ताज़ा खबर
 

बेबाक बोल: करो या मरो…

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस आने वाले समय में अपने अस्तित्व की परीक्षा से गुजरने वाली है। पांच राज्यों के चुनावों के बीच मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान तीन ऐसे क्षेत्र हैं जिन्हें हिंद का हृदय कहा जा रहा है। यानी 2019 के लोकसभा चुनावों से पहले कांग्रेस को अपना रिपोर्ट कार्ड इन्हीं राज्यों की जनता से मिल जाएगा। इन तीन राज्यों में भाजपा सत्ता विरोधी रुझान झेल रही है और उसके मुकाबले सिर्फ कांग्रेस खड़ी है। यहां भाजपा और कांग्रेस के बीच कोई अन्य नहीं है। अगर इन राज्यों में कांग्रेस जनता द्वारा नकार दी जाती है तो इसका साफ संदेश होगा कि कांग्रेस में सांगठनिक ढांचा नाम की कोई चीज नहीं है और रह जाएंगे सिर्फ पार्टी के अगुआ राहुल गांधी। फिलहाल राहुल गांधी का ऐसा कोई करिश्माई व्यक्तित्व नहीं है कि 2019 में जनता सिर्फ उनके चेहरे के बल पर कांग्रेस को वोट दे। इन तीन राज्यों के चुनावों में कांग्रेस के लिए करो या मरो वाले हालात पर बेबाक बोल।

छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में घोर सत्ता विरोधी रुझान को कांग्रेस अपने पक्ष में नहीं कर पाई तो आगे उसका चुनावी जंग में टिके रहना मुश्किल होगा।

मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे के फेरे पूरे हो गए। जनेऊ पहनने से लेकर हिंदू होने के पुख्ता सबूत देने के साथ कैलाश मानसरोवर के भी दर्शन हो गए। बर्कले से लेकर प्रिंस्टन वाला अध्याय तो उम्दा था ही। संसद में गांधीगीरी वाली झप्पी भी हो गई और सोशल मीडिया पर भी जम गए हैं। तो फाइनल परीक्षा, अंतिम परीक्षा या अग्निपरीक्षा के पहले सारे क्रैश कोर्स पूरे हो गए हैं। उम्मीद है कि आने वाले समय में जब आप अपनी परीक्षा में बैठें तो उत्तम नंबरों से पास होंगे। लेकिन अगर इस बार आप नंबर नहीं जुटा पाए तो यह नाकामी आगे सिर्फ ऋणात्मक अंक ही दिलाएगी जो परीक्षा में फेल होने का आधार बनेगी।

महात्मा गांधी ने जो ‘करो या मरो’ का नारा दिया था वह आज भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सामने सबसे बड़ा सच और सबसे बड़ी चुनौती बनकर खड़ा है। अगले महीनों में होने वाले पांच राज्यों में से तीन राज्यों का चुनाव उसकी साख और अस्तित्व का सवाल है। साख तो इससे भाजपा की अगुआई वाली राजग सरकार की भी जुड़ी है, लेकिन कांग्रेस का तो अस्तित्व ही इससे जुड़ा है। इन तीनों राज्यों की परीक्षा में कांग्रेस पास नहीं हुई तो उसके लिए आगे बहुत लंबे समय तक कोई परीक्षा बचेगी ही नहीं। फिलहाल चुनावी समीक्षक इन तीन राज्यों को हिंद का हृदय कह रहे हैं। इन तीन राज्यों की जनता ही बता देगी कि लोकसभा चुनाव में कांग्रेस का भविष्य क्या होगा। पिछले लंबे समय से मध्य प्रदेश में सत्ता विरोधी रुझान दिख रहा है। किसानों का तीखा विरोध प्रदर्शन सामने आया और गोलियां भी चलीं। तीन बार से मुख्यमंत्री बन रहे शिवराज सिंह चौहान को जनविरोध का अहसास हो चुका है और वे आपदा प्रबंधन में भी जुट गए हैं। उनकी भाषा और प्रचार का तरीका भी पूरी तरह बदल चुका है। जब राहुल हिंदू और मंदिर पर उतर आए तो वहां भाजपा नया मध्य प्रदेश और लोगों की खुशहाली की बात कर रही है। मुख्यमंत्री और उनका तंत्र लोगों को समझाने में जुटा है कि जो नाराजगी है वह स्थानीय प्रशासन और विधायकों के कारण है। शिवराज सिंह चौहान सब कुछ बदल देने के वादे के साथ नई भाषा बोल रहे तो कांग्रेस भाजपा के हिंदुत्व की उस काठ की हांडी को हाथ में थामे है जिसे भाजपा एक बार आग पर चढ़ा चुकी है। यहां पर कांग्रेस की हार का मतलब होगा शिवराज का अपराजेय बनकर सामने आना और भारत की राजनीति में इतिहास बना देना। लेकिन शिवराज का यह राज कांग्रेस को लंबे समय तक इतिहास बना देगा।

मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ दोनों ऐसे राज्य हैं जहां भाजपा लंबे समय से है और अब केंद्र में भी भाजपा है। इन दोनों राज्यों में भाजपा सत्ता विरोधी रुझान झेल रही है और वापसी के लिए अपना पूरा दमखम लगा रही है। राजस्थान में एक बार भाजपा और एक बार कांग्रेस वाला हिसाब-किताब है। वसुंधरा राजे सरकार बहुत से मामलों में अलोकप्रियता के चरम पर पहुुंच चुकी है। यहां से उठे किसान आंदोलन ने पूरे देश और सरकार को झकझोर कर रख दिया था। भाजपा के शासन वाले इन तीनों राज्यों की सबसे बड़ी अहमियत यही है कि यहां भाजपा की कांग्रेस से सीधी टक्कर है। उत्तर प्रदेश, बिहार, बंगाल, केरल व तमिलनाडु से लेकर कर्नाटक तक में अन्य दलों का मजबूत अस्तित्व है। लेकिन इन तीन राज्यों में भाजपा के बरक्स कांग्रेस ही है। मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में लंबे समय से राज कर रही भाजपा के लिए यह राज्य फिर से पाना जितना अहम है उससे ज्यादा अहम यह है कि कांग्रेस इसे भाजपा से छीन पाए। राजस्थान में सत्ता ने विपक्ष को अपनी भूमिका निभाने के लिए जितनी जगह मुहैया करवा दी है उसमें भी अगर विपक्ष यानी कांग्रेस मैदान नहीं जीत पाएगी तो फिर आगे के किसी मैदान में उससे दमखम दिखाने की उम्मीद करना ही बेमानी होगा। भारत में 1998 के बाद का दौर ऐसा आया जब राजनीति दो धु्रवों में बंट गई। एक धु्रव का अगुआ भाजपा की अगुआई वाला राजग है तो दूसरे धु्रव संप्रग की अगुआई कांग्रेस कर रही है। इन दो धु्रवों राजग और संप्रग के लिए ये तीन मैदान संख्यात्मक दृष्टि से आगे का गणित तय कर देंगे। संख्यात्मक दृष्टि से इन तीनों राज्यों में जिसकी बढ़त होगी, वही आगे की जीत का रास्ता तय करेगा। आगे 2019 में कोई गठबंधन या संयुक्त मोर्चा कैसा बनेगा उसकी बुनियाद भी इन्हीं तीनों राज्यों के नतीजे रखेंगे। ऐसी स्थिति में कांग्रेस को अगर धु्रव की धुरी बनना है तो उसे सम्मानजनक संख्या चाहिए। इन चुनावों में एक का नंबर बढ़ने का सीधा मतलब है दूसरे का घटना।

छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में घोर सत्ता विरोधी रुझान को कांग्रेस अपने पक्ष में नहीं कर पाई तो आगे उसका चुनावी जंग में टिके रहना मुश्किल होगा। इन राज्यों में जनता द्वारा कांग्रेस को नकारने का मतलब होगा कि पार्टी सांगठनिक स्तर पर पूरी तरह टूट चुकी है और जनता के बीच उसका कोई आधार नहीं बचा है। एक दौर था जब कांग्रेस बाजार और मजबूत तबके के लोगों की पार्टी कही जाती थी और भाजपा को खास बनिया व ब्राह्मण वर्ग के वृत्त में रखा जाता था वह भी उत्तर भारत की हदबंदी में ही। लेकिन पिछले चार सालों में यह परिदृश्य तेजी से बदला है। भाजपा आज पूरे देश की और सारे वर्गों की पार्टी है। वह सभी वर्गों के मतदाताओं को अपनी तरफ आकर्षित करने में सफल रही है। इन तीन राज्यों में यह भी दिखेगा कि कांग्रेस अपने परंपरागत मतदाता को यह भरोसा दिला सकती है या नहीं कि वह उसके हितों की रक्षक है। अगर वह यहां अपने मतदाताओं की वापसी नहीं करवा पाई तो आगे भी मतदाता उसके पास नहीं लौटने वाले। उसका अस्तित्व क्षेत्रीय पार्टियों जैसा ही हो जाएगा। इन तीन राज्यों में कांग्रेस के प्रदर्शन के आधार पर ही संयुक्त प्रगतिशील मोर्चा का भविष्य भी तय होगा। अगर कांग्रेस इन चुनावों में नहीं जीत पाती है तो फिर वह मोर्चे की अगुआई किस हैसियत से कर पाएगी, वहां भी नेतृत्व का संकट होगा। इन राज्यों में कांग्रेस की हार का मतलब लोकसभा चुनावों का एक धु्रवीय हो जाना होगा। भारत में चुनाव या तो मजबूत सांगठनिक स्तर पर जीते जाते हैं या किसी नेता के करिश्माई व्यक्तित्व पर। इन राज्यों में अगर कांग्रेस नाकाम रही तो यह उसकी सांगठनिक क्षमता के खात्मे की घोषणा भी होगी और आगे के लिए रह जाएगा सिर्फ करिश्मा। अब यह तो साफ है कि राहुल का व्यक्तित्व उतना करिश्माई नहीं है कि पूरा देश उनके नाम पर कांग्रेस को वोट करे। बिना किसी मजबूत संगठन के कांग्रेस राहुल के बल पर तो लोकसभा चुनाव में कोई करिश्मा कर ही नहीं सकती है। इन तीन राज्यों में अगर कांग्रेस और उसके अगुआ राहुल कुछ नहीं कर पाए तो आगे लोकसभा चुनावों में कोई चमत्कार ही कांग्रेस का अस्तित्व बचा सकता है। राजनीति के मैदान में अगर संगठन, रणनीति या करिश्माई व्यक्तित्व नहीं है तो किसी भी तरह के चमत्कार की उम्मीद बेमानी है। कांग्रेस के लिए तो फिलहाल एक ही संदेश है-करो या मरो।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App