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बेबाक बोलः मंदिर मार्ग

कन्हैया कुमार, हार्दिक पटेल, रोहिंग्या पक्ष, राम मंदिर विपक्ष, लव जेहाद पक्ष, तीन तलाक पक्ष, और कांग्रेस का बड़ा नेता कपिल सिब्बल....। छह दिसंबर को रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद में कपिल सिब्बल का फैसला देने के लिए 2019 तक इंतजार करने के तर्क के अदालत परिसर के बाहर आते ही सोशल मीडिया पर इसी तरह के संदेश विचरण करने लगे। सोशल मीडिया, भाजपा और संघ के नेता तक ही नहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी कपिल सिब्बल को घेरा। काबिल वकील और कांग्रेसी नेता की दोहरी भूमिका पर सवाल उठे। कहा जाने लगा कि सिब्बल का एक यह बयान गुजरात में कांग्रेस की लुटिया डुबो देगा। क्या वाकई हमें कपिल सिब्बल को दोहरे रूप में नहीं देखना चाहिए और किसी एक रूप को चुनना चाहिए? काले कोट वाले भरपूर कमाई वाले वकील या कांग्रेस के उजले कुर्ते वाले नेता। किस इकहरे को चुनें?

पर तारीख नहीं बताएंगे…
राम मंदिर भाजपा के लिए आस्था का मुद्दा तो बस दिखावे भर के लिए रहा है। हकीकत यह है कि राम मंदिर को लेकर न भाजपा कभी गंभीर दिखी और न मंदिर निर्माण का दावा करने वाला विश्व हिंदू परिषद। 1989 के लोकसभा चुनाव में पहली बार जरूरत महसूस हुई थी भाजपा को अयोध्या में राम मंदिर की। चुनाव में तो लगातार राम की सौगंध खाते रहे कि मंदिर वहीं बनाएंगे पर सत्ता मिलते ही सुर हर बार बदल गया। सफाई आई कि दो ही रास्ते हैं, या तो बातचीत से समाधान या फिर अदालती फैसला। कांग्रेस के राज में भाषा अलग थी। तब भाजपा कहती थी कि कांग्रेस सरकार को अयोध्या की विवादित जमीन का अधिग्रहण कर और कानूनी प्रक्रिया से मंदिर निर्माण करना चाहिए। अपनी बारी आई तो पीठ दिखाने लगे। अब तो घर-घर से सवा रुपए और एक शिला के हिसाब से जुटाई गई करोड़ों की रकम का पता न लाखों शिलाओं का। तभी तो जुमला गढ़ दिया विरोधियों ने-सौगंध राम की खाते हैं, मंदिर वहीं बनाएंगे। पर तारीख नहीं बताएंगे।

चाहे कांग्रेस हो या भाजपा। चाहे कपिल सिब्बल हों, पी चिदंबरम या अरुण जेटली। दोनों खेमों के काले कोट वाले इन उदार चेहरों के साथ जुड़ी है उदार बाजार की वकालत। याद करें, गुजरात दौरा शुरू करने के पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यूं ही नहीं कहा था कि जीएसटी मेरे अकेले का नहीं किया है। पूरे देश के आर्थिक ढांचे को बदल देने वाला जीएसटी कांग्रेस की भी स्वप्न परियोजना थी और उसका विरोध भाजपा सरकार के इसे लाने के तरीके भर से था। आधी रात के संसद सत्र से विरोध भर था। बाकी जीएसटी के लिए लाल कालीन तो कांग्रेस के वकील बिछा ही चुके थे जिस पर भाजपा के वकील बिल्ली की चाल (फैशन शो का कैट वॉक) चले थे। बिल्ली की धीमी चाल में कांग्रेस की पदचाप छुपाने की कोशिश की गई थी। लेकिन जब जीएसटी कारोबारियों के जी का जंजाल बना और कमल का फूल कारोबारियों को भूल लगने लगा तो जीएसटी में कांग्रेस का ‘हाथ’ दिखा दिया गया।

आर्थिक नीतियों की बात करें तो कांग्रेस और भाजपा में कोई विरोध है ही नहीं। सिब्बल, चिदंबरम से लेकर जेटली तक वर्ल्ड बैंक की नीतियों के वाहक रहे हैं। वहीं हम यह भी देख चुके हैं कि राहुल गांधी गुजरात में एक विभाजक रेखा खींच चुके हैं। बड़े उद्योगपति बनाम छोटे कारोबारियों और किसानों की। वे मोदी सरकार की सूट-बूट सरकार पर आरोप लगा रहे थे कि यह कुछ घरानों तक सिमटी है। उन्होंने उस सुनहरी छुअन को बार-बार दिखाने की कोशिश की जिससे कुछ ही लोग बहुत ज्यादा अमीर हो रहे हैं। अब जबकि कांग्रेस सत्ता में नहीं है तो राहुल गांधी किसानों की बात कर रहे हैं।

मुश्किल यह है कि राहुल जिस मोदीशास्त्र और सूट-बूट सरकार पर हमला कर रहे हैं वह कांग्रेस की नीतियों का हिस्सा रहा है। कल जो कांग्रेस कर रही थी वह आज भाजपा कर रही है। इसलिए यहां पर सिब्बल के काले कोट और उजले कुर्ते को एकहरा ही देखने की जरूरत है। चुनावी समय को छोड़ दें तो काले कोट और उजले कुर्ते का घालमेल कांग्रेस और भाजपा दोनों में चल रहा है। याद करें, कांग्रेस में स्वदेशी के पक्षधर मणिशंकर अय्यर को कैसे किनारे किया गया था (यह ‘नीच कांड’ से पहले की बात है)। और, अब भाजपा की सरकार आने के बाद स्वदेशी का डिब्बा कहां गुल कर दिया गया है। भारतीय मजदूर संघ और स्वदेशी जागरण मंच जब रामलीला मैदान जैसी बड़ी जगह पर बड़ा प्रदर्शन करते हैं तो मजबूरी में चीनी उत्पादों के छोटे मुद्दे तक ही सिमट कर रह जाते हैं। अब उन्हें कौन याद दिलाए कि भारत के प्रधानमंत्री न तो मनमोहन सिंह हैं और न वित्त मंत्री पी चिदंबरम। जरा विरोध का सिर उठा कर देखिए तो आपको प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और वित्त मंत्री अरुण जेटली दिखेंगे जिनकी नीतियों से स्वदेशी का इतना ही भला होता दिखा कि खादी एवं ग्रामोद्योग आयोग के कैलेंडर पर महात्मा गांधी के बजाए नरेंद्र मोदी की तस्वीर आ गई। और, आप जिस दिन चाहें चीनी उत्पादों का आयात बंद कर सकते हैं, उसके लिए शी जिनपिंग या मनमोहन सिंह से इजाजत लेने की जरूरत तो है नहीं।

आर्थिक मुद्दे पर दोनों एक ही हैं तो कपिल सिब्बल के काले कोट और उनकी कमाई के सिक्कों की खनक पर इतना हंगामा क्यों? जाहिर है कि यह हंगामा गुजरात चुनावों के मद्देनजर ही बरपा है। अगर प्रधानमंत्री तक इस पर बोले हैं तो यह संकेत तो नहीं कि 2019 तक यह सरकार मंदिर निर्माण के मार्ग पर आगे बढ़ेगी? क्या जनता 2014 को भूल जाएगी?
आखिर 2014 क्या है? वह अब 2017 का गुजरात है जहां पिछले 22 सालों से भाजपा का राज है। सत्ताधारी पार्टी को पाटीदार आंदोलन आईना दिखा ही चुका था और जीएसटी के बाद व्यापारियों का एक बड़ा वर्ग उसके खिलाफ हो चुका था। याद करें कि 2015 के दिसंबर में गुजरात में हुए निकाय चुनावों में कांग्रेस ने 20 साल बाद ग्रामीण इलाकों में शानदार वापसी की थी। कांग्रेस जिला पंचायतों की 31 में से 21 सीटें जीती वहीं सत्ताधारी भाजपा का कब्जा शहरी इलाकों पर बरकरार रहा था। यह सच है कि जीएसटी और नोटबंदी के बाद हालात और बिगड़े ही हैं। गुजरात में कांग्रेस हवा का रुख भाजपा के खिलाफ करने में कामयाब तो हुई।

दलित स्वाभिमान से छिड़ा मसला आरक्षण से लेकर जीएसटी तक पहुंचा। छोटे कारोबारियों को निगल रहे बड़े उद्योगपति, सामंती समाज से निकल रहा जाति का नया समीकरण और मध्य प्रदेश से लेकर राजस्थान व महाराष्टÑ तक फैल रहा किसानों का असंतोष और आंदोलन भाजपा को काफी परेशान कर चुका था। पाटीदार और व्यापारी खुले तौर पर भाजपा के खिलाफ खड़े हुए। मीडिया के कैमरों ने दिखाया कि सत्ताधारी मुख्यमंत्री के रोड शो में जनता नदारद रही। बर्कले से आकर राहुल मंदिर से लेकर जनेऊ तक के मुद्दे पर उछाले गए। घर-घर मोदी वाले गुजरात में राहुल वैसे ही दिख रहे थे जैसे 2014 में पूरी कांग्रेसी जमात के बरक्स मोदी का चेहरा चमक रहा था। गुजरात के इस नए समीकरण ने भाजपा के लिए सबसे बड़ा खतरा पैदा किया कि कहीं प्रतिबद्ध वोटरों की संख्या कम न हो जाए जो हवा का रुख बदल दें।

भाजपा और संघ को पता है कि चुनावों में हवा बनाने और बिगाड़ने का काम प्रतिबद्ध मतदाताओं का ही होता है। आम लोगों का मन इसी हवा के साथ हिचकोले खाने लगता है। टीवी पैनलों, अखबारी खबरों और सड़कों पर हुई चर्चा के बाद वह मन बनाता है कि वोट किसे देना है। इसलिए जनता को मंदिर मार्ग पर ले जाना जरूरी दिखा। कपिल सिब्बल को घेर कर भाजपा ने जता दिया है कि उसके पास चुनाव के तीन मुद्दे ही रहने हैं पहला मंदिर, दूसरा मंदिर और तीसरा सिर्फ मंदिर। अमित शाह अपने किले में पड़ी इस दरार को देख चुके थे। उन्हें भी पता है कि यह 2014 के लोकसभा चुनावों जैसा ही है। जीतना भी भाजपा को है और हारना भी भाजपा को है। याद रखें, हम टिप्पणीकारों ने 2014 में सबसे ज्यादा जुमला यही उछाला था कि यह मोदी की जीत नहीं कांग्रेस की हार है। आज गुजरात में 22 साल वाली भाजपा 70 साल वाली कांग्रेस की स्थिति में है। भाजपा भूल चुकी है कि 2014 में वह जनपक्षीय मुद्दों को उभार कर सत्ता में आई है। अब 2019 में तो मंदिर मार्ग ही दिख रहा है।

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