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बेबाक बोलः दुर्योधन का द्वंद्व

पौराणिक आख्यानों के स्याह चरित्रों ने इतिहास और संस्कृति को अपनी तरह से प्रभावित किया है। महाभारत की विशेषता है कि इसमें खलनायक के खांचे में खड़े व्यक्ति को भी इतना जटिल रूप दिया गया है कि हम उसमें नायकत्व खोजने लगते हैं। दुर्योधन जैसे खलनायक में भी वीरता और दोस्ती के लिए किसी भी हद तक जाने के गुण दर्शाए गए हैं। दुर्योधन का किरदार मुखर होकर दावा करता है कि वह राजा का बेटा के राजा होने के कुदरती अधिकार के लिए लड़ रहा है। दुर्योधन का अंत छल से होने के साथ ही उसके नायकत्व की ऐसी शुरुआत होती है कि कई विमर्शों में उसके नाम को सुयोधन कहने की सिफारिश होती है। कृष्ण के इशारे पर भीम द्वारा छल से मारा गया दुर्योधन एक ऐसी सहानुभूति बटोर ले जाता है कि आज भी हम सब उसी के होने जैसा तर्क ढूंढने लगते हैं। बेबाक बोल में दुर्योधन के द्वंद्व पर बात।

दुर्योधन की अन्य चरित्रों के साथ तुलना करें तो यह मित्रता के लिए कुछ भी कर सकता है।

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥

भारत! जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब ही मैं अपने रूप को रचता हूं अर्थात साकार रूप से लोगों के सम्मुख प्रकट होता हूं।’ गीता का यह श्लोक नीति और नायक की निर्मिति की शुरुआत है। ‘महाभारत’ का जैसा प्रभाव हमारी सभ्यता-संस्कृति पर पड़ा है उतना किसी और का नहीं। लेकिन इसका संदेश इतना जटिल है कि हम बार-बार अपने समय और उसके संदर्भ में इसका पुनर्पाठ करते हैं। धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि की इस मुठभेड़ का सभ्यता को क्या हासिल है? इस श्लोक के बाद हुए युद्ध के अंतिम दृश्य में कुरुक्षेत्र में एक सुनसान स्थल पर दुर्योधन कराह रहा है। कमर के नीचे घायल दुर्योधन अब एकतरफा खलनायक नहीं रह जाता है। वह सही और गलत के बीच की ऐसी बहस छोड़ जाता है कि हम सब के अंदर आज भी एक दुर्योधन पैदा हो जाता है।

‘महाभारत’ में राजसत्ता और उसे हासिल करने के लिए नीति और आदर्श की निर्मिति होनी थी। लेकिन हुआ यह है कि साम-दाम-दण्ड-भेद राजनीति के मूल्य बन गए। दुर्योधन का पूरा चरित्र इसी मूल्य स्थापना का संधान है कि क्या होना चाहिए। महाभारत में कृष्ण और शकुनि मामा जैसे चरित्र आमने-सामने खड़े हैं। इन दोनों की धर्म की अपनी व्याख्या है। फिर धृतराष्ट्र और पांडु जैसे दो भाई हैं। दोनों में बड़ा धृतराष्ट्र है लेकिन शारीरिक अयोग्यता के कारण उसे गद्दी नहीं मिलती है। यहां पर राजसत्ता के लिए शारीरिक योग्यता को एक नियम बनाने की कोशिश होती है। लेकिन पांडु की अनुपस्थिति और मृत्यु के बाद नेत्रहीन धृतराष्ट्र को ही राजा बनाया जाता है।

धृतराष्ट्र के अंदर अपनी नेत्रहीनता को लेकर हीन भावना पैदा हो जाती है कि बड़ा पुत्र होने के कारण जो मेरा कुदरती अधिकार था उसे छीन लिया गया है। अपनी शारीरिक कमी से उसके अंदर एक महत्वाकांक्षा भी पैदा होती है, जिसे पितृमोह का नाम दिया जाता है। अपनी संतति को राजा देखने की ललक उसके अपने जीवन की कमी से निकली है। इस कमी और हीनता का धारण गांधारी में भी हो जाता है, जब उसे कुंती के उससे पहले पुत्रवती हो जाने के कारण भर्त्सना मिलती है। दुर्योधन को जन्म के पहले ही युधिष्ठिर की चुनौती मिल जाती है कि वह उससे पहले जन्मा है। उसकी पहली किलकारी के पहले ही मां-पिता ग्लानि में जा चुके हैं। हीन भावना से ग्रसित मां-बाप और बहन के बेमेल विवाह से नाखुश शकुनि मामा। महत्वाकांक्षा और प्रतिशोध के औजार के रूप में दुर्योधन नीति और राजनीति के अपने प्रतिमान गढ़ता है।

कौरव गांधारी और धृतराष्ट्र के कुदरती पुत्र हैं। दूसरी तरफ सारे पांडव देवता पुत्र हैं, जिनका पांडु से रक्त-संबध नहीं है। यहां पर दुर्योधन के मन में स्वाभाविक रूप से यह धारणा बनती है कि राजा का बेटा राजा के नियम से राजगद्दी उसे ही मिलनी चाहिए तो पांडवों का तर्क था कि धृतराष्ट्र महज पांडु के प्रतिनिधि हैं और हस्तिनापुर की गद्दी पर पहला हक उनका है। महाभारत में सत्यवती और शांतनु की कहानी के साथ राजा कौन के नियम पर द्वंद्व शुरू होता है। राजसत्ता के गठन के साथ राजसत्ता पर अधिकार का मार्ग क्या हो? वहीं से धर्म और अधर्म के रास्ते तय होते हैं। ‘महाभारत’ इसी धर्म और अधर्म को राजसत्ता के नजरिए से देखने की नजर विकसित करती है।

महाभारत के जरिए सामंती मूल्य स्थापित हो रहे थे कि पिता की शारीरिक विकलांगता से तय हुए अयोग्यता के नियम को उसकी संतति को भी ढोना पड़ेगा। पति नेत्रहीन है तो उसकी पत्नी को भी दुनिया के रंग देखने से वंचित हो जाना चाहिए। गांधारी के आदर्श के जरिए एक ऐसे मर्दवादी सामंती ढांचे का निर्माण होता है जो स्त्री की हैसियत को कमजोर करता है। पति से बेहतर होना स्त्रीधर्म के बोध से कमतर हो जाना है। गांधारी के आदर्श ने उसके बेटे के जीवन में ऐसा अंधकार रचा कि वह उसके भाई के जीवन ध्येय का मोहरा बन गया।

माता-पिता से लेकर मामा तक ने दुर्योधन के मन में यही मैल पैदा किया कि राजा होना उसका एकाधिकार था जो उससे छीन लिया गया। यहीं से राजसत्ता के लिए शत्रुता की भावना पैदा होती है। महाभारत से लेकर मध्यकाल तक हम इस सामंती मूल्य को देखते हैं कि राजसत्ता के लिए सब कुछ जायज है। पूरी मुगल सल्तनत में पिता से लेकर भाई तक की कैद और कत्ल होते रहे क्योंकि उत्तराधिकार की जंग में तख्त और ताबूत में से किसी एक को चुनना होता था। सामंती दौर का मुख्य चरित्र ही यही बन गया कि नियमों को अपनी तरफ मोड़ कर किसी भी तरह से सत्ता पर कब्जा करो। महाभारत में कृष्ण का पदार्पण धर्म की स्थापना करने के लिए ही होता है। जो उनके साथ हैं वे सभी धर्म के भी साथ हैं। कृष्ण धर्म की स्थापना के लिए भी अधर्म का सहारा लेते हैं। गदा-युद्ध में कमर के नीचे वार करना अधर्म की श्रेणी में आता है लेकिन वे भीम को यही करने के लिए कहते हैं। भीम व दुर्योधन के गुरु और गदा-युद्ध के योद्धा बलराम इस अधर्म के लिए भीम से नाराज भी होते हैं जिन्हें संतुष्ट करने के लिए श्रीकृष्ण के पास तर्क थे। ‘महाभारत’ राजसत्ता का चरित्र तैयार करने के साथ धर्म और अधर्म की व्याख्या भी रचती है। दुर्योधन के जन्म और उसके अंत के साथ यही संदेश जाता है कि राजसत्ता को पा लेना ही धर्म है। धर्म को आगे बढ़ा सत्ता के सूत्रधार के रूप में स्थापित होते हैं कृष्ण।

दुर्योधन की अन्य चरित्रों के साथ तुलना करें तो यह मित्रता के लिए कुछ भी कर सकता है। उसकी दोनों शादियां हरण के जरिए होती हैं और दोनों में साथ देता है कर्ण। दोनों धर्म और अधर्म सभी मार्ग पर एक-दूसरे का साथ देते हैं। उसकी यही समझ बनती है कि उसके राजा बनने के कुदरती अधिकार का हनन किया गया है इसलिए राजगद्दी को हासिल करना ही उसका धर्म है। वहीं कृष्ण कहते हैं कि असल धर्म ज्येष्ठ पांडव को हस्तिनापुर की सत्ता दिलाना है।

महाभारत में दुर्योधन का जीवन और अंत हमारे सामने एक पाठ की तरह है कि हम आज भी वहां से धर्म और अधर्म की व्याख्या तय करते हैं। भारत में लोक से सबसे असरदार तरीके से जुड़ने वाले सिनेमा में दुर्योधन जैसे चरित्र का महिमामंडन हुआ है जो मोहब्बत और जंग में सब कुछ जायज समझता है। अधर्म से मारे जाने के कारण दुर्योधन वैसा खलनायक है जिसमें जनता नायकत्व ढूंढती है। आज दुर्योधन से सहानुभूति होती है कि उसकी सेना की कमान भीष्म पितामह और द्रोणाचार्य जैसे योद्धा के पास थी जो दुर्योधन के लिए तीर चलाते हुए पांडवों की जीत की कामना करते थे। दुर्योधन के सेनापति भीष्म का धर्म था कि पांडवों का वध नहीं करना है और पांडवों के सारथी कृष्ण का धर्म था कि किसी तरह कौरवों का वध करना है। सत्ता पाने के बीच उठते हर नैतिक बोध पर कृष्ण का धर्म कौरवों के अधर्म को याद दिलाना होता था।

आम जनता दुर्योधन के साथ आदर्श के अंत का भी संदेश ग्रहण करती है। दुर्योधन का अंत छल के बिना होता तो वह सभ्यता के लिए बड़ा संदेश होता और दुर्योधन एक खलनायक के तौर पर ही देखा जाता। लेकिन नियमों के खिलाफ जीत हासिल करवा कर कृष्ण दुर्योधन के लिए सहानुभूति का भी द्वार खोल देते हैं।

आज की राजनीति में भी हम महाभारत के स्थापित किए इन्हीं मूल्यों के साथ खड़े होते हैं। राजसत्ता पर काबिज होना ही धर्म है चाहे उसके लिए कोई भी तरीका अख्तियार करना पड़े। आलोचना होती है एक राजनीतिक दल के अनैतिक कार्य की तो दूसरा राजनीतिक दल कहता है कि तुमने भी तो यही किया था। गलती का जवाब गलती से देने वाले हममें से ज्यादातर लोग कब अपने अंदर एक दुर्योधन को जीने लगते हैं हमें पता भी नहीं चलता। यहीं पर महसूस होता है कि दुर्योधन मर कर भी जीत गया।

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