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बेबाक बोल: दर्द की दवा क्या…

औपनिवेशिक शासन के अंत ने भारत को विभाजन जैसे नासूर के साथ कश्मीर जैसी लाइलाज बीमारी भी दे दी। राजे-रजवाड़ों को आजाद हिंदुस्तान की हुकूमत की सरपरस्ती में लाने के दौरान कश्मीर को लेकर जो शुरुआती चूक हुई उसे आज तक दुरुस्त नहीं किया जा सका है। अब यह चूक कश्मीरी मूल के भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की रही है या तत्कालीन स्थितियों की, लेकिन सच तो यह है कि केंद्र की मौकापरस्त नीतियों ने इस छोटे से भूगोल को एक बड़ी सांस्कृतिक, सामाजिक और राजनीतिक समस्या में तब्दील कर दिया है। जो शेख अब्दुल्ला राजतंत्र के बरक्स लोकतंत्र की बात कर रहे थे, कश्मीरी अवाम को जनांदोलनों से जोड़ रहे थे वे अचानक भारत की केंद्र सरकार की आंखों की किरकरी बना दिए जाते हैं और पाकिस्तान में नायक की तरह देखे जाने लगते हैं। शेख अब्दुल्ला गिरफ्तार होते हैं और कश्मीर की अवाम दिल्ली से दूर हो जाती है। उसके बाद से यह दूरी बढ़ती ही गई है। आज जब केंद्र में फिर से बहुमत वाली एक मजबूत सरकार है तो सवाल है कि क्या कश्मीर को उसकी बीमारी की सही दवा दी जाएगी। कश्मीर का माकूल हल अब नहीं तो कब, यही सवाल पूछता बेबाक बोल।

प्रतीकात्मक तस्वीर।

दिल्ली के एक चमचमाते निजी अस्पताल में सड़क हादसे के मरीज को जब होश आया तो उसके होश उड़ गए। उसे तकलीफ बाएं पैर में थी लेकिन डॉक्टरों ने आॅपरेशन दाएं पैर का कर दिया। एक बड़े सरकारी अस्पताल में कैंसर के मर्ज का लंबे समय तक पता ही न चला और उसे ट्यूबरक्लोसिस (टीबी) की दवा दी जाती रही। आज जब पिछले चालीस साल के दौरान जम्मू-कश्मीर आठवीं बार राष्ट्रपति शासन (यहां के संदर्भ में राज्यपाल) के दायरे में है तो लगता है कि राजनीति विज्ञान अपनी गलती कब ठीक करेगा, कैंसर के मरीज को टीबी की दवा देने की। ‘पंजाब में आतंक के उदय का एक कारण नई दिल्ली के उच्चस्तरीय महकमे की सांठगांठ है। राज्य पर अपनी पकड़ बनाने के चक्कर में तत्कालीन केंद्रीय सरकार ने राजनीतिक हिंसा होने दी ताकि स्थानीय विपक्ष शांत रहे। इस रवैए ने आतंकवाद को एक तरह से बढ़ावा दिया’। राहुल चंदन अपनी किताब ‘द पारामाउंट कॉप’ में कंवर पाल सिंह गिल का यह उद्धरण पेश करते हैं। केपीएस गिल के नाम के साथ ही जुड़ता है पंजाब और वहां से आतंकवाद का खात्मा।

आज जलते हुए कश्मीर को देख कर भारत के हर कोने से यही आवाज आती है कि जब पंजाब में आतंकवाद का खात्मा हो सकता है तो कश्मीर में क्यों नहीं? एक ही देश के दो हिस्से और आतंक का खिलाड़ी वही पड़ोसी देश। पाकिस्तान की सीमा से जुड़े इस सूबे में आतंकवाद के खिलाफ दिल्ली की इच्छाशक्ति की गर्जना हुई तो वहां उम्मीद भरी सुबह को आते देर नहीं लगी। चेचन्या से लेकर इजराइल तक आतंकवाद को अलविदा कह चुके हैं तो कश्मीर के जख्म का कोई मरहम क्यों नहीं निकाला जा रहा? यह सही है कि आज के दौर में हम पंजाब और कश्मीर के हालात की सीधे तौर पर तुलना नहीं कर सकते हैं। कश्मीर जैसा छोटा भूगोल आज हमारी ही गलतियों के कारण पाकिस्तान से लेकर चीन और अमेरिका के लिए राजनीतिक सौदेबाजी का अड्डा बन बैठा है। आज समानता इस बात की है कि पाकिस्तान खालिस्तानियों को भी समर्थन दे रहा था और अब वही कश्मीरी अलगाववादियों का भी आका बना बैठा है। यहां एक बुनियादी अंतर इतिहास और भूगोल को लेकर भी है। दिल्ली की सत्ता ने कश्मीर को वह इतिहास और राजनीति दी कि आज कश्मीरियों के मन में इतनी कड़वाहट है कि दिल्ली बहुत दूर हो गई है। भारत की औपनिवेशिक आजादी के बाद एक वह भी दौर था जब जवाहरलाल नेहरू दावा करते थे कि रायशुमारी कराई जाए तो कश्मीरी भारत के साथ आएंगे। लेकिन आज दशकों बाद दिल्ली से कश्मीर का यह भरोसा क्यों डोल गया? दिल्ली दरबार की वह कैसी और कौन सी भूमिका थी जो कश्मीरियों के लिए अलगाव की जमीन तैयार कर रही थी?कश्मीर ने शेख अब्दुल्ला के नेतृत्व में शुरू हुआ भूमि सुधार आंदोलन भी देखा है। इतिहास गवाह है कि बिहार और बंगाल से पहले यह क्रांतिकारी कदम कश्मीर में उठा। शेख अब्दुल्ला जैसे जमीनी नेता कश्मीर की अवाम को ‘भारत’ से जोड़ रहे थे।

आजादी और भारत-पाक विभाजन के बाद राजे-रजवाड़ों को अपनी तरह से आजाद हिंदुस्तान में जुड़ने का मौका दिया गया। हैदराबाद के निजाम मुसलिम थे और वे आजादी चाहते थे। वहीं कश्मीर में बहुसंख्यक मुसलिम आबादी के राजा हरि सिंह थे और वे भी आजादी चाहते थे। लेकिन जब कश्मीर पर पाकिस्तानी कबायली हमला हुआ तो हरि सिंह ने नेहरू से मदद मांगी और कहा कि हम आपके साथ होना चाहते हैं। इसी स्थिति ने जम्मू कश्मीर का भारत के साथ विलय और अनुच्छेद 370 से नाता जुड़ा। यानी बाहरी शक्तियों से सुरक्षा देने का काम भारत सरकार करेगी, यही समझौता कायम हुआ। दावा किया जाता है कि इस पर सरदार पटेल ने कहा था कि नेहरू पछताएंगे। इसके बाद जनांदोलन के नेता, कश्मीर में लोकतंत्र की बात करने वाले शेख अब्दुल्ला को जेल में डाल दिया जाता है। एक वह दौर भी था जब कांग्रेस ने पाकिस्तान के खिलाफ शेख अब्दुल्ला का इस्तेमाल किया और बाद में उसी शेख अब्दुल्ला को भारत का दुश्मन करार दिया। कश्मीर में लोकतंत्र की पौधशाला बनाने वाला पाकिस्तान के लिए हीरो बन बैठा। जिस नेतृत्व के साथ जनता खड़ी थी, उसे दिल्ली दरबार ने धूमिल कर खारिज किया। कश्मीर की जनता से दिल्ली का नकारात्मक रिश्ता यहीं से शुरू होता है। नब्बे का दशक आते-आते कश्मीर के साथ केंद्र की यह मौकापरस्ती आम बात हो गई। इतनी असमानताओं के बाद भी आज कश्मीर में वही पंजाब वाला हल दिखता है राजनीतिक इच्छाशक्ति और भरोसा बहाली का। याद रखें कि केपीएस गिल ने पंजाब में सिर्फ बंदूक का सहारा नहीं लिया। पहले तो दिल्ली दरबार को यह मानना पड़ेगा कि यह आग हमारे घर में लगी है जिस पर किसी संयुक्त राष्टÑ का पानी नहीं डालना है। कश्मीर में सेना पर पत्थर फेंक रहे, भारत सरकार के खिलाफ नारे लगा रहे किशोर से लेकर युवा तक हमारे अपने हैं। गिल ने पंजाब के लिए पंजाब की ही अवाम का सहारा लिया था।

गिल ने पंजाबी युवाओं में सेना के प्रति सकारात्मक विचार भरे, सरहद और देश से प्रेम करना सिखाया। पंजाब के पहले गिल को भारत के अन्य राज्यों का अनुभव हो चुका था। वे स्थानीयता की अहमियत भी समझते थे। अगर आतंकवाद की बीमारी पंजाब को है तो दवा बंगाल को नहीं खिलाई जा सकती है। गिल ने सरकार और अवाम के बीच भरोसे का पुल बनाया। पुलिस महकमे में ऐसा नियम बनाया कि जो पुलिसवाला जितने बड़े आतंकियों का सफाया करेगा उसे उतना बड़ा ओहदा मिलेगा। पंजाब में हजारों नौजवानों की पुलिस में भर्ती की गई। आतंकवाद से प्रभावित श्रीलंका ने एलटीटीई से निपटने के लिए केपीएस गिल के अनुभवों की सेवा ली। छत्तीसगढ़ में भी नक्सलवाद के खात्मे के लिए केपीएस गिल को बुलाया गया। लेकिन गिल छत्तीसगढ़ में कामयाब नहीं हो पाए। वहां बड़ी संख्या में सैन्यकर्मियों की मौत सिर्फ गिल नहीं बल्कि राज्य और केंद्र सरकार की भी नाकामी थी। वहां राज्य की इच्छाशक्ति की कमी भी अहम थी।

आज कश्मीर की कराह इतनी बढ़ चुकी है कि उसे आतंकवाद से खात्मे के लिए पंजाब से भी आगे जाना होगा। केंद्र को कश्मीर की जनता के लिए नीतियां बनाकर उनके बीच जाना होगा। पाकिस्तान की पूरी कोशिश होगी कि यहां जनता और सेना की मुठभेड़ होती रहे और फिरकापरस्त ताकतें कश्मीर को भारत से दूर करती रहें। संयुक्त राष्टÑ की रिपोर्ट कश्मीर में आतंकवादियों की घुसपैठ को ‘स्पैम’ में डाल देती है। लेकिन उसी अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट में पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर के लिए 26 बार ‘आजाद जम्मू कश्मीर’ और आतंकवादियों के लिए ‘लीडर’ और आतंकवादी संगठनों के लिए हथियारबंद समूह जैसे शब्द का इस्तेमाल हो रहा है तो समझा जा सकता है कि यह लड़ाई पंजाब से कितनी ज्यादा बड़ी हो चुकी है। हम अपनी लड़ाई को संयुक्त राष्टÑ ले गए थे और आज अलगाववादी नेता मीरवाइज फारूक और पाकिस्तानी आतंकवादी हाफिज सईद इसकी रिपोर्ट का शुक्रगुजार हो बैठता है।
कश्मीर के मामले में सब कुछ नकरात्मक ही नहीं है। आज वहां आतंकवादियों के चेहरों से मुखौटा उतर चुका है। कश्मीरी युवाओं की पहचान बोर्ड परीक्षाओं और सिविल सेवा परीक्षाओं के टॉपर और फिल्मी सितारों के रूप में बन रही है। यह कश्मीरी अवाम की इच्छाशक्ति है कि आतंकवाद कुछ छोटे जिलों तक सिमट कर रह गया है। और सबसे बड़ी बात है, केंद्र में एक मजबूत सरकार। इस समय भी कश्मीर को कश्मीर की बीमारी वाली दवा नहीं दी गई तो आगे भी यह लाइलाज ही रहेगा।

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