ताज़ा खबर
 

कांग्रेस कथा 2: रुकावट के लिए ‘खेत’ है

बीसवीं सदी के अंत के साथ कांग्रेस शिक्षा से लेकर खेती को बाजार के हवाले करने के लिए कई तरह के कानून बनाने की शुरुआत कर चुकी थी। खेती राज्य का विषय था तो सबसे पहले केंद्रीकृत तरीके से सबके लिए बाजार खोलने का रास्ता निकाला गया। लेकिन उस वक्त संसद में विपक्ष और प्रतिरोध का स्वर तीखा था। कांग्रेस मनमाने तरीके से आगे नहीं बढ़ पा रही थी। किसानों को बाजार के हवाले करने में विपक्ष की रुकावट का क्षोभ कपिल सिब्बल के भाषण में सुन सकते हैं और वे निजीकरण के खिलाफ खड़े होने वालों को बिचौलिए के साथ खड़ा कर देते हैं।

Bebak bol, Rajkajकिसानों के साथ नाइंसाफी हमेशा से होती रही है। जबकि किसान ही सबके पेट भरता है। लेकिन दुर्भाग्य से उसके ही पेट पर सबसे पहले ठोकर मारा जाता है।

जमीन और उस पर खेती के मालिकाना हक का संघर्ष दुनिया की सभी सभ्यताओं का हिस्सा रहा है। भारत में ब्रितानी हुकूमत ने पहली बार खेती को पूंजीवादी ढांचे से जोड़ कर उसे बाजार के हवाले किया। खेती को नील के बाजार में झोंकने का असर बंगाल के नील विद्रोह के रूप में फूटा तो महात्मा गांधी ने चंपारण में औपनिवेशिक शासन के खिलाफ सत्याग्रह की शुरुआत की। गांधी का ‘हिंद स्वराज’ वस्तुत: ग्राम स्वराज था जो विकेंद्रीकरण की बात करता था। लेकिन आजादी के बाद कांग्रेस केंद्रीकरण की नीति को सख्ती से लागू करते हुए हर चीज को बाजार के हवाले कर देने की उग्र कवायद में जुट गई। हालांकि मजबूत विपक्ष उसे लोककल्याणकारी नीति पर टिके रहने के लिए मजबूर करता रहा। आज जब विपक्ष कमजोर है तो बाजार के हवाले किए जा रहे किसान किसकी बात पर भरोसा करें। सत्ता बदलने के साथ ही बाजार और किसानों की व्यथा पर बदलते सुर पर बेबाक बोल।

जब किसान बोता है और वो बेचना चाहता है तो उसके पास कोई मार्केट नहीं है, उसे मालूम नहीं है कि किस मार्केट में जाना है। अगर मंडी जाता है तो पैंतीस से चालीस फीसद सामान खराब हो जाता है। इस बीच आठ लोग कमीशन एजंट होते हैं। बेचारे किसान को ये बिचौलिए…जो माल बाजार में बिकता है उसका केवल 15 से 17 फीसद किसान को जाता है, बाकी बिचौलियों को चला जाता है। विपक्षी दलों को तय करना है कि वे किसान के साथ हैं या बिचौलिए के साथ हैं…।’

विपक्ष के बिचौलियों के साथ जाने पर धिक्कार भरे ये शब्द हैं वरिष्ठ कांग्रेस नेता कपिल सिब्बल के। जीएसटी की जनक कांग्रेस विपक्ष में आकर उसे गब्बर सिंह टैक्स कहती है तो आज कृषि विधेयक पर सरकार विपक्ष के सामने सिब्बल का यह पुराना भाषण पेश कर देती है और हमारे सामने गंगाधर ही शक्तिमान था जैसा प्रहसन खड़ा हो जाता है। इसी समय हमें संसद से अरुण जेटली की भी वैसी आवाज सुनाई दे जाएगी जैसी इन दिनों विपक्ष के खेमे से कांग्रेस बोल रही है। बाजार, बिचौलिए और पक्ष-विपक्ष की इस पटकथा में जो आज भी ठिठका खड़ा है, वह और कोई नहीं किसान है।

हमने इस स्तंभ में कांग्रेस पर संवाद की कड़ी शुरू की है और हमारी बात शुरू होती है औपनिवेशिक सत्ता के खिलाफ उठी उस आवाज से जो भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के रूप में खड़ी होती है। अपने इतिहास के साथ कांग्रेस यह भी देख सकती है कि अंग्रेजों के शासन से लेकर आज तक किसान कहां है? औपनिवेशिक सत्ता से लेकर अब तक जो भी शासक वर्ग रहा, उसमें खेती और किसानी के लिए सरोकार कितने थे?

साम्राज्यवादी शक्ति के रूप में अंग्रेजों ने भारत में पहली बार खेती का मुनाफे से जुड़ा कारोबारी ढांचा पेश किया। भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में नील की खेती का वृहद संदर्भ है। अभी तक किसानी और खेती का संबंध अन्नदाता से था। किसानों का अनाज से निजी रिश्ता था। अनाज का उत्पादन उपभोग के लिए हो रहा था, मुनाफे के लिए नहीं। इसे माली फसल के रूप में पूंजीवाद के मुनाफे के साथ जोड़ा गया यानी एक तरह से खेती-किसानी को भी कारखाने की तरह देखा गया। इसमें लागत से कई गुणा अधिक मुनाफे का गणित था।

खेती को बाजार का सामना कराया गया। इसका भयानक परिणाम जमीन से लेकर किसानों की बदहाली के रूप में दो तरह से दिखा। जबरन नील की खेती कराने से अनाज की कमी होने लगी। नील की खेती का फायदा सिर्फ ब्रितानी हुकूमत को हो रहा था। किसान और उससे जुड़े मजदूरों के हाथ क्या आ रहा था? नील की खेती के कारण एक बड़ा समाज अनाज की पैदावार से कट रहा था और उसका नतीजा हुआ अकाल।

किसान जमींदारों के गुलाम तो हुए ही जमीन भी बंजर होने लगी। किसानों का सत्ता का गुलाम बन जाना और प्रकृति का संतुलन बिगड़ने के बाद भारत ने बंगाल का अकाल तक देखा है। प्रकृति की मार से तो इंसान मिल-जुल कर मुकाबला कर सकता है लेकिन सत्ता और मुनाफे की मार बंगाल को ऐसा अकाल देती है जो मानवता के पर लगे कलंक का इतिहास लिखती है।

दक्षिण अफ्रीका में गुलामी से अनुभव लेकर गांधी ‘हिंद स्वराज’ और ‘स्वदेशी’ की अवधारणा लाते हैं। गांधी बाजारवादी ढांचे वाली उस आधुनिकता की आलोचना करते हैं जो साम्राज्यवादी हितों के साथ जाती है। वे साम्राज्यवाद के ढांचे को ही आधुनिक मॉडल मानते हैं। जो आधुनिक होगा उसकी अवधारणा साम्राज्यवादी ही होगी। इसी कारण उनके स्वदेशी सांचे के खिलाफ पूंजीवाद खड़ा दिखता है। गांधी इसे साम्राज्यवादी न कह कर सीधे आधुनिकता कहते हैं और इसकी आलोचना पेश करते हैं।

इसी स्वदेशी के अभियान से विदेशी और बाजार का नकार पैदा होता है। ‘हिंद स्वराज’ में आत्मनिर्भर गांव ‘ग्राम स्वराज’ की संकल्पना पेश करता है। गांधी की इस धारा के उलट कांग्रेस में दूसरी धारा नेहरू की थी। वे आधुनिकता और साम्राज्यवादी ढांचे में फर्क करते हैं जिसे गांधी एक ही बता रहे थे। नेहरू इस संदर्भ को अलग करते हुए कहते हैं कि हमें आधुनिक राष्ट्र बनना है। आधुनिक राष्ट्र का मतलब है भारत में सामाजिक भेदभाव जैसी कुरीतियों को हटाना। नेहरू भारत की गरीबी का इलाज आधुनिकता में देखते हैं।

नेहरू के लिए आधुनिक भारत के निर्माण का सूत्र था औद्योगीकरण और उत्पादन शक्ति में इजाफा करना। बड़े पुल, बड़े बांध, इंजीनियरिंग और मेडिकल कॉलेज, अस्पताल, कला संस्थान, हवाई अड्डा। नेहरू के आधुनिक राष्ट्र की दृष्टि आत्मनिर्भर ग्राम की नहीं है। स्वाभाविक है कि आधुनिक राष्ट्र के निर्माण में खेती की संरचना भी बदली। गांधी की विकेंद्रीकरण नीति के उलट आधुनिक भारत शक्तियों के केंद्रीकरण की राह पर चल रहा था। कल-कारखानों की आधुनिक दौड़ में खेती-किसानी पीछे छूट गई। सशक्त और आत्मनिर्भर किसान की अवधारणा खारिज कर दी गई। अब आधुनिक भारत के गान में ‘हिंद स्वराज’ वाले किसान की अहमियत नहीं थी। कल-कारखानों को मंदिर का दर्जा दे दिया गया।

लेकिन चीन से युद्ध के बाद सीमा से लेकर खेत-खलिहान तक नए तरीके से सोचने की जरूरत महसूस हुई। जवानों और किसानों को अग्रिम पंक्ति में लाया गया। आधुनिक राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया में जो चीज पीछे छूट गई थी उसे आगे लाने के लिए ही ‘जय जवान, जय किसान’ का नारा दिया गया। जवान और किसान उपेक्षित पड़े थे। सैन्य ताकत के तौर पर भारत को सशक्त बनाने और किसानी को तवज्जो देने की बात होती है। किसानों के लिए मंडी की व्यवस्था की जाती है। किसान और बाजार के बीच मध्यस्थ खरीदार आता है।

बीसवीं सदी के अंत में शुरुआती नवउदारवादी नीति का सबसे पहला हमला किसानों पर होता है। कांग्रेस की अगुआई में डंकल का आना और उसके नेताओं का सबसिडी खत्म करो का राग किसानों को बाजार आधारित नीति में धकेल चुका था। कांग्रेस अपने जन्म के साथ अंग्रेजों के जिस ढांचे के खिलाफ लड़ी थी, इक्कीसवीं सदी की शुरुआत में वही उसे फिर से खड़ा करती है। किसानों की जमीन कॉरपोरेट को देने यानी व्यावसायिक कृषि की सबसे ज्यादा फिक्र हुई। खेती में उत्पादन-वितरण के संबंध को बाजार से जोड़ने के बदलाव की मांग के लिए मुहिम शुरू हुई।

बीसवीं सदी के अंत के साथ कांग्रेस शिक्षा से लेकर खेती को बाजार के हवाले करने के लिए कई तरह के कानून बनाने की शुरुआत कर चुकी थी। खेती राज्य का विषय था तो सबसे पहले केंद्रीकृत तरीके से सबके लिए बाजार खोलने का रास्ता निकाला गया। लेकिन उस वक्त संसद में विपक्ष और प्रतिरोध का स्वर तीखा था। कांग्रेस मनमाने तरीके से आगे नहीं बढ़ पा रही थी। किसानों को बाजार के हवाले करने में विपक्ष की रुकावट का क्षोभ कपिल सिब्बल के भाषण में सुन सकते हैं और वे निजीकरण के खिलाफ खड़े होने वालों को बिचौलिए के साथ खड़ा कर देते हैं।

आज विपक्ष के कमजोर होते ही सरकार अपने फैसले मजबूती से करते हुए कमजोर कांग्रेस को सुना देती है कि जो सुधार आप नहीं कर पा रहे थे, देखिए हम कितनी आसानी से कर रहे हैं। यूपीए-एक के बाद भाग दो में कांग्रेस निजीकरण को लेकर ज्यादा आक्रामक हुई। इसी तरह राजग सरकार भी अपनी दूसरी पारी में नीतियों की गाड़ी सरपट दौड़ा रही है। दोनों की राह में फर्क है तो विपक्ष के गतिरोधक का। वाया कांग्रेस कथा विपक्ष की व्यथा पर बात जारी रहेगी। (क्रमश:)

Hindi News के लिए हमारे साथ फेसबुक, ट्विटर, लिंक्डइन, टेलीग्राम पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News AppOnline game में रुचि है तो यहां क्‍लिक कर सकते हैं।

Next Stories
1 कांग्रेस कथा 1: कुकर क्रांति
2 राजकाज: अर्थशाप
3 राजकाज: बर्बरीक बोध
IPL 2020
X