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राजकाज: धृतराष्ट्र जिंदा है

दुनिया में जहां भी लोकतंत्र के लिए ललक पैदा हुई उसका इतिहास बताता है कि वहां न सिर्फ राजशाही रही बल्कि एक ऐसा राजा या उसकी पीढ़ी रही जिसने अनीति और अन्याय की हद कर दी।

bebak bol, rajkajआजादी के बाद से जिस तरह संतान स्थापना राजनीतिक दलों का ध्येय बन गया है उसे देख लगता है कि धृतराष्ट्र तो आज भी जिंदा है।

आज जब हम लालकिले पर तिरंगा फहरते देखेंगे तो इस किले का प्राचीर वह इतिहास भी याद दिलाएगा कि भारत जैसे देश में जनतंत्र की स्थापना कितनी मुश्किल है जहां सामंती विरासत को ढोती हुई सरकार चलती है। संविधान के कागजों पर लिखे बराबरी के सिद्धांत को उन्हीं नेताओं की अगली पीढ़ी ने धता बता दिया जो औपनिवेशिक लड़ाई के सेनानी थे। लोकतंत्र की पड़ताल यही है कि सत्ता किसे और कैसे मिलती है। भारत में आज भी राजा का बेटा राजा के सिद्धांत को आंख मूंद कर स्वीकार कर लिया जाता है। राजनीति के वटवृक्ष अपने आसपास सिर्फ अपनी संतानों को फलने-फूलने का अवसर देते हैं। जिस पुत्रमोह को महाभारत की सबसे बड़ी वजह बताया गया, वह लोकतंत्र की जड़ों में अब विषबेल की तरह लिपटी है। आजादी के बाद से जिस तरह संतान स्थापना राजनीतिक दलों का ध्येय बन गया है उसे देख लगता है कि धृतराष्ट्र तो आज भी जिंदा है। लोकतंत्र के धृतराष्ट्रों पर बेबाक बोल

अठारह दिनों के युद्ध के बाद कुरु वंश का नाश हो गया, यदुवंश को खात्मे का शाप मिल चुका और विजेता पांडवों के हिस्से भी मौत का मंजर है। इंसान के शव को देख आसमान में इतने गिद्ध उड़ रहे हैं कि हस्तिनापुर की उम्मीदों पर अंधेरा छाया हुआ है। जो देख सकते थे, इस अंधेरे में अब उन्हें भी कुछ नहीं दिख रहा।

हस्तिनापुर का वह नरेश अभी जिंदा है जिसका वंश उजड़ चुका है। वह इस युद्ध के विजेता पांडवों से मिलना चाहता है। कहता है कि योद्धा भीम के गले लगना चाहता है। वही योद्धा जिसने दुशासन का खून पीया और छल से दुर्योधन की जंघा तोड़ी। युधिष्ठिर और अर्जुन को छोड़ भीम से गले लगने की मंशा को कृष्ण ने भांप लिया। धृतराष्ट्र तो गोचर को नहीं देख सकते थे लेकिन नारायण अगोचर को भी देख सकते थे। हारे हुए राजा ने भीम को आलिंगन में लेकर अपनी शक्ति से उसके शरीर को चकनाचूर कर दिया और यह अहसास होते ही कि उसने भीम की हत्या कर दी है, वह फूट-फूट कर रोने लगा।

सब कुछ खत्म होने के बाद भी धृतराष्ट्र यह नहीं समझ पाए कि इस संहार की जड़ में उनका पुत्रमोह था। धृतराष्ट्र की शुरुआत होती है जन्मजात शारीरिक अयोग्यता के कारण भेदभाव से। नेत्रहीनता के कारण कुंठाजनित महत्वाकांक्षा उनके चरित्र को नकारात्मक बना देती है। कई जगह वे तर्क की जमीन पर खड़े होते हैं लेकिन फिर कुंठित पुत्रमोह उस जमीन पर भूकम्प ला देता है। एक तरफ तो भीम की हत्या की कोशिश और दूसरी तरफ फूट-फूट कर रोना और पांडवों को गले लगा कर अपना लेना। धृतराष्ट्र के चरित्र का यह आरोह-अवरोह जिस बिंदु पर जाकर टिकता है वह पुत्रमोह ही है। जो भी है, जैसा भी है मेरे बाद मेरे बेटे को ही सत्ता मिले।

इसी तरह भारत की राजनीति, वंशवाद के चक्रव्यूह को आज तक नहीं भेद पाई है। हर राजनेता की संतति गर्भ से ही यह सुन कर आती है कि उसके अभिभावक की संसदीय सीट उसी की होनी है। उसकी शिक्षा में राजतंत्र का वंशवाद यानी जन्मजात अधिकार तो है लेकिन लोकतंत्र का कर्तव्य नहीं। आखिर हम आज के आधुनिक भारत में भी उत्तर से लेकर दक्षिण तक वंशवाद के धृतराष्ट्र आलिंगन और सामंती प्रवृत्ति को लोकतंत्र का सामान्य नियम मान लेने के लिए बाध्य क्यों हो जाते हैं?

धृतराष्ट्र का पुत्रमोह सिर्फ सामंती व्यवस्था तक सीमित नहीं रहा। इसकी जड़ में पितृसत्ता ही थी। इसलिए आधुनिक पूंजीवाद में भी व्यवस्था को बनाए रखने के लिए पितृसत्ता का इस्तेमाल किया गया है। पितृसत्ता होगी तो पुत्र-मोह भी होगा। दोनों में गहरा संबंध है। आधुनिक सभ्यता राजा का बेटा राजा वाली सामंती व्यवस्था को ही ढो रही है और आजादी से लेकर आज तक हर राजनीतिक दल में अपने-अपने धृतराष्ट्र वंशवाद से आलिंगनबद्ध हैं।

भारत में जनतंत्र, राजतंत्र के खिलाफ लड़ कर नहीं आया। यहां का जनतंत्र अंग्रेजों के साम्राज्यवाद की मुखालफत का हासिल है। रोचक है कि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के एक दौर में कई सामंती ताकतों ने भी बहुत दूर तक उपनिवेशवाद के खिलाफ लड़ाई लड़ी। वे हमारे राष्ट्रीय नायक बने। चाहे वे बहादुरशाह जफर हों या झांसी की रानी, तमाम राजे-रजवाड़े भी 1857 में अंग्रेजों से लड़े। ऐसी भी रियासतें रहीं जो अंग्रेजों के साथ थीं और उनके जाने के बाद अपना स्वतंत्र अस्तित्व चाहती थीं।

1947 में भारत को आजादी मिली तो उसके सामने 562 से ज्यादा आजाद रियासतों की समस्या थी। लॉर्ड माउंटबेटन के भारत स्वतंत्रता अधिनियम के अनुसार इन रियासतों को भारत या पाकिस्तान में विलय के अलावा संप्रभु रहने का विकल्प भी दिया गया था। लेकिन जवाहरलाल नेहरू और अंतरिम सरकार के उपप्रधानमंत्री व गृह मंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल समझ चुके थे कि ये रियासतें औपनिवेशिक और सामंती शक्तियों का औजार बन बगावत की मुश्किलें पैदा करती रहेंगी।

इसलिए इन्हें भारतीय संघ में शामिल करने के ‘लौह’ इरादे को सरदार पटेल ने दो साल में पूरा किया। हैदराबाद, जूनागढ़ और कश्मीर जैसी रियासतें जो संप्रुभता की हुंकार भर रही थीं, उन्हें भी भारतीय गणराज्य में विलय को स्वीकारना पड़ा। आगे चल कर इंदिरा गांधी ने इन रजवाड़ों को मिल रही ‘प्रिवी पर्स’ की सुविधा खत्म कर गणतंत्र में राजतंत्र के प्रतीक को खत्म कर दिया।

आजादी के बाद भारतीय मानसिकता जितनी जनतांत्रिक और आधुनिक हुई है, वह वंशवाद के खिलाफ नहीं उपनिवेशवाद के खिलाफ लड़ कर हुई है। यही वजह है कि तमाम राजे-रजवाड़े निरंतरता में चलते रहे। इनके वंशवाद को तोड़ने की कोशिश तो नहीं हुई, अलबत्ता यह जरूर हुआ कि उन सामंती ताकतों का सहारा लेकर सत्ता हासिल करने में सफलता प्राप्त हो गई।

आजादी के बाद कांग्रेस तो वंशवाद की अमरबेल साबित हुई। लेकिन उसके विकल्प में जितने भी राष्ट्रवादी, लोहियावादी तथा समाजवादी दल खड़े हुए उनके अगुआ धृतराष्ट्रों को विरासत में अपनी संतानों के अलावा कुछ भी मंजूर नहीं था चाहे अयोग्य संतानों के कारण पार्टी ही क्यों न डूब जाए। जिंदा कौमें पांच साल इंतजार नहीं करतीं का मंत्रोच्चार करने वाले नेता विकल्प के नाम पर सिर्फ अपनी संतानों के जवान होने का इंतजार करते रहे।

भारतीय राजनीति में वंशवाद के सवाल से मुठभेड़ किया राष्ट्रवादी विचारधारा की एक पार्टी ने, लेकिन खास संदर्भ में। वंशवाद की परंपरा को सत्तर साल की सत्ता के खिलाफ इस्तेमाल करते हुए पहली बार नकारात्मक रूप से जनमानस के बीच लाया गया। इसे चुनाव के मैदान में सबसे बड़ा मुद्दा बना कर उतारा गया। लेकिन राजनीति में इस सार्थक दखल को कांग्रेस और खासकर नेहरू खानदान तक ही सीमित रखा गया।

विकल्प का आह्वान कर कांग्रेस के खिलाफ परिवारवाद पर हमला सफल साबित हुआ और वह इसी तर्क पर खारिज भी हुई। दुखद है कि कांग्रेस के खारिज होने के बाद भी वंशवाद की जड़ें उतनी ही मजबूती से जमी हुई हैं। आज भारतीय राजनीति में सबसे आम चरित्र धृतराष्ट्र है। कई दलों में नेताओं की विरासत की दूसरी से तीसरी पीढ़ी आ गई, लेकिन परिवारवाद पर बहस का दायरा कांग्रेसी चेहरों तक सीमित कर इस मुद्दे के जरिए जो जनतंत्रीकरण की प्रक्रिया होनी चाहिए थी वह नहीं हुई। एक वारिस के खिलाफ दूसरे वारिसी चेहरे को आराम से उतार दिया जाता है। बाप के बाद उसकी संतान को जनता के जरिए सत्ता हस्तांतरित करवा दी जाती है।

दुनिया में जहां भी लोकतंत्र के लिए ललक पैदा हुई उसका इतिहास बताता है कि वहां न सिर्फ राजशाही रही बल्कि एक ऐसा राजा या उसकी पीढ़ी रही जिसने अनीति और अन्याय की हद कर दी। धृतराष्ट्र के मामले में भी यही बात लागू होती है। पहले तो आप सभी बातों से अनजान होकर आंखें मूंदे रहते हैं। इन सबका केंद्रीय भाव हो जाता है कि मेरी संतान ही मेरी शक्ति हासिल करे। भारतीय राजनीति में समय-समय पर ऐसे कई वटवृक्ष रहे जिन्होंने बड़े मूल्यों की आड़ में अपने छोटे स्वार्थ साध लिए। ये कभी भी हमारी लोक नीति को बड़ा नहीं होने देते।

इस दुविधा में हम पहले भी थे और आज भी हैं। महाभारत में अश्वत्थामा को मौत नहीं दी गई और उसे आज तक जिंदा माना जाता है। मगर भारतीय राजनीति में वंशवाद के वर्चस्व से लगता है कि महाभारत का अमर चरित्र तो धृतराष्ट्र है। वही जो महाभारत काल में मरा हाड़-मांस का इंसान था। लेकिन संतान मोह की जिस अंध मानसिकता का वह द्योतक है उस रूप में वह कभी मरा ही नहीं। धृतराष्ट्र जिंदा है।

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