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बेबाक बोलः द्रोणकाल

महाभारत में धर्म की पुनर्स्थापना के लिए जो अधर्म का चरम था वह खुद धर्मराज के अवतार ने किया। गुरु द्रोण का वध वह मोड़ है जहां व्यवस्था को बनाने के लिए व्यवस्था की हत्या को जायज ठहराया जाता है। व्यवस्था इस पर निर्भर करती है कि उसका प्रबंधन कौन कर रहा है। महाभारत के जरिए भारत में राज-समाज को चलाने के नियमों का निर्माण हो रहा था। वंशवाद से लेकर जातिवाद की सामंती व्यवस्था की बुनियाद पड़ रही थी। शिक्षा सीखने और सिखाने वाले के बीच सहज और सरल रिश्ता नहीं रह गया था। धर्म और राजसत्ता के गठजोड़ से इस पर खास वर्ग का वर्चस्व कायम हुआ। द्रोणाचार्य ने जिस गुरुकुल परंपरा की शुरुआत की, वहां ज्ञान को भी पैतृक संपत्ति की तरह अपने वारिसों के लिए ही हस्तांतरणीय बनाया गया। परशुराम से लेकर द्रोण जैसे पौराणिक चरित्रों के जरिए शिक्षा को जिस तरह खास तबके के लिए सुरक्षित रखा गया उस पर बेबाक बोल।

परशुराम से लेकर द्रोण तक ने वर्ण व्यवस्था के तहत शिक्षा को जाति की जंजीर में जकड़ दिया।

इस स्तंभ पर जब यह सवाल उठ रहे थे कि इस समय ‘महाभारत’ क्यों तब देश का एक बड़ा तबका इस बात से जूझ रहा था कि हम बिना स्मार्ट फोन या लैपटॉप व बेहतर इंटरनेट कनेक्शन के ऑनलाइन पढ़ाई कैसे करें। जब विद्यार्थियों का बड़ा वर्ग ऑनलाइन स्कूलों की कक्षा में पहुंचने से वंचित रह जाता है तो एक बार उन प्रतीकों पर बात करने की जरूरत है जो आधुनिक संस्थानों को प्रभावित कर रहे हैं। यहीं पर हमारे सामने आते हैं महाभारत के प्रतीक पुरुष द्रोण। अगर आपको किसी देश के माहौल को समझना है तो वहां के किसी विद्यालय के माहौल को समझ लेना ही काफी होगा। महाभारत में द्रोण और उनका गुरुकुल उस व्यवस्था की पौधशाला है जहां वंशवाद तथा जातिवाद के बीज बोकर पूरी सामंती व्यवस्था की फसल तैयार की गई।

आज शिक्षा शब्द के साथ ही हम एक ऐसे ढांचे की कल्पना करते हैं जहां सबको समान शिक्षा पाने का समान अधिकार हो। द्रोणाचार्य जब खुद को एक शिक्षक के रूप में स्थापित कर रहे थे तो वे अपने साथ एक पक्षपाती विचार को भी मजबूत कर रहे थे। जो बच्चा सबसे ऊर्जावान दिखता है, उसे अपना सर्वश्रेष्ठ शिष्य बनाने के लिए चुन लेते हैं। मेहनती अर्जुन को विश्व का श्रेष्ठ धनुर्धर बनने की भविष्यवाणी करने के साथ ही किसी और को धनुर्विद्या नहीं सिखाते हैं। हर शिष्य को अलग-अलग विधा में पारंगत करते हैं।

बालक दुर्योधन के मन में चचेरे भाइयों के प्रति दुर्भावना है तो उसे ठीक करने के बजाए अपने बेटे अश्वत्थामा को इस बात के लिए प्रेरित करते हैं कि वह पांडव भाइयों के साथ अच्छे संबंध बनाए। द्रोण बेहतर शिष्य की पहचान करते हैं और भविष्य में अपने फायदे के लिए छांट कर रख लेते हैं तो कमतरों को उनके हाल पर छोड़ देते हैं। वे दुर्योधन के खराब व्यवहार को सुधारने पर मेहनत करने का मुश्किल विकल्प छोड़ आज्ञाकारी अर्जुन को बेहतर बनाने का संकल्प चुनते हैं। एक शिक्षक को इस बात पर गर्व होना चाहिए कि कमजोर तबके का बच्चा उनकी मूर्ति बना कर ही शिक्षा हासिल कर रहा है। लेकिन इसमें गर्व के बजाए एकलव्य में जाति की हीनता दिखती है। इस तरह उन्होंने जाति को एक कारण बना कर उसे शिक्षा से वंचित कर दिया।

परशुराम से लेकर द्रोण तक ने वर्ण व्यवस्था के तहत शिक्षा को जाति की जंजीर में जकड़ दिया। ब्राह्मण और क्षत्रिय के अलावा किसी को शिक्षा लेनी भी है तो उसे झूठ बोलना होगा। उसके बाद भी उसे कर्ण की तरह ऐसा शाप दिया जाएगा कि ऐन मौके पर वह उसकी मृत्यु का कारण बन जाए।

शिक्षा में जातिवादी व्यवस्था के अगुआ परशुराम द्रोण के गुरु हैं। परशुराम से लेकर द्रोण तक में हम ब्राह्मण और क्षत्रिय के संघर्ष को देख सकते हैं। द्रोण का किरदार एक गरीब ब्राह्मण के रूप में शुरू होता है जो गरीबी और भूख को झेलते हैं। उनका जीवन दान और भिक्षा पर टिका हुआ है। बेटा अश्वत्थामा भूख से रोता है तो उनकी पत्नी कृपि उसे दूध के नाम पर पानी में आटा घोल कर पिला देती है। इस दारुण दृश्य को देख वे अपने बाल सखा राजा द्रुपद के पास मदद मांगने जाते हैं जो कभी अपने गरीब ब्राह्मण दोस्त को अपना आधा राज्य देने का दावा करता था। लेकिन अब मदद मांगने आए दरिद्र दोस्त को द्रुपद अहंकार से कहते हैं कि दरिद्र मनुष्य धनवान का, मूर्ख विद्वान का और कायर शूरवीर का मित्र हो ही नहीं सकता।

द्रुपद द्वारा इस अपमान के बाद ही द्रोण की निर्मिति होती है। यह ब्राह्मण महज विद्या के जरिए सिर्फ दरिद्रता ही झेल रहा था। अब वह शस्त्र उठा कर उन क्षत्रियों का गुरु बनता है जिनके पास सत्ता है। शास्त्र और सत्ता के मेल के जरिए अपना वर्चस्व कायम किया जा सकता है।

राजाश्रय मिलते ही विपन्न द्रोण, द्रोणाचार्य बन जाते हैं। भूख और जलालत भरी जिंदगी को पीछे छोड़ उनका सशक्तीकरण होता है। इसके साथ ही शिक्षा के सवाल का जाति से गठजोड़ होता है। शिक्षा किसको, कितनी और कैसे मिलेगी, यह ब्राह्मण और क्षत्रिय के गठजोड़ की व्यवस्था तय करेगी। इस व्यवस्था को हम चार चरित्रों एकलव्य, अश्वत्थामा, कर्ण और अर्जुन के जरिए समझ ही चुके हैं। इन चारों में वे सिर्फ दो को ही शिष्य होने का अधिकार देकर एकलव्य और कर्ण को नकार देते हैं। शूद्र शिष्य उनसे खुद ही शिक्षा ले लेता है तो गुरु उसका अंगूठा ही मांग लेते हैं। शूद्र को शस्त्र और शास्त्र के ज्ञान से वंचित कर जाति-व्यवस्था की जकड़न को और मजबूत कर दिया जाता है।

व्यवस्था को व्यवस्था की तरह संतुलित भी दिखना चाहिए, इसलिए इसके प्रतीक पुरुष का चेहरा बहुआयामी होने की मांग करता है। एकलव्य और कर्ण के साथ हम द्रोण का नकारात्मक रूप देखते हैं तो वहीं वे अर्जुन को शिक्षा देते हैं कि तुम्हारे विपक्ष में जो भी खड़ा रहे तुम्हें उससे लड़ना ही है। अगर मैं भी तुम्हारे सामने खड़ा हूं तो तुम्हें मुझसे भी लड़ना है। वे अपने बंधन को भी मानते हैं कि कौरवों के आश्रय में रहने के कारण उनके साथ बंध गए हैं।

द्रोण को अपने अभाव के कारण राजाश्रय हासिल करना पड़ा तो इस वजह से महाभारत के युद्ध में अपने राजा के पक्ष में ही लड़े। लेकिन न्याय के पक्ष में खुद पांडवों का वध नहीं करने की सौगंध लेकर अर्जुन को कहा कि तुम मुझ पर वार करने से हिचकना मत। धनुर्विद्या में वे अपने पुत्र से ज्यादा शिष्य को श्रेष्ठ मानते थे। यहां योग्यता और शिष्यता का पक्ष भी आता है। आरोप लगाया जाता है कि अर्जुन को अजेय रखने के लिए ही एकलव्य और कर्ण की शिक्षा में उन्होंने बाधा पहुंचाई। यह पक्षपात गुरु की कमजोरी है जो उनके साथ व्यवस्था का हिस्सा भी बन जाता है। उनकी हत्या भी इसी का परिणाम है जो कृष्ण की तय व्यवस्था से होती है। कृष्ण और बलराम जातिगत श्रेष्ठता को तोड़ने के प्रतीक के रूप में दिखते हैं जो सबको शिक्षा देने के हिमायती हैं।

शिक्षा सशक्तीकरण की बुनियाद होती है तो इसका आधार गुरुकुल परंपरा को बनाया गया। यानी खास कुल व खानदानी लोगों के लिए ही दरवाजे खुलेंगे। अब खानदानी वही हैं जो राजघराने से आते हैं। स्त्री, शूद्र और अन्य कमजोर तबके को इससे अलग रखा गया।

आधुनिक भारत में शिक्षा को वर्ण व्यवस्था की कुरीति से मुक्त करने के लिए आरक्षण को औजार बनाया गया। वंचित तबके तक शिक्षा को पहुंचाने के लिए खास तरह के स्कूल और जेएनयू जैसे विश्वविद्यालय बने। इसके बाद भी प्रतीक पुरुषों की बनाई भेदभाव की व्यवस्था अपना वर्चस्व बना ही लेती है। आज भी हम देश की राजधानी में नौकरशाहों के बच्चों के लिए आरक्षित ‘संस्कृति’ स्कूल जैसा शिक्षा का द्वीप पाते हैं। इसमें या किसी और महंगे स्कूल में आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग का कोई एकलव्य या कर्ण पहुंच भी जाता है तो गैरबराबरी की खाई में गिर कर अपने अस्तित्व से जूझने की दोहरी जंग लड़ता है। आधुनिक खेल प्रशिक्षण में ‘द्रोणाचार्य पुरस्कार’ जाति व्यवस्था का ही मोह ढोता दिखता है। खास वर्ग के नियंत्रण को एक तरह से भारतीय शिक्षा का पैमाना बना दिया गया है। भारतीय शिक्षा आज भी गुरुकुल परंपरा से रोमांचित होती है। इसलिए सरकार बदलते ही भारत के आधुनिक शहरों का अग्रदूत बन रहे गुड़गांव का नाम बदल कर गुरुग्राम किया गया। हरियाणा के इस भूगोल को इतिहास में गुरु द्रोण की कर्मस्थली बताया गया है तो राजनीति ने इसे अपनी विचारधारा का प्रतीक बना डाला।

जिस रूप में द्रोणाचार्य ने भेदभाव भरी शिक्षा की बुनियाद रखी, वह आज भी भारतीय शिक्षा के सामने बहुत बड़ा सवालिया निशान लेकर खड़ी है। क्या अब भी हम उसे उसी रूप में मान सकते हैं? आधुनिक शहर को गुरुग्राम बनाना और आधुनिक खेल शिक्षा में द्रोणाचार्य की छवि की पुनर्स्थापना के बरक्स लगता है कि अपने पुत्र की तरह वो पिता भी अमर हो हमारी व्यवस्था का हिस्सा बने हुए हैं। वो आज भी व्यवस्था की इमारत के कंगूरे पर चमक उठते हैं।

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