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बेबाक बोलः अमरत्व का अभिशाप

अमरत्व के अमृत पर पूरी दुनिया की सभ्यता अपने हिसाब से मंथन कर मृत्यु से पार पाने की कोशिश करती है। लेकिन महाभारत दुनिया का ऐसा दुर्लभ काव्य ग्रंथ है जो सभ्यता को संदेश देता है कि अमरत्व से बड़ा अभिशाप कुछ भी नहीं है। कुरुक्षेत्र के मैदान में मृत्यु को भी एक कर्म के रूप में देखा गया है। जो आया है वह जाएगा भी, इससे खुद जीवनदायक नारायण भी परे नहीं हैं। पौराणिक ग्रंथों में मोक्ष की अवधारणा है यानी जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त हो जाना। मोक्ष के विपरीत अश्वत्थामा जैसे किरदार जब अमरत्व की मणि लेकर आते हैं तो मृत्युलोक में उनके नायकत्व का कद छोटा हो जाता है। अपने कौशल व शक्ति से लड़ने, जीतने या मरने वालों के सामने अश्वत्थामा का अमरत्व उसे एक गढ़ा हुआ नायकत्व देता है, जिसकी इतिहास में कद्र नहीं होती है। एक सकर्मक जीवन के बाद मृत्यु कितनी सकारात्मक हो सकती है, इसी की बात करता बेबाक बोल।

महाभारत में अश्वत्थामा का पूरा चरित्र समय और काल के अनुसार विकास करता है।

महाभारत को मृत्यु, जीवन और नीति के महापर्व के रूप में भी देखा जाता है। यहां मृत्यु यानी युद्ध जीवन का पर्याय भी है। महाभारत वह महाख्यान है जिसमें पहली बार बताया गया है कि अमरत्व का कोई मूल्य नहीं है। पृथ्वी को मृत्युलोक कहा गया है। इस लोक में मृत्यु उतना ही बड़ा सच है जितना जीवन। जहां मृत्यु को एक कर्म की तरह देखा जाता है, वहां अमरत्व एक शाप बन जाता है जिसे अपने कर्मों से झेलना पड़ता है।

एक मृत्यु शारीरिक होती है तो दूसरी आध्यात्मिक। एक निश्चित समय के बाद हम खत्म नहीं होते हैं तो आध्यात्मिक भी नहीं हो सकते हैं। जीवन और मृत्यु के बीच अश्वत्थामा के अमरत्व को लाकर वेदव्यास ने एक ऐसा चरित्र गढ़ा जो दुनिया के पौराणिक साहित्य में दुर्लभ है। जब हम कहते हैं कि अश्वत्थामा आज भी जिंदा है तो हम समय के संदर्भ में महाभारत की सर्वकालिकता को समझते हैं।

महाभारत में अश्वत्थामा का पूरा चरित्र समय और काल के अनुसार विकास करता है। यह शुरू से अंत तक बदलता हुआ चरित्र है। नायकों के दो तरह के चरित्र होते हैं। एक में हम स्थिरता देखते हैं, जैसे दुर्योधन और कर्ण के चरित्र। ये दोनों जैसे पहले थे वैसे ही बाद में भी हैं। यानी परिस्थितियों का, इतिहास का, समय का, देश का, काल के बदलाव का जैसे इन पर कोई असर ही नहीं होता है। दूसरा चरित्र परिवर्तनशील होता है। जिस तरह की परिस्थितियां बनती हैं, उनमें वह चरित्र नए रूप गढ़ता है। वह समय और इतिहास से प्रभावित होकर नए तरीके से प्रतिक्रिया देता है।

अश्वत्थामा के चरित्र में लगातार परिवर्तन दिखाई देता है। जो चरित्र सबसे मानवीय है, वह कैसे अमानवीय रूप धर लेता है, इसका वह ज्वलंत उदाहरण है। उस तरह की अमानवीयता कर्ण में नहीं दिखाई देती, क्योंकि उसके चरित्र में निज को लेकर स्थिरता है। दुर्योधन में शुरू से ही एक स्वार्थी और अमानवीय प्रवृत्ति को दिखाया गया। अश्वत्थामा की जिंदगी में गरीबी से लेकर अमीरी तक का विरोधाभास रहा। उसने खुद को इन सबके अनुकूल ढाला। लेकिन जिस तरह उसके पिता की हत्या हुई वहां से उसके चरित्र में एकदम से परिवर्तन आता है। इसके बाद वह मृत्यु को ही न्याय मानता है। वह तो मौत को सजा के तौर पर देखता है। लेकिन इसके उलट उसे जिंदगी की सजा मिलती है। कृष्ण उसे शाप देते हैं, तुम जिंदा रहोगे और भटकते रहोगे। जिंदगी भी कोई सजा हो सकती है यह महाभारत में पहली बार दिखाया गया है। धर्म की पुनर्स्थापना के लिए अधर्म को जायज बनाने के मार्ग में वह अपना जो रास्ता तय करता है उसमें उसके अमरत्व को सजा बना दिया जाता है।

अश्वत्थामा भी दुर्योधन का कर्ण जैसा ही प्रिय दोस्त था। लेकिन दुर्योधन ने कभी उसे कर्ण जैसी अहमियत नहीं दी। वह बचपन से ही दुर्योधन के साथ अपनापन महसूस करता था। राजकुमारों के गुरुकुल में पांडव उसे अपने पिता की वजह से आया शिष्य ही देखते थे। लेकिन दुर्योधन ने अपने जीवन का पहला दोस्त गुरुकुल में अश्वत्थामा को ही बनाया। अश्वत्थामा तो दुर्योधन की दोस्ती से सम्मोहित-सा रहता था और उसे अपना सब कुछ मानता था।

द्रुपद से द्रोण के अपमान का बदला पांडु पुत्र लेकर आए इसके बावजूद अश्वत्थामा उनकी ओर आकर्षित नहीं हुआ। द्रोण उस पर पांडवों से बेहतर रिश्ते बनाने का जितना दबाव डालते गए वह इसे पक्षपात मान अपने पिता से उतना ही दूर होता चला गया। एकलव्य का अंगूठा लेने के बाद अपने पिता और गुरु द्रोण का तीव्र विरोध अश्वत्थामा ने ही किया। उसने अपने पिता से कहा कि आपने अर्जुन को अजेय बनाने के लिए एकलव्य से अन्याय किया।

दुर्योधन के दो दोस्त उसकी जिंदगी में अहम थे जिनमें अश्वत्थामा का स्थान अनोखा है। भीष्म ने दुर्योधन को कहा था कि पांडु पुत्रों को पहले ही जीत का वरदान दे चुका हूं इसलिए तुम्हें नहीं दे सकता। लेकिन तुम्हें ये वरदान देता हूं कि मरने से पहले तुम्हारे चेहरे पर परम संतोष होगा। उस परम संतोष का कारण अश्वत्थामा था। कर्ण ने भी एक हद तक दुर्योधन के साथ धोखा किया था। पिता सूर्यदेव के आगाह करने के बावजूद उसने कवच कुंडल दान कर दिया। कर्ण की नजर में दुर्योधन की जीत से ज्यादा अहम निज की पहचान की रक्षा करना था। दानवीर होने के मान को बचाना उसके लिए जरूरी था वो भी तब जब दुर्योधन ने उससे कहा था कि तुम्हारा कवच ही मेरा कवच है।

सिर्फ कवच कुंडल लेने से कर्ण नहीं मर सकता था। कृष्ण जानते थे कि कर्ण के पुण्य का फल ही उसका असली कवच है। कृष्ण खुद ब्राह्मण बन कर उसके दान का पुण्य भी मांग लेते हैं। अपने मान की आन में कर्ण खुद को निहत्था कर बैठता है। वह इनमें से कोई बात दुर्योधन को नहीं बताता है। यह भी नहीं कि वह कुंती का बेटा है। उसके लिए दोस्त की जीत से अहम निज की छवि थी।

अश्वत्थामा ने अपने स्व को दुर्योधन में समाहित कर लिया था। इसलिए अमरत्व का वरदान भी उसे नायकत्व नहीं दिला सका। गदा युद्ध के बाद मौत के मुंह में तड़पते हुए दुर्योधन से वह पूछता है कि मैं तुम्हारे लिए क्या कर सकता हूं? दुर्योधन को चैन की मौत देने के लिए उसने अपने हिसाब से तो पांचों पांडवों को मार दिया था। पांडवों के बच जाने और उनके प्रतिघात के बाद वह ब्रह्मास्त्र उत्तरा के गर्भ की तरफ छोड़ देता है कि मैं तुम्हारे वंश का नाश कर दूंगा।

अश्वत्थामा के खाते में क्या जमा हो रहा है? कृष्ण युद्ध शुरू होने के पहले ही अभिमन्यु को कहते हैं कि महाभारत के बाद तुम्हें याद रखा जाएगा। यह सुन द्रौपदी डर जाती है कि इसका तात्पर्य, बाद में वह नहीं रहेगा। कृष्ण द्रौपदी को कहते हैं कि पांच पांडवों के अलावा सब मर जाएंगे और इस वंश का भी नाश हो जाएगा। कृष्ण ने कुरुक्षेत्र में शस्त्र नहीं उठाने की शपथ ली थी। लेकिन वे दो बार शस्त्र उठाते हैं। एक बार भीष्म पितामह के लिए, लेकिन फिर उसे वापस ले लेते हैं। दूसरी बार अश्वत्थामा के लिए। कृष्ण को उनके वचन से डिगाने वाला भी अश्वत्थामा ही है। कुरुक्षेत्र के युद्ध में कौरवों का नाश हो गया, गांधारी के शाप से कृष्ण का यदुवंश नष्ट हो गया। लेकिन कहा जाता है कि अश्वत्थामा आज भी जिंदा है। कृष्ण ने शाप दिया कि तुम्हारा अमरत्व अभिशाप बन कर रह जाएगा। तुम मौत खोजते रह जाओगे लेकिन तुम्हें मौत मिलेगी नहीं।

आम हालात में अश्वत्थामा के सिर पर अमरत्व की मणि के साथ नायकत्व का मुकुट सजता। लेकिन वह इससे वंचित रहा क्योंकि अपने पिता के अनुसार योग्य पुत्र नहीं था। पिता ने ब्रह्मास्त्र छोड़ना तो सिखाया मगर वापस लेना नहीं सिखाया। इसलिए वह ब्रह्मास्त्र वापस नहीं बुला सका और उत्तरा के गर्भ में चला गया। कृष्ण ने भविष्यवाणी की थी कि पांडव कुल नहीं बचेगा। लेकिन वे खुद उत्तरा के गर्भ पर हाथ रख देते हैं और ब्रह्मास्त्र से बचाते हैं। उत्तरा का बच्चा पैदा होता है लेकिन वह आठ जगह से मुड़ा हुआ होता है। पांडवों के वंश का नाश बाद में होता है जब तक्षक उत्तरा के पुत्र परीक्षित को डस लेता है।

अश्वत्थामा सबसे बड़ा योद्धा था मगर वह अपनी साख नहीं बना पाता है। फिर भी मित्रता की कसौटी पर सबसे मजबूत चरित्र वही है। पिता की मृत्यु वह जाल है जहां से उसके लिए नीति और अनीति की विभाजन रेखा खत्म हो जाती है। यहीं से एक उच्च चरित्र की महत्ता की हत्या हो जाती है और वह अमानवीय रूप में उभर कर सामने आता है। इस तरह का और कोई चरित्र महाभारत में नहीं जो इतना विराट हो और उसके अंत को अंतहीन बना उसके नायकत्व को शून्य में विलीन कर दिया गया हो।

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