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राजकाज: बेबाक बोल- बिहार एक प्रयोग

बिहार राजनीतिक संभावनाओं का खुला मैदान है आज। नीतीश कुमार के चेहरे को चुनावी रंग-रोगन की जरूरत है तो एक समय दलित, ओबीसी और मुसलमानों के सर्वमान्य नेता रहे लालू यादव जेल में हैं। निजीकरण और सरकारी नौकरियों की किल्लत के दौर में आरक्षण पर भी ध्रुवीकरण नहीं हो सकता है। सवर्ण और मुसलमानों का पूरा तबका निर्वात की स्थिति में है जिसे भरने के लिए प्रशांत किशोर ने प्रयोग शुरू कर दिया है। सपने देखने के लिए करोड़ों आंखें और किशोर की पुरानी असामी कांग्रेस के साथ अपनी सभाओं में अभूतपूर्व भीड़ जुटा रहे कन्हैया कुमार भी हैं। कन्हैया कुमार परंपरागत वाम तरीके से अलग प्रबंधन करते दिखते हैं तो उन पर नजर जाना लाजिम है कि किसके साथ जुड़ेंगे। जातिवाद की पुरानी दीवार के सामने विकास, मानव मूल्य, शिक्षा, रोजगार और राष्टÑवाद के नारों वाली नई और ऊंची दीवार तो प्रशांत किशोर बनाएंगे ही। दिल्ली के बाद बिहार के हालात पर बेबाक बोल।

चुनाव रणनीतिकार प्रशांत किशोर (फाइल फोटो)

आप 97 फीसद कम्युनिस्ट हैं…यह प्रमाणपत्र दे रहा है हमारे हाथ का स्मार्टफोन। एक ऐप में कुछ तकनीकी प्रश्नावली और उसके आधार पर आपके साम्यवादी होने की पड़ताल हो जाएगी। दिल्ली विधानसभा चुनाव खत्म होने के साथ ही इंटरनेट आंकड़ों के बाजार में मार्क्सवादी प्रमाणपत्र बांटने वाला यह ऐप आ गया। सबसे रोचक है कि उसके ताजा माल में मार्क्सवादी रुझान के उपभोक्ता हैं। अब इस बाजार की इससे बड़ी सफलता क्या होगी कि कार्डधारी मार्क्सवादी भी इसकी जांच को उत्साह से दिखा रहे हैं।

आंकड़ों का बाजार हमारे दिमाग को एक दिन भी खाली नहीं बैठने देता है। आप दस साल पहले कैसे लगते थे, पचास साल बाद कैसे लगेंगे, आप कितने हिम्मती हैं, आपका सबसे पसंदीदा दोस्त कौन सा है, यह बताने वाला ऐप। हम सब इसके समीकरण को जानते हुए इस ऐप के कारखाने में प्रवेश करते हैं और इसकी मशीनों से गुजरने पर पाते हैं कि अरे यह तो सच्ची बात है। हम इसी तरह के नेता से मेल खाते हैं, इतने ही लोग सच्चे हैं और हम इतने फीसद मार्क्सवादी हैं ही।

हम सब यह भी जानते हैं कि नतीजे निकालने के लिए फेसबुक पर हमारी मौजूद सूचनाओं का ही इस्तेमाल होता है। फिर भी हम चौंकते हैं कि अरे हमारे बारे में इतनी सच्ची बातें कैसे। कुछ ऐसे ही चौंकते हैं जैसे सड़क पर पेड़ किनारे किसी भविष्यवक्ता का तोता जो पर्ची निकालता था, जिसमें हमारे बारे में सब अच्छा होता था। हम यह भी समझते थे कि उल्टी रखी सभी पर्चियों में ज्यादातर अच्छी बातें ही लिखी होंगी। तो फेसबुक के ऐप पर भी ज्यादातर बातें अच्छी ही निकलती हैं ताकि हम फेसबुक पर साझा कर उसे और लोगों को इस्तेमाल करने के लिए प्रेरित करें।

अमेरिकी चुनाव में सोशल मीडिया के आंकड़ों का इस्तेमाल एक बहुत बड़ा मसला बना था और वहां के लोगों को अहसास हुआ कि वे लोकतंत्र के नागरिक नहीं बल्कि सूचनाओं का समुच्चय हैं। नागरिकों का आंकड़ा हासिल कर उनका इस्तेमाल रोबोट की तरह करने के आरोप लगे। चुनाव प्रबंधन के इस अमेरिकी ढांचे ने भारत में भी अपनी बुनियाद रखी। प्रशांत किशोर की चुनाव कंपनी ने 2014 के लोकसभा चुनाव के प्रयोग को कॉपी किया और दिल्ली विधानसभा चुनाव में अरविंद केजरीवाल के अखाड़े की तरफ पेस्ट कर दिया। 2014 के लोकसभा चुनाव से लेकर कई विधानसभा चुनाव तक जीतने वाले खेमे में एक नाम अहम रहा प्रशांत किशोर का।

प्रशांत किशोर किसी जेपी आंदोलन की उपज नहीं हैं और न ही किसी वाम या दक्षिण की राजनीतिक विचारधारा से आते हैं। किशोर उपज हैं उस छवि प्रबंधन कारोबार की जो इक्कीसवीं सदी में उत्तर सत्य की तरह हमारे सामने विकल्प कौन का सवाल खड़ा कर रहा है। इन दिनों अमदाबाद में हवाई अड्डे से सटे इलाके में झुग्गियों के सामने दीवार खड़ी कर लिख दिया गया है कि दुनिया का सबसे पुराना लोकतंत्र दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र से मिल रहा है। आज दोनों के लोकतंत्र में समानता है छवि प्रबंधन की। दुनिया का सबसे बड़ा कारोबार इसलिए खुश है कि सबसे बड़ा बाजार बोलेगा, ‘नमस्ते ट्रम्प’। और इन सबके बीच प्रशांत किशोर इस साल के सबसे बड़े चुनावी बाजार में अपना पंडाल सजा चुके हैं। बिहार में अपने चुनाव प्रबंधन की दुकान पर विकल्प को ताजा आमद (फ्रेश अराइवल) की तरह लगा दिया है।

तो प्रशांत किशोर ने बिहार में बोर्ड लगा दिया है कि हमारे यहां हर तरह का विकल्प तसल्लीबख्श तरीके से मिलता है। तो कैसा होगा बिहार में प्रशांत के विकल्प का चेहरा। हम यहां एक खांका खींच सकते हैं। प्रशांत किशोर का विकल्प वो, जो न तो लालू प्रसाद यादव का पक्षधर हो और न तो किसी खास जाति का नुमाइंदा हो। ऐसे ही विकल्प पर जनता को प्यार लुटाने के लिए तैयार किया जा सकता है। प्रशांत किशोर की कंपनी को पता है कि राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली और बिहार में बहुत फर्क है। यहां का गांव-कस्बा आधारित समाज दिल्ली के शहरी मध्यवर्ग और बिरादरीविहीन समाज से अलग है तो यहां आम आदमी पार्टी वाला विकल्प नहीं बेचा जा सकता है।

बिहार में विकल्प का मतलब है नब्बे के दशक के दौर की अवधारणा में सब कुछ बदल डालना। नब्बे के दौर में बिहार में सवर्णों का एक बहुत बड़ा तबका कांग्रेसी था। वहां भाजपा सवर्णों की नहीं बल्कि सीमित बनिया समुदाय या यादवों की पार्टी थी, सवर्ण कांग्रेस के काडर होते थे। इसके बाद लालू यादव ने आरक्षण के दौर में ऐसा विकल्प दिया कि पूरा सवर्ण तबका विकल्पहीन हो गया। इसके बाद कांग्रेस भी लालू के साथ तो वाम भी लालू के साथ। लेकिन अब निजीकरण के इस दौर में आरक्षण एजंडे से बाहर हो गया है। सरकारी नौकरियों की तंगी और अदालती दखल के बीच इसके नाम पर किसी तरह का ध्रुवीकरण नहीं किया जा सकता है।

लालू के साथ जो राजनीति आई थी अब उसका अंत हो चुका है। लालू की राजनीति के धु्रवीकरण में दलित भी थे, ओबीसी और मुसलमान भी। लालू के दौर में एक ही ध्रुव्रीकरण हुआ, एक तरफ आरक्षण के समर्थक तो दूसरी तरफ उसके विरोधी। लेकिन अब उदारीकरण के इस दौर में सवर्णों की राजनीति की क्या धुरी होगी जो मुख्यधारा से पूरी तरह बाहर हो चुके थे। एक समय में इसका लाभ नीतीश कुमार ने उठाया। लेकिन आज बिहार में जितनी जाति है उतने ही नेता हैं। दलित, महादलित, कुर्मी, कुशवाहा और मल्लाह सबके अपने-अपने प्रतीक।

बिहार अभी संभावनाओं का बाग है जहां विकल्प के फल लगने हैं। अब तक यहां जिनका राजनीतिक दावा था और हिस्सेदारी है वो सब परिदृश्य से बाहर जा चुके हैं। अब ऐसे विकल्प की तलाश है जिससे राजनीतिक संभावना मिल सके और प्रशांत ने इसे हर पंचायत के युवाओं के रूप में देखा है। जाति की पुरानी दीवार के सामने विकास, राष्ट्रवाद और भारत माता के जयकारे के नारे वाली उदारवादी दीवार तैयार की जा सकती है। बिहार के सामंती और आर्थिक रूप से पिछड़े ढांचे में युवाओं की आंखों में उम्मीदों के सपने सजाने की काबिलियत तो प्रशांत किशोर रखते हैं।

बिहार में सवर्णों और मुसलमानों का एक बड़ा वोट बैंक है जिसका कोई आधार नहीं है। इस निर्वात को भरने की तैयारी प्रशांत किशोर कर रहे हैं। प्रशांत वहां जाकर वो एक नया राजनीतिक आधार, जिसमें एक बार फिर से एक नए समीकरण के साथ एक नई राजनीतिक संभावना की खोज हो सके पर काम शुरू कर चुके हैं।

तो बिहार में किस आधार पर वोटों का धु्रवीकरण होगा, वहां विकास का मॉडल क्या होगा? अब लालू जेल में हैं जो कि एक ही समय में सभी पिछड़ी कही जाने वाली जातियों और मुसलमानों के नेता थे। नीतीश के चेहरे को पूरी तरह चुनावी रंग-रोगन की जरूरत है। कुछ राज्यों में प्रशांत किशोर की असामी कांग्रेस भी है तो वो कन्हैया कुमार भी हैं जिनकी सभाओं में आश्चर्यजनक तरीके से भीड़ जुट रही है। यह भीड़ वाम नेताओं की सभाओं में जुटने वाली भीड़ से अलग है यानी भरपूर प्रबंधन दिखता है। टीवी चैनल पर ख्रुश्चेव मुर्दाबाद के नारे लगाने वाले कन्हैया कुमार जिस तरह जमीन बना रहे हैं उस पर भी किशोर की नजर हो सकती है।

बिहार राजनीतिक संभावनाओं का खुला मैदान है। इस मैदान में खेल की क्या रणनीति होगी? पुराने खयाल के लोग अब भी जातिवादी राजनीति देख रहे हैं जिसके आधार पर बात नहीं बनने वाली है। हर जाति का नेता इसी बात पर करवट लेगा कि उसे सत्ता में कितना हिस्सा मिलेगा। वहां सत्ता के नए समीकरण का रास्ता बाजार के ब्रांड से ही बनाया जा सकता है। फिलहाल प्रशांत किशोर की मास्टरी इसी में है। बिहार के खुले और जटिल मैदान में क्या होगा, अभी कुछ भी कहना संभव नहीं है। हां, वहां प्रशांत किशोर का प्रयोग शुरू हो चुका है जो संयोग तो बिलकुल नहीं है।

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