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बेबाक बोल: रुद्रावतार!

कर्नाटक विधानसभा चुनाव के समय ‘कर नाटक’ का जो व्यंग्य चल रहा था उसका पटाक्षेप जद (सेकु)-कांग्रेस सरकार का पहला बजट पेश करने के बाद भी नहीं हुआ। 104 सीटें लाने वाली और बहुमत से दूर भाजपा की सरकार के शपथ ग्रहण के बाद इस गठबंधन ने अदालत तक लड़ाई लड़ी और येदियुरप्पा को गीली आंखों से सदन से विदाई लेनी पड़ी। लेकिन कर्नाटक की जनता ने यह नहीं सोचा था कि कुर्सी हासिल न होने पर रोने वाले नेता के बाद कुर्सी हासिल करने वाले नेता भी काम करने के बदले सताए हुए का पत्ता ही खेलेंगे। काम नहीं करने देते हैं का भारतीय राजनीति का नया विलाप करते हुए अपनी तुलना भगवान शिव से कर बैठते हैं। अब इनसे तो जनता ही पूछेगी कि हमने आपको काम करने के लिए वोट दिया था या आंसू बहाने के लिए। 224 सीटों वाली विधानसभा में 37 सीटों वाली पार्टी के नेता अगर मुख्यमंत्री बनने का दुस्साहस करते हैं तो उन्हें जनता से किए अपने वादों को निभाने का साहस भी तो दिखाना चाहिए। आंसू बहाने वाले आधुनिक ‘रुद्रावतार’ पर इस बार का बेबाक बोल।

कर्नाटक के मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी।

‘आप सब मुझे बधाई देने के लिए गुलदस्ते के साथ खड़े हैं। आप सभी को लग रहा होगा कि आपका भाई मुख्यमंत्री बन गया है और इससे आप सभी खुश हैं। लेकिन मैं इससे खुश नहीं हूं। मैं गठबंधन की सरकार के दर्द को जानता हूं। मुझे भगवान शंकर की तरह गठबंधन सरकार का जहर पीना पड़ रहा है’।  ये बातें उन एचडी कुमारस्वामी ने कहीं जो 224 सीटों वाली विधानसभा में 37 सीटों के साथ मुख्यमंत्री बनने के लिए लोकतंत्र की दुहाई दे रहे थे। जो कल ‘किंग’ बनकर दहाड़ रहे थे आज आंसू बहा रहे हैं। मुख्यमंत्री, आंसू और रुमाल, बहुत ही भावुक मामला है। भारतीय राजनीति के रंगमंच पर इन दिनों ऐसे दृश्यों का दोहराव होता रहता है। ‘काम नहीं करने दे रहे जी’ दिल्ली से निकला हुआ ऐसा संवाद जो राजनीति के हर नाटककार की पटकथा में शामिल हो जाता है। ‘मेरे पास मां है’ का महानायक का सबसे लोकप्रिय संवाद भी इसके सामने फेल हो जाए कि काम नहीं करने दिया जा रहा है।
जब 104 सीटों वाली भाजपा के नेता येदियुरप्पा ने सरकार बनाने का दावा पेश कर मुख्यमंत्री पद की शपथ भी ले ली तो विपक्ष ने आरोप लगाया कि भारत का लोकतंत्र खतरे में आ गया। जिस कांग्रेस को जनता ने नकार दिया था और जिस जद (सेकु) को भी सत्ता से दूर रहने का संदेश मिला, दोनों के गठबंधन ने लोकतंत्र बचाओ आंदोलन शुरू कर दिया। सत्ता पाने के लिए अदालती लड़ाई लड़ी गई और जीती भी गई। जद (सेकु) और कांग्रेस की जीत के बाद येदियुरप्पा के आंसू निकले थे। कुमारस्वामी के पहले सदन, आंसू और रुमाल वाली भूमिका वे बखूबी निभा चुके थे। गीली आंखों से अपना अधूरा भाषण छोड़ कर 104 सीटों वाली भाजपा के येदियुरप्पा विदा हो लिए। उसके बाद ‘किंग मेकर’ ने सदन का राजा बनकर शपथ ली। जनता ने सोचा, चलो सरकार बन गई अब काम कर लो। लेकिन ये क्या। अब उनके आंसू निकल रहे हैं जो कल तक कह रहे थे कि राजा बनाने का रिमोट कंट्रोल उनके पास है। वे कह रहे कि हमें काम नहीं करने दिया जा रहा। अब जनता सोच रही कि किसके आंसू पर भरोसा करें। रोए तो येदियुरप्पा और रो ये भी रहे। अब रोजी-रोटी के बेहतर साधन की उम्मीद लगाए बैठी जनता किसके पास रोने जाए?

सत्ताधारियों के इन आंसुओं का जनता क्या करे। चुनावी भाषणों में आप महामानव बन जाते हैं, सब कुछ बदल डालूंगा की तर्ज पर। 224/37 का अंक लाने के बाद भी सरकार बनाने का दुस्साहस करते हैं। आपकी सरकार बनने का मतलब लोकतंत्र का बचना था। लेकिन सत्ता का तंत्र हाथ में आने के बाद आपने लोक के साथ क्या किया? वही काम नहीं करने देने का विलाप। जनता आपके इस बहाने का क्या करे। उत्तर सत्य के इस युग में एक धरना-प्रदर्शन करने के बाद हर कोई दूसरा गांधी तो दूसरे नेल्सन मंडेला का खिताब पाने लगता है। दिल्ली में हजारों लोगों की भीड़ जुटती है तो मीडिया उसे दूसरी आजादी का नाम दे देता है। हम भी दूसरी आजादी-दूसरी आजादी के नारे लगाने लगते हैं। यह इतिहास को, उसके मानकों को सिकोड़ने का समय है। औपनिवेशिक सत्ता से 200 सालों की जंग की तुलना हम कुछ सफल धरना-प्रदर्शनों के अगुआ से कर बैठते हैं। दो सौ सालों के संघर्षों की जीत के ताज को उनके सिर पर पहना देते हैं जो कल तो जंतर-मंतर पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाते हैं, ट्रकों में सबूत होने का दावा करते हैं और उसके बाद अखिल भारतीय माफी मांगो आंदोलन चलाते हैं। सारे भ्रष्टाचार के सबूत मंगल ग्रह पर चले गए और धरती पर भारत के नक्शे पर खड़ा यह नायक इसे ऐसा ग्रह बताता है जहां काम नहीं करने दिया जा रहा।
37 सीटों वाले मुख्यमंत्री आंसू बहाते हुए अपनी तुलना सीधे शिव से कर बैठते हैं। वह सत्यम, शिवम, सुंदरम वाले शिव। अगर आप शिव और शिवत्व में छुपे आध्यात्मिक दर्शन को समझते तो कम से कम शिव का नाम न लेते। शिव ने धरती के कल्याण के लिए विषपान किया था। शिव लोक से जुड़े लोकल्याण के प्रतीक हैं। आप एक ऐसे अवसरवादी नेता थे जो 37 सीटों के साथ राज करना चाहते थे। आपको पता था कि इस गठबंधन का हश्र क्या हो सकता है। लेकिन आपका मकसद येन-केन-प्रकारेण सत्ता हासिल करना था। अब सत्ता की गाड़ी आराम से नहीं चल रही तो लगे शिव-शिव कर रुद्रावतार बनने। बात बिगड़ने के बाद ये आधुनिक ‘रुद्रावतार’ पलट भी जाते हैं। कहा कि आंसू बेबसी नहीं भावुकता के थे और कांग्रेस पर किसी तरह का आरोप लगाने से भी इनकार करते हैं। हलाहल पान का दावा करने वाले मुख्यमंत्री अब आपदा प्रबंधन में कहते हैं, ‘मैंने मीडिया के लोगों से कहा कि कठिनाई के बावजूद मैंने ऋण माफी को लेकर मजबूत कदम उठाया है। लेकिन कहीं भी मुझे अपने अच्छे काम के लिए प्रोत्साहन नहीं मिल रहा है। ईश्वर ने मुझे यह दिन दिया है, वह तय करेगा कि मैं कितने दिन इस पर रहूंगा’। इसके पहले वे कह चुके हैं, ‘मैं कांग्रेस की दया से मुख्यमंत्री बना हूं। मुझे मुख्यमंत्री के तौर पर काम करना है, लेकिन उनकी इजाजत के बिना मैं कुछ नहीं कर सकता हूं’।

अब जब आपको किसानों की कर्जमाफी पर अमल करना है, कावेरी संकट सुलझाना है और कांग्रेस से साथ भी निभाना है तो आप कह रहे कि आपको मुख्यमंत्री ईश्वर ने बनाया है। वैसे यह बात सच भी हो सकती है क्योंकि जनता ने आपको 37 सीटें ही दी थीं और आपके बड़े भाई कांग्रेस को सत्ता के द्वार से नमस्कार ही कर दिया था। लेकिन आपने जनता के नकार को नहीं माना और गठबंधन किया। आप जनता की पसंद के नहीं राजनीतिक समीकरण के मुख्यमंत्री हैं। पिछले चार सालों से ज्यादा समय में भारतीय जनता ने कई राज्यों के चुनावों में हिस्सेदारी की और तख्तापलट भी किया। उत्तर का चुनाव हो या दक्षिण का, दावों और वादों में कोई कमी नहीं रहती। अजीबोगरीब संख्या के साथ सरकार भी बन जाती है। लेकिन ऐसी सरकार के साथ शुरू होता है वही अखिल भारतीय विलाप, काम नहीं करने देने का। भारतीय लोकतंत्र में पांच सालों के अंतर पर विधानसभा और लोकसभा चुनाव होते हैं। जनता जब भी वोट देती है वह अच्छे दिनों की उम्मीद ही करती है। चुनावी मैदान में दावों और वादों का ढेर लगाए नेताओं में से एक को अपना शासक चुनती है। हम जनता पर मजहब और जाति के खांचों में बंटे होने का आरोप लगा सकते हैं लेकिन इन खांचों के अंदर से भी जनता उसे चुनती है जिसे वो अपने लिए बेहतर समझती है। आम भारतीय की एक आम सी उम्मीद कि आप उसे सड़क, बिजली, अस्पताल और रोजगार देने की दिशा में काम करें। लेकिन आप काम शुरू करते ही रोने लगते हैं।

यह हमारे बड़बोले नेताओं का उत्तर सत्य है। वे अपना प्रदर्शन भी एक सिनेमाई नायक की तरह ही करते हैं जिसका मूल्याकंन हर शुक्रवार को टिकट खिड़की पर होता है। इस बार एक्शन है तो दूसरी बार आंसू। चुनावों के पहले आप सब कुछ करने में सक्षम होते हैं। जनता से नकार मिलने के बाद संवैधानिक स्वीकार भी लेकर आते हैं कि आप ही शासन करने लायक हैं। और उसके बाद शुरू होता है काम नहीं करने देने का रुदन वह भी ‘रुद्रावतार’ बनकर। गठबंधन की गांठ जोड़ते वक्त क्या आपको अहसास नहीं था कि यह जहर पीने जैसा होगा। लेकिन सत्ता की मलाई खा लेने के बाद काम करना आपके लिए जहर पीने जैसा हो जाए तो यह जनादेश का अपमान करना है। सत्ता पाकर सताए हुए का पीड़ित पत्ता खेलना आप जितना जल्दी बंद कर दें उतना ही अच्छा। वरना 224/ 37 का रिपोर्ट कार्ड देकर जनता ने बता ही दिया है कि वह सब जानती है।

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