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विशेष: पासबां कोई न हो

जगजीवन राम जैसे जुझारू नेता की जमीन को खाली छोड़ दिया गया। सीताराम केसरी का नाम भी किसी की जुबान से नहीं निकलता। कांग्रेस ने इन्हें कहीं कुछ दिया भी तो आलंकारिक तौर पर आभूषण की तरह।

गांधीवादी नेता और बिहार के तीन बार सीएम रहे तथा केंद्र मे भी मंत्री रहे भोला पासवान शास्त्री।

‘बे-दर-ओ दीवार सा इक घर बनाया चाहिए /कोई हम-साया न हो और पासबां कोई न हो’। मिर्जा गालिब का यह शेर कांग्रेस के बनाए उस सियासी घर पर सटीक बैठता है जहां सामाजिक न्याय की कोई पहरेदारी न हो। जिस पार्टी के पास बिहार में भोला पासवान से लेकर जगजीवन राम की विरासत रही हो वह राष्ट्रीय जनता दल के पीछे चलने के लिए मजबूर है। आज जब रामविलास पासवान जैसे नेता को अवसरवादी करार दिया जाता है तो उसके पीछे यह समझने की जरूरत ही नहीं समझी जाती कि दलित समाज के लिए अवसर कभी बनने ही नहीं दिया गया। संवैधानिक मजबूरियों के कारण ही कांग्रेस ने कमजोर तबके के चेहरे को जगह दी। लेकिन जब लालू यादव जैसे नेता सामाजिक न्याय के संघर्ष में आगे बढ़े तो बिहार जैसे मैदान में कांग्रेस के हाथ खाली होते गए। सामाजिक न्याय के सवाल पर चुप्पी साध कर राजनीति में राह भटकने वाली कांग्रेस पर बेबाक बोल।

भोला पासवान शास्त्री एक बेहद ईमानदार और देशभक्त स्वतंत्रता सेनानी थे। वह महात्मा गांधी से प्रभावित होकर स्वतंत्रता संग्राम के दौरान सक्रिय हुए थे। बहुत ही गरीब परिवार से आने के बावजूद वह बौद्धिक रूप से काफी सशक्त थे। कांग्रेस पार्टी ने उन्हें तीन बार अपना नेता चुना और वह तीन बार अखंड बिहार के मुख्यमंत्री बनाए गए। उनका कार्यकाल निर्विवाद था और उनका राजनीतिक व व्यक्तिगत जीवन पारदर्शी था।

शास्त्री जी वैसे ही शास्त्री हुए थे जैसे लाल बहादुर शास्त्री थे। यानी भोला पासवान जो निलहे अंग्रेजों के हरकारे के पुत्र थे ने बीएचयू से शास्त्री की डिग्री हासिल की थी। राजनीति में सक्रिय थे। इंदिरा गांधी ने इन्हें तीन दफा बिहार का मुख्यमंत्री और एक या दो बार केंद्र में मंत्री बनाया। मगर इनकी ईमानदारी ऐसी थी कि मरे तो खाते में इतने पैसे नहीं थे कि ठीक से श्राद्ध कर्म हो सके। बिरंची पासवान जो शास्त्री जी के भतीजे हैं। उन्होंने ही शास्त्री जी को मुखाग्नि दी थी।

शास्त्री जी को अपनी कोई संतान नहीं थी। विवाहित जरूर थे मगर पत्नी से अलग हो गए थे। पूर्णिया के तत्कालीन जिलाधीश ने इनका श्राद्ध कर्म करवाया था। गांव के सभी लोगों को गाड़ी से पूर्णिया ले जाया गया था। चूंकि मुखाग्नि उन्होंने दी थी सो श्राद्ध भी उनके ही हाथों संपन्न हुआ। सरकार की ओर से शास्त्री जी के परिजन को एक या दो इंदिरा आवास मिला है। हालांकि उन्होंने कभी कुछ मांगा नहीं।’

विकिपीडिया के पृष्ठ से भोला पासवान शास्त्री के बारे में यह जानकारी ज्यों की त्यों उठाई गई है। लेकिन आज की नई पीढ़ी भोला पासवान के बारे में कितना जानती है? कांग्रेस नेताओं से आपने कितनी बार इनका नाम सुना है? कांग्रेस के पास दलित चेहरों और आवाज की एक गरिमामय विरासत थी। लेकिन उन चेहरों के साथ क्या किया गया? जगजीवन राम जैसे जुझारू नेता की जमीन को खाली छोड़ दिया गया। सीताराम केसरी का नाम भी किसी की जुबान से नहीं निकलता। कांग्रेस ने इन्हें कहीं कुछ दिया भी तो आलंकारिक तौर पर आभूषण की तरह। आज जब बिहार में दलित, महादलित, पिछड़ा और अति पिछड़ा का हल्ला मच रहा है तो कांग्रेस की आवाज गुम क्यों है?

भोला पासवान जैसे लोग गांधी से प्रभावित होकर कांग्रेस में आए और आजीवन ईमानदार राजनीति की। लेकिन गांधी के बाद कांग्रेस जाति और सामाजिक न्याय के मुद्दे पर कितना आगे बढ़ पाती है? आजादी के बाद सामाजिक न्याय से कांग्रेस का रिश्ता आवयविक नहीं बल्कि ओढ़ा हुआ रहा। आंख, हाथ और कान हमारे शरीर के आंगिक अवयव हैं जो यांत्रिक नहीं हैं। आवयविक और यांत्रिक रिश्ते में बुनियादी फर्क है। यांत्रिक रिश्ता आभूषण की तरह होता है जो क्रिया और प्रतिक्रिया नहीं करता है। राजनीति के स्तर पर समाज एक जीवंत हिस्सा है। उसमें अगर समाज का कोई हिस्सा जैविक अस्तित्व न रखे तो इसका मतलब है कि वह क्रिया-प्रतिक्रिया में शामिल नहीं है। वह सिर्फ आभूषण की तरह यांत्रिक तौर पर है।

बुनियादी बात यह है कि देश में लंबे समय तक सत्ता जिनके हाथ में रही उनके जरिए सभी वर्गों का सामाजिक सशक्तिकरण नहीं हुआ। जाति और आर्थिक ताकत के आधार पर सत्ता खास लोगों तक सीमित रही। दलित और मुसलमान जैसे सामाजिक अंगों के साथ सत्ता का जैविक रिश्ता बनने ही नहीं दिया गया। यही वजह है कि देश की सबसे पुरानी और एक समय तक सबसे मजबूत पार्टी रही कांग्रेस से समाज के अन्य कमजोर तबके की तरह दलित समाज भी छिटक गया। दलित समुदाय के कांग्रेस से अलगाव को किस तरह देखा जाए? सबसे पहली बात तो यही कि कांग्रेस में दलित चेहरे बस मान और सम्मान की तरह

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