्वतंत्रता संग्राम तक राम का अखिल भारतीय स्वरूप रहा है। वैदिक धर्म और ब्रह्मा, विष्णु, महेश में भी राम गाथा है तो वैदिक धर्म के प्रतिरोध में खड़े हुए बौद्ध व जैन धर्म से लेकर भक्ति आंदोलन तक सब रामनामी रहा। सबसे अहम है कि वैदिक धर्म के विरोध में जो लोक का धर्म खड़ा होता है वहां भी राम हैं। सदियों की परंपरा में अपने-अपने राम दिख रहे हैं। राम का यह बहुरूप ही तो मंगलकारी है जो नायक के बरक्स नायक के रूप में खड़ा होता है।

भारतीय संस्कृति में राम एकता की वह मूर्ति है जिसकी प्राण-प्रतिष्ठा सदियों पहले लोक के हृदय में हो चुकी है। राम का कोई एक रूप नहीं, कोई एक रंग नहीं, कोई एक भाव नहीं। भव्य सोने के कंगूरे वाले मंदिर में भी राम तो सुदूर जंगल में कबीलाई सभ्यता के लोगों के पास भी राम। लेकिन आज राम के इस बहुरूप पर हमला है। अब राम के रूप में एकरूपता लाई जा रही कि उस कोख से, वहीं की जमीन पर पैदा हुआ वह धनुर्धारी ही राम है। इस एकरूपता के खिलाफ विमर्श में राम का विपक्ष भी खड़ा कर दिया गया है। वैदिक धर्म में नायक भी राम हैं तो उनके खिलाफ खड़ी शक्ति भी राम रूप की ही है। भारतीय लोक में राम पक्ष के पक्षकार हैं। लेकिन एकरूपता की राजनीति में पहली बार लोक के इस पक्ष का विपक्ष खड़ा हो गया है। राम की एकरूपता का यह गढ़ंत ही उनका प्रतिपक्ष गढ़ रहा है। घट-घट के, रोम-रोम में राम वाले भाव में किसी खास ढांचे और तारीखों का क्या काम।
राम को किसी हाड़-मांस के व्यक्ति में नहीं बांटा जा सकता है। राम एक नीति है, एक विचार है। जिस तरह कहा गया कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है तो राम में भगवान नहीं, एक सामाजिक प्राणी दिखता है। यह सामाजिक शब्द ही उस विचारधारा का विस्तार है जिसे रामराज्य कहा गया। मर्यादा के प्रतीक के रूप में राम का नाम प्रतिबद्धता का रूपक है। राम वह इकाई है जो व्यक्ति, परिवार और समाज के बाद राज्य के रूप में एकाकार होता है। राम को एक खास जगह और काल में नहीं बांधा जा सकता है। राम को एक खास क्षेत्र के पौराणिक किरदार में भी नहीं बांधा जा सकता क्योंकि राम कल्पनाशीलता हैं जो व्यक्ति को दूरदृष्टा बनाती है और औपनिवेशिक भारत के गांधी में रामराज्य का आदर्श भरती है। औपनिवेशिक सत्ता के खिलाफ हिमालय से समुद्र और पहाड़ से लेकर मैदान तक के भारत को किस आदर्श के तहत एकजुट किया जा सकता था? अमीर-गरीब, औरत-मर्द को किस साझा सपने के साथ सारे भेद भुलाकर खड़ा किया जा सकता था। गांधी के लिए तो राम अहिंसा का हथियार थे।

राम एक विचार हैं जिसका विस्तार जनता का, जनता के द्वारा और जनता के लिए वाले आधुनिक नागरिक शास्त्र में दिखता है। राम किसी खास जमीन पर बने मंदिर के गर्भगृह या घर के पूजा वाले हिस्से के लाल कपड़े में नहीं, बल्कि नागरिक और समाजशास्त्र की किताबों में हैं। राम नवरात्र के समय स्कूलों में होने वाली फैंसी पोशाक प्रतियोगिता में नहीं, स्कूल की किताबों और ब्लैक बोर्ड में हैं। राम लोक अदालतों में हैं तो लोकपाल से लेकर सूचना के अधिकार में भी हैं। आज एक बड़ा सवाल है कि राज्य जनता के लिए है या जनता राज्य के लिए तो राम का द्वंद्व सामने आता है। लोकतंत्र में हमारे नेता कहते हैं कि अदालत वैसे ही फैसले जारी करे जो लागू करवाए जा सकें। वहीं राम की मर्यादा है कि हमारे नेता अलोकप्रिय फैसले लेने से डरें। सीता निष्कासन के बाद राम का राजपाट से विमुख हो जाना उस लोक को भी पाठ पढ़ाता है कि जो दूसरे का मन नहीं समझते राम उनके पास भी नहीं जाना चाहते। राष्टÑवाद, राज्य, नागरिक और सर्विलांस स्टेट के बीच जब मर्यादा की बात आएगी तो हमारे सामने राम ही आएंगे। यहां राम चुनावी मैदान में मंदिर के वादे के रूप में नहीं, बल्कि एक लोकल्याणकारी नीति के रूप में आएंगे। राम अचल हैं जिसके समांतर कुछ भी खड़ा नहीं किया जा सकता है। राम का पक्ष-विपक्ष और विकल्प-संकल्प भी राम ही हैं। इसलिए कवि तुलसीदास मनुष्यों से कहते हैं कि भीतर और बाहर दोनों ओर उजाला चाहिए हो तो मुखरूपी द्वार की जीभ की दहलीज पर राम नाम की मणि का दीप रखो।
राम नाम मनिदीप धरु जीह देहरीं द्वार
तुलसी भीतर बाहेरहुं जौं चाहसि उजिआर

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