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बेबाक बोल: भरोसे का भ्रम

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने मुजफ्फरपुर बालिका गृह यौन उत्पीड़न मामले को लेकर नाराजगी जाहिर करते हुए ऐसी घटनाएं दोबारा होने से रोकने के लिए संस्थागत प्रणाली विकसित करने की जरूरत पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि बालिका गृह में बच्चियों के कथित यौन उत्पीड़न ने हमें शर्मिंदगी और अपराध बोध का अहसास कराया है। उन्होंने राज्य के मुख्य सचिव से ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए संबंधित विभागों के परामर्श के साथ संस्थागत प्रणालियां विकसित करने को कहा है। नीतीश कुमार ने इस अहम मामले में अपनी चुप्पी तोड़ी है। यह सही है कि हमने पारंपरिक ग्रामीण समाज से निकल कर शहरीकरण तो कर लिया लेकिन हम अपनी संस्थाओं का आधुनिकीकरण नहीं कर पाए। पारंपरिक परिवार को छोटा कर आधुनिक संस्थाओं का विस्तार नहीं कर पाए। यह घटना हमारे समाज की टूट-फूट दिखा रही है। जिन संस्थाओं पर भरोसा कर हम आगे बढ़े वही पुलिस, प्रशासन ढहा हुआ दिख रहा है। इन लड़कियों की मेडिकल रिपोर्ट सवाल कर रही है कि हमने उन्हें कैसा समाज दिया। इन बच्चियों के भरोसे के मलबे के ढेर से बेबाक बोल में कुछ सवाल।

एक व्यक्ति पेड़ के नीचे कराह रहा था। बाबा भारती अपने जान से अजीज घोड़े के साथ गुजरते हैं और उसके कराहने की वजह पूछते हैं। व्यक्ति अनुरोध करता है कि वे उसे घोड़े पर बिठा कर तीन मील दूर वैद्य तक पहुंचा दें। बाबा भारती नीचे उतर बीमार को घोड़े पर बिठा खुद उसकी लगाम पकड़ चलने लगते हैं। थोड़ी ही देर में वह बीमार बाबा भारती को झटक घोड़ा भगाने लगता है। पता चलता है कि वह डाकू खड़ग सिंह है जो उनके घोड़े को छीनना चाहता था। बाबा भारती बीमार के वेश में आए डाकू से कहते हैं कि यह घोड़ा तुम ले जाओ, लेकिन लोगों को इस घटना का पता नहीं चलने देना कि तुमने इसे कैसे ठगा। बाबा ने कहा, ‘लोगों को यदि इस घटना का पता चला तो वे दीन-दुखियों पर विश्वास नहीं करेंगे’। सुदर्शन की लिखी इस कहानी का जिक्र इस स्तंभ में पहले भी किया जा चुका है। लेकिन जब मंडावली में भूख से तड़प कर मर गई बच्चियों पर लिखा तो एक आश्रय गृह की बच्चियों की मेडिकल रिपोर्ट सवाल कर रही थी कि देखो इस समाज ने हमें क्या दिया है। इन बच्चियों के न्यायिक अधिकारी के सामने दिए बयान पढ़ कर लगता है कि किस पर और कैसे भरोसा करें। यहां हर कोई डाकू खड़ग सिंह बना बैठा है, पर सेवा और भरोसे की भावना बचाने वाला कोई बाबा भारती नहीं बचा है।सुदर्शन की कहानी में बाबा भारती को चिंता है समाज और संस्थान के भरोसे की। इंसान व्यक्तिगत से लेकर पारिवारिक और सामाजिक तो उन्हीं संस्थानों के भरोसे के बल पर हुआ जिसका उसने निर्माण किया। पुलिस, अदालतें, प्रशासन ये सारी संस्थाएं भरोसे का भाव पैदा करने के लिए ही तो बनाई गर्इं, एक नागरिक को सुरक्षा की गारंटी देते हुए।

आश्रय गृह की बच्चियों की मेडिकल रिपोर्ट बता रही है कि पुलिस, कानून, प्रशासन ढह रही संस्थाएं हैं। यह कानून और प्रशासन का मसला था। बच्चियों के उत्पीड़न का आरोप उस जगह पर है जो राज्य के दिए पैसे से चलता है। तो क्या यह राज्य संरक्षित उत्पीड़न नहीं है? राज्य सरकार से जुड़े नुमाइंदे आकर कहते हैं कि सब ठीक चल रहा है, मुंबई से आई संस्था ने बता दिया कि बच्चियों के साथ यौन उत्पीड़न हुआ है, उसके बाद भी राज्य का विभाग संस्था के लिए फंड जारी कर देता है। हम दावा कर रहे थे कि सामंती व्यवस्था को ढहा कर आधुनिक संस्थानों का निर्माण कर चुके हैं। आज के आधुनिक शहरी समाज में पालनाघर, बाल गृह, आश्रय गृह, वृद्धाश्रम का निर्माण क्यों किया जाता है? अब खेती पर आधारित संयुक्त परिवार वाली व्यवस्था खत्म हो चुकी है। ऐसे में एक सहारे की व्यवस्था का निर्माण करना जरूरी होता है। आधुनिक राज और समाज में ऐसी व्यवस्थाएं बनानी जरूरी हैं। परिवार पर कोई आपदा आई और परिवार टूटा तो बच्चे, किशोर या बुजुर्ग कहां जाएंगे? अब परिवार का दायरा छोटा है तो वे राज्य के भरोसे ही रहेंगे। ग्रामीण पारंपरिक संयुक्त व्यवस्था में एक बेटी पूरे गांव की बेटी मानी जाती है। घर में कोई बुजुर्ग अकेलेपन की मौत नहीं मरता क्योंकि वहां परिवार और समाज का दायरा बड़ा होता है। लेकिन शहरी आधुनिक व्यवस्था में अपने परिवार के दायरे के बाहर हर कोई अकेला है। वह पुलिस, कानून, प्रशासन या एनजीओ के भरोसे है। हमने गांवों को खत्म कर शहरीकरण तो कर लिया। लेकिन इन शहरों के लिए जिस तरह के समाज और संस्थान की जरूरत थी हम उसका निर्माण नहीं कर पाए। दिल्ली के मंडावली में मानसिक चुनौतियों से जूझ रही मां और बेरोजगारी व मुफलिसी के शिकार बाप की तीन बच्चियों तक किसी तरह की सरकारी मदद नहीं पहुंच पाती है। तीनों बच्चियां भूख के कारण मानव कंकाल की स्थिति में अस्पताल पहुंचती हैं और तब तक पड़ोसियों को पता नहीं चलता है कि बगल में बच्चियां भूख से मर रही हैं। कई दिनों तक वे स्कूल नहीं गई हैं और स्कूल प्रशासन ने सुध नहीं ली कि वे क्यों नहीं आ रही हैं। जब मां मानसिक रूप से कमजोर और बाप बेरोजगार था तो यहीं राज्य की जिम्मेदारी आती थी। लेकिन सरकारी और गैर सरकारी संस्थाओं के गढ़ देश की राजधानी में इस परिवार तक कोई मदद नहीं पहुंचती है। जब देश की राजधानी का यह हाल है तो हम दूर-दराज के इलाकों की कल्पना कर सकते हैं।

बिहार के मुजफ्फरपुर में 29 बच्चियों की मेडिकल रिपोर्ट के जरिए परिवार, अखबार, पड़ोसी, पुलिस, कानून सबने अपने ढहने का सबूत दे दिया। ये बच्चियां हमें परिवार से लेकर राज्य सरकार का रिपोर्ट कार्ड दे रही हैं कि देखो सब फेल हैं। राज्य सरकार ने आश्रय गृह बनाया और संस्थानों की लापरवाही ने यहां रह रहीं लड़कियों को यौन उत्पीड़ित का तमगा दे दिया। ये लड़कियां बता रही हैं कि इन आधुनिक शहरों में जो लड़की पारंपरिक तौर पर किसी की बेटी, बहन, बीवी, मां नहीं है तो वह इंसानी गोश्त भर है। सआदत हसन मंटो के शब्द हमें क्रूर लगते हैं जब वे कहते हैं, ‘हम औरत उसी को समझते हैं जो हमारे घर की हो, बाकी हमारे लिए कोई औरत नहीं होती बस गोश्त की दुकान होती है’। आज कथित संतों के आश्रम से लेकर प्रशासन के बनाए आश्रय गृह तक लड़कियों को सिर्फ इंसानी गोश्त ही तो समझा जा रहा। मंडावली से लेकर मुजफ्फरपुर तक हम ऐसे समाज में जी रहे हैं जहां व्यवस्था नाम की चीज नहीं है। मुजफ्फरपुर की लड़कियां हमसे सवाल कर रहीं कि हमारी इस मेडिकल रिपोर्ट का जिम्मेदार कौन है, हम कहां जा रहे हैं। एक तरफ आधुनिक भारत के निर्माण की बात कर रहे हैं लेकिन उसके हिसाब से बनी संस्थाओं को धूमिल और खारिज कर रहे हैं। राज्य के आसरे में रह रही लड़कियों के बारे में समाज की धारणा बन रही है कि यहां यौन उत्पीड़न की शिकार आती हैं, इनके साथ यही होता है।

इन आश्रय गृहों का मकसद परिवार से बिछड़ी लड़कियों की देखरेख और पुनर्वास करना होता है। आधुनिक समाज में ये राज्य संरक्षित आसरे जरूरी भी हैं। लेकिन अब हम किस आधार पर इनके पुनर्वास की बात कहेंगे। और इसके लिए इसकी सरकार या उसकी सरकार के खिलाफ नारेबाजी कर क्या समस्या का हल हासिल कर लेंगे। सबसे चिंता की बात यह है कि यहां पर कठघरे में खड़ा हमारा नागरिक समाज है। हमने हर समस्या के हल में एनजीओ-एनजीओ का नारा लगाना शुरू कर दिया। लेकिन इनका हासिल क्या मिला इसका कोई आॅडिट हुआ क्या? मुजफ्फरपुर का मामला पहला नहीं है। बहुत से ऐसे मामले पहले भी आए हैं जिसमें राज्य संरक्षित सुधारगृह ही यातनागृह में बदल गया है। यह बिहार की कोई स्थानीय समस्या नहीं है। यह चीन से लेकर अमेरिका तक की समस्या है। यह हर उस आधुनिक शहर की समस्या है जो पारंपरिक परिवार और समाज से आगे निकल कर अपने यहां की संस्थाओं का आधुनिकीकरण करने में नाकाम रहा है। आश्रय गृह की लड़कियां जिनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी राज्य सरकार की थी उनके पास तो बाबा भारती वाली उम्मीद भी नहीं बची है। उन बच्चियों की मेडिकल रिपोर्ट के जरिए हमारे नागरिक समाज की पोस्टमार्टम रिपोर्ट जारी हो गई है। परिवार से लेकर प्रशासन तक अपना भरोसा खो चुके हैं। इस ढहे हुए मलबे के ढेर पर हम कब तक खड़े रहेंगे? अब तो भरोसे का भ्रम भी टूट रहा।

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