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बेबाक बोल : कर्नाटक की बोध कथा

‘अब तो ईगलटन रिसॉर्ट के मालिक का भी कहना है कि मैं सरकार बनाऊंगा मेरे पास 117 सदस्यों का बहुमत है’। कर्नाटक में येदियुरप्पा को सरकार बनाने के आमंत्रण को चुनौती देने वाली याचिका की सुनवाई के दौरान शुक्रवार को जज एके सीकरी ने ईगलटन रिसॉर्ट के मालिक पर चल रहे वॉट्सऐप मजाक का जिक्र किया। गालिब और फैज के शेरों का उद्धरण देने वाले जज जब सुनवाई के दौरान सोशल मीडिया पर चल रहे मजाक का जिक्र करने को मजबूर हो जाएं तो अंदाजा लगाया जा सकता है कि कर्नाटक चुनाव का नाटक किस चरम अवस्था पर जा पहुंचा। लोकतंत्र के बनते-बिगड़ते उसूलों के बीच कर्नाटक कथा का संदेश यह है कि चुनावी नतीजों के अंतिम आकार लेते ही कांग्रेस अध्यक्ष ने विनम्रता से जनता दल (सेकु) से मिलन की मांग की। बड़े भाई वाले अहंकार से निकल एक साझा परिवार के समझदार सदस्य की तरह किया गया कांग्रेस का यह व्यवहार ही 2019 के लिए मजबूत विपक्ष की राह बन सकता है। आज शाम तक येदियुरप्पा बहुमत साबित कर पाएंगे या नहीं, यह तो देखने की बात है लेकिन यह दिख रहा है कि अपने छोटे अहंकार और स्वार्थ को छोड़ विपक्ष हाथ मिलाएगा तभी आगे कुछ बात बन सकती है। कर्नाटक से निकले इसी संदेश पर बेबाक बोल।

‘गोवा, मणिपुर, मेघालय वाला फार्मूला कर्नाटक में भी लागू हो’ – यह बयान है मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) के महासचिव सीताराम येचुरी का जो उन्होंने कर्नाटक चुनाव के त्रिशंकु नतीजों के बाद भाजपा को सरकार बनाने का निमंत्रण मिलने के बाद दिया। फिलहाल कांग्रेस, भाजपा, बसपा या सपा के किसी नेता ने यह बयान दिया होता तो हम इसे अपने स्तंभ में उद्धृत नहीं करते। लेकिन यह बयान माकपा नेता का है। वाम और आम के बीच वाली आम आदमी पार्टी के राजनीतिक मूल्य तो उतनी ही जल्दी इतिहास बन गए जितनी जल्दी इसने ऐतिहासिक जीत हासिल की थी। अब जब वंचितों की अगुआई वाली पार्टी के अगुआ जैसे को तैसे वाली भाषा बोलेंगे तो हमें कर्नाटक में भारतीय जनता पार्टी की जीत के मायने देखने होंगे। वर्गीय भेद की जमीन पर काम करने वाली पार्टी अचानक संख्याबल की मीनार पर चढ़ने की पैरोकारी क्यों कर रही है? येचुरी का यह बयान उसी राजनीति का हिस्सा लग रहा है जिसकी आलोचना वे बुर्जुआ और फासीवादी कहकर करते हैं। भाजपा और कांग्रेस को एक साथ कोसने वाली पार्टी आज कांग्रेस के पक्ष में ऐसे बयान दे रही है जिसकी खुद हमेशा से धुर विरोधी रही है। वहीं कांग्रेस कहती है कि आप राज्यपालों का रबर स्टैंप की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं तो भाजपा का पलटवार होता है कि आपने कब नहीं किया। लेकिन इन सबके बीच उसी समीकरण की पैरोकारी क्यों, जिसे कभी संविधान और लोकतंत्र की हत्या बताने में नहीं थकते थे। कीचड़ को कीचड़ से धोने की बात कहना भाजपा की जीत का नया पाठ रचना है। कर्नाटक की इस जमीन पर कल की कांग्रेस बनाम आज की भाजपा की जो बहस छिड़ी है उससे ज्यादा अहम है, इन नतीजों का वह संदेश जिसे विपक्ष जितनी जल्दी पढ़, समझ ले उतना अच्छा। कर्नाटक के दिए राजनीतिक संदेश को समझने के बीच उद्धरण एक लोक कथा का जो हम सबने न जाने कितनी बार सुनी होगी। एक किसान के चार बेटे आपस में बहुत लड़ते थे और किसान बेटों के रवैए से परेशान था। उसे चिंता थी कि उसके जाने के बाद उसके परिवार का क्या होगा। जब वह मृत्युशैया पर था तो उसने अपने बड़े बेटे से एक लकड़ी लाकर उसे तोड़ने के लिए कहा, और बेटे ने उसे तोड़ दिया। चारों बेटों से उसने ऐसा ही करवाया और चारों ने लकड़ी तोड़ दी। फिर किसान ने सारी लकड़ियों का एक गठ्ठर बना बेटों को उसे तोड़ने कहा और कोई भी बेटा उसे न तोड़ पाया। किसान अपने बेटों को संगठन की शक्ति समझा चुका था।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी चिरपरिचित शैली में चुनाव प्रचार के दौरान कहा था कि कर्नाटक चुनावों के बाद कांग्रेस सिर्फ तीन प (पीपीपी) में सिमट जाएगी। पंजाब, पुद्दुचेरी और परिवार। यह चेतावनी हकीकत न बन जाए इसे रोकने के लिए राहुल गांधी बिहार में अपना ही गढ़ा पाठ भी न दुहरा पाए। हाल ही में उपचुनाव में बसपा और सपा के गठबंधन का उदाहरण भूल गए। बिहार का सफल मॉडल रचने वाले नेता ने जनता दल (सेकु) के साथ चुनाव पूर्व कोई समझौता नहीं किया। इन सबके बीच मीडिया के सवाल पर राहुल ने बयान दे दिया था कि 2019 में सरकार बनी तो वे प्रधानमंत्री पद के लिए तैयार हैं। इस बयान के कई पाठ हो सकते हैं। इसे एक नेता का आत्मविश्वास भी करार दिया जा सकता है, लेकिन यह बयान वे कर्नाटक की जमीन पर दे रहे थे जहां चुनावों के पहले उन्होंने जद (सेकु) से गठबंधन की कोई जरूरत नहीं समझी थी, जिसे उनके अहंकार के रूप में भी देखा गया। इस बयान का एक विस्तार यह भी था कि 2019 में अगर विपक्ष के गठबंधन जैसी कोई चीज होती है तो उसकी अगुआई राहुल गांधी करेंगे। यानी कांग्रेस की तरफ से यही संदेश गया कि गठबंधन की गांठ में उसकी भूमिका बड़े भाई वाली होगी। राहुल गांधी के सिर पर कांग्रेस अध्यक्ष पद का सेहरा बहुत सोच-समझ कर बांधा गया था। उनकी ताजपोशी तब की गई जब कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में उन्हें कर्नाटक का मैदान मिलना था। वह कर्नाटक जहां कांग्रेस की सरकार और तंत्र थे। उसी समय से कहा जा रहा था कि कर्नाटक का नतीजा 2019 की लड़ाई का खाका खींचेगा। राहुल गांधी के लिए यह अग्निपरीक्षा सरीखा ही था। और, इस परीक्षा के नतीजे में झगड़ालू बेटों वाले किसान की कहानी सामने आई।

चुनाव बाद जिस तेजी से कांग्रेस ने जद (सेकु) का हाथ थामा और एच डी कुमारस्वामी को मुख्यमंत्री पद देने की पेशकश की, यही तस्वीर इस चुनाव का हासिल है जिसे पूरे विपक्ष को बार-बार देखना चाहिए। इस तस्वीर के पहले बड़े भाई के अहंकार वाले फ्रेम का शीशा टूटा है। विपक्ष अगर एक नहीं हुआ तो वह अलग-अलग लकड़ियों की तरह टूटता रहेगा। अलग-अलग चूल्हा फूंकने के बजाए साझा परिवार की तरह उसे एकता का गठ्ठर बनाना होगा। और सबसे अहम है कि कांग्रेस अगर अब भी जमीन की तरफ नहीं लौटी तो उसके लिए आगे संभावनाओं का आकाश और दूर हो जाने की आशंका है। भारतीय राजनीति में कांग्रेस के दो चरण रहे हैं। पहला चरण जनतंत्रीकरण का रहा है। आजादी के दौर में जो संघर्ष था उसका असर आगे तक दिखाई देता है जिसकी वजह से आदिवासी, दलित और कमजोर तबका कांग्रेस के वोट बैंक बने। यह पूरा दौर और पूरी प्रक्रिया उदारवाद की थी। उस दौर में जनतंत्रीकरण का मतलब निर्बलों का सबलीकरण था। जंग-ए-आजादी की चमक के कारण ही निर्बल तबका खुद से कांग्रेस को जोड़ रहा था। एक सतत प्रक्रिया के तहत उस पूरे दौर में संस्थाओं का भी जनतंत्रीकरण हुआ चाहे न्यायपालिका हो, कार्यपालिका या फिर पंचायतीराज। शासन में ज्यादा से ज्यादा लोगों की सहभागिता बढ़ी, आरक्षण या महिलाओं के पक्ष में कानून बनाने के जरिए।

जनतंत्र के इस सबलीकरण के दौर को धक्का लगता है इंदिरा गांधी के लाए आपातकाल में। अपनी लोकप्रियता खत्म होते देख वे आपातकाल थोप देती हैं। लेकिन जनता से मिले नकार के बाद सुधार भी करती हैं और जनता ही नारा लगाती है कि आधी रोटी खाएंगे, इंदिरा को जिताएंगे। ‘गरीबी हटाओ’ वाली जिस इंदिरा को जनता ने हटा दिया था उसी के लिए आधी रोटी खाकर जिताने का नारा भी लगाया था। कांग्रेस का दूसरा चरण नवउदारवाद का है। अब जनतंत्रीकरण की प्रक्रिया को पलट कर केंद्रीकरण की प्रक्रिया शुरू होती है। लालफीताशाही या इंस्पेस्क्टर राज के नाम पर सारी चीजों का केंद्रीकरण होता है जो जनतंत्रीकरण के उलट था। यह व्यवस्था निर्बलों के खिलाफ थी। इसके बाद लोगों का भरोसा उठ जाता है। अब अर्थशास्त्री मनमोहन सिंह मौनमोहन हो जाते हैं और जनता के जरिए नकार दिए जाते हैं। यह तो तय है कि जनता ने कर्नाटक में कांग्रेस को नकार दिया है। इस नकार को स्वीकार बनाने और आगे का रास्ता तय करने के लिए संगठन की शक्ति की बोध कथा का पाठ भी दिया है। अब देखना है कि इससे कांग्रेस समेत पूरे विपक्ष की चेतना का कितना बोध होता है।