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राजकाज-बेबाक बोल-कांग्रेस कथा 13: जहाज के पंछी

फिलहाल कांग्रेस भाजपा की नीति का कोई विकल्प नहीं दे पाई है। उसकी सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि समस्या क्या है यह सभी समझ रहे हैं लेकिन उसका हल बताने और उस पर चलने का हौसला नहीं है।

congressकांग्रेस पार्टा के नई दिल्ली स्थित मुख्यालय में नेताओं की मीटिंग। (फोटो-PTI)

कांग्रेस के जिन 23 नेताओं ने चिट्ठी लिख कर पार्टी में बगावत की अंगड़ाई ली वे पत्रकारों के फोन करते ही कहने लगे कि हमारी आगे कोई लड़ाई नहीं है। सियासी चिट्ठी मीडिया में ‘लीक’ करने का मतलब दिल्ली के शीशमहल की राजनीति की लीक छोड़ना तो कतई नहीं है। कांग्रेस की नवउदारवादी नीति के झंडाबरदार इन नेताओं को इस बात का अहसास है कि उनका इस जहाज के अलावा कहीं ठौर नहीं। इन नेताओं को पता है कि कांग्रेस में नेतृत्व से बड़ा नीति का संकट है। जब दिल्ली की सीमा पर किसान अपनी मांगों के अलावा कोई और बात सुनने को तैयार नहीं हैं तो कांग्रेस संसद का शीतकालीन सत्र नहीं बुलाने पर सरकार का शगुनी विरोध कर खामोश हो जाती है। कांग्रेस शासित राज्य ही किसान आंदोलन में उबल रहे हैं और इन सबमें कांग्रेस ही नहीं है। कांग्रेस सड़क पर उतरी जनता को भी अपने पक्ष में गोलबंद क्यों नहीं कर पा रही इसकी पड़ताल करता बेबाक बोल

‘मेरो मन अनत कहां सुख पावै।
जैसे उड़ि जहाज कौ पंछी, फिरि जहाज पर आवै॥
कमल-नैन कौ छांड़ि महातम, और देव कौ ध्यावै।
परम गंग को छांड़ि पियासो, दुरमति कूप खनावै॥
जिहिं मधुकर अंबुज-रस चाख्यौ, क्यों करील-फल भावै।
‘सूरदास’ प्रभु कामधेनु तजि, छेरी कौन दुहावै॥’

देश की राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली की सीमा पर किसान अब तक का सबसे अनोखा और अभूतपूर्व प्रदर्शन कर रहे हैं। सरकारी मेवे को छोड़ सरकार के दरबार में लंगर का खाना खा रहे हैं। संसद के शीतकालीन सत्र ने किसानों के आंदोलन की गर्मी से ठिठुर कर खुलने से इनकार कर दिया और कांग्रेस ने शगुन सरीखा प्रतिरोध कर उसे स्वीकार कर लिया तो सूरदास की ये पंक्तियां सहज ही जेहन में आ जाती हैं।

जब किसान अपनी मांगों के अलावा किसी और बात पर कान देने को तैयार नहीं हैं तो कांग्रेस के शीशमहल में 23 बागी ‘पत्र-कारों’ को बुलावा देकर पुचकार कर उनके कान में कुछ बोल बोले गए। जब इन नेताओं ने चिट्ठी लिखी तो लगा कि बात कुछ आगे बढ़ेगी। लेकिन इस बगावत को अदबी शराफत बनने में कोई देर नहीं हुई और पत्रकारों के फोन करने पर वे कहने लगे कि अगर राहुल जी अध्यक्ष बनने के लिए मान जाएं तो हमें कोई दिक्कत नहीं है। हमें तो सिर्फ इस बात से मतलब है कि अध्यक्ष बनना चाहिए।

कांग्रेस के कथित कागजी शेरों को चिट्ठी लिखते वक्त इस बात का अहसास था कि उनकी आरामतलब राजनीति का इस पार्टी के अलावा कहीं और गुजारा नहीं है। लेकिन उन्होंने महान योद्धा का अभिनय करते हुए बगावत का झंडा उठाया। ये कांग्रेसी नेता दूसरे दलों की इस बात के लिए आलोचना करते हैं कि वहां असहमति के लिए कोई जगह नहीं है। लेकिन जैसे आपके यहां पुचकार है तो औरों के यहां भी ऐसा ही विरोध वापसी वाला प्यार है। आपने असहमति को सजावटी चिट्ठी तक सीमित कर उसे सार्वजनिक कर दिया। उस वक्त भी आप चाहते तो सही मंच पर जाकर संवाद कर सुधार की बात कर सकते थे।

सियासी चिट्ठी लिखी ही ‘लीक’ करने के लिए जाती है न कि लीक छोड़ कर चलने के लिए। वे 23 क्रांतिकारी चिट्ठी को सार्वजनिक कर अपनी आरामगाह के एकांतवास में चले गए। सबका चिट्ठी लिखने का मकसद यही था कि कांग्रेस की अगुआई की कमान किसी और को दी जाए। लेकिन सबने ये बात बहुत नपी-तुली भाषा में कही। किसी ने भी सीधे यह नहीं कहा कि अध्यक्ष के तौर पर राहुल गांधी अस्वीकार्य हैं। मतलब आप बस अंगड़ाई लेकर आगे की लड़ाई से आंखें मूंद लेना चाहते थे। आपके सामने शरद पवार, ममता बनर्जी, जगनमोहन रेड्डी जैसे अपने ही भूतपूर्व के उदाहरण हैं। लेकिन आपके पास उनके जैसा जनाधार नहीं है, इसलिए विरोध के भूत से भी डरते हैं।

चिट्ठी लिखने वाले ज्यादातर बागी संसद के पार्श्व द्वार से आगमन के लिए उसी परिवार के मोहताज हैं जिसके खिलाफ फुसफुसाती आवाज में बगावत कर रहे थे। इनमें से ज्यादातर वे लोग हैं जो शायद अपने राज्यों में पहचाने न जाएं। हम इतिहास के पन्ने नहीं पलटेंगे, एक ताजा उदाहरण लेते हैं। कश्मीर में स्थानीय चुनावों के नतीजे अभी आए हैं। इस पूरे अभियान के अग्रदूत रहे गुलाम नबी आजाद क्या बताएंगे कि कश्मीर में कांग्रेस की दुर्दशा के लिए कौन जिम्मेदार है?

क्या इसके लिए कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व जिम्मेदार है? या कभी जम्मू और कश्मीर की मिट्टी से जुड़े हुए वे नेता जिम्मेदार हैं जिन्होंने कांग्रेस आलाकमान के बूते दिल्ली में अपनी दुकान जमा लेने के बाद दोबारा कश्मीर का रुख नहीं किया? ये इतना जरूर जानते हैं कि इनके पास ले-देकर राज्यसभा में जगह हो सकती है। आलाकमान नाराज हो जाए तो फिर जनता के पास वापसी का कोई आधार भी नहीं बचा कर रखा है।

अब ‘कांग्रेस-कथा’ का सवाल फिर एक बार वही है कि देश की सबसे पुरानी पार्टी के लिए आगे का रास्ता क्या हो? कांग्रेस यह रास्ता भाजपा की सफलता में खोज सकती है। जब भाजपा 2004 में हारी तो एक चीज साफ थी कि कांग्रेस की नीतियों पर ही चल उसने ‘शाइनिंग इंडिया’ का जुमला गढ़ा था। उसी ‘शाइनिंग इंडिया’ ने उसकी राजनीति धुंधली कर दी। भाजपा को यह सबक मिल गया था कि बिना वैकल्पिक राजनीति के उसकी सत्ता में आमद मुश्किल है। उसने अपनी वैकल्पिक राजनीति को हिंदुत्व की राजनीति से जोड़ा। हिंदुत्व की यही राजनीति कांग्रेस की नवउदारवदी नीति का विकल्प बनी और 2014 के बाद लगातार दूसरी बार भाजपा को जीत मिली।

फिलहाल कांग्रेस भाजपा की नीति का कोई विकल्प नहीं दे पाई है। उसकी सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि समस्या क्या है यह सभी समझ रहे हैं लेकिन उसका हल बताने और उस पर चलने का हौसला नहीं है। कांग्रेस के दिग्गज और पुराने खिलाड़ी जिन्होंने चिट्ठी लिखी है, वे भी इस संकट को पहचान रहे हैं और नेतृत्व भी इसे समझ रहा है मगर किसी के पास इसके लिए वैकल्पिक राजनीति नहीं है। जैसे ही इस पर बात होती है वैसे ही वामपंथी दबाव या झुकाव कह कर पुराने क्षत्रप नाराज हो जाते हैं। वजह यह है कि कांग्रेस के नेता नवउदारवादी नीति के बाहर अपनी राजनीति देख ही नहीं पाते हैं।

अभी हालत यह है कि किसान कृषि कानून के विरोध में सड़क पर हैं। कांग्रेस शासित राज्यों में विरोध की आग जल रही है। अफसोस कि इस आंदोलन में कांग्रेस कहीं नहीं है। आंदोलन का कदम आगे बढ़ाते ही वह सरकार के इस ताने के साथ पीछे हो जाती है कि देखो जी, ये राजनीति कर रहे हैं, देखो आंदोलन का राजनीतिकरण हो रहा है। लेकिन कांग्रेस यह कह कर पलटवार नहीं करती कि राजनीतिक दल राजनीति न करें तो फिर क्या करें? जब जनता खुद ही सड़क पर है तब भी कांग्रेस उसे अपने साथ गोलबंद करने की हालत में नहीं है।

जाहिर सी बात है कि इसके पीछे नेतृत्व तो वजह नहीं है। सारा संकट इसी बात से शुरू होता है कि कांग्रेस किस आधार पर अपना रुख तय करे? कांग्रेस विरोध की बात शुरू करती है तो उसे बताया जाता है कि यह तो आपके घोषणापत्र में था। अब घोषणापत्र में होने का मतलब क्या है? आपकी वही नीति रही है। संकट यही कि उसके बाद आप फिर कहां जाएंगे? तो आप कहेंगे कि हम इस नए को खत्म कर पुराने को बेहतर तरीके से लागू करेंगे। स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को लागू करेंगे। स्वामीनाथन आयोग की बात करते ही आपको वाम की राजनीति के साथ खड़े होते दिखाया जाएगा। इसी के साथ कांग्रेस के अंदर का विरोधाभास उभर कर सामने आ जाता है।

वैकल्पिक राजनीति के बिना आपकी जनता के साथ खड़े होने की जमीन नहीं बनेगी। अगर आप जनता के साथ खड़े नहीं हो पा रहे हैं तो नेतृत्व किसका कीजिएगा? फिर नेतृत्व का मतलब होगा शीशमहल वाली राजनीति। और वहां पर फिर क्या होगा? आप समस्या का विश्लेषण करेंगे। इसमें एक-दूसरे को जिम्मेदार ठहराया जाएगा। यह सार्वजनिक होगा। फिर ऐसा लगेगा जैसे जहाज से पंछी अलग हो गए हैं। फिर कुछ दिनों के बाद उन्हें भी कोई दूसरा ठौर नहीं और इन्हें भी कोई दूसरा आसरा नहीं तो जहाज और पंछी वापस एक-दूसरे के। (क्रमश:)

सोनिया गांधी के साथ बैठक में कांग्रेस के नेताओं ने एक ऐसे अध्यक्ष की मांग की जो पार्टी में संरचनात्मक स्तर तक बदलाव ला सके। नेताओं ने इस बात पर भी नाराजगी जाहिर की कि कांग्रेस मुख्यालय के दफ्तर में कोई वरिष्ठ नेता आसानी से उपलब्ध नहीं होता। इसके साथ ही उन्होंने मांग की कि पार्टी के प्रदेश अध्यक्षों के हाथों में ज्यादा शक्ति दी जाए। पार्टी को नीतिगत आधार पर स्पष्ट राह चुनने के लिए भी कहा।

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