Jansatta column Beabak Bol Delhi's Pain about Three children die from hunger in Delhi - बेबाक बोल: दिल्ली का दर्द - Jansatta
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बेबाक बोल: दिल्ली का दर्द

भूख एक ऐसा शब्द है जो सामाजिक स्तर की पहचान कराता है। आज इक्कीसवीं सदी में देश की राजधानी दिल्ली जहां दो-दो सरकारें अपना शक्ति प्रदर्शन करती हैं, एक प्रचंड बहुमत वाली सरकार और दो संघर्षशील विपक्ष है वहां तीन बच्चियों की मौत भूख से हो जाती है। वहीं भूख से लड़ते हुए और अपने हिस्से का देश से कुछ नहीं मिलने के बावजूद हिमा दास दौड़ में सोना जीतकर इतिहास बनाती है। भूख को मात देकर सोने तक पहुंची उसकी जीत के साथ पूरा देश आ जाता है। उधर जब दिल्ली के मंडावली इलाके में तीन बच्चियों के पेट में कई दिनों तक खाना नहीं पहुंचता है और पोस्टमार्टम रिपोर्ट कहती है कि बच्चियों के शरीर में वसा की शून्य मात्रा है तो यह रिपोर्ट कार्ड असल में किसकी है? जब देश के नौनिहाल मानव कंकाल बनकर अस्पताल पहुंचें तो इनकी मौत का जिम्मेदार कौन है? भूख से हुई ऐसी हर मौत पर शासन-प्रशासन के अगुआ पर गैरइरादतन हत्या का मामला क्यों न दर्ज किया जाए, यही सवाल पूछता बेबाक बोल।

दिल्ली का वह घर जहां तीन बच्चियां भूख के कारण मर गर्इं।

खबर पढ़ रहा था कि मंगल ग्रह पर पानी जैसा कुछ द्रव मिला है। अन्य देशों की तरह हम भी मंगल ग्रह पर संभावनाएं खोज रहे हैं, क्योंकि अब विकास की छलांग मंगल तक है। लेकिन इसी समय पूरी दुनिया भारत के विषय में यही पढ़ रही है कि इक्कीसवीं सदी में पृथ्वी ग्रह पर भारत जैसा एक देश है जिसकी राजधानी में तीन बच्चियों का पोस्टमार्टम हो रहा है। पहला पोस्टमार्टम बताता है कि बच्चियों के पेट खाली थे और उनकी भूख से मौत हुई है। बच्चियों के शरीर में वसा की मात्रा शून्य थी। व्यवस्था को यकीन नहीं हुआ और दूसरे पोस्टमार्टम में भी यही बात सामने आई कि तीनों बच्चियों के पेट में कुछ दिनों से अन्न का एक दाना भी नहीं गया था। अब हम मंगल पर पानी खोज कर क्या करेंगे जब दिल्ली में तीन बच्चियों के पेट में खाना तक नहीं पहुंचा। अस्पताल में उनका शरीर मानव कंकाल की तरह ही पहुंचा था। अभी हम 11 अगस्त के बारे में सोच रहे थे, जब पिछले साल इसी दिन उत्तर प्रदेश के गोरखपुर के अस्पताल में आॅक्सीजन की आपूर्ति रुकने से 30 से ज्यादा बच्चों की मौत हो गई थी। तब सरकार की तरफ से आवाज आई थी कि अगस्त में बच्चे मरते ही हैं। लेकिन मौतें विकास की छलांग लगा रही हैं। कोई भी महीना भूख की मौत से मुक्त नहीं इसकी तस्दीक तो मध्यप्रदेश ही कर देता है। मध्यप्रदेश विधानसभा में सवाल-जवाब के दौरान बताया जाता है कि यहां हर दिन 61 बच्चे भूख से मर रहे हैं। आंकड़ों के मुताबिक मध्यप्रदेश में सालाना एक साल की उम्र के 6024 बच्चे भूख से मरते हैं। वहीं झारखंड के एक अस्पताल में 30 दिनों के अंदर 52 बच्चों की मौत पर मानवाधिकार आयोग ने रिपोर्ट तलब की है। अस्पताल प्रशासन का दावा है कि इन बच्चों की मौत कुपोषण से हुई है। इन नौनिहालों की मौतों का कारण यह है कि जब ये अपनी मां के गर्भ में थे तो इनकी मांओं को पौष्टिक तो छोड़िए पेट भर खाना भी नसीब नहीं हुआ था। दो-दो सरकारों वाली देश की राजधानी दिल्ली तीन बच्चियों को खाना तो नहीं दे सकी लेकिन मौत के इलाके पर झगड़ा आम पुलिस थानों जैसा है। भाजपा के दिल्ली अध्यक्ष याद दिलाते हैं कि यह इलाका दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया का है। वहीं उपमुख्यमंत्री ट्वीट करते हैं कि घटना की न्यायिक जांच के आदेश दे दिए गए हैं। बताया जाता है कि परिवार को 25 हजार महीने का मुआवजा दिया जाएगा।

बच्चियों की मौत का इलाका दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया के अंतर्गत आता है। बहुत प्रचार हुआ है इस इलाके का, शिक्षा व्यवस्था का और खुशी की पाठशाला का भी। अभी-अभी इनकी खुशी की पाठशाला की तारीफ दलाई लामा कर गए थे। लेकिन सरकार अपने कामों पर विज्ञापन देने के बजाए बच्चों के पेट में अन्न पहुंचाती तो इंसानियत यूं शर्मसार नहीं होती। आम आदमी पार्टी सरकार की साफ नाकामी तो है। लेकिन हम उन विपक्षी दलों के नेताओं को किस नजर से देखें जो ट्वीट कर बता रहे कि कल वो इतने बजे उस पीड़ित परिवार के घर जाएंगे। यह ट्वीट उन मीडिया वालों के लिए है जो भूख से मौत पर शोक जताते हुए इनकी तस्वीरें खींचेंगे। दो-दो सरकार और दो-दो मजबूत विपक्ष जनता की मौत का तमाशा बनाते हैं। हमारे देश के लोकतंत्र की विडंबना है कि भूखी जनता किसी खास नेता के लिए नारा लगाती है कि आधी रोटी खाएंगे, फलां को जिताएंगे। लेकिन आजादी के बाद से ही सत्तर साल पहले और सत्तर साल बाद का यही हाल है कि जिसे जनता आधी रोटी खाकर जिताती है वह सत्ता में आने के बाद जनता को हराने में कोई कसर नहीं छोड़ती। जनकल्याण योजनाओं पर भ्रष्टाचार ऐसा भारी है कि सरकारी सहायता प्राप्त राशन अमीरों के घर पहुंच जाता है। गरीबों की संख्या बढ़ती जा रही है और राशन कार्ड की संख्या कम होती जा रही है। यह सभी पार्टियों के लिए सुखद आंकड़ा हो सकता है कि भूख से होनेवाली मौत किसी पार्टी विशेष से नहीं जुड़ी हुई है। ये बस कम और ज्यादा के आंकड़ों पर ही अपनी कमीज को उसकी कमीज से कम गंदी बता सकते हैं।

झारखंड के सिमडेगा में जब 11 साल की संतोषी की मौत भूख से हुई और उसकी मां ने बताया कि वह भात-भात करते मर गई तो प्रशासन की तरफ से दावा आया कि वह भूख से नहीं बीमारी से मरी थी। यानी, हमारे देश में बच्चों का बीमारी से मर जाना प्रशासन के लिए क्षम्य है, यह सरकार की नाकामी का सबब नहीं। हमने बड़े आराम से कह दिया कि वह भूख नहीं बीमारी से मरी है। लेकिन मुश्किल यही है कि इस देश में भूख अभी भी बहुत बड़ी बीमारी बनी हुई है। लेकिन इस भूख की बीमारी का विषाणु कहां फैला है? सरकार में या उस समाज में जो यह सरकार बनाने का दावा करती है। यहां याद दिला दें कि जिस मकान में तीन बच्चियों की मौत हुई, वहां तीस परिवार रहते हैं। ये तीस परिवार आर्थिक रूप से कमजोर हैं, प्रवासी किराएदार हैं और ज्यादातर के पास राशन कार्ड नहीं है। यह प्रवासियों की सबसे बड़ी समस्या है कि वे महानगरों में बस किराएदार बनकर ही रह जाते हैं और सरकार कभी मकान मालिकों से नहीं पूछती कि किराएदारों को उनके हिस्से की नागरिक सुविधाएं मिली कि नहीं। कोई कमजोर तबके का परिवार 15 सालों से रह रहा है और उसका राशन कार्ड भी नहीं बना है तो इसका गुनाहगार कौन है?

कुछ समय पहले केरल में एक आदिवासी युवक मधु की खाना चुराने के आरोप में पीट-पीट कर हत्या कर दी गई थी। मधु उस आदिवासी समुदाय का था जिसका पूरे जंगल और वहां के प्राकृतिक साधनों पर मालिकाना हक माना जाना चाहिए। लेकिन अगर भूख में उसने किसी का खाना खा लिया तो उसकी हत्या कर दी गई। वो कौन लोग हैं जो भूखे लोगों की हत्या कर डालते हैं। हमारा समाज इतना सिकुड़ कैसे गया है कि कोई परिवार भूख से मर रहा है और पड़ोसी झांक भी नहीं रहे हैं। भूख से मौत एक दिन में नहीं आती है। यह धीरे-धीरे मरते हुए समाज का संकेत है। भूख की यह बीमारी दिल्ली के मंडावली से लेकर लाल क्रांति वाले चीन और अमेरिका तक पहुंच चुकी है। हर जगह प्रवासियों के केंद्र खुल रहे हैं। प्रवासी और कमजोर तबका सामाजिक और राजनीतिक संबंधों से बाहर है। इस तबके की राजनीतिक पकड़ इतनी कमजोर है कि थोड़े हल्ले और मुआवजे के बाद हर जगह शांति छा जाती है।
आपका यह मानना कि व्यवस्था के रूप में आप नाकाम रहे और मुआवजा तो सरकार की साख का आपदा प्रबंधन भर है। सवाल है कि भूख से हुई इन मौतों का जिम्मेदार कौन होगा? वह सरकार जो उस बाप को रोजगार नहीं दिला सकी जिसका ई-रिक्शा चोरी हो गया, जो उसे राशन नहीं दिलवा सकी या वह केंद्र सरकार जिनकी मंत्रियों की फौज अंतिम आदमी तक बिजली, पानी, दवा पहुंचाने का दावा कर योजनाएं गिनवाती है। झारखंड से लेकर दिल्ली सरकार तक से यह सवाल क्यों न पूछा जाए कि नागरिकों की भूख से मौत के बाद आप पर गैरइरादतन हत्या का मामला क्यों न दर्ज किया जाए?

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