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बेबाक बोलः राजकाज- साडा हक

मेरी हड्डियां/मेरी देह में छिपी बिजलियां हैं/मेरी देह/मेरे रक्त में खिला हुआ कमल...। कवि केदारनाथ सिंह की इन पंक्तियों के साथ हमने उन किसानों को देखा जो अपने चेहरे की झुर्रियों में उम्मीद की रोशनी और पैर के छालों में संघर्ष का नारा लेकर आए थे। वर्ग अलग था लेकिन यहां संवदेनाओं का संघर्ष साझा था। जनता ने जनता को पहचान लिया था। मध्य वर्ग उस तबके को देख कर ठिठका हुआ था जिनके पांवों में चप्पल तक नहीं है वे बच्चों की परीक्षाओं की चिंता कर रहे हैं। माओवादी और नक्सली करार दिए जा रहे किसानों का मुंबईकरों ने दिल खोल कर स्वागत किया। इन किसानों को अंदाजा था कि एक हफ्ते तक अपनी खेती, किसानी या मजदूरी का काम छोड़ कर संघर्ष की राह पर चलने का खतरा यह हो सकता है कि उनके घरों में और कुछ दिनों तक चूल्हा न जल पाए। लेकिन जब आपके पास खोने के लिए कुछ नहीं रहता तो संघर्ष के सिवा कोई विकल्प नहीं होता। किसानों की मांगें मानी गर्इं और वे संघर्ष की राह को माप-जोख कर वापस लौटे। भारतीय कृषि क्षेत्र का संकट जितना बड़ा है उसमें किसानों की इस छोटी जीत के क्या मायने हैं इस पर बेबाक बोल।

देश की औद्योगिक राजधानी में पहुंचा यह आदिवासियों और किसानों का जत्था सबसे ज्यादा वंचितों का तबका था।

काल वह कीमत है जो भारतीयों को खरगोशों की तरह बच्चे पैदा करने के कारण चुकानी पड़ी। ..अकाल से लोग मर रहे हैं तो अब तक गांधी क्यों नहीं मरा…’। फिल्म ‘डार्केस्ट आवर’ में विंस्टन चर्चिल की भूमिका निभा रहे गैरी ओल्डमैन जिस तरह से इस संवाद को बोलते हैं वह उत्तर ब्रेग्जिट काल में ब्रिटेन का गौरवशाली अतीत खोजने की कोशिश भर है, जब महारानी के राज में सूरज नहीं डूबा करता था। औपनिवेशिक भारत में बंगाल का अकाल जहां मानवता के लिए तमाचा था, वहीं भारत में सैन्य अधिकारी के रूप में रहे नेता जो ब्रिटेन का प्रधानमंत्री बनने वाले थे, भूख से मरते हुए भारतीयों की तुलना खरगोशों से कर रहे थे (फिल्म के मुताबिक)।

शशि थरूर के ट्वीट को रीट्वीट करने के बाद जेहन में बंगाल का वह कुख्यात अकाल भी घूमा और कानों में शब्द भी गूंजे कि ये किसान नहीं, नक्सली हैं। देखना ये बिस्लेरी का पानी पिएंगे और उसके बाद बिरयानी खाएंगे। आज भारत में उत्तर आजादी के इस समय में वह विंस्टन चर्चिल याद आ रहे हैं जो सिनेमा में कहते हैं कि जब अकाल से लोग मर रहे हैं तो गांधी क्यों नहीं मरा। जिन भारतीय नागरिकों के पास खोने के लिए कुछ नहीं बचा है उन्हें नक्सली और माओवादी कहा जा रहा था। किसान कह रहे थे कि जिनका खून सफेद हो जाता है उन्हें लाल रंग से डर लगता है।

हिंदी फिल्म ‘तीसरी कसम’ में गाड़ीवान बाईजी से पूछता है, ‘मन समझती हैं न आप’। जो लोग मुंबई विधानसभा की ओर बढ़ रहे थे, उनके मन से पहले उनके पांव देखे। स्टीफन हॉकिंग के ही उद्धरण तो दिमाग में उमड़-घुमड़ रहे थे कि अपने पैरों की ओर नहीं सितारों की ओर देखना सीखो। लेकिन अभी तो इनके पैर बता रहे कि सितारे आंखों की रडार से दूर हैं। मशीनी सभ्यता में कहीं मानव न छूट जाए। इस मानव का न मन देखा और न तन और उसे नक्सली घोषित कर दिया। अपने जीने का हक मांगने के लिए मुंबई विधानसभा के पास पहुंच रहे थे ये किसान। इनमें से ज्यादातर नाशिक के पास के किसान थे, जिसका बड़ा क्षेत्र आदिवासी बहुल है। जंगल कानून में परिवर्तन होने के बाद से इनके खेतों को जंगल घोषित कर दिया गया था। उनकी रोजी-रोटी का मुख्य आधार वही जंगल था, जिस पर अब सरकार का अधिकार था। जब जीना मुश्किल था तो सीधे सरकार बहादुर के पास पहुंचे कि हम खाएं क्या, हमारे खेत हमें लौटा दो, जब फसल ही नहीं हुई तो कर्ज कहां से लौटाएं।

देश की औद्योगिक राजधानी में पहुंचा यह आदिवासियों और किसानों का जत्था सबसे ज्यादा वंचितों का तबका था। जिनके पांव में चप्पल नहीं थी, उनके पास खोने के लिए क्या हो सकता है। इनका सवाल सिर्फ रोजी और रोटी का सवाल नहीं है। आदिवासी समुदाय के लिए जंगल उनकी सभ्यता और संस्कृति का भी हिस्सा होता है। खेतों और जंगलों से उनके अधिकार छीन कर उन्हें आर्थिक के साथ सांस्कृतिक संकट में भी डालना है। अगर ये अपने जंगल से उजड़ते हैं तो शहरी आर्थिक आकंड़ों में शून्य बना कर गुम कर दिए जाएंगे।
आंध्र, छत्तीसगढ़ से लेकर झारखंड तक नक्सल प्रभावित इलाकों का हाल देखिए, जहां कमजोर तबके से जुड़े लोग नक्सलवाद के रास्ते पर चलने के लिए मजबूर कर दिए गए। लेकिन महाराष्टÑ के वंचितों का यह वैसा मोर्चा था जिसने लोकतांत्रिक ढांचे में संगठित होकर पहली जीत हासिल की बिलकुल अहिंसक और अनुशासित तरीके से। इस तबके से अब तक इतना बड़ा प्रतिरोध नहीं निकला था।

इसके पहले हमने राजस्थान में भी किसान आंदोलन देखा था, लेकिन यह आंदोलन उससे काफी अलग था। राजस्थान में किसानों का बड़ा तबका जाट समुदाय का है जो एक खास सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक हैसियत रखता है और सरकार के साथ संवाद कर सकता है। लेकिन महाराष्टÑ के ये आदिवासी व किसान हाशिए पर थे और पहली बार खामोशी से सरकार के सामने थे।

ये किसान आजाद भारत के ‘विंस्टन चर्चिल’ से सामना कर रहे थे। सैकड़ों किलोमीटर की यात्रा, पैरों से रिसता खून और चिंता इस बात की कि दिन में नहीं चलना है, बच्चों की बोर्ड परीक्षा है। जिस हाईवे पर आप 100 किलोमीटर की स्पीड पर गाड़ी दौड़ाते हैं उस तपती सड़क पर 35 डिग्री के तापमान में ये नंगे पांव चल रहे थे। मुंबई का मध्य वर्ग और संभ्रांत तबका उनके अनुशासन से ठिठका हुआ था। स्विमिंग पूल वाली सोसायटी में रहने वालों को शिकायत है कि कल मेरे बच्चे की बोर्ड परीक्षा है और पड़ोसी दिन भर कानफोड़ू आवाज में डीजे चला रहे हैं कि ‘पार्टी यूं ही चालेगी…आंटी पुलिस बुला लेगी’। मुंबईकरों ने देखा कि हमारे ‘संभ्रांत’ पड़ोसियों को हमारे बच्चों की परीक्षा की चिंता नहीं लेकिन जिन्हें पूरी शिक्षा व्यवस्था के ढांचे से बाहर रखा गया है, वे इतने बड़े आंदोलन की रूपरेखा में इस अहम तथ्य को शामिल रखते हैं कि परीक्षा देने जा रहे बच्चों को दिक्कत नहीं हो।
इन्होंने तो मुंबई से लेकर पूरे देश के मध्य वर्ग और उच्च वर्ग को एक संदेश दिया कि हम आपके बारे में इतना जानते हैं, इतना सोचते हैं। आप हमारे बारे में कितना जानते हैं और कितना सोचते हैं। हम आपके प्रति इतने संवदेनशील हैं, हमारे प्रति आपकी संवेदना क्या कहती है। आप तो किसान और खेतिहर मजदूर का फर्क भी नहीं जानते हैं। आप तो यह भी नहीं जानते कि आदिवासी भी किसान होते हैं। जब किसान से खेत छिनता है तो वह मजदूर बन जाता है।

संभ्रांत लोगों का टीवी चैनल पूछने लगा कि इनके पास इतना खाना कहां से आया। पचास हजार लोगों को खाना कौन खिला रहा है। अलमुनियम की परतों में खाना लपेट कर रखने वाले शहरी नौकरीपेशा लोग तौलिये और साड़ी के टुकड़ों में बंधी रोटी और मुरमुरे की कीमतों का अंदाजा नहीं लगा पा रहे थे। उन्हें ये चीजें हड़प्पाकालीन लग रही होंगी। किसानों के हाथ का केला उन्हें नक्सली का हथियार दिख रहा था। वैसे भी इस मीडिया का गणित तो नीरव और मेहुल चोकसी की गाड़ियों और घड़ियों की कीमत तय करने में ही गड़बड़ा गया था।
किसानों की इस खामोश यात्रा ने संवेदना के स्तर पर जो चीख मचाई है उसी से इसकी सफलता का अंदाजा लगाया जा सकता है। वंचितों का यह आंदोलन मध्य वर्ग के सोशल मीडिया पर छाया हुआ था। चमड़ा निकल कर खून रिसता किसान महिला का पांव लोगों का परिचयात्मक चित्र बन गया। संघर्ष की राह पर चला वह पांव मोनालिसा की मुस्कुराहट को मात दे रहा था। जितनी कविताएं, जितने मार्मिक उद्धरण दिए इस आंदोलन ने वह भी एक इतिहास रच गया। आम मुंबईकरों ने भी उनका दिल खोल कर स्वागत किया। ‘डब्बावाले’ उनके लिए खाना लेकर पहुंचे, तो सिखों का लंगर हर भूखे पेट का स्वागत करने के लिए तैयार रहता ही है। किसानों को नक्सली और माओवादी बोलने वाले परिदृृश्य से गायब हो चुके थे और आम लोग कुछ ज्यादा ही आम लोगों के दर्द से रूबरू हो रहे थे।

जब फ्रांस के राष्टÑपति भारत को सौर ऊर्जा का तोहफा दे रहे थे तो किसान रैली में नाशिक के त्र्यंबकेश्वर तालुका के किसान लक्ष्मण भासरे अपने सिर पर सौर ऊर्जा का पैनल लेकर चल रहे थे। अपने साथ संघर्ष के साथियों का मोबाइल भी चार्ज कर रहे थे। ये किसान कह रहे थे कि हम उस सरकार से मिलने आए हैं जिसने हमें अकेला छोड़ दिया। हम न तो आत्महत्या करेंगे और न नक्सली बनेंगे। हमारा तो एक ही संदेश है, ‘साडा हक ऐत्थे रख’।

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