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बेबाक बोलः राम राष्ट्र

अयोध्या में राम मंदिर की बुनियाद रखे जाने के साथ भारतीय राजनीतिक, सांस्कृतिक व सामाजिक इतिहास का एक बड़ा अध्याय निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया। राम मंदिर निर्माण को लेकर जिस तरह प्रमुख राजनीतिक दलों के बयान आए वे भारतीय राजनीति में धर्म की भूमिका की पुनर्व्याख्या की मांग करते हैं। अपवाद को छोड़ कर ज्यादातर मुसलिम पक्षकारों ने मस्जिद मुद्दे पर सामाजिक समरसता का पर्दा गिरा दिया है। प्रधानमंत्री ने बुनियाद की र्इंट को रख संदेश दे दिया है कि आने वाले समय में धर्म और राज्य के उस रिश्ते में बदलाव आएगा जो अभी तक भारतीय सैद्धांतिक राजनीति का हिस्सा था। आज जब मंदिर निर्माण में ज्यादातर राजनीतिक दलों ने आस्था की हामी भरी है तो हम सरयू के तट से आए संदेश को ग्रहण करें। अब जरूरत है कि देश के नवनिर्माण में धर्म की शक्ति का सकारात्मक इस्तेमाल किया जाए। राष्ट्र और राम के संबंध पर बेबाक बोल।

राम मंदिर आंदोलन से लेकर उसके निर्माण तक की घटना आज भारत के इतिहास के लिए एक संदेश है।

एक घाव जो 1528 से लगा हुआ था उसकी मरहम पट्टी कर सुखाने में देश की जनता को पांच सदी का वक्त लग गया। जब मंदिर बनाने का सफर इतना लंबा है तो सोचिए, राम की अवधारणा को अपने अंदर उतारने के लिए कितनी पीढ़ियों को आगे बढ़ कर कुर्बानी देनी होगी।
तुलसी के राम की अवधारणा को आधुनिक भारत के इतिहास में गांधी ने समझा था। आइंस्टीन ने गांधी के बारे में कहा था कि आने वाली नस्लें मुश्किल से यकीन करेंगी कि धरती पर हाड़-मांस का ऐसा कोई व्यक्ति कभी चलता था। उस फकीर को राम की मर्यादा पर यकीन था। वे जानते थे कि राम क्या हैं। राम तो जन्म के बाद की मंगलकामना हैं, पालने की लोरी हैं, बेटी के ब्याह का शुभ गीत हैं तो पंचतत्व में अंत होने का संदेश भी हैं।

गांधी ने राम में ऐसा शासक देखा जिसने उत्तर से दक्षिण का भारत जोड़ा था। अयोध्या में राम मंदिर इक्कीसवीं सदी में बन रहा है, लेकिन गांधी ने बीसवीं सदी में ही ‘इमाम ए हिंद’ को भारत की प्रयोगशाला में उतार दिया था। लकड़ी का एक डंडा पकड़ कर चलने वाले बूढ़े के पीछे अपने हाथ से काती-बुनी खादी की साड़ी में स्वावलंबी स्त्रियां चल पड़ी थीं देश को फिरंगी हुकूमत से आजाद कराने। राम खादी की साड़ी वाली स्त्रियों का हौसला थे जिन्हें अंग्रेजों की बंदूकों और जेल से डर नहीं लगता था। रघुपति राघव राजा राम गाती हुई स्त्रियां मैनचेस्टर की कपड़ा मिलों के उपनिवेशवाद का अपने करघे से मुकाबला करने चली थीं। जिन्होंने सोने के गहने को स्त्री-धन के रूप में नकारते हुए देश के लिए दान कर आजादी के धन के लिए लड़ना कबूल किया था। राम कस्तूरबा में थे जिन्होंने शौचालय की सफाई को भी अपना धर्म माना। राम वे स्वतंत्रता सेनानी थे जो औरतों और बच्चों के साथ होकर दुनिया के इतिहास में 15 अगस्त 1947 लेकर आए। भारत के स्वतंत्रता संग्राम जितना अहिंसक आंदोलन दुनिया में दूसरा कोई नहीं है क्योंकि गांधी के पास राम नाम का लोककल्याणकारी हथियार था।

गांधी ने लंबी गुलामी के सामने रख दिया था राम को। गांधी जानते थे कि राम जैसा शासक होना आसान नहीं है। जिनके हाथों शंबूक वध होता है तो उसका पश्चाताप करते हैं और अंतिम जन की आवाज बनते हैं। समाज में अलग-अलग सुरों का समावेशी गीत रामधुन में निकलता है। उसमें भेदभाव और अभाव के खिलाफ भाव है। मां-बाप के लिए योगी बने तो प्रजा के न्याय के लिए वियोगी। चरण पादुका को सिंहासन पर रख राज्य चलाना लोकराज का सबसे प्राचीन प्रतीक है। खड़ाऊं प्रतीक है उस भरत भाव वाले लोक का जो एक अलिखित सांस्कृतिक-राजनीतिक संविधान सामने रखता है।

भौगोलिक रूप से विशाल और सांस्कृतिक रूप से बहुलतावादी पूरे भारत को जोड़ने वाला कोई ग्रंथ है तो वह है रामकथा यानी रामायण। संस्कृत, प्राकृत से लेकर तमाम क्षेत्रीय भाषाओं में अलग-अलग रूप में राम व्याप्त हैं। तुलसी ने रामकथा को अवधी में लिखा और घर-घर पहुंचा दिया। महात्मा गांधी ने इसी आध्यात्मिक राम को आधार बना कर अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ भारतीयता का आख्यान रचा। इस आध्यात्मिक राम की व्यापकता पूरे भारत में है जो उसे एक सूत्र में जोड़ने का काम करती है।

ऐतिहासिक संदर्भों में बात करें तो भारत में आधुनिकता की अवधारणा यूरोप से आई। गौरतलब है कि यूरोप की आधुनिकता चर्च और राजसत्ता के खिलाफ संघर्ष से पैदा हुई थी। यही कारण है कि उस आधुनिकता में अध्यात्म का निषेध है। वही यूरोपीय आधुनिकता जब भारत पहुंचती है तो यहां के परंपरागत समाज से टकराती है। पश्चिमी आधुनिकता के चश्मे से भारतीय परंपरागत समाज की कुरीतियां साफ-साफ दिखने लगी थीं। आधुनिकता के नजरिए से सती प्रथा और छुआछूत के खिलाफ बोध बन रहा था। इसी आधुनिकता से अंग्रेजों का साम्राज्यवादी वर्चस्व भी दिखाई दे रहा था।

गांधी ने यूरोपीय आधुनिकता को भारतीयता के संदर्भ में पुनर्भाषित करने का प्रयोग किया। उन्होंने यूरोपीय ढांचे को स्वीकार करने के बजाए उसके भारतीयकरण की राह निकाली। यही वजह है कि उनकी आधुनिकता के सामने अन्य में यूरोप की तरह का चर्च नहीं है। यानी वे आधुनिकता को आध्यात्मिकता के खिलाफ नहीं खड़े होने देते हैं। वे यूरोप की आधुनिकता की जमीन पर राम की आध्यात्मिकता की बुनियाद रख रहे थे। राम गांधी के लिए उसी आधुनिक आंदोलनकारी अर्थ में भूमिका निभा रहे थे। गांधी के राम दशरथ पुत्र राम नहीं बल्कि वे आध्यात्मिक राम हैं जिसकी व्याप्ति पूरे भारत में है।

गांधी से ही प्रेरणा लेकर अवध के किसान आंदोलन में रामचरितमानस का आधार लिया गया था। रामकथा के जरिए किसानों को उनकी जमीनी लड़ाई के लिए जागृत किया गया था। आध्यात्मिक राम की व्याप्ति भारतीय जन और चेतना को साझेदारी में लाती है। इसके जरिए न सिर्फ सामंतवाद और जमींदारी के खिलाफ लड़ाई लड़ी गई बल्कि साम्राज्यवाद के खिलाफ भी गांधी राम को लेकर खड़े रहे। इसी राम नाम के साथ छुआछूत के खिलाफ लड़ कर सभी तरह की कुप्रथाओं का हल खोजने की कोशिश की गई। सफाई से लेकर औपनिवेशिक लड़ाई राम जी का काज करने की तरह थी।

भारतीय आधुनिकता के जिस ढांचे का गांधी ने इस्तेमाल किया वह आज दिखाई दे रहा है। भारत में सिर्फ वामपंथी दल हैं जो यूरोपीय ढांचे की धर्मनिरपेक्षता की बात करते हैं जिसमें धर्म और राज्य को अलग-अलग रखने की वकालत की जाती है। यह धर्म को व्यक्तिगत मसला कह कर राज्य को इससे दूर रहने की बात करता है। इसी आधार पर प्रधानमंत्री के मंदिर की बुनियाद के कार्यक्रम में शामिल होने पर सवाल भी उठाया गया था। लेकिन भारतीय जनमानस में आध्यात्मिकता की व्याप्ति को राज्य से अलग नहीं किया जा सकता है। लोगों के अंदर राम की व्याप्ति इतनी स्पष्ट हो तो राज्य व्यावहारिक रूप से उससे अलग नहीं हो सकता है।

भारत में धर्मनिरपेक्षता का मूल सर्वधर्म समभाव में है जिसे लेकर गांधी चले थे। यह और बात है कि भारतीय राजनीति ने इस सर्वधर्म समभाव को विभाजनकारी राजनीति बनाकर उसका वोट बैंक की तरह इस्तेमाल किया। आजादी के बाद भारतीय राजनीति ने तुष्टीकरण के रूप में धर्म के लोककल्याणकारी स्वरूप को ही नष्ट कर दिया।

गांधी के लोकवादी राम को भुलाते हुए तुष्टीकरण की चाबी राजीव गांधी ने दिखाई। एक हाथ में शाहबानो तो दूसरे हाथ में राम जन्मभूमि को रख तुष्टीकरण को तंदुरुस्त बनाने वाली कांग्रेस को अहसास नहीं था कि एक दिन यही उसकी सेहत के लिए सबसे बड़ा खतरा बन जाएगी। तुष्टीकरण की राजनीति ने भारतीयों की राजनीतिक चेतना को एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा कर दिया। मंदिर निर्माण की बुनियाद एक बड़े राजनीतिक अध्याय का अंत है जिसमें एक दल के बोए को दूसरे दल ने काटा।

राम मंदिर आंदोलन से लेकर उसके निर्माण तक की घटना आज भारत के इतिहास के लिए एक संदेश है। यह तो हम कभी नहीं भूलेंगे कि जिस भारत ने दुनिया को राम की अवधारणा के साथ गांधी की अहिंसा दी वहीं हाड़ मांस का संत ‘हे राम’ कहते हुए मारे गए। मंदिर-मस्जिद के पूरे झगड़े में जितने बड़े पैमाने पर हिंसा हुई और समाज का विभाजन हुआ वह भी इतिहास के पन्नों में दर्ज रहेगा। इसलिए जरूरी है कि भारतीय राजनीति और समाज के इस ऐतिहासिक मोड़ पर हम सामूहिक सबक का स्मारक बनाएं। फिलहाल मंदिर आंदोलन की यह पूरी प्रक्रिया आगाह करती है कि भारतीय राजनीति के संदर्भ में धर्म के सवाल पर पुनर्व्याख्या की फौरी जरूरत है। सरयू तट से संदेश है कि हाथ जला कर हाथ सेंकने के बजाए, धर्म की शक्ति का इस्तेमाल समाज के नवनिर्माण में करना चाहिए। गांधी कर चुके हैं, हमें तो बस दुहराना है।

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