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बेबाक बोलः कोरोना में कर्ण

आज जो सबसे बड़ा संकट मनुष्यता के सामने खड़ा है वह है पहचान का संकट। इस खंडित दौर में खुद को पहचानने का संकट। महाभारत के रचयिता ने कर्ण के जरिए एक नायक गढ़ने की कोशिश की लेकिन एक झूठ के साथ उसे पहचान के चक्रव्यूह में घेर दिया। कोरोना के इस काल में विराट मनुष्य की अपार शक्ति का अहसास भी जब महाशक्तियों को हिला दे तब एक विषाणु के तेज विस्तार के आगे खुद को पहचानने का संकट सहज है। कर्ण उसी संकट से ग्रसित एक विराट चरित्र है जो बजरिए दूरदर्शन एक बार फिर खलनायक के खांचे में खड़ा किया जा रहा है द्रौपदी को वेश्या कहने के कारण, वो भी तब जब छोटे परदे पर राजकुल का हर किरदार उसे उसकी जाति के लिए अपमानित कर रहा हो। स्त्री का ऊंचा कुल एक नायक के नीचे कुल पर भारी पड़ता है। कोरोना काल में पुनर्पाठ के क्रम में कर्ण के किरदार पर एक नजर।

महाभारत का हर नायक कर्ण की जाति पर सवाल उठाता है जिसमें विष्णु के अवतार कृष्ण भी शामिल हैं।

‘जाति हाय री जाति कर्ण का हृदय क्षोभ से डोला
कुपित सूर्य की ओर देख वह वीर क्रोध से बोला
जाति जाति रटते, जिनकी पूंजी केवल पाषंड,
मैं क्या जानूं जाति? जाति हैं ये मेरे भुजदंड।’

महाभारत के रचयिता वेदव्यास अपने लेखन के बारे में एलान करते हैं कि जो महाभारत में नहीं वो भारत में नहीं, तो उनके एक पात्र कर्ण का इसी भारत में कई बार पुनर्पाठ होता है। ‘रश्मिरथी’ में दिनकर ने कर्ण के माध्यम से जातिवादी व्यवस्था पर प्रहार किया है। महाभारत में कर्ण के किरदार की स्थापना झूठ से होती है। इंसान के जीवन के सबसे बड़े सत्य उसके जन्म की कहानी को छुपा नायकत्व के कई केंद्र गढ़े गए।

नायकत्व के गढ़े गए केंद्रों को बचाने के लिए वेदव्यास ने कर्ण के किरदार को दानवीर तो बनाया लेकिन वो युद्धवीर नहीं बनने दिया जो वर्णवादी व्यवस्था का सूत्रधार होता है। व्यवस्था कर्ण को अपना औजार बनाती है, लेकिन निर्णायक क्षण में उसे निर्बल हो जाने का शाप देकर। सामंती वर्ण-व्यवस्था में क्षत्रिय ही लड़ सकता है, हत्या कर सकता है और इतिहास का चक्का अपने हिसाब से घुमा सकता है। जहां मरने और मारने के खेल पर ही सारे नियम टिके हैं, उस रणक्षेत्र में कर्ण या तो दुर्योधन के उपकार, कुंती को दिए वचन और जरूरत के समय में ब्रह्मास्त्र का ज्ञान भूल जाने के शाप से घेर दिया गया है।

वेदव्यास जब एक सामंती भारत का आख्यान रच रहे थे तो कर्ण को यह भरोसा भी दिला रहे थे कि आने वाले समय में लोग गर्व से कहेंगे कि हमने कर्ण जैसे योद्धा को देखा है। लेकिन वर्ण-व्यवस्था के निचले पायदान में रख दिए जाने भर से वह कर्म के स्तर पर योद्धा की योग्यता से खारिज कर दिया जाता है। महाभारत का हर नायक कर्ण की जाति पर सवाल उठाता है जिसमें विष्णु के अवतार कृष्ण भी शामिल हैं। कृष्ण यानी ब्रह्मांड के सारथी के जरिए वेदव्यास वर्ण-व्यवस्था की महत्ता स्थापित कर समाज को चलाने के लिए सामंती ढांचे का संदेश स्थापित कर देते हैं।

अस्मिताओं के संघर्ष के इस दौर में आज दूरदर्र्शन पर जब कर्ण, द्रौपदी को वेश्या कहता है तो वो खलनायक के खांचे में खड़ा कर दिया जाता है। लेकिन कुल गर्विता द्रौपदी को यह छूट आज भी जारी रहती है कि वह कर्ण की जाति का अपमान करे। ‘वेश्या’ बनाम ‘सूत-पुत्र’ में जाति की अस्मिता हार जाती है और कथित ऊंचे कुल की वधू की सामंती अस्मिता को अक्षुण्ण रखने के लिए आधुनिक विमर्श का सहारा लिया जाता है जाति के सवाल पर से पर्दा गिराकर। वेदव्यास सफल हैं क्योंकि आज का भारत उनकी वर्ण-व्यवस्था वाले महाभारत के ढांचे पर ही खड़ा है। कोरोना के इस समय में महाभारत को बड़े फलक में भी देखा जाए। व्यवस्था के ढांचे पर कर्ण के प्रतिरोध का स्वर आज भी मुखर है।

इन दिनों टीवी पर दिखाए जा रहे रामायण और महाभारत दो प्राचीन महाकाव्य हैं। ये जोड़ते हैं संपूर्ण भारत को। भारत को भारतीयता की पहचान देने वाला, एक सूत्रता में बांधने वाला महाकाव्य। उत्तर से लेकर दक्षिण या पूरब से लेकर पश्चिम-किसी भी क्षेत्र या भाषा को देखना चाहेंगे तो वहां आप इन दो महाकाव्यों की छाप को अलग नहीं कर पाएंगे। नायक हो या खलनायक, मुहावरे तक में ये काव्य अपनी उपस्थिति दर्ज कराते मिलेंगे। जन्म हो या विवाह या फिर अन्य संस्कार गीतों में उनके रस मिलेंगे। जहां रामायण नैतिकता की एक महाकाव्यात्मक अभिव्यक्ति है तो वहीं महाभारत मृत्यु-बोध के अहसास को जीवन कर्म की ऊर्जा से संकल्पित करने का महा-आख्यान है। आज जब मृत्यु-बोध का अहसास वैश्विक परिदृश्य में छाया हुआ है, तब महाभारत का पाठ और पुनर्पाठ वैसा ही है जैसे घोर रेगिस्तान में जीवन-जल का अहसास होना। निष्काम कर्म की प्रेरणा तो आजादी के दौर में भी बाल गंगाधर तिलक इसी महाभारत से दे रहे थे। क्या आज भी वही निष्काम कर्म की प्रेरणा जीवन के लिए जरूरी है? क्या आज सड़कों पर भूख से तड़पते मजदूरों के बच्चों को महाभारत का निष्काम कर्म की प्रेरणा जीवित रख सकता है? या आज उसी महाभारत के पात्र कर्ण से एक बार फिर से प्रेरणा लेने की जरूरत है?

आज जो सबसे बड़ा संकट मनुष्यता के सामने खड़ा है वह है पहचान का संकट। इस खंडित दौर में खुद को पहचानने का संकट। संकट क्यों? विराट मनुष्य की अपार शक्ति का एहसास भी जब महाशक्तियों को हिला दे तब एक विषाणु के तेज विस्तार के आगे खुद को पहचानने का संकट सहज है। कर्ण उसी संकट से ग्रसित एक शक्तिशाली, विराट और विशाल चरित्र है।

रामायण और महाभारत के दो पात्रों की तुलना भारतीय संस्कृति के कई उलझे-सुलझे संबंध सूत्रों को खोलने-समझने की दृष्टि दे सकता है। एक विभीषण और दूसरा कर्ण। नायक कौन खलनायक कौन? भारतीय मानसिकता में दोनों में कौन है जो नैतिक भी है और जिसका उद्देश्य भी सही है? यह सवाल स्त्री के नजरिए से देखें तो एक तरफ सीता के अपहरण के लिए जिम्मेदार रावण है तो दूसरी तरफ द्रौपदी के चीर-हरण का जिम्मेदार दुर्योधन। विभीषण अपने भाई को छोड़ राम के साथ खड़ा हो जाता है। उसका पक्ष इसलिए नैतिक है। उद्देश्य भी नारी की मुक्ति का है। लेकिन आज भी वह नाम भारतीय समाज की चेतना में मुहावरे के तौर पर ऐसे लिया जाता है जैसे वह घोर अनैतिक हो। यही स्थिति कमोबेश कर्ण के साथ है। पांडव को कृष्ण का साथ है। वे नैतिक हैं। उनका उद्देश्य भी सही है। परंतु कर्ण दुर्योधन के साथ खड़ा है। कर्ण, भीष्म पितामह नहीं है जो गद्दी और अपने वचन से बंधे थे। उनका यह मूल्य बोध सामंती था। लेकिन कर्ण उस भावबोध से बंधा हुआ था जिसमें उसकी पहचान छिपी थी। कुंती ने उसकी पहचान छीन कर उसे अनैतिक बना दिया। ठीक उसके विपरीत दुर्योधन ने उसे एक पहचान दी। अब वह किधर जाए? अनैतिक करार दिए संबंधों-जो रक्त संबंध हैं या पहचान देने वाला जो आज अनैतिक कार्य कर रहा है? महाभारत नैतिकता और अनैतिकता से कठिन तनी हुई रस्सी पर न सिर्फ पात्रों को खड़ा कर देता है, बल्कि पाठक भी उसी हालत में खुद को पाता है।

यहीं से हमें लगता है कि अगर नायक और खलनायक की निर्मिती सभ्यता करती है तो ऐसे सैकड़ों पात्र उन नायकों एवं खलनायकों के निर्माण के लिए स्वाहा कर दिए जाते हैं। वे अपनी संपूर्ण योग्यता में भूमिका निभाने के लिए स्वतंत्र नहीं रह पाते। यही कारण है कि कर्ण के चरित्र को परंपरागत ज्ञानालोक से नहीं पहचाना जा सकता। पहचान का संकट सभ्यता के आरंभ से रहा है। कृष्ण महाभारत में अर्जुन को उसी पहचान के संकट से उबारने के लिए उपदेश देते हैं जो श्रीमद्भगवदगीता कहलाया। अर्जुन अंतत: अपने इस संकट से उबर जाते हैं और युद्ध का रास्ता चुनते हैं। कर्ण को कृष्ण पहचान के संकट से नहीं उबार पाते। क्यों? क्योंकि अर्जुन को नायक बनना था। यह सभ्यता का चुनाव था। आज एकलव्य हो या कर्ण-सभ्यता के आगे अपनी पहचान के साथ खड़े हैं अपनी-अपनी मृत्यु का इल्जाम लगाते हुए। तब सभ्यता इनके जरिए नायक का निर्माण कर रही थी, आज ये अपने नायकत्व के लिए पुनर्पाठ की मांग कर रहे हैं। खासकर मृत्यु-बोध के बीच। जब अमेरिका में भी काले लोगों की मृत्यु की दर बहुत ऊंची है, भारत जैसे देश में भूख और कोरोना के बीच चुनाव के लिए डंडे खाती जनता अपनी पहचान की खोज कर रही है, तब महाभारत का पुनर्पाठ बहुत सारे सुलझे-अनसुलझे अर्थ संदर्भ छोड़ देता है।

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