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बेबाक बोल : कठिन राह

केंद्र की राजग सरकार ने चुनाव सुधारों के तहत लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ करवाने के लिए कदम उठाने की इच्छा जाहिर की थी। समय-समय पर प्रधानमंत्री से लेकर राष्टÑपति भी इसकी हिमायत करते रहे हैं। चुनाव आयोग भी दावा कर चुका है कि वह इस तरह के चुनाव सुधारों के लिए तैयार है। लेकिन पिछले दिनों पश्चिम बंगाल के पंचायत चुनावों में हुई हिंसा से लोकतंत्र और चुनावी प्रक्रिया सकते में है। एक सूबे के पंचायती चुनाव में 73 फीसद मतदान करवाने में 12 लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी। चुनाव आयोग जहां बंगाल में हिंसा रोकने में नाकाम रहा वहीं उत्तर प्रदेश में तो मशीनों से ही मात खा गया। दो सीटों पर हुए उपचुनावों में जितनी बड़ी संख्या में ईवीएम में खराबी आई उससे कई सवाल उठते हैं। चुनाव अधिकारी तर्क देते हैं कि मशीन गर्मी की वजह से खराब हो गई यानी ये मशीनें मौसम की मार भी नहीं झेल सकतीं। हिंसा और खराब मशीनों के बीच क्या आज भी चुनाव आयोग सभी चुनाव एक साथ करवाने का दावा कर सकता है, यही सवाल पूछता बेबाक बोल।

प्रतीकात्मक फोटो।

राजग सरकार ने सत्ता में आते ही चुनाव सुधार की बात करते हुए लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराने के लिए कदम बढ़ाने के संकेत दिए थे। बजट सत्र की शुरुआत में राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने इसकी हिमायत कर बार-बार होने वाले चुनावों को विकास में बाधक बताया था। कोविंद ने दोनों सदनों की साझा बैठक में राजनीतिक सुधारों पर जोर देते हुए कहा था कि एक साथ चुनाव कराने को लेकर राजनीतिक दलों के बीच ज्यादा बातचीत होनी चाहिए और इसे लेकर एक समझौते के प्रयास किए जाने चाहिए। राष्ट्रपति कोविंद ने इस अहम मुद्दे पर कहा, ‘देश में बार-बार होने वाले चुनावों के प्रतिकूल प्रभावों को देखते हुए सरकार के प्रति संवेदनशील लोग चिंताग्रस्त हैं। देश में बार बार चुनाव होने से न केवल मानव संसाधनों पर अतिरिक्त भार पड़ता है बल्कि आचार संहिता लागू होने के कारण देश की विकास प्रक्रिया में बाधा आती है’। इसके पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी एक साथ चुनाव कराने की बाबत कह चुके हैं। राजग सरकार के इस नजरिए पर चुनाव आयोग ने हमेशा दृढ़ता दिखाई और दावा करता रहा कि वह पूरे देश में एक साथ चुनावों के लिए तैयार है।
कयास लगाए जा रहे थे कि सरकार 2019 के आम चुनावों के पहले होने वाले विधानसभा चुनावों को एक साथ करवाकर इस दिशा में आगे बढ़ सकती है। यह तो तय है कि अरसे से हम यही देख रहे हैं कि पूरे देश में कहीं न कहीं चुनाव चल रहे हैं और पक्ष से लेकर विपक्ष और मीडिया से लेकर आम जनता तक चुनावी चर्चा में ही व्यस्त रहते हैं। इस पुल का उद्घाटन अभी क्यों, तब क्यों नहीं, यह घोषणा अभी क्यों, तब क्यों नहीं इस राजनीति का नुकसान आम जनता भुगतती रहती है। दिल्ली में बवाना की एक सीट के नतीजों से पूरे देश के आगे का राजनीतिक भविष्य बांच दिया जाता है तो एक कैराना सीट के बाद ही चुनावी चर्चा के पंडित 2019 का प्रधानमंत्री तय करने लग जाते हैं।

इस बार तो लग रहा है कि पूरा देश पांच साल तक कैडरों में बंट गया है। तथाकथित भक्तों और अभक्तों की टोली का झगड़ा सुलझाए न सुलझता है, लेकिन अंत में जो जहां है वहीं रहता है। क्या इतनी ज्यादा राजनीतिक उलझन देश की सेहत के लिए ठीक है। नागरिकों में बेहतर राजनीतिक चेतना जरूरी है लेकिन पांच साल तक हर नागरिक एक राजनीतिक युद्ध के मोर्चे पर तैनात रहेगा तो आम जिंदगी के सवाल कैसे आगे बढ़ेंगे? अभी कर्नाटक में सरकार बनने के बाद भी देश का राजनैतिक माहौल स्थिर नहीं हो पाया है और कहा जा रहा है कि जनता को राष्ट्रपति शासन या दुबारा चुनाव झेलना पड़ सकता है। अगर ढाई-ढाई साल के अंतर पर दो बार चुनाव कराने का ही सुझाव मान लिया जाए तो इस खतरे की आशंका से तो उबरा जा सकता है। वरना आम मतदाता तो यही सोचेगा कि उसने वोट देकर गलती कर दी। याद रहे कि विधि आयोग की रिपोर्ट में दोनों चुनावों को साथ कराने का सुझाव देने का आधार राजनीतिक स्थिरता ही थी। इसके साथ ही चुनाव कराने में खर्च होने वाला धन उसके साथ जुटने वाला मानव संसाधन बड़ी चिंता का विषय है ही। सेना के जवान से लेकर पुलिस और आम स्कूलों के शिक्षक तक इतनी बड़ी प्रक्रिया में झोंक दिए जाते हैं। शिक्षक चुनाव कर्मचारी और स्कूल मतदान केंद्र व सैनिक छावनी में बदल दिए जाते हैं।
दिल्ली और एनसीआर के इलाकों की जिंदगी साथ-साथ कदमताल करती है। लेकिन अगर फरीदाबाद (हरियाणा) में चुनाव हो रहा हो तो दिल्ली आने वाले लोगों को इस आचार संहिता का पालन करना होगा। नोएडा (उत्तर प्रदेश) से पैसे लेकर निकला कारोबारी दिल्ली की चुनाव आचार संहिता के उल्लंघन का आरोपी होगा। यह समीकरण देश के कई हिस्सों में लागू होता होगा। और सबसे जरूरी बात जो लोकतांत्रिक अधिकार की है कि नोएडा के लेबर चौक पर काम कर रहे मजदूर को अपना वोट डालने के लिए बिहार जाने की जरूरत नहीं होगी। वह जहां रहकर अपनी रोजी-रोटी कमा रहा है, वहीं के लिए अपनी सरकार चुन सकता है। लेकिन इतने बड़े चुनावी सुधार के सपने को चुनाव आयोग ज्यादा देर नहीं देखने देता और अव्यवस्था आपको झकझोर कर उठा देती है कि लोकतंत्र की रक्षा करने वाली मशीन तो मौसम की मार भी नहीं झेल सकती है। उत्तर प्रदेश में लोकसभा उपचुनाव ने बताया कि हमारे लोकतंत्र को ‘लू’ लग गई। कई मतदान केंद्रों पर ईवीएम और वीवीपैट मशीनें खराब होने की शिकायतें मिलीं और चुनाव अधिकारी हतप्रभ। विपक्षी दलों ने दावा किया कि अकेले कैराना में करीब डेढ़ सौ मशीनें खराब थीं। अधिकारी इस समस्या के लिए तैयार नहीं थे और अपनी तरफ से जवाब दे दिया कि बहुत ज्यादा गर्मी की वजह से मशीनों की चिप खराब हो गई। इस जवाब पर भी हल्ला मच गया कि सुबह सात से आठ के बीच कितनी गर्मी पड़ गई कि मशीनों को ‘लू’ लग गई। इन शिकायतों के बाद कैराना के 73 मतदान केंद्रों पर फिर से मतदान करवाया गया। मतदान के लिए घर से निकले लोगों ने सवाल किया कि क्या मई के महीने में उत्तर प्रदेश में पहली बार गरमी पड़ी।

इन सबके बीच विपक्षी दलों के नेताओं ने समय पर कदम उठाया और चुनाव आयोग से ईवीएम की खराबी की शिकायत की। समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव से लेकर राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के प्रफुल्ल पटेल तक सक्रिय हुए। पटेल ने सवाल पूछा कि जब चुनाव आयोग कुछ उपचुनाव ही सही ढंग से नहीं करवा पा रहा है तो फिर वह सभी चुनावों को एक साथ करवाने की तैयारी का दावा कैसे कर सकता है। इन चुनावों के नतीजे आने के बाद चुनाव प्रक्रिया पर सवाल उठाने का मकसद है कि चुनावों के दौरान हुई इतनी बड़ी खराबी नतीजे के शोर में गुम न हो जाए। एक छोटे से क्षेत्र के चुनाव पर इतना हल्ला और हंगामा। चुनाव अधिकारी का बयान बताता है कि उसने इतनी बड़ी गड़बड़ी रोकने के लिए कोई तैयारी नहीं की थी। यहां तक कि एक जिम्मेदार और संतोषजनक बयान देने की भी नहीं। तो यह थी चुनाव आयोग की तैयारी, उसकी सतर्कता लोकतंत्र के महापर्व को लेकर। उत्तर प्रदेश के चुनाव अधिकारी रत्नेश सिंह ने कहा कि मशीनों में खराबी जरूर थी लेकिन यह इतना बड़ा मामला नहीं है कि इसकी वजह से पूरा मतदान प्रभावित हो रहा हो। जहां चुनावों में हजार और दो हजार के मतों से नतीजे प्रभावित हो रहे हों वहां राज्य चुनाव अधिकारी का यह बयान बताता है कि वे इस महान लोकतांत्रिक प्रक्रिया के लिए जरा भी संवेदनशील नहीं हैं। 73 बूथों पर पुनर्मतदान मामूली बात नहीं है। हजारों लोग गर्मी में मतदान के लिए निकले थे। लेकिन मशीन की खराबी से उनकी बारी आ ही नहीं पा रही थी और बहुत से लोग बिना मतदान किए लौट गए। इनमें से बहुत लोग वैसे भी होंगे जो खीझ के मारे पुनर्मतदान में हिस्सा लेने नहीं पहुंचे होंगे। इससे पहले पश्चिम बंगाल में हुआ पंचायती चुनाव का दृश्य याद करें। माकपा कार्यकर्ता और उनकी पत्नी को जिंदा जला दिया गया। चुनावी हिंसा के इस दृश्य से पूरा देश हतप्रभ था। एक सूबे के पंचायती चुनाव में 12 लोगों की जान गई। घायलों की संख्या 50 के पार थी। वहां 73 फीसद मतदान करवाने में चुनाव आयोग ने 60 हजार से अधिक सुरक्षाकर्मी तैनात किए थे। और इतने भारी सुरक्षाबल का हासिल यह था कि उत्तर 24 परगना, दक्षिण 24 परगना, पूर्वी मिदनापुर, बर्दवान, नादिया, मुर्शिदाबाद और दक्षिणी दिनाजपुर जिले हिंसा की आग में झुलस गए। इसके पहले आरोप लगे कि विपक्षी दलों से खड़े बहुत से लोगों को नामांकन ही नहीं भरने दिया गया।

उत्तर प्रदेश से लेकर बंगाल तक के चुनावों में बदहाल होते लोकतंत्र का हाल देख हम यह सवाल फिर से उठा रहे हैं कि भारत में आम चुनाव से लेकर विधानसभा चुनाव एक साथ करवाने की कवायद करने का दम हम कैसे भर सकते हैं। ये तर्क तो पहले भी दिए गए थे कि भारत बहुत बड़ा देश है और हिंसा व अव्यवस्था को रोकने के लिए अलग-अलग चुनाव ही सही है। बंगाल व उत्तर प्रदेश तक यही बताता है कि चुनाव आयोग हिंसा और अव्यवस्था को रोकने में नाकाम रहा है। मतदाताओं को घर से बाहर निकालने वाले प्रचार पर खर्च करने के बजाय वह हिंसा को कम करने और मशीनों को भरोसेमंद बनाने पर संसाधन लगाए तो लोकतंत्र ज्यादा विश्वसनीय होगा। जिस मशीन को उत्तर प्रदेश में गर्मी लग सकती है उसे कश्मीर, लद्दाख और अन्य पहाड़ी इलाकों पर ठंड भी लग सकती है। लू और सर्दी-जुकाम से पीड़ित हो जाने वाली इन मशीनों की बदौलत चुनाव आयोग लोगों को लोकतंत्र में कैसे भरोसा दिलाएगा। हिंसा और हंगामा तो मानवीय मामला है। लेकिन चुनाव आयोग तो मशीनों को भी संभालने में नाकाम है। भारत जैसा देश जिसका बहुत बड़ा इलाका भीषण गर्मी झेलता है, वहां अगर चुनाव अधिकारी यह कहें कि मशीन गर्मी के कारण खराब हो गई तो यह हम सबके लिए ठहर कर सोचने का वक्त है। सोशल मीडिया पर मजाक और चुटकुलों तक ही इस गंभीर मुद्दे को दफ्न न कर दिया जाए। इतनी नाजुक मशीन और इतने गैरजिम्मेदार चुनाव अधिकारी के साथ क्या हम लोकसभा और विधानसभा चुनाव साथ कराने का मुद्दा उठा सकते हैं?

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