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बेबाक बोलः राजकाज- केदरानाथ

‘किसी को प्यार करना/तो चाहे चले जाना सात समुंदर पार/पर भूलना मत/कि तुम्हारी देह ने एक देह का/नमक खाया है...’। केदारनाथ सिंह भावनाओं को जोड़ने वाले कवि थे। उन्होंने जड़ों से उखड़े आम आदमी के लिए शब्दों का पुल रचा जिससे वह पीछे लौटता भी है और उस आगे की अहमियत भी समझता है जहां वह खड़ा है। आम आदमी के क्लिष्ट जीवन को सरल शब्दों की कविता दी बिना किसी राजनीतिक नारे और गर्जना के। खामोशी से नए संज्ञा, सर्वनाम और विशेषण रचने वाले जन कवि कहीं नहीं जाते। उनके शब्द आम लोगों के जीवन के व्याकरण में हैं। इस बार हमारे कवि की कविता के साथ बेबाक बोल।
केदारनाथ सिंह

जिंदगी की चुनौती कैसे झेलें?
‘उसका हाथ
अपने हाथ में लेते हुए मैंने सोचा
दुनिया को
हाथ की तरह गर्म और सुंदर होना चाहिए’।
जनसत्ता बारादरी के लिए जब केदारनाथ सिंह ने आमंत्रण स्वीकार किया था तब उनकी यह कविता जेहन में सबसे पहले कौंधी थी। जनसत्ता के दफ्तर की दूसरी मंजिल की सीढ़ियों पर चढ़ते हुए उनका हाथ मेरे हाथ में था तो महसूस हुआ कि मैं संवेदना के एक पूरे संसार को स्पर्श कर रहा हूं। उसके बाद भी कई कार्यक्रमों में मिलते ही जैसे ही वो हाथ पकड़ते उनके स्नेह की ऊष्मा से खुद को बच्चा सा महसूस करने लगता था। उनके सामने खड़ा होना किसी बोधिवृक्ष के सामने खड़े होने जैसा था। उनके पास से निकलती इंसानियत की ऊष्मा आपकी ठंडी होती संवेदनाओं को पिघला जाती थी।

हमारे प्रिय कवि जाने जैसी सबसे खौफनाक क्रिया से गुजर ही गए। पिछले हफ्ते अपने स्तंभ में जब किसान आंदोलन पर लिख रहा था तो किसानों के पांवों से रिसते रक्त को देखकर केदारनाथ सिंह की कविता ही याद आई। भूख से मर रहे, विस्थापित हो रहे किसान पूछ रहे थे कि ‘वो क्यों चुप हैं जिनको आती है भाषा’। स्टीफन हॉकिंग जैसे जन विज्ञानी को खोने के बाद हमारा जनकवि भी चला गया। हॉकिंग मानव के मशीनी हो जाने के खिलाफ थे तो केदारनाथ सिंह इस गैरबराबरी वाली दुनिया में पूरी ताकत के साथ शब्दों को आदमी की तरफ फेंक रहे थे। ‘बिग बैंग’ की तरह वो भाषा और शब्दों का सिद्धांत रच रह थे। वे भरी सड़क पर ‘शब्द और आदमी के टक्कर का धमाका’ सुनना चाहते थे। हॉकिंग ब्रह्मांड के जन्म में दिव्य ब्रह्म की भूमिका को नकारते हैं तो केदारनाथ सिंह उस पूरी राजनीति और संस्कृति को बेपर्दा करते हैं जहां आम आदमी के सामने ब्रह्म को विकल्पहीन बना दिया गया है। तभी तो अंतिम सिक्के की तरह बच गई हिंदी की जीभ की खाल पर चोटों के निशान देखते हैं और सब कुछ छीन कर हाशिए पर भेज दी गई हाशिए के लोगों की भाषा इसका दोष किस पर डाले, यही पूछते हैं। इस भाषा के बारे में कवि कहते हैं, ‘कहीं मिलेगा ही नहीं/इसका एक भी अक्षर/और यह नहीं जानती/इसके लिए अगर ईश्वर को नहीं तो फिर किसे धन्यवाद दे’। कवि उस ‘किसे’ की पहचान सामने लाने की कोशिश करते हैं जिसे गुमा दिया गया है, छुपा दिया गया है। उसका नया पाठ तैयार करते हैं।

इंसान और भाषा के साथ संवेदना का व्याकरण रचतीं, केदारनाथ सिंह की कविताएं पाठक को कविता का ऐसा ककहरा सिखा जाती हैं कि वह खुद भी रचनात्मक हो जाता है और शब्दों से मुठभेड़ करने लगता है। वे लिखते हैं ‘जानता हूं कि लिखने से कुछ नहीं होता’ और उस कवि के पाठक के साथ कितना कुछ हो जाता है। उनकी उस कविता के साथ सहजीवन का रिश्ता बन जाता है जो पाठक के सामने मूर्त रूप में आकर खड़ी हो जाती है। वह कविता का नख-शिख वर्णन कर सकता है। उनकी कविता से निकला कोमल भाव पाठक को दुलराता है, उनके व्याकरण में जो ‘कारक की बेचैनी’ है वह इस धरती और आसमान के प्रति भरोसा पैदा करती है। इससे ‘खाली कटोरों के अंदर भी वसंत को उतरते’ हुए देखा जा सकता है।

जीवन और मृत्यु के संबंधों को संवेदना के नए स्तर पर ले जाने वाला कवि जब मृत्यु और मोक्ष के शहर बनारस पहुंचता है तो वह दशाश्वमेध घाट के आखिरी पत्थर को और भी मुलायम पाता है। और, इस समय सीढ़ियों पर बैठे बंदरों की आंखों में वो अजीब सी नमी देखते हैं जो डार्विन, आइंस्टीन से लेकर स्टीफन हॉकिंग की वैज्ञानिक चेतना से मिलती है। एक शहर जो अपनी एक टांग पर खड़ा है और दूसरी टांग से बेखबर है। कितनी गड़बड़ियां हो गई हैं इस शहर में। बनारस एक ऐसा शहर है जो उनकी कविता में सूक्ष्म अध्ययन (माइक्रो स्टडी) के रूप में सामने आता है। जैसे श्रीलाल शुक्ल ‘राग दरबारी’ में शिवपालगंज के जरिए पूरे हिंदुस्तान का पाठ तैयार कर जाते हैं वैसे ही इस शहर के जरिए वो ब्रह्म से लेकर ब्रह्मांड तक का संवाद कर जाते हैं।
देश, शहर, कस्बा, बस्ती से लेकर गांव तक की ‘बुनावट’ में जो कुछ गलत हो गया है उसे कवि देख रहा है। वह सीधे-सादे शब्दों में आदि से लेकर अंत तक का बदलाव चाहते हैं। वह दुनिया का सारा कपड़ा फिर से बुनने की मांग करते हैं। वो उस समय की भी पहचान कर चुके हैं जब गलतियों को कम करने के लिए फिर से बुनाई-धुनाई शुरू कर देनी चाहिए।
इतने क्रांतिकारी बदलावों की मांग वे कितने साधारण शब्दों से करते हैं। झाड़न, मोजे, टाट, दरी, नाव का पाल। उनका ‘बुनाई का गीत’ बदलाव का गीत है। दर्जी की मशीन, घाट का धोबी, स्कूल जाते नंगधड़ंग बच्चों के बिंब से वो बतलाते हैं कि बराबरी की बुनाई का ताना कहां फंस गया है। किसी धूसर समय का जिक्र वो कितने चमकते शब्दों से करते हैं। लगता है जैसे ठहरे हुए तालाब के पानी में विचारों का पत्थर फेंक दिया गया है। और यह विचार आम जन को डराता नहीं है बल्कि उसके दिमाग के सांचे में ढलने की कोशिश करता है, उसके आकार और प्रकार का।

साहित्य में प्रेमचंद की जो साधारणिकता की परंपरा रही है आधुनिक कविता में केदारनाथ सिंह उसे ही आगे बढ़ाते हैं। साधारणिकता को वैचारिकता के आधार पर आगे बढ़ाना और वह भी बिना राजनीतिक हुए। एक तरफ नागार्जुन भी जन कवि थे लेकिन उनकी कविता में राजनीति चीखती है। वहां भी साधारण जन है, दुखरन मास्टर है, दुख है लेकिन वहां मुखर स्वर राजनीति ही है।

केदारनाथ सिंह की कविताएं गांव से लेकर शहर तक की भौगोलिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक दूरी को पाट जाती हैं। उनका गांव शहर को उचक-उचक कर देखने लगता है तो शहर भी अपने छूटे गांव के साथ संवाद करता है। प्रेमचंद की साधारणिकता और मुक्तिबोध की वैचारिकता केदारनाथ सिंह के गांव से लेकर शहर तक में टकराती है। दिल्ली जैसे महानगर में आकर दूर से अपना गांव देखने लगते हैं तो जब गांव लौटते हैं तो वहां से दिल्ली दूर नहीं दिखती। दूर से देखना और निकटता का अहसास करना उनकी कविता में दिखता है। वे साधारण ग्रामीण मनुष्य को नायकत्व देते हैं, लेकिन वह भी बहुत तेज स्वर में नहीं। इनके यहां जो वैविध्य है, वह बहुत कम कवियों में दिखाई देता है। केदारनाथ सिंह की शुरू की कविताओं में बिंबात्मकता बहुत ज्यादा है। लेकिन जैसे ही कविताओं में रूपवादी फैशन का दौर आता है ये खुद को वहां से अलग करते हैं। सपाटबयानी ही वह काव्यविधान है जो केदारनाथ सिंह की देन है। साधारण मनुष्य की सपाटबयानी में इनका लक्ष्य संवेदना को पकड़ना होता है।

आज साधारण आदमी की जिंदगी क्लिष्ट हो गई है। मनुष्य की संवेदना में जो जटिलता आ रही है उसे पकड़ने की क्षमता ही इनकी कविता को नया बनाती है। दिल्ली में बलिया के और बलिया में दिल्ली वाला बन जाना। विस्थापित हो रहे साधारण मनुष्यों की पीड़ा इनकी कविताओं में महसूस होती है। जिस शहर की ओर मजबूर होकर वह विस्थापित होता है वह शहर उसे झटकता रहता है और वह गांव भी उसे खारिज करता है जहां वह शहर से घबराकर लौटता है। आधुनिकता की प्रक्रिया में यही साधारण आदमी तो सबसे ज्यादा उखड़ा है। इन्हीं उखड़े हुए लोगों के लिए शब्दों का पुल बनाने वाले कवि को सलाम।

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